भारत ने Chandrayaan-3 की सफलता से विश्व में नई पहचान बनाई. इस उपलब्धि के पीछे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसरो दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियों में गिना जाता है. प्रतियोगी परीक्षाओं में इसरो , उसके मिशन और वैज्ञानिक उपलब्धियों से जुड़े प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं.
आज इसरो अंतरिक्ष कार्यक्रमों व सैटेलाइट प्रक्षेपण के मामले में दुनिया का सबसे किफायती व विश्वशनीयता के कारण काफी प्रसिद्ध हो गया हैं. किसी समय बैलगाड़ी व साईकिल से संवेदनशानशील उपकरणों की ढुलाई के कारण इसरो के कंगाली का मजाक बना था. लेकिन चाँद और मंगल के सफर के बाद इस अंतरिक्ष संगठन के साहसिक उड़ान का लोहा आज पुरा दुनिया मानता है.
जब 75 साल पहले 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, तो उस वक्त देश में खाने, रहने समेत तमाम मुश्किलें थी. भारत की स्थिति उस वक्त आज के सोमालिया की तरह ही थी. लेकिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री के साथ ही देशवासियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया. वे साहस बटोरकर धैर्यपूर्वक आगे बढ़ते रहे.
अंतत: साल 1962 में वह घड़ी आई जब भारत ने अंतरिक्ष का सफर करने का फैसला किया. इस साल देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) की स्थापना की. यहीं से भारत का अंतरिक्ष तकनीक (Space Technology) के क्षेत्र में सफर शुरू हुआ. आज भारत की इसरो दुनिया की 6 सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है. तो चलिये जानते हैं कि आखिर इसरो कैसे प्रसिद्द हुआ और उसके रास्ते में कौन-कौन सी अड़चने आईं जैसे अनेक महत्वपूर्ण बारीक जानकारियां-
इसरो का पुराना नाम क्या है? (Full Name of ISRO in Hindi)
इसरो का पुराना नाम INCOSPAR है. भारत सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को बढ़ा देने के लिए साल 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति’ (Indian National Committee for Space Research -INCOSPAR) की स्थापना की थी. तब यह परमाणु अनुसंधान विभाग (Department of Atomic Energy) के अंतर्गत आता था.
इसके प्रथम व संस्थापक अध्यक्ष थे- दूरदर्शी वैज्ञानिक डॉ विक्रम साराभाई. उनके नेतृत्व में, INCOSPAR ने ऊपरी वायुमंडलीय अनुसंधान के लिए तिरुवनंतपुरम के थुम्बा में इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS) की स्थापना की.
इसरो की स्थापना कब, कहाँ, किसने व कैसे की गई? (Foundation of ISRO in Hindi)
15 अगस्त 1969 को INCOSPAR का नाम बदलकर ISRO (Indian Space Research Organisation), मतलब इसरो की स्थापना की गई. यह संगठन वर्तमान में भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) के अधीन काम करता हैं. इस संगठन का मुख्यालय बैंगलोर में हैं.
“डॉ. विक्रम साराभाई को भारत में आधुनिक अंतरिक्ष कार्यक्रम का ‘संस्थापक जनक’ कहा जाता है. उनका मानना था कि अंतरिक्ष के संसाधनों से मनुष्य व समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व करने के लिये एक दल का गठन किया था. इसमें देश के सक्षम व उत्कृष्ट वैज्ञानिकों, मानवविज्ञानियों, समाजविज्ञानियों और विचारकों को शामिल किया गया था.”
1972 में, भारत सरकार ने अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की. फिर 01 जून, 1972 में इसरो को अंतरिक्ष एटॉमिक ऊर्जा विभाग से अंतरिक्ष विभाग के अधीन कर दिया गया. इसरो के अलावा अंतरिक्ष विभाग, खगोल विज्ञान (Astronomy) और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Technology) के क्षेत्र में भारत सरकार में अन्य संस्थानों को नियंत्रित करता है.
इसरो क्यों प्रसिद्ध है? (What is ISRO famous for?)
ISRO अपने किफायती व सुरक्षित अंतरिक्ष मिशन के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि साल 1999 से अब तब इसरो ने अपनी वाणिज्यिक शाखा (एंट्रिक्स) के ज़रिये ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) द्वारा 34 देशों के 345 विदेशी उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है.
इसरो दुनिया की उन छह सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है, जिसके पास खुद की पूर्ण प्रक्षेपण क्षमताएं, क्रायोजेनिक इंजन, पृथ्वी के बाहर मिशन लांच करने की क्षमता और कृत्रिम उपग्रहों के बड़े बेड़े का संचालन है.
इसरो को मंगल मिशन व चंद्रयान-1 की सफलता से भी काफी प्रसिद्धि मिली हैं.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान का इतिहास व विकास (History of Indian Space Research and Development in Hindi)
भारत में अंतरिक्ष सम्बन्धी तकनीक का आगमन मध्यकाल व आधुनिकाल के बीच हो चुका था. भारत के दक्षिणी राज्य मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने रॉकेट का इस्तेमाल करते हुए कई युद्ध जीते थे. हालांकि उनके पिता हैदर अली ने भी इसका इस्तेमाल किया था, लेकिन वे उतने सफल नहीं रहे, जितना टीपू.
टीपू सुल्तान ने दूसरे (1780–84), तीसरे (1790–92) व चौथे (1798–99) एंग्लो-मैसूर युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ लोहे के बने रॉकेटों का इस्तेमाल किया. इसी से प्रभावित होकर, विलियम कंग्रीव ने 1804 में कंग्रीव रॉकेट का आविष्कार किया.
रॉकेट मूलतः भारत के पड़ोसी देश चीन का आविष्कार था और आतिशबाजी के रूप में पहली बार प्रयोग किया गया था. फिर प्राचीन रेशम मार्ग से होते हुए मैसूर तक लाया गया. टीपू सुलतान द्वारा इस्तेमाल किए गए राकेट आज भी लंदन के मशहूर साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के जमाने के कुछ रॉकेट रखे हैं, जिन्हें अंग्रेज अपने साथ 18वीं सदी के अंत में ले गए थे.
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, 10 सितम्बर 1780 में दूसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान, पोल्लिलूर या पेराम्बकम, कांजीवरम, तमिलनाडु के पास हुए लड़ाई में सबसे उन्नत राकेट का उपयोग किया गया था. वहीं, सर काँग्रीव ने तीसरे आंग्ला-मैसूर युद्ध से राकेट बनाने की प्रेरणा ली थी.
चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू सुलतान के मौत के साथ ही भारत से राकेट गायब हो गया. उसके बाद इस दिशा में आजादी के बाद ही काम किया गया.
एक नजर: ISRO के प्रमुख मिशन
| मिशन | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| Aryabhata | 1975 | पहला उपग्रह |
| Chandrayaan-1 | 2008 | चंद्र अध्ययन |
| Mangalyaan | 2013 | मंगल मिशन |
| Chandrayaan-2 | 2019 | चंद्र अन्वेषण |
| Chandrayaan-3 | 2023 | सफल चंद्र लैंडिंग |
| Aditya-L1 | 2023 | सूर्य अध्ययन |
1960-1970 का दशक व अंतरिक्ष कार्यक्रम का शुरुआत (Starting of Indian Space Programme in Hindi)
साल 1957 में रूस द्वारा स्पूतनिक के सफल प्रक्षेपण के बाद कृत्रिम उपग्रहों के महत्ता को पुरे दुनिया ने माना. 1962 में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की स्थापना हुई. इसी के साथ अनुसंधित रॉकेट का प्रक्षेपण के लिए कार्य-योजना पर काम शुरू किया गया. इसमें भारत की भूमध्य रेखा की समीपता वरदान साबित हुई.
भारत ने साउंडिंग रॉकेट टेक्नोलॉजी में महारत हासिल करने के बाद उपग्रह प्रक्षेपण यान विकसित करने का शुरू कर दिया. पहला प्रयास पृथ्वी के निचले कक्षा में 35 किलोग्राम वजन के उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित करने के प्रयास शुरू किए गए. सात साल में इसरो ने 400 किलोमीटर की कक्षा में 40 किलोग्राम का उपग्रह प्रक्षेपित करने का तकनीक प्राप्त किया.
1970 से 90 के दो दशक का दौर
इस समय, भारत ने भविष्य में संचार की आवश्यकता एवं दूरसंचार का पूर्वानुमान लगते हुए, उपग्रह के लिए तकनीक का विकास प्रारम्भ कर दिया था. भारत की अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रथम यात्रा 1975 में रूस के सहयोग से इसके कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से शुरू हुई.
1979 तक, नव-स्थापित द्वितीय प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से एस.एल.वी. प्रक्षेपण के लिए, एक एसएलवी लॉन्च पैड, ग्राउंड स्टेशन, ट्रैकिंग नेटवर्क, रडार और अन्य संचार स्थापित किए गए. 1979 में रोहिणी तकनीक का पेलोड SLV के जरिए प्रक्षेपित किया गया. लेकिन द्वितीय स्तरीय असफलता (पेलोड से उपग्रह अलग नहीं हो पाना) के कारण इसे वांछित कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका.
1980 तक इस समस्या का निवारण कर लिया गया. इसके बाद 1980 में ही SLV राकेट द्वारा RS-I उपग्रह के साथ सफल प्रक्षेपण किया गया. इससे भारत भी यूएसएसआर, यूएस, फ्रांस, यूके, चीन और जापान के बाद पृथ्वी की कक्षा कृत्रिम उपग्रह पहुँचाने वाला सातवां देश बन गया.
भारत ने अपने यादगार सफलता के बाद, 1978 में 600 किलोग्राम के वजन के साथ 1000 किलोमीटर तक (सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट) में प्रक्षेपण के कार्य-योजना पर काम शुरू किया. यही कार्य बाद में PSLV के विकास का आधार बना.
1983 में SLV-3 बंद कर दिया गया. इससे पहले इस दो और प्रक्षेपण हुए थे. इसके बाद सन 1985 में इसरो ने तरल प्रणोदन प्रणाली केंद्र (एलपीएससी) स्थापित किया. इस परियोजना में, फ्रेंच वाइकिंग तकनीक पर आधारित एक अधिक शक्तिशाली इंजन “विकास” पर काम शुरू किया गया. दो साल बाद, तरल ईंधन वाले रॉकेट इंजनों के परीक्षण के लिए फैसिलिटी सेंटर्स स्थापित की गईं और विभिन्न रॉकेट इंजन थ्रस्टर्स का विकास और परीक्षण शुरू हुआ.
उसी समय, एसएलवी -3 पर आधारित एक और ठोस ईंधन रॉकेट संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान विकसित कर कृत्रिम उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा (जीटीओ) में लॉन्च करने के लिए प्रौद्योगिकियां विकसित की जा रही थीं.
इसके साथ ही, भारतीय राष्ट्रीय संचार उपग्रह प्रणाली और पृथ्वी अवलोकन (Earth Observation) उपग्रहों के लिए भारतीय सुदूर संवेदन कार्यक्रम (Indian Remote Sensing Programme) के लिए प्रौद्योगिकियों (Technologies) को विकसित किया गया और विदेशों से लॉन्च किया गया. उपग्रहों की संख्या में वृद्धि के साथ ही और भारतीय कृत्रिम उपग्रह सिस्टम दुनिया का सबसे बड़ा कृत्रिम उपग्रहों का तारामंडल बन गया. इसमें मल्टी-बैंड संचार, रडार इमेजिंग, ऑप्टिकल इमेजिंग और मौसम संबंधी उपग्रह शामिल थे.
1990 से 21वीं सदी का स्वर्णिम दौर
1990 के दशक में पीएसएलवी का आगमन भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को स्वर्णिम दौर में ले गया. इस तकनीक के माध्यम से भारत ने देश-विदेश के सबसे अधिक कृत्रिम उपग्रह स्थापित किए हैं.
1994 में दो आंशिक विफलताओं के बाद, पीएसएलवी ने 50 से अधिक सफल उड़ानें भरी. PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) पृथ्वी पृथ्वी की निम्न कक्षा में उपग्रहों को स्थापित करने व जीटीओ के लिए छोटे पेलोड ले जाने में सक्षम है.
PSLV के साथ ही भारत उच्च कक्षा में प्रवेश के लिए क्रायोजेनिक इंजन आधारित GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) के विकास के काम पर लगा हुआ था. लेकिन जैसे ही अमेरिका को इसकी भनक लगी, उसने रुसी अंतरिक्ष एजेंसी ग्लावकास्मोस व भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो को चेतावनी दी. दरअसल, इस तकनीक का प्रयोग कर भारत अंतर-महादेशीय प्रक्षेपास्त्र विकसित कर सकता है, ऐसा अमेरिका को संदेह था. फिर अमेरिका ने साल 1992 में इसरो पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
इसके बाद भारत का रूस से क्रायोजेनिक इंजिन प्राप्त करने की कोशिश खटाई में पड़ गई. भारत ने इसके बाद विदेश से तकनीक खरीदने के बजाए खुद ही इसे विकसित करने का निर्णय लिया. इससे अमेरिका का रुख नरम हुआ व इसरो से प्रतिबन्ध हटाए लिया गया. इस तरह, इसरो पर 6 मई 1992 से 6 मई 1994 के बीच अमेरिकी सरकार का प्रतिबंध रहा था.
कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को GPS सेवा देने से मना कर दिया. इसके बाद भारत ने खुद का GPS सिस्टम IRNSS (Indian Regional Satellite Navigation System) विकसित करने का निर्णय लिया.
साल 2000 से आज तक (From 2000 to till date)
इसरो का चंद्रयान-1 मिशन (Chandrayaan-1 Mission of ISRO in Hindi):
चंद्रयान-1 मिशन 22 अक्टूबर 2008 को एसडीएससी शार, श्रीहरिकोटा से इसरो द्वारा 1380 किलोग्राम का चंद्रयान-1 चाँद के लिए छोड़ा गया. यह 14 नवंबर 2008 को चंद्रमा की सतह पर पहुँचा. चाँद पर तिरंगा लहराते ही भारत अपने बलबूते चंद्रमा पर झंडा लगाने वाला विश्व का चौथा देश बन गया.
इस मिशन का अंतरिक्ष यान चंद्रमा के रासायनिक, खनिज और फोटो-भूगर्भिक मानचित्रण के लिए चंद्रमा की सतह से 100 किमी की ऊंचाई पर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था. अंतरिक्ष यान में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में निर्मित 11 वैज्ञानिक उपकरण थे.
सभी प्रमुख मिशन उद्देश्यों के सफल समापन के बाद, मई 2009 के दौरान कक्षा को 200 किमी तक बढ़ा दिया गया. उपग्रह ने चंद्रमा के चारों ओर 3400 से अधिक परिक्रमाएं कीं और मिशन तब समाप्त हुआ जब 29 अगस्त 2009 को अंतरिक्ष यान के साथ संचार खो गया.
इस मिशन ने कई नई कामयाबी हासिल की, जिसमें चन्द्रमा पर जल का खोज भी शामिल है. 14 नवंबर 2008 को, चंद्रयान-1 ने शेकलटन क्रेटर पर प्रभाव डालने के लिए मून इम्पैक्ट प्रोब जारी किया था, जिससे पानी में बर्फ की उपस्थिति की पुष्टि करने में मदद मिली. सिलिकेट निकायों में ऐसी विशेषताओं से हाइड्रॉक्सिल- और/या जल-धारण किए हुए निकायों का पुष्टि होता है.
क्रायोजनिक इंजन:
रूस से क्रायोजेनिक इंजन प्राप्त करने में विफल रहने के बाद भारत ने खुद ही क्रायोजेनिक इंजिन बनाने के परियोजना पर काम शुरू कर दिया था. देश को इसका परिणाम दो दशक बाद 5 जनवरी 2014 को प्राप्त हुआ, जब ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो का फुल फॉर्म) ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की D5 उड़ान में किया.
मंगलयान :
साल 2014 में इसरो ने मंगलयान को मंगल की धरती पर उतारकर नया कीर्तिमान स्थापित किया. इस तरह ऐसा करने वाला भारत चौथा देश बना. इसरो के इस मिशन में महज़ 450 करोड़ रूपए खर्च हुए थे. खास बात यह है कि भारत एकमात्र ऐसा देश था जिसे पहली बार में ही मंगलयान को मंगल पर भेजने में सफलता मिल गई थी. इस मिशन को अब Mars Orbit Mission (MOM) भी कहा जाता हैं.
IRNSS:
इसी दशक में भारत ने अपना खुद का GPS नेविगेशन सिस्टम भी विकसित किया. इस परियोजना के तहत कुल सात कृत्रिम उपग्रह स्थापित करने का योजना था. हालाँकि एक आंशिक सफल (PSLV-XL-C22 – IRNSS के तहत प्रथम प्रक्षेपण) व एक असफल प्रक्षेपण (PSLV-XL-C39) कि वजह से कुल 9 लॉन्चिंग ISRO को करना पड़ा. मूलतः भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित इस सिस्टम के तहत हुए प्रक्षेपण से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी निम्नवत हैं-
| उपग्रह | प्रक्षेपण तारीख | प्रक्षेपण यान | नतीजा |
| IRNSS-1A | 1 जुलाई 2013 | PSLV-XL-C22 | आंशिक असफलता |
| IRNSS-1B | 4 अप्रैल 2014 | PSLV-XL-C24 | सफल |
| IRNSS-1C | 16 अक्टूबर 2014 | PSLV-XL-C26 | सफल |
| IRNSS-1D | 28 मार्च 2015 | PSLV-XL-C27 | सफल |
| IRNSS-1E | 20 जनवरी 2016 | PSLV-XL-C31 | सफल |
| IRNSS-1F | 10 मार्च 2016 | PSLV-XL-C32 | सफल |
| IRNSS-1G | 28 अप्रैल 2016 | PSLV-XL-C33 | सफल |
| IRNSS-1H | 31 अगस्त 2017 | PSLV-XL-C39 | असफल |
| IRNSS-1I | 12 अप्रैल 2018 | PSLV-XL-C41 | सफल |
इसरो रॉकेट एलवीएम3-एम2/वनवेब इंडिया-1 और 36 सैटेलाइट मिशन
23 अक्टूबर 2022 को लांच यह मिशन इसरो का पहला वाणिज्यिक मिशन है. साथ ही, प्रक्षेपण यान के साथ एनएसआईएल का भी पहला अभियान है. मिशन में वनवेब के 5,796 किलोग्राम वजन के 36 उपग्रहों के साथ अंतरिक्ष में ले जाया गया. एक साथ इतने सैटेलाइट का प्रक्षेपण इसरो के लिए एक रिकॉर्ड है.
एलवीएम3-एम2/वनवेब इंडिया-1 को आंध्रप्रदेश के श्राहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया. फिर, ब्रिटिश ग्राहक वनवेब के लिए 36 ब्रॉडबैंड संचार उपग्रहों को निचली कक्षा (एलईओ) में स्थापित किया गया. अंतरिक्ष विभाग के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) ने लंदन के वनवेब से इस संबंध में करार किया था.
चंद्रयान 3 (Chandrayaan-3 in Hindi)
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा चंद्रयान 3 मिशन का बहुप्रतीक्षित प्रक्षेपण 14 जुलाई, 2023 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से भारतीय समयानुसार दोपहर 2.35 बजे हुआ था. यह चंद्र मिशन चंद्रयान 2 का अनुवर्ती है, जिसे सितंबर 2019 में लॉन्च किया गया था.

चंद्रयान 2 ऑनबोर्ड कंप्यूटर और प्रणोदन प्रणाली की समस्याओं के कारण ‘विक्रम’ सॉफ्ट लैंडिंग को पूरा करने में विफल रहा और चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. अब चंद्रयान-3 मिशन में 23 अगस्त 2023 को सफल लेंडिंग के बाद इसरो ने बॉक्स के आकार के रोवर ‘विक्रम’ को तैनात दिया है. यह तैनाती चंद्रयान -2 मिशन में विफल रहा था.
चंद्रयान-3 मिशन के द्वारा भारत ने चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने में सफलता प्राप्त की है. इस हिस्से में सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता है, जिससे यहां हमेशा अँधेरा रहता है. इस वजह से इस हिस्से में दुनिया का कोई भी मिशन अभी तक नहीं उतर पाया है. इसलिए भारत का यह उपलब्धि काफी ख़ास है.
चंद्रयान 3 मिशन की योजना चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग और घूमने की एंड-टू-एंड क्षमता प्रदर्शित करने की है. मिशन के मुख्य उद्देश्य हैं:
- चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग का प्रदर्शन करना,
- चंद्रमा पर घूमते रोवर का प्रदर्शन करना; और
- यथास्थान वैज्ञानिक प्रयोगों का संचालन करना.
इसरो ने पहली बार जनवरी 2020 में इसकी घोषणा की. इसरो ने चंद्रयान 3 मिशन के लैंडर को चंद्रयान 2 की तुलना में अधिक मजबूत पैर वाला बनाया है.
इसे 2021 की शुरुआत में लॉन्च किया जाना था. लेकिन COVID-19 महामारी के कारण अंतरिक्ष यान के विकास और संयोजन में देरी हुई. महामारी की दूसरी लहर के कारण और देरी हुई. हालांकि प्रणोदन प्रणालियों का निर्माण और परीक्षण मई 2021 तक लगभग पूरा हो चुका था. अंततः 14 जुलाई, 2023 की तारीख तय होने के साथ, अंतरिक्ष यान को लॉन्च व्हीकल मार्क 3 (एलवीएम 3) रॉकेट पर लॉन्च किया गया.
एक अलग लैंडर और रोवर मॉड्यूल से युक्त, अंतरिक्ष यान के चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने और पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर यानी एक चंद्र दिवस तक संचालित होने की संभावना है.
चंद्रयान 3 मिशन ने चंद्रयान 2 के समान प्रक्षेपवक्र का अनुसरण किया है, जहां प्रणोदन मॉड्यूल ने चंद्रमा की ओर उड़ान भरने से पहले कई बार पृथ्वी की परिक्रमा किया. एक बार चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के भीतर, मॉड्यूल खुद को 100 x 100 किमी की गोलाकार कक्षा में ले गया. फिर, लैंडर अलग होकर और सतह पर उतर गया.
लॉन्च के समय से मॉड्यूल को चंद्रमा तक पहुंचने में लगभग एक महीने का समय लगा. इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. सिवन ने इस लैंडिंग को “आतंक के 15 मिनट” बताया है.
चंद्रयान-3 की सफलता का महत्व
चंद्रयान-3 ने भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाई. इस मिशन की सफलता ने दिखाया कि भारत जटिल अंतरिक्ष अभियानों को कम लागत में सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है. इसके साथ ही भारत चंद्रमा पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना. यह उपलब्धि भारतीय वैज्ञानिकों की तकनीकी क्षमता और वर्षों की मेहनत का प्रमाण है.
दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का क्षेत्र माना जाता है. यहाँ ऐसे क्रेटर मौजूद हैं जहाँ सूर्य का प्रकाश बहुत कम पहुँचता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन क्षेत्रों में जल-बर्फ के भंडार हो सकते हैं. चंद्रयान-3 ने इसी चुनौतीपूर्ण क्षेत्र के निकट सफल लैंडिंग करके इतिहास रच दिया. ऐसा करने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना.
विक्रम लैंडर (Vikram Lander)
‘विक्रम‘ लैंडर (डॉ विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया नाम) ने चंद्रमा की सतह के तापमान और भूमिगत विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए अपने चार वैज्ञानिक पेलोड तैनात किया है. मॉड्यूल में ‘स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्री ऑफ हैबिटेबल प्लैनेट अर्थ’ (SHAPE)’ नामक एक उपकरण है, जो पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित और परावर्तित प्रकाश के बारे में डेटा एकत्र करेगा.
विक्रम लैंडर चंद्रयान-3 का वह भाग था जिसे चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित उतरने के लिए विकसित किया गया था. इसकी सफल लैंडिंग ने चंद्रयान-2 से मिले अनुभवों को वास्तविक सफलता में बदल दिया. लैंडर पर लगे वैज्ञानिक उपकरणों ने चंद्र सतह के तापमान, कंपन और स्थानीय वातावरण से जुड़े महत्वपूर्ण आँकड़े एकत्र किए. यह भविष्य के भारतीय चंद्र अभियानों के लिए भी उपयोगी साबित होगा.
प्रज्ञान रोवर (Pragyan Rover)
‘प्रज्ञान‘ रोवर, चंद्रमा के चारों ओर घूमते हुए रासायनिक और दृश्य परीक्षणों का उपयोग करके चंद्रमा की सतह का अध्ययन करेगा. प्रज्ञान एक छह पहियों वाला रोवर है, जिसे विक्रम लैंडर से चंद्र सतह पर उतारा गया. इसका कार्य चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों का अध्ययन करना है. रोवर ने दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सल्फर सहित कई तत्वों की उपस्थिति की पुष्टि की. इन खोजों से वैज्ञानिकों को चंद्रमा की संरचना और उसके विकास को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिली.
आदित्य-एल1 (Aditya-L1) मिशन
आदित्य-एल1 भारत का पहला समर्पित सौर मिशन है. इसका उद्देश्य सूर्य के बाहरी भागों और उससे जुड़ी गतिविधियों का अध्ययन करना है. यह मिशन वैज्ञानिकों को सूर्य के व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में सहायता प्रदान कर रहा है. आदित्य एल 1 मिशन को 2 सितंबर 2023 को सुबह 11:50 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था.
यह इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित L1 (लैग्रांज बिंदु-1) के आसपास अपनी निर्धारित हेलो कक्षा में कार्य कर रहा है. यह स्थान पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है. 6 जनवरी 2024 को अंतरिक्ष यान ने इस कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश किया था. तब से यह लगातार सूर्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ वैज्ञानिकों तक पहुँचा रहा है.
प्रक्षेपण से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रक्षेपण तिथि: 2 सितंबर 2023
- प्रक्षेपण समय: सुबह 11:50 बजे (IST)
- प्रक्षेपण यान: PSLV-C57
- प्रक्षेपण स्थल: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा
- विशेषता: सूर्य के अध्ययन के लिए भारत का पहला समर्पित अंतरिक्ष मिशन
आदित्य–एल1 में लगे वैज्ञानिक उपकरण
आदित्य-एल1 में कुल सात स्वदेशी वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए हैं. इनमें से कुछ सीधे सूर्य का अध्ययन करते हैं, जबकि कुछ अंतरिक्ष में मौजूद कणों और चुंबकीय क्षेत्र का विश्लेषण करते हैं.
- सूर्य का प्रत्यक्ष अध्ययन करने वाले उपकरण
- VELC (Visible Line Emission Coronagraph): यह उपकरण सूर्य के सबसे बाहरी भाग, यानी कोरोना, का अध्ययन करता है. इसके माध्यम से वैज्ञानिक सौर विस्फोटों और कोरोनल मास इजेक्शन जैसी घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं.
- SUIT (Solar Ultraviolet Imaging Telescope): यह सूर्य के प्रकाशमंडल और वर्णमंडल की तस्वीरें लेता है. इससे सूर्य की सतह पर होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है.
- SoLEXS (Solar Low Energy X-ray Spectrometer): यह सूर्य से निकलने वाली कम ऊर्जा वाली एक्स-रे किरणों पर नजर रखता है. इसके आंकड़े सौर ज्वालाओं की गतिविधियों को समझने में मदद करते हैं.
- HEL1OS (High Energy L1 Orbiting X-ray Spectrometer): यह उच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे किरणों का अध्ययन करता है. इससे सूर्य पर होने वाली शक्तिशाली घटनाओं के बारे में जानकारी मिलती है.
- अंतरिक्षीय वातावरण का अध्ययन करने वाले उपकरण
- ASPEX (Aditya Solar Wind Particle Experiment): यह सौर पवन में मौजूद कणों का विश्लेषण करता है. इससे यह समझने में मदद मिलती है कि सूर्य से निकलने वाले कण अंतरिक्ष में कैसे फैलते हैं.
- PAPA (Plasma Analyser Package for Aditya): यह सौर पवन में उपस्थित विभिन्न आयनों और प्लाज़्मा कणों का अध्ययन करता है.
- डिजिटल मैग्नेटोमीटर: यह L1 क्षेत्र के आसपास मौजूद चुंबकीय क्षेत्र को मापता है. इसके आंकड़े अंतरिक्ष मौसम को समझने में उपयोगी होते हैं.
आदित्य–एल1 की यात्रा कैसे पूरी हुई?
सूर्य के अध्ययन तक पहुँचने का रास्ता सीधा नहीं था. अंतरिक्ष यान को कई चरणों से गुजरना पड़ा.
- पृथ्वी की कक्षा में प्रारंभिक चरण: प्रक्षेपण के बाद आदित्य-एल1 लगभग 16 दिनों तक पृथ्वी की कक्षा में रहा. इस दौरान उसकी कक्षा को पाँच बार बढ़ाया गया. इससे उसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए आवश्यक वेग मिला.
- L1 की ओर लंबी यात्रा: इसके बाद अंतरिक्ष यान ने लगभग 110 दिनों की यात्रा शुरू की. इस दौरान उसने पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर की दूरी तय की.
- हेलो कक्षा में प्रवेश: 6 जनवरी 2024 को आदित्य-एल1 अपने निर्धारित गंतव्य पर पहुँच गया. वर्तमान में यह L1 बिंदु के चारों ओर घूमते हुए लगातार वैज्ञानिक आंकड़े एकत्र कर रहा है. यह लगभग 178 दिनों में अपनी एक परिक्रमा पूरी करता है.
मिशन के प्रमुख उद्देश्य
इस मिशन का मुख्य लक्ष्य सूर्य के कोरोना, क्रोमोस्फीयर और सौर वायु का अध्ययन करना है. वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि सूर्य से निकलने वाले ऊर्जावान कण और चुंबकीय गतिविधियाँ अंतरिक्ष में किस प्रकार प्रभाव डालती हैं. मिशन सौर विस्फोटों तथा कोरोनल मास इजेक्शन (CME) जैसी घटनाओं के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र करता है.
मिशन की अवधि और महत्व
यदि चंद्रयान-3 ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचाया, तो आदित्य-एल1 भारत को सूर्य के रहस्यों को समझने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है. आदित्य-एल1 को कम से कम पाँच वर्षों तक कार्य करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी एक बड़ी विशेषता यह है कि L1 बिंदु से सूर्य का अवलोकन बिना किसी रुकावट के किया जा सकता है. पृथ्वी की छाया यहाँ बाधा नहीं बनती.
इसी कारण वैज्ञानिक सूर्य की गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकते हैं. इससे सौर तूफानों, अंतरिक्ष मौसम और पृथ्वी पर उनके प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी. भविष्य में यह जानकारी संचार उपग्रहों, नेविगेशन प्रणालियों और अंतरिक्ष अभियानों की सुरक्षा के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- आदित्य-एल1 भारत का पहला सौर अध्ययन मिशन है.
- यह सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 बिंदु के आसपास कार्य कर रहा है.
- L1 बिंदु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित है.
- मिशन का मुख्य उद्देश्य सूर्य के बाहरी वायुमंडल और अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन करना है.
- आदित्य-एल1 में कुल 7 वैज्ञानिक पेलोड लगाए गए हैं.
- यह मिशन अंतरिक्ष मौसम की निगरानी में भारत की क्षमता को बढ़ाता है.
- आदित्य-एल1 ने 6 जनवरी 2024 को हेलो कक्षा में प्रवेश किया.
- VELC मिशन का प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण माना जाता है.
- अंतरिक्ष यान लगभग 178 दिनों में L1 बिंदु की एक परिक्रमा पूरी करता है.
- यह सूर्य के अध्ययन के लिए भारत का पहला समर्पित अंतरिक्ष मिशन है.
- मिशन की निर्धारित अवधि 5 वर्ष है.
गगनयान (Gaganyaan) मिशन
गगनयान भारत का प्रमुख मानव अंतरिक्ष मिशन है. इसका उद्देश्य भारत की स्वदेशी क्षमता का प्रदर्शन करना है, जिसके तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में भेजकर सुरक्षित वापस लाया जाएगा. प्रस्तावित योजना के अनुसार यह मिशन लगभग 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर संचालित होगा और इसकी अवधि लगभग तीन दिन होगी. मानवयुक्त उड़ान से पहले कई मानवरहित परीक्षण मिशन संचालित किए जाएंगे. वर्तमान योजना के अनुसार मानवयुक्त मिशन वर्ष 2027 के मध्य तक प्रक्षेपित किया जा सकता है.
मिशन की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
| प्रक्षेपण यान | मानव-रेटेड एलवीएम-3 (HLVM3) |
| कक्षा | पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) |
| ऊँचाई | लगभग 400 किमी |
| मिशन अवधि | 3 दिन |
| वापसी | भारतीय समुद्री क्षेत्र में जल-अवतरण (Splashdown) |
| चालक दल | 3 अंतरिक्ष यात्री |
गगनयान के लिए चयनित अंतरिक्ष यात्री
गगनयान मिशन के लिए भारतीय वायुसेना के चार अधिकारियों का चयन किया गया है. ये सभी वर्तमान में बेंगलुरु स्थित मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (Human Space Flight Centre) में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं.
- ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालकृष्णन नायर
- ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन
- ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप
- विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला
मानवयुक्त मिशन से पहले परीक्षण
अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने से पहले इसरो विभिन्न तकनीकों और सुरक्षा प्रणालियों का परीक्षण कर रहा है. इन परीक्षणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मिशन के दौरान किसी भी प्रकार की आपात स्थिति में चालक दल सुरक्षित रहे.
- इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT): इन परीक्षणों में चालक दल मॉड्यूल को हेलीकॉप्टर की सहायता से ऊँचाई से गिराया जाता है. इसके बाद पैराशूट प्रणाली की कार्यक्षमता का परीक्षण किया जाता है. यह सुनिश्चित किया जाता है कि समुद्र में उतरते समय कैप्सूल सुरक्षित रहे.
- मानवरहित परीक्षण मिशन: गगनयान कार्यक्रम के अंतर्गत कई मानवरहित उड़ानें प्रस्तावित हैं. इनमें G1 और G2 मिशन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. दूसरे मानवरहित मिशन में इसरो द्वारा विकसित मानव-सदृश रोबोट व्योममित्र (Vyommitra) को भेजने की योजना है. यह रोबोट अंतरिक्ष यान की विभिन्न प्रणालियों का परीक्षण करने में सहायता करेगा.
गगनयान में प्रयुक्त महत्वपूर्ण तकनीकें
मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इसरो ने कई उन्नत तकनीकों का विकास किया है.
- क्रू एस्केप सिस्टम (Crew Escape System): यदि प्रक्षेपण के दौरान कोई तकनीकी समस्या उत्पन्न होती है, तो यह प्रणाली चालक दल को तुरंत सुरक्षित दूरी पर ले जाने में सक्षम होगी.
- पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन समर्थन प्रणाली (ECLSS): यह प्रणाली अंतरिक्ष यान के भीतर पृथ्वी जैसा वातावरण बनाए रखती है. इसके माध्यम से आवश्यक ऑक्सीजन, तापमान और वायु दाब नियंत्रित किया जाता है.
- थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम: पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान अत्यधिक तापमान उत्पन्न होता है. यह प्रणाली चालक दल मॉड्यूल को उस गर्मी से सुरक्षित रखती है.
भारत के लिए गगनयान का महत्व
गगनयान केवल एक अंतरिक्ष मिशन नहीं है, बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है. इस मिशन की सफलता के बाद भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में मानव भेजने वाला चौथा देश बन सकता है. इसके साथ ही भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और अन्य मानव अंतरिक्ष अभियानों का मार्ग भी प्रशस्त होगा.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन है.
- मिशन में तीन अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है.
- अंतरिक्ष यान लगभग 400 किमी ऊँची पृथ्वी की निचली कक्षा में संचालित होगा.
- मानवयुक्त उड़ान से पहले कई मानवरहित परीक्षण किए जा रहे हैं.
- व्योममित्र इसरो द्वारा विकसित मानव-सदृश रोबोट है.
- गगनयान की सफलता के बाद भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता वाला चौथा देश बन सकता है.
इसरो की कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियां (Some other important achievements of ISRO in Hindi)
भले ही भारत सरकार ने साल 1962 में अंतरिक्ष कार्यक्रमों का औपचारिक शुरुआत करने का ऐलान किया हो. लेकिन, इसकी शुरुआत भारतीय वैज्ञानिकों ने वायुमंडल, इसके लेयर्स (स्तर), रेडियो टेक्नोलॉजी व धरती के चुम्बकीय क्षेत्र के अध्ययन के साथ ही हो गई थी.
1950 में, परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की स्थापना की गई थी.डॉ भाभा इसके सचिव बने. इसने पूरे भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए फंडिंग की. भारत में 1823 में कोलाबा वेधशाला की स्थापना के बाद से ही मौसम विज्ञान और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के पहलुओं पर परीक्षण किया जा रहा था. आजादी के बाद भी विभिन्न स्थानों पर ऐसे ही प्रयोग जारी रहे. ये शुरूआती अनुसंधान बाद में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में मिल का पत्थर साबित हुए. आइये अब जानते है इसरो की कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ-
19 अप्रैल 1975 को भारत ने अपना पहला प्रायोगिक उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ को रूस के सहयोग से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया. इसे रूस के प्रक्षेपण यान कॉसमॉस-3M, जो कॉसमॉस परिवार का एक राकेट है, के द्वारा कपूस्टिन यार (Kapustin Yar) प्रक्षेपण केंद्र से लांच किया गया था.
आर्यभट्ट का निर्माण इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन के मार्गदर्शन में नौसिखिए युवा टीम ने किया था. इससे पहले इस टीम ने कभी भी अंतरिक्ष हार्डवेयर नहीं बनाया था. इस छोटे उपग्रह (Satellite) का वजन मात्र 360 किलो था, जिसे बनाने में 3 साल का समय लगा व 3 करोड़ रुपये से अधिक का खर्चा आया.
आर्यभट्ट के बाद 07 जून 1979 को 442 किलोग्राम वजनी प्रायोगिक भास्कर-I उपग्रह को रूस के C-1 इंटरकॉस्मॉस प्रक्षेपण यान द्वारा सफलतापूर्वक छोड़ा गया व धरती के निम्न कक्षा (LEO) में स्थापित किया गया. यह भारत का पहला सुदूर संवेदन उपग्रह (Experimental Remote Sensing) था, जो धरती के विभिन्न हिस्सों चित्र भेजता था. इससे महासागरों, वनों, पर्वतों व धरती के अध्ययन में मदद मिली.
इसके बाद सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, तिरुपति, आंध्र प्रदेश (SHAR) से 10 अगस्त 1979 को Rohini Technology Payload (RTP) को भारत के स्वदेसी प्रक्षेपण यान SLV-3E1 राकेट द्वारा छोड़ा गया. इस राकेट ने आंशिक सफलता पाई, इस तरह मिशन असफल हो गया.
इसरो ने 18 जुलाई 1980 को स्वदेसी प्रक्षेपण यान एसएलवी-3E2 का सफल परीक्षण किया व 35 किलोग्राम वजनी रोहिणी उपग्रह आरएस-1 को कक्षा में स्थापित किया गया था. इस तरह भारत का नाम उन देशों में शामिल हो गया जो अपने उपग्रहों को खुद प्रक्षेपित कर सकते थे.
इसके बाद भारत ने 31 मई, 1981 को SLV-3D1 राकेट द्वारा रोहिणी उपग्रह, RS-D1, अंतरिक्ष में भेजा गया. फिर, 19 जून 1981 को फ्रेंच गुआना के कौरु अंतरिक्ष केंद्र से प्रायोगिक संचार उपग्रह एप्पल (Ariane Passenger Payload Experiment – APPLE) को Geo-synchronous Orbit (GEO) में एरियन-1 (Ariane -1) (V-3) राकेट द्वारा सफल परिक्षण किया गया.
30 अगस्त 1983 में संचार उपग्रह इनसैट-1बी का सफल प्रक्षेपण किया गया. इसने भारत के दूर संचार, दूरदर्शन प्रसारण और मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में क्रांति लाने का काम किया.
इस प्रक्षेपण से पहले 20 नवम्बर 1981 को प्रायोगिक उपग्रह भास्कर-II (सफल) का C-1 इंटरकॉस्मॉस राकेट से LEO कक्षा में व 10 अप्रैल 1982 को संचार उपग्रह इनसेट-1A (INSAT-1A) (असफल) का डेल्टा यान से प्रक्षेपण किया गया था.
इसके बाद DLR जर्मनी द्वारा IRS-1A उपग्रह का उन्नत संस्करण IRS-1E तैयार किया गया. 846 किलोग्राम वजनी इस उपग्रह को PSLV-D1 यान द्वारा 20 सितम्बर 1993 को LEO में प्रक्षेपित किया गया. हालाँकि, यह प्रक्षेपण असफल रहा. यह PSLV सीरीज का पहला उड़ान था.
ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) ने पहला सफल उड़ान 04 मई 1994 को भरी गई. इसके द्वारा प्रायोगिक उपग्रह SROSS-C2 को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया गया. इस सफल प्रक्षेपण से भारत के स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता में वृद्धि हुई. इस यान के ज़रिये अब तक 50 से अधिक सफल मिशन प्रक्षेपित किये जा चुके हैं.
15 फरवरी 2017 को इसरो ने PSLV-C 37 द्वारा एक साथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर विश्व रिकॉर्ड कायम किया.
5 जून 2017 को इसरो ने देश का सबसे भारी रॉकेट GSLV MK 3 लॉन्च किया. यह अपने साथ 3,136 किग्रा का उपग्रह जीसैट-19 लेकर गया था. इससे पहले 2,300 किग्रा से भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिये देश को विदेशी प्रक्षेपकों पर निर्भर रहना पड़ता था.
12 अप्रैल 2018 को इसरो ने नेवीगेशन उपग्रह IRNSS सिस्टम के सभी उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया गया. इस तरह अब अमेरिका के GPS सिस्टम की तरह भारत के पास भी खुद का नेविगेशन सिस्टम हैं. यह सिस्टम स्वदेशी तकनीक से निर्मित हैं.
27 मार्च 2019 को इसरो ने एंटी सैटेलाइट (A-SAT) से एक लाइव भारतीय सैटेलाइट को नष्ट करने में सफलता पाया. इस तरह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने वाला भारत चौथा देश बन गया है.
इतना ही नहीं, 1 अप्रैल 2019 को इसरो ने इलेक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस उपग्रह समेत 29 उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित किया. इनमें 28 विदेशी उपग्रह शामिल थे. पहली बार इसरो ने एक ही मशीन से तीन अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रहों को स्थापित किया.
इसरो का चमत्कारिक सिलसिला आगे भी जारी रहा, 22 जुलाई 2019 को भारत ने दूसरे चंद्रमिशन चंद्रयान-2 को रवाना किया. इसे ‘बाहुबली’ नाम के सबसे ताकतवर और विशाल राकेट जीएसएलवी-मार्क III के ज़रिये प्रक्षेपित किया गया. हालांकि यह मिशन असफल रहा लेकिन देश ने इसे एक उपलब्धि के तौर पर देखा.
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसरो के वैज्ञानिकों के पिछले सफलताओं को देखते हुए, बेंगलुरु में इसरो के मुख्यालय पर इस मौके का गवाह बनने पहुंचे थे. हालाँकि, रोबोटिक लैंडर विक्रम का चंद्रमा की सतह से मात्र 2.1 किमी की दुरी पर पहुँचने के बाद, धरती पर ग्राउंड स्टेशनों से संपर्क टूट गया था. अंतरिक्ष विज्ञान के जगत में इस मिशन को सफल ही माना जाता है, सिवाय रोबोटिक लैंडर के तकनिकी खामी के.
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रणालियाँ व प्रेक्षण यान (System of India’s Space Programme and Launch Vehicles in Hindi)
इनसैट प्रणाली – 1980 के दशक में विकसित इनसैट एक बहु उद्देश्यीय उपग्रह प्रणाली है. इसलिए यह कई क्षेत्रों के लिए सेवाएं उपलब्ध करवाता है. इस प्रणाली के 11 उपग्रह; इन्सेट-4सीबी, इनसेट-4 बी, इनसेट-4ए, एडुसेट, इनसेट-3ई, जीसेट-2, इनसेट-3ए, कल्पना-1, इनसेट-3सी, इनसेट-3बी और इनसेट-2ई; वर्तमान में सेवा प्रदान कर रहे हैं. यह 66 सी-बैंड ट्रांसपोंडर्स, 8 वृहद् सी-बैंड ट्रांसपोंडर्स और 3 के यू बैंड ट्रांसपोंडर्स उपलब्ध करवाता है.
भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह प्रणाली(IRS System):- यह प्रणाली मुख्य तौर पर पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों का चित्र खींचने का काम करता है. इन चित्रों से उपज, जल, वन, बंजर व प्रति भूमि जैसे स्थानों की जानकारी प्राप्त की जाती है. इसका रेजोलुशन 360 मी. से 5.8 मीटर के विभेदन तक है. इस समूह में अब 10 उपग्रह प्रचालित हैं- ओसेनसेट-2, रिसेट-2, कार्टोसेट-2ए, आईएमएस-1, कार्टोसेट-2, कार्टोसेट-1, रिसोर्ससेट-1, टीईएस, ओसेनसेट-1 व आईआरएस. मेघा-ट्रापिक्स, सरल एवं इन्सैट-3डी को भी इस प्रणाली में शामिल करने की योजना है.
प्रक्षेपण यान (Launch vehicle या राकेट): – एस एल वी-3 1980 ई. में पहला भारतीय स्वदेशी प्रक्षेपण यान है. इसे बाद संवद्र्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (Advanced Satellite Launch Vehicle -ASLV) का निर्माण किया गया. फिर अक्टूबर 1994 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) द्वारा IRSP 2 यान को छोड़कर इसरो ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की.
इसरो ने 18 अप्रैल, 2001 को सफलतापूर्वक स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान छोड़ा. भारत के पास चार चरणों वाला PSLV है. यह एक टन वजनी पेलोड को भू-स्थिरीय कक्षा में प्रक्षेपित कर सकता है. वहीं, GSLV 2,500 किग्रा श्रेणी के उपग्रहों को भूस्थिर कक्षा में छोड़ सकता है.
1 जुलाई, 2022 तक पीएसएलवी ने 55 प्रक्षेपण किए हैं, जिनमें से 52 सफलतापूर्वक अपनी नियोजित कक्षाओं में पहुंच गए हैं. इसके दो पूर्ण विफलताएं और एक आंशिक विफलता, 94% (या आंशिक विफलता सहित 95%) की सफलता दर प्रदान कर रही है.
इसरो के अन्य सहयोगी व अनुषंगी संगठन (Other associate and subsidiary organizations of ISRO)
- विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (Vikram Sarabhai Space Centre – VSSC), कोचुवेली, तिरुवनंतपुरम्, केरल– यह प्रक्षेपण यान के विकास का मुख्य केंद्र है.
- इसरो उपग्रह केंद्र (ISRO Satellite Centre-ISAC), अंतरिक्ष भवन, बंगलौर– यहाँ उपग्रहों का डिज़ाइन, निर्माण, परीक्षण एवं प्रबंधन किया जाता हैं.
- अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (Space Applications Centre – SAC), अहमदाबाद:- यह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए यंत्र बनाने, संगठित और निर्माण करने के लिए इसरो का अनुसंधान एवं विकास केंद्र है.
- शार केंद्र – SHAR- आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित यह इसरो का मुख्य प्रक्षेपण केंद्र है. पहले इसे Sriharikota Range (Shar) कहा जाता था. अब इस SDSC यानि Satish Dhavan Space Centre कहा जाता है. 9 अक्टूबर 1971 को ‘रोहिणी-125’ का पहला उड़ान परीक्षण, शार केंद्र से पहला रॉकेट लॉन्च था.
- तरल नोदन यंत्र (Liquid Propulsion Systems Centre – LPSC):- यह प्रमोचक रॉकेट तथा उपग्रहों के लिए द्रव एवं क्रायोजेनिक इंजन के विकास में अग्रणी केंद्र है. इसके केंद्र तिरुवनंतपुरम, बँगलौर और महेंद्रगिरि (तमिलनाडु) में स्थित है.
- विकास, शिक्षा संचार एकक (Development & Education Communication Unit – DECO), अहमदाबाद– यह केंद्र अंतरिक्ष अनुप्रयोग कार्यक्रम की संकल्पना, परिभाषा, योजना और सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन में लगा हुआ है.
- इसरो दूरमापी यंत्र, पथ और कमांड नेटवर्क (ISRO Telemetry, Tracking and Command Network – ISTRAC), बंगलौर– इस संस्था का कार्य उपग्रह और प्रक्षेपण यान मिशनों के लिए टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड सपोर्ट का सेवा उपलब्ध करवाना है.इसका मुख्यालय और अंतरिक्षयान नियंत्रण केंद्र बंगलौर में एवं इसके भू-स्थल केंद्र का नेटवर्क श्रीहरिकोटा, तिरुवनंतपुरम, बँगलौर, लखनऊ, कार निकोबार और मॉरीशस में स्थित है.
- प्रमुख नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility)– कर्नाटक के हासन और मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित यह सेंटर इसरो के सभी भूस्थैतिक/ जियोसिंक्रोनस उपग्रहों, अर्थात् इनसैट, जीसैट, कल्पना और IRNSS Series के उपग्रहों की निगरानी और नियंत्रण करती है. एमसीएफ इन उपग्रहों के पूरे जीवन में उपग्रहों की कक्षा में वृद्धि, कक्षा में पेलोड परीक्षण और कक्षा में संचालन के लिए जिम्मेदार है. एमसीएफ के गतिविधियों में चौबीसों घंटे ट्रैकिंग, टेलीमेट्री और कमांडिंग (TT & C) संचालन, और विशेष संचालन जैसे ग्रहण प्रबंधन, स्टेशन-कीपिंग युद्धाभ्यास और आकस्मिकताओं के मामले में रिकवरी कार्रवाई शामिल हैं. एमसीएफ उपग्रह पेलोड्स के प्रभावी उपयोग, विशेष संचालन के दौरान सेवा में गड़बड़ी को रोकने और उपयोगकर्ता एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करने का काम करता हैं.
- इसरो अक्रिय यंत्र एकक(ISRO Inertial Systems Unit -IISU), तिरुवनंतपुरम् – यहाँ पुराने तकनीक से नए तकनीक बनाने का प्रयोग व अनुसंधान किया जाता हैं. यह इसरो के प्रक्षेपण यान और अंतरिक्ष यान कार्यक्रमों के लिए जड़त्वीय प्रणालियों (Inertial Systems) के डिजाइन और विकास के लिए भी जिम्मेदार है.
- भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory – PRL), अहमदाबाद– यह प्रयोगशाला अंतरिक्ष विभाग के अधीन आती है.
- राष्ट्रीय दूरसंवेदी सेंटर (National Remote Sensing Centre – NRSC), हैदराबाद – यह संस्था रिमोट सेंसिंग से जुड़े तकनीक मुहैया करवाता हैं.
- नेशनल मीसोस्फीयर, स्ट्रेटोस्फीयर, ट्रोपोस्फियर राडार फैसिलिटी (NMRF)गंदकी, आंध्र प्रदेश – यहाँ वातावरणिक अनुसंधान किया जाता हैं.
- Thumba Equatorial Rocket Launching Station (TERLS), थुम्बा, तिरुवनंतपुरम:- 21 नवंबर 1963 को स्थापित यह प्रक्षेपण केंद्र पृथ्वी के चुम्बकीय भूमध्य रेखा के निकट भारत के दक्षिणी हिस्सी में स्थित हैं.
- विद्युत प्रकाशिकी प्रणाली प्रयोगशाला (लियोस) (Electro-Optics Systems Laboratory (LEOS), बंगलुरू:- विद्युत प्रकाशिकी तंत्र प्रयोगशाला में उपग्रहों तथा प्रमोचन यानों के लिए विद्युत-प्रकाशिकी संवेदकों (Sensors) तथा कैमरा प्रकाशिकी का डिजाइन, विकास तथा उत्पादन किया जाता है. इन संवेदकों में तारा सूचक, भू संवेदक, सौर संवेदक व संसाधक इलैक्ट्रॉनिकी शामिल हैं.
इसरो मिशन : भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम व भारत द्वारा प्रक्षेपित यान व उपग्रह (Satellites and Launch Vehicles of Indian Space Programme)
| उपग्रह | प्रक्षेपण तिथि | प्रक्षेपण यान | उद्देश्य |
| आर्यभट्ट | 19 अप्रैल 1975 | इंटरकॉसमॉस | प्रायोगिक (Experimental) |
| भास्कर -1 | 07 जून 1979 | इंटरकॉसमॉस | पृथ्वी का अवलोकन (Earth Observation), प्रायोगिक |
| रोहिणी प्रौद्योगिकी पेलोड | 10 अगस्त 1979 | Satellite Launch Vehicle (SLV-3) | असफल |
| रोहिणी आर एस – 1 | 18 जुलाई 1981 | SLV-3 | प्रायोगिक |
| रोहिणी आर एस – डी 1 | 31 मई 1981 | SLV-3 | पृथ्वी का अवलोकन |
| APPLE | 19 जून 1981 | Ariane | संचार प्रायोगिक |
| भास्कर – 2 | 20 नवम्बर 1981 | इंटरकॉसमॉस | पृथ्वी का अवलोकन, प्रायोगिक |
| INSAT-1A | 10 अप्रैल 1982 | Delta launch vehicle | संचार, असफल |
| रोहिणी आरएस – डी2 | 17 अप्रैल 1983 | SLV-3 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-1B | 30 अगस्त 1983 | Shuttle (PAM-D) | संचार |
| SROSS-1 (एसआरओएसएस-1) | 24 मार्च 1987 | ASLV-D1 (असफल) | प्रायोगिक (Experimental) |
| IRS-1A | 17 मार्च 1988 | Vostok | पृथ्वी का अवलोकन (Earth Observation) |
| SROSS-1 (एसआरओएसएस-2) | 13 जुलाई 1988 | ASLV-D2 (असफल) | पृथ्वी का अवलोकन, प्रायोगिक |
| INSAT-1C | 22 जुलाई 1988 | Ariane-3 (आंशिक सफलता) | संचार (Communication) |
| INSAT-1D | 12 जून 1990 | Delta 4925 | संचार |
| IRS-1B | 29 अगस्त 1991 | Vostok | पृथ्वी का अवलोकन |
| SROSS-C | 20 मई 1992 | ASLV-D3 | प्रायोगिक |
| INSAT-2A | 10 जुलाई 1992 | Ariane-44L H10 | संचार |
| INSAT-2B | 23 जुलाई 1993 | Ariane-44L H10+ | संचार |
| IRS-1E | 20 सितम्बर 1993 | PSLV-D1 (असफल) | पृथ्वी का अवलोकन |
| SROSS-C2 | 04 मई 1994 | ASLV-D4 | प्रायोगिक |
| IRS-P2 | 15 अक्टूबर 1994 | PSLV-D2 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-2C | 7 दिसम्बर 1995 | Ariane-44L H10-3 | संचार |
| IRS-1C | 29 दिसम्बर 1995 | Molniya | पृथ्वी का अवलोकन |
| IRS-P3 | 21 मार्च 1996 | PSLV-D3 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-2D | 4 जून 1997 | Ariane-44L H10-3 | संचार, असफल |
| IRS-1D | 29 सितंबर 1997 | PSLV-C1 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-2E | 3 अप्रैल 1999 | Ariane-42P H10-3 | संचार |
| Oceansat-1 (IRS-P4) | 26 मई 1999 | PSLV-C2 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-3B | 22 मार्च 2000 | Ariane-5G | संचार |
| GSAT-1 | 18 अप्रैल 2001 | GSLV-D1 | संचार |
| Technology Experiment Satellite (TES) | 22 अक्टूबर 2001 | PSLV-C3 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-3C | 24 जनवरी 2002 | Ariane-42L H10-3 | जलवायु और पर्यावरण, संचार |
| Kalpana-1 (METSAT) | 12 सितंबर 2002 | PSLV-C4 | जलवायु और पर्यावरण, संचार |
| INSAT-3A | 10 अप्रैल 2003 | Ariane-5G | जलवायु और पर्यावरण, संचार |
| GSAT-2 | 8 मई 2003 | GSLV-D2 | संचार |
| INSAT-3E | 28 सितंबर 2003 | Ariane-5G | संचार |
| RESOURCESAT-1 (IRS-P6) | 17 अक्टूबर 2003 | PSLV-C5 | पृथ्वी का अवलोकन |
| EDUSAT | 20 अक्टूबर 2004 | GSLV-F01 | संचार |
| HAMSAT | 5 मई 2005 | PSLV-C6 | संचार |
| CARTOSAT-1 | 5 मई 2005 | PSLV-C6 | पृथ्वी का अवलोकन |
| INSAT-4A | 22 दिसम्बर 2005 | Ariane-5GS | संचार |
| INSAT-4C | 10 जुलाई 2006 | GSLV-F02 | संचार |
| CARTOSAT-2 | 10 जनवरी 2007 | PSLV-C7 | पृथ्वी का अवलोकन |
| Space Capsule Recovery Experiment (SRE-1) | 10 जनवरी 2007 | PSLV-C7 | प्रायोगिक |
| INSAT-4B | 12 मार्च 2007 | Ariane-5ECA | संचार |
| INSAT-4CR | 2 सितंबर 2007 | GSLV-F04 | संचार |
| CARTOSAT-2A | 28 अप्रैल 2008 | PSLV-C9 | पृथ्वी का अवलोकन |
| IMS-1 (Third World Satellite – TWsat) | 28 अप्रैल 2008 | PSLV-C9 | पृथ्वी का अवलोकन |
| चंद्रयान-1 | 22 अक्टूबर 2008 | PSLV-C11 | ग्रहों का अवलोकन |
| RISAT-2 | 20 अप्रैल 2009 | PSLV-C12 | पृथ्वी का अवलोकन |
| ANUSAT | 20 अप्रैल 2009 | PSLV-C12 | छात्र उपग्रह (Anna University) |
| Oceansat-2 (IRS-P4) | 23 सितंबर 2009 | PSLV-C14 | जलवायु और पर्यावरण, पृथ्वी अवलोकन |
| GSAT-4 | 15 अप्रैल 2010 | GSLV-D3 | संचार |
| CARTOSAT-2B | 12 जुलाई 2010 | PSLV-C15 | पृथ्वी अवलोकन |
| StudSat | 12 जुलाई 2010 | PSLV-C15 | छात्र उपग्रह |
| GSAT-5P / INSAT-4D | 25 दिसम्बर 2010 | GSLV-F06 | संचार, असफल |
| RESOURCESAT-2 | 20 अप्रैल 2011 | PSLV-C16 | पृथ्वी अवलोकन |
| Youthsat | 20 अप्रैल 2011 | PSLV-C16 | छात्र उपग्रह |
| GSAT-8 / INSAT-4G | 21 मई 2011 | Ariane-5 VA-202 | संचार, पथ प्रदर्शन (GPS) |
| GSAT-12 | 15 जुलाई 2011 | PSLV-C17 | संचार |
| Megha-Tropiques | 12 अक्टूबर 2011 | PSLV-C18 | जलवायु और पर्यावरण, पृथ्वी अवलोकन |
| Jugnu | 12 अक्टूबर 2011 | PSLV-C18 | छात्र उपग्रह |
| RISAT-1 | 26 अप्रैल 2012 | PSLV-C19 | पृथ्वी अवलोकन |
| SRMSAT | 26 अप्रैल 2012 | PSLV-C19 | छात्र उपग्रह(SRM University) |
| GSAT-10 | 29 सितंबर 2012 | Ariane-5 VA-209 | भारत का उन्नत संचार उपग्रह |
| SARAL | 25 फ़रवरी 2013 | PSLV-C20 | जलवायु और पर्यावरण, पृथ्वी अवलोकन |
| IRNSS-1A | 1 जुलाई 2013 | PSLV-C22 | मार्ग-दर्शन (Indian GPS System) |
| INSAT-3D | 26 जुलाई 2013 | Ariane-5 | जलवायु और पर्यावरण, आपदा प्रबंधन प्रणाली |
| GSAT-7 | 30 अगस्त 2013 | Ariane-5 | सैन्य संचार |
| मंगल कक्षित्र मिशन अंतरिक्षयान | नवंबर 05, 2013 | PSLV-C25 | मंगल ग्रह का अध्ययन |
| जीसैट-14 | जनवरी 05, 2014 | GSLV-D5/GSAT-14 | संचार |
| आईआरएनएसएस-1बी | अप्रैल 04, 2014 | पीएसएलवी-सी24 | नौवहन |
| आईआरएनएसएस-1सी | नवंबर 10, 2014 | पीएसएलवी-सी26 | नौवहन |
| जीसैट-16 | दिसम्बर 07, 2014 | एरियन-5 वी.ए.-221 | संचार |
| क्रू माड्यूल वायुमंडलीय पुन:प्रवेश परीक्षण (सी.ए.आर.ई.) | दिसम्बर 18, 2014 | LVM-3/CARE Mission | प्रायोगिक |
| आईआरएनएसएस 1डी | मार्च 28, 2015 | पीएसएलवी-सी27 | नौवहन |
| जीसैट -6 | अगस्त 27, 2015 | GSLV-D6 | संचार |
| एस्ट्रोसैट | सितंबर 28, 2015 | PSLV-C30/AstroSat MISSION | अंतरिक्ष विज्ञान |
| जीसैट-15 | नवंबर 11, 2015 | ||
| आई.आर.एन.एस.एस.-1ई | जनवरी 20, 2016 | पी.एस.एल.वी.-सी31/आई.आर.एन.एस.एस.-1ई | नौवहन |
| आई.आर.एन.एस.एस.-1एफ | मार्च 10, 2016 | पी.एस.एल.वी.-सी32/आई.आर.एन.एस.एस.-1एफ | नौवहन (GPS Navigation System) |
| आई.आर.एन.एस.एस.-1जी | अप्रैल 28, 2016 | पी.एस.एल.वी.-सी33/आई.आर.एन.एस.एस.-1जी | नौवहन |
| कार्टोसैट-2 श्रृंखला का उपग्रह | जून 22, 2016 | पीएसएलवी-सी34 | भू प्रेक्षण |
| सत्यभामासैट | जून 22, 2016 | PSLV-C34 / CARTOSAT-2 Series Satellite | छात्र उपग्रह |
| स्वयं | जून 22, 2016 | PSLV-C34 / CARTOSAT-2 Series Satellite | |
| इन्सैट-3DR | सितंबर 08, 2016 | GSLV-F05 / INSAT-3DR | जलवायु और पर्यावरण, आपदा प्रबंधन |
| प्रथम | सितंबर 26, 2016 | PSLV-C35 / SCATSAT-1 | छात्र उपग्रह |
| स्कैटसैट -1 | सितंबर 26, 2016 | PSLV-C35 / SCATSAT-1 | जलवायु और पर्यावरण |
| पीसैट | सितंबर 26, 2016 | PSLV-C35 / SCATSAT-1 | छात्र उपग्रह |
| जीसैट -18 | अक्टूबर 06, 2016 | एरियन-5 वी.ए.-231 | संचार |
| रिसोर्ससैट -2ए | दिसम्बर 07, 2016 | PSLV-C36 / RESOURCESAT-2A | भू प्रेक्षण |
| कार्टोसैट -2 श्रृंखला उपग्रह | फ़रवरी 15, 2017 | पीएसएलवी-C37 / कार्टोसेट -2 श्रृंखला उपग्रह | भू प्रेक्षण |
| आईएनएस-1B | फ़रवरी 15, 2017 | पीएसएलवी-C37 / कार्टोसेट -2 श्रृंखला उपग्रह | प्रायोगिक |
| आईएनएस-1ए | फ़रवरी 15, 2017 | पीएसएलवी-C37 / कार्टोसेट -2 श्रृंखला उपग्रह | प्रायोगिक |
| जीसैट-9 | मई 05, 2017 | GSLV-F09 / GSAT-9 | संचार |
| जीसैट -19 | जून 05, 2017 | जीएसएलवी एमके III-डी 1 / जीसैट -19 मिशन | संचार |
| निउसैट | जून 23, 2017 | पीएसएलवी-सी 38 / कार्टोसैट -2 श्रृंखला उपग्रह | छात्र उपग्रह |
| कार्टोसैट -2 श्रृंखला उपग्रह | जून 23, 2017 | PSLV-C38 / Cartosat-2 Series Satellite | पृथ्वी अवलोकन |
| आईआरएनएसएस -1 एच | अगस्त 31, 2017 | पीएसएलवी-सी39/आईआरएनएसएस-1एच मिशन | नौवहन (GPS), असफल |
| माइक्रोसैट | जनवरी 12, 2018 | प्रायोगिक | |
| आईएनएस-1सी | जनवरी 12, 2018 | पीएसएलवी-सी 40 / कार्टोसैट -2 श्रृंखला उपग्रह मिशन | प्रायोगिक |
| कार्टोसैट -2 श्रृंखला उपग्रह | जनवरी 12, 2018 | PSLV-C40/Cartosat-2 Series Satellite Mission | पृथ्वी अवलोकन |
| जीसैट-6ए मिशन | मार्च 29, 2018 | संचार | |
| आई.आर.एन.एस.एस.-1आई | अप्रैल 10, 2018 | PSLV-XL-C31 | नौवहन (GPS) |
| GSAT-29 | नवंबर 14, 2018 | GSLV Mk III-D2 / GSAT-29 Mission | संचार |
| हाइसिस | नवंबर 29, 2018 | PSLV-C43 / HysIS Mission | पृथ्वी अवलोकन |
| जीसैट-11 मिशन | दिसम्बर 05, 2018 | Ariane-5 VA-246 | संचार |
| GSAT-7A | दिसम्बर 19, 2018 | GSLV-F11 / GSAT-7A Mission | संचार |
| कलामसैट-वी2 | जनवरी 24, 2019 | PSLV-C44 | छात्र उपग्रह |
| माइक्रोसैट-आर | जनवरी 24, 2019 | PSLV-C44 | |
| जीसैट-31 | फ़रवरी 06, 2019 | Ariane-5 VA-247 | संचार |
| एमिसैट | अप्रैल 01, 2019 | PSLV-C45/EMISAT MISSION | |
| RISAT-2B | मई 22, 2019 | PSLV-C46 Mission | आपदा प्रबंधन, भू प्रेक्षण |
| चंद्रयान-2 | जुलाई 22, 2019 | GSLV-Mk III – M1 / Chandrayaan-2 Mission | चंद्रमा का अध्ययन (Lunar) |
| Cartosat-3 | नवंबर 27, 2019 | PSLV-C47 / Cartosat-3 Mission | पृथ्वी अवलोकन |
| रिसैट-2बी.आर.1 | दिसम्बर 11, 2019 | PSLV-C48/RISAT-2BR1 | आपदा प्रबंधन, भू प्रेक्षण |
| जीसैट-30 | जनवरी 17, 2020 | एरियन-5 वी.ए.-251 | संचार |
| ई.ओ.एस.-01 | नवंबर 07, 2020 | पी.एस.एल.वी.-सी.49/ई.ओ.एस.-01 | आपदा प्रबंधन, भू प्रेक्षण |
| CMS-01 | दिसम्बर 17, 2020 | PSLV-C50/CMS-01 | संचार |
| UNITYsat | फ़रवरी 28, 2021 | PSLV-C51/Amazonia-1 | छात्र उपग्रह |
| सतीश धवन उपग्रह (SDSAT) | 28 फ़रवरी 2021 | PSLV-C51/Amazonia-1 | छात्र उपग्रह |
| EOS-03 | 12 अगस्त 2021 | GSLV-F10 / EOS-03 | पृथ्वी अवलोकन,असफल |
| INSPIRE sat-1 | 14 फ़रवरी 2022 | PSLV-C52/EOS-04 Mission | छात्र उपग्रह |
| EOS-04 | 14 फ़रवरी 2022 | PSLV-C52/EOS-04 Mission | पृथ्वी अवलोकन |
| INS-2TD | 14 फ़रवरी 2022 | PSLV-C52/EOS-04 Mission | प्रायोगिक |
| GSAT-24 | 23 जून 2022 | Ariane-5 VA-257 | संचार |
ISRO से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक
डॉ. विक्रम साराभाई
डॉ. विक्रम साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है. उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान को भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास से जोड़ने की परिकल्पना की थी. उनके प्रयासों से ही 1969 में ISRO की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ. आज भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम जिस मजबूत आधार पर खड़ा है, उसकी नींव डॉ. साराभाई ने रखी थी.
सतीश धवन
डॉ. सतीश धवन ने ISRO को एक संगठित और पेशेवर संस्थान के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनके कार्यकाल में प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी और उपग्रह कार्यक्रमों को नई गति मिली. श्रीहरिकोटा स्थित भारत के प्रमुख प्रक्षेपण केंद्र का नाम भी उनके सम्मान में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) रखा गया है.
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारत के अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक थे. उन्होंने उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-3) के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया. बाद में वे भारत के मिसाइल कार्यक्रम के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए और देश के राष्ट्रपति भी बने. युवाओं के बीच वे “मिसाइल मैन ऑफ इंडिया” के नाम से प्रसिद्ध हैं.
डॉ. के. सिवन
डॉ. के. सिवन ने 2018 से 2022 तक ISRO के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. उनके नेतृत्व में चंद्रयान-2 मिशन का प्रक्षेपण किया गया. यद्यपि मिशन का लैंडर पूरी तरह सफल नहीं हो सका, लेकिन इससे प्राप्त अनुभवों ने चंद्रयान-3 की सफलता की नींव रखी. उन्हें प्रक्षेपण यान विशेषज्ञ के रूप में भी जाना जाता है.
एस. सोमनाथ
एस. सोमनाथ के नेतृत्व में ISRO ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं. उनके कार्यकाल में चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल लैंडिंग की और आदित्य-एल1 मिशन को भी सफलता मिली. उन्होंने भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान की तैयारियों को भी आगे बढ़ाया.
वी. नारायणन
डॉ. वी. नारायणन भारत के प्रमुख रॉकेट और प्रणोदन (Propulsion) विशेषज्ञों में गिने जाते हैं. उन्होंने क्रायोजेनिक इंजन और प्रक्षेपण यान तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. ISRO के नेतृत्व से जुड़ने के बाद वे भारत के भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और गगनयान जैसे कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर रहे हैं.
भारतीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण व इसरो से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली (Source : www.isro.gov.in ):-
- SROSS का fullform होता है- Stretched Rohini Satellite Series.
- IRNSS का मतलब होता है- Indian Regional Navigational Satellite System
- GSAT :- “Geosynchronous” Satellite
- GSLV :- Geosynchronous Satellite Launch Vehicle
- INSAT :- Indian National Satellite
- APPLE :- Asian Passenger Payload Experiment
- PSLV :- Polar Satellite Launch Vehicle
इसरो के वर्त्तमान अध्यक्ष कौन है?
13 जनवरी, 2025 से ‘डॉ. वी. नारायणन’ इसरो प्रमुख हैं. उनसे पहले हुए इसरो के अध्यक्षों की सूचि निनंवत हैं:-
- एस सोमनाथ (2022-25)
- डॉ के सिवन (2018 – 2022)
- श्री ए एस किरण कुमार (2015 – 2018)
- डॉ के राधाकृष्णन (2009-2014)
- श्री जी.माधवन नायर (2003-2009)
- डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन (1994-2003)
- प्रो. उडुपी रामचंद्र राव (1984-1994)
- प्रो. सतीश धवन (1972-1984)
- प्रो. एम जी के मेनन (जनवरी-सितंबर 1972)
- डॉ विक्रम अंबालाल साराभाई (1963-1971)
वैश्विक अंतरिक्ष कार्यक्रम: वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा
पिछले कुछ दशकों में अंतरिक्ष विज्ञान केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं रहा है. आज यह राष्ट्रीय सुरक्षा, संचार, मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन, संसाधन प्रबंधन और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है. यही कारण है कि दुनिया के अनेक देश अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर पहले से अधिक निवेश कर रहे हैं.
एक समय था जब अंतरिक्ष अनुसंधान पर मुख्य रूप से अमेरिका और सोवियत संघ का प्रभुत्व था. आज स्थिति बदल चुकी है. अमेरिका, रूस, चीन, भारत, जापान और यूरोपीय देशों के अलावा कई उभरते राष्ट्र भी अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम विकसित कर रहे हैं.
चीन ने चंद्रमा और मंगल मिशनों में उल्लेखनीय प्रगति की है. वहीं अमेरिका पुनः मानव चंद्र अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. कई देश अब चंद्रमा, मंगल और गहरे अंतरिक्ष की खोज को भविष्य की प्राथमिकता मान रहे हैं.
हाल के वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है. पहले अधिकांश अंतरिक्ष गतिविधियाँ केवल सरकारी संस्थाओं तक सीमित थीं. अब निजी कंपनियाँ रॉकेट निर्माण, उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष पर्यटन और अंतरिक्ष संचार सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
निजी क्षेत्र के प्रवेश से लागत में कमी आई है और नवाचार को बढ़ावा मिला है. पुनः उपयोग किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यानों जैसी तकनीकों ने अंतरिक्ष अभियानों को अधिक किफायती बनाया है. इससे छोटे देशों और निजी संगठनों के लिए भी अंतरिक्ष तक पहुँच आसान हुई है.
आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वैश्विक विकास का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकती है. वर्तमान समय में अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित नहीं हैं. कई नए क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे हैं. जैसे, चंद्रमा पर दीर्घकालिक अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की योजनाएँ, मंगल ग्रह पर मानव मिशनों की तैयारी, अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट सेवाएँ, अंतरिक्ष पर्यटन का विकास, क्षुद्रग्रहों और अन्य खगोलीय पिंडों के संसाधनों
अंतरिक्ष विज्ञान की प्रगति के साथ कई नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं. सबसे बड़ी समस्या अंतरिक्ष मलबे (Space Debris) की है. पृथ्वी की कक्षा में हजारों निष्क्रिय उपग्रह और रॉकेट के अवशेष मौजूद हैं. ये सक्रिय उपग्रहों और भविष्य के मिशनों के लिए खतरा बन सकते हैं. इसके अतिरिक्त, अत्यधिक लागत, तकनीकी जटिलताएँ, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष कानून तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बने हुए हैं.
वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति
भारत ने सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरिक्ष विज्ञान में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं. कम लागत में जटिल मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा करना भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है.
चंद्रयान-3 की सफलता, आदित्य-एल1 मिशन और गगनयान कार्यक्रम ने भारत की क्षमता को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है. आज भारत विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष देशों में गिना जाता है और विकासशील देशों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है.
भारतीय अंतरिक्ष उद्योग में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी भी नई संभावनाएँ पैदा कर रही है. आने वाले वर्षों में यह सहयोग भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उपग्रह सेवाओं और अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में और अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकता है.
निष्कर्ष
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की यात्रा भारत के वैज्ञानिक विकास, आत्मनिर्भरता और नवाचार की प्रेरणादायक कहानी है. सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज विश्व की अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों में शामिल हो चुका है. आर्यभट्ट उपग्रह के प्रक्षेपण से लेकर चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता, आदित्य-एल1 के सौर अध्ययन मिशन और गगनयान जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं तक, ISRO ने लगातार यह सिद्ध किया है कि दृढ़ संकल्प और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बल पर बड़े से बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं.
ISRO की उपलब्धियाँ केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं हैं. इसके उपग्रह संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, शिक्षा, आपदा प्रबंधन और नेविगेशन जैसी अनेक सेवाओं के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि ISRO आज भारत की वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक बन चुका है.
वर्तमान समय में अंतरिक्ष विज्ञान तेजी से विकसित हो रहा है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है. ऐसे में ISRO के सामने नई चुनौतियों के साथ अनेक अवसर भी मौजूद हैं. निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नई प्रौद्योगिकियाँ भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.
निस्संदेह, ISRO केवल एक अंतरिक्ष संस्था नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास, तकनीकी क्षमता और भविष्य के सपनों का प्रतीक है. आने वाले वर्षों में इसके मिशन न केवल अंतरिक्ष के नए रहस्यों से पर्दा उठाएँगे, बल्कि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष नेतृत्व की दिशा में भी आगे बढ़ाएँगे.
UPSC / State PCS मेन्स हेतु विश्लेषणात्मक प्रश्न (FAQ)
Q1. भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास में ISRO की क्या भूमिका है?
उत्तर: ISRO के उपग्रह संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, मत्स्य पालन, आपदा प्रबंधन और नेविगेशन सेवाओं में सहायता प्रदान करते हैं. इससे सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और जनकल्याण को भी बल मिलता है.
Q2. चंद्रयान-3 मिशन को भारत की वैज्ञानिक उपलब्धि क्यों माना जाता है?
उत्तर: चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल लैंडिंग कर भारत की तकनीकी क्षमता को सिद्ध किया. इससे भविष्य के चंद्र अभियानों और वैज्ञानिक अनुसंधान के नए अवसर खुले हैं.
Q3. निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है?
उत्तर: निजी कंपनियों की भागीदारी से नवाचार, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं. इससे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का व्यावसायिक उपयोग भी तेज़ी से विकसित होगा.
Q4. गगनयान मिशन भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: गगनयान भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करेगा. इससे उन्नत तकनीकों का विकास होगा और भारत की वैश्विक वैज्ञानिक प्रतिष्ठा भी मजबूत होगी.
Q5. अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के सामने कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं?
उत्तर: भारत को उन्नत तकनीक, अनुसंधान निवेश, अंतरिक्ष मलबे की समस्या और निजी क्षेत्र के प्रभावी उपयोग जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इन चुनौतियों का समाधान भारत की भविष्य की अंतरिक्ष सफलता के लिए आवश्यक है.



