भारत विश्व का दूसरा सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित (Hit by Flood in Hindi) देश है. यह भारत में हरेक साल आने वाली सबसे बड़ी आपदा है. यह देश में तबाही लाने वाली सबसे बड़ी वार्षिक प्राकृतिक आपदा भी है. हर साल देश का एक बड़ा हिस्सा इससे प्रभावित रहता है. भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश का 40 से 45 मिलियन हेक्टेयर इलाका बाढ़ प्रभावित है. हालाँकि, बड़े हिस्से में बाढ़-नियत्रण के उपाय किए गए है. लेकिन, इस कोशिश में अभी आंशिक या नाममात्र की सफलता मिली है.
“भारतका पूर्वी, उत्तर-पूर्वी व उत्तरी इलाका सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित है. बांग्लादेश के बाद भारत दुनिया में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित देश है. बाढ़ के कारण होने वाली वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में होता है. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार देश में लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित है. इससे कम से कम सालाना औसतन 18.6 मिलियन हेक्टेयर भूमि प्रभावित होती है.”
जल का एक विशाल भंडार है, जो सूखे जमीन या आवासीय जमीन व खेतों, मकानों, चरागाहों को डुबो देता है- यह आपदा ही बाढ़ कहलाता हैं. दूसरे शब्दों में, स्थलीय बसावट में विशाल जलराशि के प्रवेश से इनका जलमग्न होना बाढ़ कहलाता है.
अन्य आपदाओं के तुलना में, बाढ़ के आपदा का कारण सबसे अधिक सुसपष्ट है. किसी ख़ास इलाके में निश्चित कारणों से ही अधिकांश बाढ़ आती है. भारत में बाढ़ आने का मुख्य कारण मॉनसूनी बारिश के कारण नदियों का उफान है. इसकी प्रकृति प्रभावित इलाकों के लोगों को अच्छे से ज्ञात होता है. इस वजह से भी नुकसान थोड़ा कम होता है.
बाढ़ के प्रकार (Types of Flood in Hindi)
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन सभी बाढ़ एक जैसी नहीं होती हैं. इनके उत्पन्न होने के कारण, गति, प्रभाव क्षेत्र और विनाश की तीव्रता में काफी अंतर पाया जाता है. कहीं अत्यधिक वर्षा के कारण नदियाँ उफान पर आ जाती हैं, तो कहीं कुछ ही घंटों में अचानक जलप्रवाह बढ़ने से फ्लैश फ्लड की स्थिति बन जाती है. वहीं तटीय क्षेत्रों में चक्रवात और समुद्री तूफान भी विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकते हैं.
भूगोल और आपदा प्रबंधन के अध्ययन में बाढ़ को उसके उत्पन्न होने के कारणों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है. सामान्यतः बाढ़ को तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जाता है— आकस्मिक बाढ़ (Flash Flood), नदी की बाढ़ (River Flood) और तटीय बाढ़ (Coastal Flood). प्रत्येक प्रकार की बाढ़ की अपनी विशेषताएँ, कारण और प्रभाव होते हैं, जिन्हें समझना आपदा प्रबंधन तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण है.
आकस्मिक बाढ़ (Flash Flood in Hindi)
आकस्मिक बाढ़ या फ्लैश फ्लड वह बाढ़ है, जो बहुत कम समय में अचानक उत्पन्न हो जाती है. सामान्यतः भारी वर्षा शुरू होने के छह घंटे के भीतर यह स्थिति बन सकती है. इस कारण इसे बाढ़ का सबसे खतरनाक रूप माना जाता है.
फ्लैश फ्लड प्रायः बादल फटने (Cloudburst), अत्यधिक वर्षा, चक्रवात, पहाड़ी क्षेत्रों में तेज जलप्रवाह या बांध टूटने जैसी घटनाओं से उत्पन्न होती है. इसमें जल का स्तर इतनी तेजी से बढ़ता है कि लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता.
हिमालयी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड की घटनाएँ अधिक देखने को मिलती हैं. वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ इसका प्रमुख उदाहरण है. केदारनाथ क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा और बादल फटने के कारण अचानक जलप्रवाह बढ़ गया, जिससे हजारों लोगों की जान चली गई और बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुकसान हुआ.
आकस्मिक बाढ़ की प्रमुख विशेषताएँ
अचानक और बहुत तेजी से विकसित होती है.
चेतावनी और निकासी के लिए समय कम मिलता है.
पहाड़ी और संकरे नदी घाटी क्षेत्रों में अधिक सामान्य है.
जान-माल की व्यापक क्षति का कारण बन सकती है.
भूस्खलन और मलबे के प्रवाह की संभावना बढ़ जाती है.
परीक्षा हेतु तथ्य
फ्लैश फ्लड सबसे कम चेतावनी अवधि वाली बाढ़ मानी जाती है.
बादल फटना (Cloudburst) फ्लैश फ्लड का प्रमुख कारण है.
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर इसके प्रति अधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं.
नदी की बाढ़ (River Flood in Hindi)
जब किसी नदी में उसकी वहन क्षमता से अधिक जल एकत्र हो जाता है और वह अपने किनारों से बाहर बहने लगती है, तब नदी की बाढ़ उत्पन्न होती है. यह बाढ़ बड़े जलग्रहण क्षेत्रों में लगातार वर्षा, हिमपिघलन या सहायक नदियों से बढ़े जलप्रवाह के कारण आती है.
नदी की बाढ़ सामान्यतः धीरे-धीरे विकसित होती है. कई बार इसके प्रभाव दिनों या सप्ताहों तक बने रहते हैं. फ्लैश फ्लड की तुलना में इसमें लोगों को तैयारी और सुरक्षित स्थानों पर जाने का कुछ समय मिल सकता है. हालांकि, यदि तटबंध टूट जाएँ तो स्थिति अचानक गंभीर हो सकती है.
भारत के उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में गंगा, ब्रह्मपुत्र, घाघरा, गंडक और कोसी जैसी नदियाँ नियमित रूप से बाढ़ लाती हैं. इन नदियों के आसपास की उपजाऊ भूमि कृषि के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन बाढ़ के समय यही क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होते हैं.
कोसी नदी : बिहार का शोक
कोसी नदी भारत और नेपाल के बीच बहने वाली एक महत्वपूर्ण नदी है. यह अपने मार्ग को बार-बार बदलने के लिए प्रसिद्ध है. ऐतिहासिक रूप से इस नदी ने कई बार अपना प्रवाह मार्ग बदला है, जिसके कारण बिहार के विशाल क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित हुए हैं.
वर्ष 2008 में नेपाल स्थित कुशाहा तटबंध के टूटने के बाद कोसी नदी ने अपना पुराना मार्ग अपना लिया. इसके परिणामस्वरूप बिहार के कई जिलों में विनाशकारी बाढ़ आई. लाखों लोग विस्थापित हुए और कृषि भूमि को भारी नुकसान पहुँचा.
इसी कारण कोसी नदी को लंबे समय से “बिहार का शोक” कहा जाता है.
नदी की बाढ़ की प्रमुख विशेषताएँ
बड़े नदी बेसिनों में विकसित होती है.
प्रभाव कई दिनों या सप्ताहों तक रह सकता है.
कृषि भूमि और ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक प्रभावित करती है.
तटबंध टूटने पर विनाश कई गुना बढ़ सकता है.
बड़े पैमाने पर जनसंख्या विस्थापन का कारण बन सकती है.
परीक्षा हेतु तथ्य
कोसी नदी को “बिहार का शोक” कहा जाता है.
ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिन भारत के प्रमुख बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं.
नदी की बाढ़ भारत में सबसे सामान्य प्रकार की बाढ़ मानी जाती है.
तटीय बाढ़ (Coastal Flood in Hindi)
तटीय क्षेत्रों में समुद्र के जलस्तर में असामान्य वृद्धि होने पर तटीय बाढ़ उत्पन्न होती है. यह बाढ़ मुख्यतः चक्रवात, तूफानी ज्वार (Storm Surge), उच्च ज्वार (High Tide) और समुद्री तूफानों के कारण आती है.
जब कोई शक्तिशाली चक्रवात समुद्र तट से टकराता है, तो उसकी तेज हवाएँ समुद्री जल को तट की ओर धकेल देती हैं. परिणामस्वरूप समुद्र का जल सामान्य स्तर से कई मीटर ऊपर उठ सकता है और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश कर जाता है. इसे तूफानी ज्वार कहा जाता है.
भारत के पूर्वी तट, विशेष रूप से ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल, तटीय बाढ़ के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं. बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात अक्सर बड़े पैमाने पर तटीय बाढ़ का कारण बनते हैं.
ओडिशा सुपर चक्रवात, 1999
वर्ष 1999 में ओडिशा में आए सुपर चक्रवात ने व्यापक तबाही मचाई थी. चक्रवात के साथ उत्पन्न तूफानी ज्वार के कारण समुद्री जल कई किलोमीटर अंदर तक प्रवेश कर गया. हजारों लोगों की मृत्यु हुई और लाखों लोग प्रभावित हुए.
चक्रवात अम्फान, 2020
चक्रवात अम्फान ने पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में भारी नुकसान पहुँचाया. तेज हवाओं और समुद्री जलस्तर में वृद्धि के कारण कई क्षेत्रों में तटीय बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई.
तटीय बाढ़ की प्रमुख विशेषताएँ
समुद्र तट के समीप क्षेत्रों में होती है.
चक्रवात और तूफानी ज्वार से जुड़ी होती है.
खारे पानी के प्रवेश से कृषि भूमि प्रभावित होती है.
मत्स्य पालन और तटीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाती है.
समुद्र-स्तर वृद्धि के कारण भविष्य में इसका जोखिम बढ़ रहा है.
परीक्षा हेतु तथ्य
तटीय बाढ़ का प्रमुख कारण Storm Surge (तूफानी ज्वार) है.
बंगाल की खाड़ी का तट भारत का सबसे अधिक चक्रवात प्रभावित क्षेत्र है.
जलवायु परिवर्तन और समुद्र-स्तर वृद्धि तटीय बाढ़ के जोखिम को बढ़ा रहे हैं.
शहरी बाढ़ (Urban Flood)
जब किसी शहर में अत्यधिक वर्षा होने के बाद पानी सड़कों, कॉलोनियों, बाजारों और भवनों में भर जाता है, तब उसे शहरी बाढ़ (Urban Flood) कहा जाता है. यह समस्या मुख्य रूप से बड़े शहरों में अधिक देखने को मिलती है.
शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट की सड़कें, भवन और पार्किंग स्थल वर्षा जल को भूमि के भीतर जाने नहीं देते. परिणामस्वरूप पानी तेजी से जमा होने लगता है. यदि जल निकासी व्यवस्था कमजोर हो, नालों पर अतिक्रमण हो या जलाशयों को पाट दिया गया हो, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है. भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण शहरी बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं.
मुंबई की बाढ़, 2005
26 जुलाई 2005 को मुंबई में लगभग 24 घंटे के भीतर रिकॉर्ड वर्षा हुई. कई क्षेत्रों में सड़कें नदी जैसी दिखाई देने लगीं. रेल सेवाएँ, हवाई यातायात और दैनिक जीवन लगभग ठप हो गया था. लाखों लोग घंटों तक सड़कों पर फँसे रहे. भारी वर्षा के साथ-साथ कमजोर जल निकासी और मीठी नदी (Mithi River) के आसपास बढ़ते अतिक्रमण को भी इस आपदा का एक महत्वपूर्ण कारण माना गया.
चेन्नई की बाढ़, 2015
वर्ष 2015 में चेन्नई में लगातार भारी वर्षा हुई, जिससे शहर के अनेक भाग जलमग्न हो गए. कई आवासीय क्षेत्र, अस्पताल और व्यावसायिक परिसर पानी में डूब गए. हवाई अड्डे का संचालन भी प्रभावित हुआ. विशेषज्ञों के अनुसार, जल निकासी की कमी, जलाशयों एवं आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण तथा अत्यधिक वर्षा इस आपदा के प्रमुख कारण थे. चेन्नई की बाढ़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि अनियोजित शहरी विकास भविष्य में बड़े संकट उत्पन्न कर सकता है.
शहरी बाढ़ के प्रमुख कारण
अत्यधिक वर्षा
कमजोर जल निकासी व्यवस्था
नालों और नदियों पर अतिक्रमण
जलाशयों और आर्द्रभूमियों का नष्ट होना
अनियोजित शहरीकरण
जलवायु परिवर्तन
शहरी बाढ़ के प्रभाव
यातायात व्यवस्था बाधित हो जाती है.
घरों और दुकानों को भारी नुकसान होता है.
बिजली और संचार सेवाएँ प्रभावित होती हैं.
जलजनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है.
आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ जाती हैं.
बांधटूटनेसेउत्पन्नबाढ़ (Dam Break Flood)
जब किसी बांध की दीवार, तटबंध या जल नियंत्रण संरचना अचानक क्षतिग्रस्त हो जाती है और बड़ी मात्रा में जल एक साथ बाहर निकल जाता है, तब बांध टूटने से उत्पन्न बाढ़ आती है.
यह बाढ़ सामान्य बाढ़ की तुलना में अधिक विनाशकारी हो सकती है, क्योंकि इसमें पानी अत्यधिक वेग और दबाव के साथ नीचे के क्षेत्रों की ओर बढ़ता है. कई बार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का समय भी नहीं मिल पाता.
गुजरात का मोरबी बांध हादसा, 1979
भारत के इतिहास में सबसे चर्चित बांध दुर्घटनाओं में से एक 1979 का मोरबी (Machchu Dam) हादसा है. गुजरात में स्थित मच्छू-2 बांध के टूटने के बाद विशाल जलराशि मोरबी शहर की ओर बढ़ी. इस घटना में हजारों लोगों की मृत्यु हुई और व्यापक जन-धन की हानि हुई. इसे भारत की सबसे गंभीर बांध-संबंधी आपदाओं में गिना जाता है.
बांध टूटने के प्रमुख कारण
अत्यधिक वर्षा और जलभराव
बांध की संरचनात्मक कमजोरी
निर्माण संबंधी त्रुटियाँ
रखरखाव की कमी
भूकंप या भूस्खलन
जल प्रबंधन में लापरवाही
बांध टूटने से होने वाले प्रभाव
अचानक और तीव्र बाढ़
जनहानि और पशुहानि
फसलों का विनाश
पुल, सड़क और भवनों की क्षति
पेयजल एवं विद्युत व्यवस्था पर प्रभाव
बचाव के उपाय
बांधों का नियमित निरीक्षण
आधुनिक चेतावनी प्रणाली
आपदा प्रबंधन योजना
जोखिम वाले क्षेत्रों का मानचित्रण
समय-समय पर संरचनात्मक मरम्मत
बांध सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित निगरानी और समय पर रखरखाव से ऐसी आपदाओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
जलवायु परिवर्तन और बाढ़ (Climate Change and Flood)
पिछले कुछ दशकों में दुनिया के अनेक भागों में बाढ़ की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी गई है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) एक महत्वपूर्ण कारण है. पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने जल चक्र (Water Cycle) को प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल रहा है.
सामान्यतः गर्म वातावरण अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है. जब यह जलवाष्प संघनित होती है, तो कम समय में अत्यधिक वर्षा हो सकती है. यही कारण है कि कई क्षेत्रों में भारी वर्षा और अचानक बाढ़ की घटनाएँ पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही हैं.
जलवायु परिवर्तन बाढ़ को कैसे प्रभावित करता है?
1. अत्यधिकवर्षाकीघटनाओंमेंवृद्धि
जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ रही है. इससे कई क्षेत्रों में अल्प समय में अत्यधिक वर्षा होने लगी है. ऐसी स्थिति में नदियाँ, नाले और जल निकासी तंत्र अतिरिक्त जल को संभाल नहीं पाते, जिससे बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है.
भारत में मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में हाल के वर्षों में अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ी हैं. कई बार कुछ घंटों की वर्षा ही पूरे शहर को जलमग्न कर देती है.
2. हिमनदोंकेपिघलनेकाप्रभाव
वैश्विक तापमान बढ़ने से हिमालयी हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं. इससे नदियों में जलप्रवाह बढ़ सकता है. कई बार हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes) टूट जाती हैं, जिससे अचानक बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.
उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएँ पिछले वर्षों में चर्चा का विषय रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) का खतरा और बढ़ सकता है.
3. समुद्र–स्तरमेंवृद्धि
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है. समुद्री जल के ऊष्मीय प्रसार और ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से यह प्रक्रिया तेज हो रही है.
समुद्र-स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है. चक्रवात के समय समुद्री जल अधिक अंदर तक प्रवेश कर सकता है. भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में यह चुनौती भविष्य में और गंभीर हो सकती है.
4. चक्रवातोंकीतीव्रतामेंवृद्धि
वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि गर्म समुद्री जल चक्रवातों को अधिक ऊर्जा प्रदान करता है. परिणामस्वरूप कई चक्रवात पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली हो रहे हैं.
शक्तिशाली चक्रवात अक्सर भारी वर्षा, तेज हवाओं और तूफानी ज्वार (Storm Surge) के माध्यम से तटीय बाढ़ को जन्म देते हैं.
धरातल की वास्तविकता
जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित विषय नहीं रह गया है. इसके प्रभाव अब लोगों के दैनिक जीवन में भी दिखाई देने लगे हैं. पहले जहाँ कुछ क्षेत्रों में दशकों में एक बार बड़ी बाढ़ आती थी, वहीं अब ऐसी घटनाएँ कम अंतराल पर देखने को मिल रही हैं.
कई शहरों में रिकॉर्ड वर्षा की घटनाएँ लगातार दर्ज की जा रही हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड की घटनाएँ बढ़ी हैं. तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. साथ ही, किसानों को फसलों के नुकसान का सामना अधिक बार करना पड़ रहा है.
अध्ययन क्या बताते हैं?
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर किए गए अनेक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण चरम मौसमी घटनाएँ (Extreme Weather Events) अधिक सामान्य होती जा रही हैं.
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में वर्षा कम दिनों में लेकिन अधिक तीव्रता के साथ हो सकती है. इसका अर्थ है कि सूखा और बाढ़ दोनों की संभावना एक ही क्षेत्र में बढ़ सकती है.
अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की विभिन्न रिपोर्टों में भी अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जोखिम के बीच संबंध पर प्रकाश डाला गया है. वहीं विश्व मौसम संगठन (WMO) ने भी चेतावनी दी है कि बदलती जलवायु बाढ़ से जुड़े जोखिमों को बढ़ा रही है.
भारत के कुछ प्रमुख उदाहरण
केरलबाढ़, 2018
वर्ष 2018 में केरल में असामान्य रूप से भारी वर्षा हुई. नदियाँ उफान पर आ गईं और कई बांधों से जल छोड़ना पड़ा. यह भारत की सबसे विनाशकारी बाढ़ घटनाओं में से एक मानी जाती है.
उत्तराखंडआपदा, 2013
अत्यधिक वर्षा और बादल फटने की घटनाओं ने अचानक बाढ़ और भूस्खलन को जन्म दिया. इससे हजारों लोग प्रभावित हुए और भारी जन-धन की हानि हुई.
चेन्नईबाढ़, 2015
लगातार भारी वर्षा, शहरीकरण और कमजोर जल निकासी व्यवस्था ने चेन्नई में व्यापक जलभराव की स्थिति पैदा कर दी. यह शहरी बाढ़ का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है.
इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन ने बाढ़ की प्रकृति और आवृत्ति दोनों को प्रभावित किया है. आज केवल अधिक वर्षा ही नहीं, बल्कि अनियमित वर्षा, समुद्र-स्तर वृद्धि, तीव्र चक्रवात और हिमनदों के पिघलने जैसी प्रक्रियाएँ भी बाढ़ के जोखिम को बढ़ा रही हैं. यदि समय रहते जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और बेहतर आपदा प्रबंधन अपनाने के प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य में बाढ़ की घटनाएँ और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
जलवायु परिवर्तन और बाढ़ के बीच सीधा संबंध माना जाता है.
बढ़ता तापमान वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ाता है.
समुद्र-स्तर वृद्धि तटीय बाढ़ के जोखिम को बढ़ाती है.
हिमालयी हिमनदों का पिघलना नदी बाढ़ और GLOF की संभावना बढ़ा सकता है.
IPCC और WMO ने जलवायु परिवर्तन को बाढ़ जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया है.
मॉनसून, हिमालय व बाढ़ (Monsoon, Himalayas and Floods)
आज से करोडो वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप गोंडवाना नाम के उपमहाद्वीप (भूभाग) का हिस्सा था. इससे भूमध्य सागर की प्लेट टकरा गई. इस वजह से आज जहाँ हिमालय स्थित है, वहां की भूमि काफी ऊपर उठ गई व इससे हिमालय का निर्माण हुआ. इसके दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप व उत्तर में तिब्बत का पठार स्थित है.
हिमालय, हिन्द महासागर व अरब सागर से आने वाले मॉनसूनी हवाओं के लिए अवरोध का काम करता है. मॉनसूनी हवाएं समुद्री से चलती है, इसलिए इनकी आद्रता काफी अधिक होती है. हिमालय से टकराने के बाद ये हवाएं वापस लौटने लगती है. इस दौरान इसमें स्थित जल के नन्हें कण बर्षा के बूंदों में धीरे-धीरे बदलने लगती है. फिर यह भारत, बांग्लादेश व पाकिस्तान (दक्षिण एशिया) में जोरदार बारिश करती है.
मॉनसूनी बारिश काफी तीव्र होते है, जो चार माह तक चलते है. इस वजह से हिमालय के आसपास विशाल जलराशि का जमाव हो जाता है. जो आगे चलकर मैदानी इलाकों में बाढ़ का कारण बनता है.
भारतीय बाढ़ की प्रकृति (Nature of Indian Flood in Hindi)
भारत भौगोलिक रूप से विविधतापूर्ण है. यहाँ पर्वत श्रृंखला, समुद्र तट, मैदानी व पथरी इलाके व रेगिस्तान तक है. साथ ही, पुरे देश में सदाबहार व मौसमी नदियों का बड़ा जाल बिछा हुआ है. देश में साल के निश्चित महीनों के दौरान ही भारी वर्षा होती है. उपर्युक्त भौगोलिक कारकों के अतिरिक्त, मानवीय कारक भी बाद के प्रकृति को प्रभावित करते है.
1. मॉनसूनी प्रकृति के बाढ़ (Monsoon Triggered Floods in Hindi)
भारत में हरेक साल कुछ निश्चित इलाकों में ही बाढ़ आते है. ये इलाके हिमालय के तलहटी में स्थित है. इन इलाकों से हिमालय से निकलने वाले नदियों का जाल बिछा है. जब मॉनसून के वक्त तेज बारिश होती है, तो हिमालय के ऊपरी इलाके से पानी नदियों से बहते हुए निचले इलाकों में फ़ैल जाता है.
इसके नीचे उतरने के साथ ही मैदानी भागों में भी जोरदार बारिश होती है. मैदानी इलाकों का पानी जब इन नदियों से मिलता है, तो विशाल जलराशि का निर्माण होता है. इस तरह भारत के अधिकतर राज्यों में बाढ़ आती है.
2. हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ (Flood in Himalayan Region in Hindi)
कई बार जलाशयों या तालाबों के भर जाने से इनका किनारा टूट जाता है. इससे पैदा हुई बाढ़ भारी तबाही लाती है. ऐसा हाल ही में उत्तराखंड में देखने को मिला है.
“उत्तराखंड में 7 फरवरी 2021 को बाहरी गढ़वाल इलाके में स्थित नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान से भीषण बाढ़ (Flash Flood) शुरू हुई. इसका कारण भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियल झील का किनारा टूटना माना जाता है. इसके कारण ऋषिगंगा, धौलीगंगा, और अलकनंदा नदी में बाढ़ आ गई. ये तीनों धाराएं आगे चलकर गंगा नदी का निर्माण करती है. इस बाढ़ से चमौली जिला सबसे अधिक प्रभावित हुआ. इस आपदा में कम से कम 38 लोग मरे गए और लगभग 168 लोग लापता हुए.”
3. तटीय व अन्य क्षेत्रों में बाढ़ (Flood in Coastal and Other Areas in Hindi)
भारत में, तटीय क्षेत्रों में तूफान, लंबे समय तक तेज़ बारिश, हिम का पिघलना, ज़मीन की जल अवशोषण क्षमता में कमी होना और अधिक मृदा अपरदन के कारण नदी के तल में जलोढ़ मिट्टी की मात्रा में वृद्धि से भी कई बार भयावह बाढ़ आते है.
इसके विस्तार में मानवीय हस्तक्षेप भी जिम्मेदार है. अंधाधुंध वन कटाव, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, प्राकृतिक अपवाह तंत्रों का अवरुद्ध होना तथा नदी तल और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में मानव बसाव की वजह से बाढ़ की तीव्रता, परिमाण, बारम्बारता और विध्वंसता बढ़ जाती है.
बाढ़ का जन-जीवन पर प्रभाव (Impact of Flood on Lifestyle in Hindi)
इस आपदा से जनजीवन को भारी नुकसान होता है. इससे सार्वजनिक व निजी सम्पति, बुनियादी ढांचे, लोगों के मनोविज्ञान व भावनाओं को काफी नुकसान होता है. अक्सर, बाढ़ प्रभावित इलाके के लोग, शहरों की ओर मजदूरी के लिए पलायन कर जाते है. जब वे अपने इलाकों की तुलना इन शहरों से करते है, तो वे राज्य से खुद को ठगा हुआ महसूस करते है. इस तरह बाढ़ से लोगों को मानसिक आघात पहुँचता है.
बाढ़ से प्रभावित इलाका, देश के मुख्य भू-भाग से अलग हो जाता है. इस वजह से ऐसे इलाके में सभी आर्थिक क्रियाकलाप ठप्प हो जाते है. इससे व्यापारियों को तो नुकसान होता ही है. लेकिन, सबसे अधिक नुकसान उन गरीबों का होता है जिन्होंने पाई-पाई जोड़कर झोपडी खड़ी की होती है. उनका कमजोर आशियाना भी बाढ़ की पानी में बह जाता है. मवेशियों, फसलों, खाद्य भंडार, मवेशी चारा व जनहानि बाढ़ के मुख्य विशेषताएं है.
बाढ़ग्रस्त इलाके (Flood Hit Areas) में व्यापार के साथ ही, कृषि, औद्योगिक उत्पादन, शिक्षा, यातायात व अन्य जरुरी सेवाएं ठप्प हो जाती है. इस तरह बाढ़ग्रस्त इलाका कुछ समय के लिए आदिमयुग में पहुँच जाता है.
भारत के बाढ़ ग्रस्त इलाके (Flood Prone Areas of India in Hindi)
हमारे देश भारत का करीब 12.5% हिस्सा बाढ़ क्षेत्र में शामिल है. यहाँ बाढ़ आने का मुख्य कारण हिमालय से निकलने वाली तीन नदी तंत्र है. पश्चिम में सिंधु, उत्तर में गंगा और पूर्वोत्तर में ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र. इन नदियों के किनारे स्थित कई किलोमीटर के इलाके हरेक साल बाढ़ से प्रभावित होते है. इन तंत्रों से मुख्यतः जम्मू-कश्मीर का कुछ इलाका, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार प्रभावित होता है.
पंजाब और उत्तर प्रदेश में भी अक्सर बाढ़ आते रहते है. वहीं, पर्यावरण असंतुलन के कारण, राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में कुछ सालों से आकस्मिक बाढ़ आने लगे है.
साथ ही, तीव्र समुद्री तूफ़ान व चक्रवात के वजह से, तटीय इलाकों में जोरदार बारिश होती है. इन बारिशों से उड़ीसा, तमिलनाडु, आंध्र और तेलंगाना व केरल जैसे राज्य मुख्य रूप से प्रभावित होते है. साथ ही, लौटती मॉनसून के कारण नवंबर से जनवरी के दौरान तमिलनाडु में काफी बारिश होती है. इससे तमिलनाडु में कभी-कभार बाढ़ आ जाते है.
भारत में बाढ़ की व्यापकता (Prevalence of Floods in India in Hindi)
द एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार, बाढ़ की आपदा (Calamity of Flood) भारत में सबसे ज्यादा क्षति करती है. देश के कुल प्राकृतिक आपदाओं के नुकसान का 50 प्रतिशत केवल बाढ़ से होता है.
राष्ट्रीय बाढ़ आयोग और असम सरकार की रिपोर्ट (2018) के अनुसार, असम के कुल भौगौलिक क्षेत्र 78.52 लाख हेक्टेयर है. इनमें 31.05 लाख हेक्टेयर अर्थात लगभग 40 फीसदी क्षेत्रफल सालाना बाढ़ से प्रभावित होता है. बिहार की स्थिति भी कुछ ऐसा ही है. उत्तर बिहार का 73.63 प्रतिशत भाग बाढ़ प्रभावित है. हर साल राज्य के 38 में से 28 जिलों में बाढ़ आती है.
बिहार, भूटान और सिक्किम से चलकर हिमालय की कई नदिया पश्चिम बंगाल पहुँचती है. गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन का हिस्सा होने के कारण, उत्तर बंगाल अत्यधिक बाढ़ प्रवण है. राज्य के कुछ हिस्सों में सलाना बाढ़ आते है. साथ ही, देश के अलग-अलग हिस्सों में अत्यधिक बारिश से भी बाढ़ के हालात उत्पन्न हो जाते है. समुद्रतटीय इलाकों में भी सुनामी व चक्रवातीय बारिश से बाढ़ का आकस्मिक खतरा बना रहता है.
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात व उत्तराखंड भी बर्षा के दिनों में बाढ़ की चपेट में आ जाते है. हालाँकि, इन राज्यों के कुछ हिस्से में ही बाढ़ आता है.
नदियों में बाढ़ आने के प्रमुख कारण (Causes of River Flooding in Hindi)
जलग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा या सहायक नदियों से मुख्य नदी को क्षमता से अधिक जल प्राप्त होने से इनका पानी आश्रय स्थलों में फ़ैल जाता है.
भूस्खलन के कारण नदी के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होने से नदी अपना मार्ग बदल देती है. इससे अचानक व भारी तबाही वाली बाढ़ आती है.
वनों की कटाई से नदियों के पेंदी में गाद बहकर जमा हो जाता है. नदी के पहाड़ो व जलग्रहण क्षेत्र में वनों की कटाई से मिट्टी, बालू, कंकड़-पत्थर बहकर नदियों के तलछट में जमा हो जाती है. इन गाडों की सफाई न होने से नदी का जल बड़े इलाके में फ़ैल जाता है. इस तरह बाढ़ आ जाती है.
प्राकृतिक जल निकास में मानवीय व अन्य अवरोध. जैसे, तटबंधों, नहरों, सड़क पुलों और रेलवे के कारण नदी की चौड़ाई व बहाव बाधित होना.
इसके अलावा निम्न कारणों से भी बाढ़ आते है (Other reasons of Flood in Hindi)
चक्रवात और बहुत तीव्र वर्षा;
भरे हुए नदी के इलाकों में तेज बारिश;
बादल फटना;
ज्वार-भाटा; और
सुनामी इत्यादि.
बाढ़ राज्य सूची का विषय कैसे है? (Flood: A State Issue in Hindi)
सिंचाई और जल प्रबंधन राज्य सूचि का विषय है. लेकिन, आपदा प्रबंधन का उल्लेख न तो राज्य सूची और न ही समवर्ती सूची में है. इसलिए, अनुच्छेद 248 के तहत, संघ सूची की प्रविष्टि संख्या 97 के समानांतर आपदा प्रबंधन अधिनियम को केंद्र द्वारा लागू किया जा सकता है.
वहीं, कटाव नियंत्रण सहित बाढ़ प्रबंधन राज्य सूचि में शामिल है. इससे जुडी योजनाएं राज्य सरकार अपने प्राथमिकता के अनुसार अमल में लाती है. इसके लिये केंद्र सरकार राज्यों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करती है.
कई बार दो राज्यों में स्थित जलस्त्रोतों को लेकर दोनों में विवाद हो जाते है. साथ ही सूखे व कम जल संसाधन वाले राज्यों को अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. रावी-व्यास, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महादाई और कृष्णा नदी जल विवाद इसी तरह से उपजे है. इसलिए जल को समवर्ती सूचि में लाने का मांग उठता रहता है.
बाढ़ के विनाशकारी परिणाम (Devastating Consequences of Flood in Hindi)
बाढ़ के मैदानों (Flood Fields) में सबकुछ जलमग्न हो जाता है. कमजोर इमारत के ढहने से जनहानि होती है. इमारतों के बेसमेंट डूबने से मकान गिरने का खतरा रहता है.
आधारभूत संरचना, जैसे सड़कें, रेल मार्गों, पुल; और मानव बस्तियों को भी नुकसान पहुँचता है.
सीवरेज, पानी की आपूर्ति, संचार लाइनों और बिजली आपूर्ति बाधित हो जाता है.
गोदामों में खाद्य भंडार, कृषि क्षेत्र व फसल, पशुधन, वाहन, मशीनरी और जमीन पर लगे उपकरण, मछली पकड़ने वाली नावें भी बर्बाद हो जाता है.
इलाके में हैजा, आंत्रशोथ (Enteritis), हेपेटाईटिस एवं अन्य दूषित जलजनित बीमारियाँ फैल जाती हैं.
आर्थिक गतिविधि ठप्प होने से लोगों के आजीविका का साधन भी छीन जाते है. इसलिए बाढ़ग्रस्त इलाके में गरीबी आम है. यह गरीबी, निर्धनों में मानसिक तनाव का कारण भी बनता है.
संभावित लाभ (Some Benefits of Flood in Hindi)
बाढ़ से होने वाले नुकसान के तुलना में इससे प्राप्त होने वाला लाभ नगण्य है.
इससे नदी द्वारा बहाकर लाइ गई नई जलोढ़ मृदा की परत बिछ जाती है. यह काफी उपजाऊ होती है.
भूजल का स्तर भी बाढ़ के पानी के कारण सुधर जाता है.
बाढ़ नियंत्रण के उपाय (Flood Control Measures in Hindi)
1. अवसंरचनात्मक तैयारी (Infrastructure in Flood Areas in HIndi)
प्राकृतिक जल-बहाव के क्षेत्र में निर्माण का निषेध या कमतर निर्माण: नदी के किनारे दो से तीन किलोमीटर तक के इलाके को सिर्फ खेती के लिए आरक्षित कर इसे खुला रखा जा सकता है. बाढ़ का पानी उतरने के बाद यहाँ फिर से खेती की जा सकेगी. इस इलाके के बाद ही आवासीय, व्यावसायिक व अन्य निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए. नियोजित विकास, हरित पट्टी का विकास, प्राकृतिक व मानव-निर्मित जलनिकासी व्यवस्था में सुधार, बाढ़ से बचने में सहायक होते है.
2. नदियों को परस्पर जोड़ना:
यह भी इसका एक उपाय माना जाता है. केंद्र सरकार की केन-बेतवा, दमनगंगा-पिंजाल, पार-तापी-नर्मदा, महानदी – गोदावरी, और मानस-संकोश-तीस्ता-गंगा नदियों को आपस में जोड़ने का लक्ष्य है.
इन परियोजनाओं के लागु हो जाने से 35 मिलियन हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी. इससे समग्र सिंचाई क्षमता 140 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 175 मिलियन हेक्टेयर हो जाएग. इससे बाढ़ नियंत्रण, नौवहन, जलापूर्ति, मातिस्यिकी, लवणता तथा प्रदूषण नियंत्रण आदि लाभ प्राप्त होंगे. इसके अतिरिक्त 34000 मेगावाट विद्युत शक्ति का उत्पादन भी होगा.
3. ऐतिहासिक बाढ़ से सबक (Lessons from Past Floods in Hindi)
बाढ़ की आपदा देश में हरेक वर्ष विभिन्न इलाकों में आते है. इलाकों में इसके कारण और विनाशलीला की व्यापकता के आधार पर व्यापक तैयारी कर, इससे होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है.
4. संस्थागत सतर्कता (Vigilance on Flood)
नागरिकों में जागरूकता व सतर्कता, स्वास्थ्य व आपदा कर्मियों को पूर्व प्रशिक्षण से बाढ़ की विभीषिका के प्रभाव को हम कम कर सकते है.
5. तटबंध (Embankment against Flood)
नदी के किनारे से दो से तीन किलोमीटर दूर तक इसका क्षेत्र विस्तारित रहता है. इस इलाके के बाद तटबंधों का निर्माण कर अन्य इलाकों में बाढ़ फैलने से रोका जा सकता है.
6. ईमानदार प्रयास (Unselfish Efforts against Flood)
सरकार बाढ़ रोकने के लिए अनेक योजनाएं चला रही है. लेकिन, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अवैज्ञानिक विकास कार्य आदि को रोके बिना ऐसा असंभव है.
7. बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System)
बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए समय पर चेतावनी अत्यंत महत्वपूर्ण है. आज मौसम उपग्रहों, रडारों और कंप्यूटर मॉडलों की सहायता से वर्षा तथा नदी जलस्तर का पूर्वानुमान लगाया जाता है.
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) समय-समय पर बाढ़ संबंधी चेतावनी जारी करते हैं. समय पर प्राप्त चेतावनी लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचने का अवसर देती है, जिससे जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
8. बाढ़ क्षेत्र मानचित्रण (Floodplain Mapping)
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्रण बाढ़ प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण उपाय है. इसके अंतर्गत उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है, जहाँ बार-बार बाढ़ आने की संभावना रहती है.
इस जानकारी के आधार पर प्रशासन सुरक्षित क्षेत्रों में आवासीय और औद्योगिक विकास की योजना बना सकता है. इससे जोखिम वाले क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण को रोका जा सकता है.
9. आर्द्रभूमियों और जलाशयों का संरक्षण
आर्द्रभूमियाँ (Wetlands), झीलें और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र अतिरिक्त वर्षा जल को अपने भीतर संग्रहित करने की क्षमता रखते हैं. इन्हें प्रकृति का प्राकृतिक स्पंज भी कहा जाता है.
जब इन क्षेत्रों पर अतिक्रमण या निर्माण कार्य किया जाता है, तो वर्षा जल के लिए उपलब्ध प्राकृतिक भंडारण क्षमता कम हो जाती है. परिणामस्वरूप बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए जलाशयों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण बाढ़ नियंत्रण का एक प्रभावी उपाय है.
10. वनीकरण और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन
वन वर्षा जल को भूमि में अवशोषित करने में सहायता करते हैं. वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं और सतही बहाव को कम करती हैं.
वनों की कटाई से वर्षा का जल तेजी से नदियों और नालों में पहुँचता है, जिससे बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए वनीकरण और जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्यक्रम बाढ़ नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
11. शहरी बाढ़ प्रबंधन
तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने अनेक शहरों में बाढ़ की समस्या को गंभीर बना दिया है. वर्षा जल निकासी प्रणाली का नियमित रखरखाव, नालों की सफाई, वर्षा जल संचयन तथा जलनिकासी मार्गों पर अतिक्रमण हटाना शहरी बाढ़ को कम करने के प्रभावी उपाय हैं.
मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में शहरी बाढ़ की घटनाओं ने इस दिशा में बेहतर योजना की आवश्यकता को स्पष्ट किया है.
12. सामुदायिक भागीदारी और आपदा शिक्षा
बाढ़ प्रबंधन केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है. स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है.
स्कूलों, पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से लोगों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा सकता है. नियमित मॉक ड्रिल, राहत शिविरों की जानकारी और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था बाढ़ के समय लोगों की सुरक्षा बढ़ाती है.
आधुनिक समय में केवल तटबंध या बांध बनाना पर्याप्त नहीं माना जाता. विशेषज्ञ अब एकीकृत बाढ़ प्रबंधन (Integrated Flood Management) पर बल देते हैं.
इसके अंतर्गत नदी बेसिन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, भूमि उपयोग नियोजन, मौसम पूर्वानुमान, सामुदायिक जागरूकता और आपदा प्रबंधन को एक साथ जोड़ा जाता है. यह बाढ़ नियंत्रण का सबसे टिकाऊ और दीर्घकालिक दृष्टिकोण माना जाता है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
CWC (Central Water Commission) भारत में बाढ़ पूर्वानुमान जारी करता है.
IMD मौसम संबंधी चेतावनियाँ जारी करता है.
Wetlands प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रक के रूप में कार्य करती हैं.
Floodplain Mapping आधुनिक बाढ़ प्रबंधन का महत्वपूर्ण भाग है.
Integrated Flood Management (IFM) वर्तमान में विश्व स्तर पर अपनाई जा रही प्रमुख रणनीति है.
बाढ़प्रबंधनमेंप्रमुखसंस्थाओंकीभूमिका
बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत में कई संस्थाएँ कार्य करती हैं. कुछ संस्थाएँ मौसम और बाढ़ का पूर्वानुमान जारी करती हैं, जबकि कुछ राहत एवं बचाव कार्यों का संचालन करती हैं. इनके समन्वित प्रयासों से बाढ़ के दौरान होने वाली जन-धन की हानि को कम किया जा सकता है.
1. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) भारत में आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च संस्था है. इसका गठन वर्ष 2005 के आपदा प्रबंधन अधिनियम के अंतर्गत किया गया था.
NDMA विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक और मानवजनित आपदाओं के लिए दिशा-निर्देश तैयार करता है. बाढ़ की स्थिति में यह केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करता है तथा दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन योजनाएँ तैयार करता है.
उदाहरण के लिए, NDMA ने बाढ़, शहरी बाढ़ और ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जैसी आपदाओं के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश जारी किए हैं.
परीक्षाहेतुतथ्य
स्थापना : 2005
अध्यक्ष : भारत के प्रधानमंत्री
मुख्य कार्य : आपदा प्रबंधन नीति एवं दिशा-निर्देश तैयार करना
2. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force – NDRF) बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान राहत और बचाव कार्यों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित बल है.
जब किसी क्षेत्र में गंभीर बाढ़ आती है, तो NDRF की टीमें नावों, आधुनिक उपकरणों और बचाव सामग्री के साथ प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचती हैं. यह लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने, चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने और राहत सामग्री वितरित करने का कार्य करती हैं.
वर्ष 2018 की केरल बाढ़ तथा 2023 के हिमाचल प्रदेश बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में NDRF की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही थी.
परीक्षाहेतुतथ्य
गठन : 2006
नियंत्रण : गृह मंत्रालय
मुख्य कार्य : राहत एवं बचाव अभियान
3. राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF)
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (State Disaster Response Force – SDRF) राज्य स्तर पर कार्य करने वाली विशेष बचाव इकाई है.
SDRF की टीमों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाता है. बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात और अन्य आपदाओं के दौरान यह राज्य प्रशासन के साथ मिलकर कार्य करती है.
कई बार किसी आपदा की प्रारंभिक प्रतिक्रिया SDRF द्वारा ही दी जाती है, जबकि आवश्यकता पड़ने पर NDRF की अतिरिक्त सहायता ली जाती है.
परीक्षाहेतुतथ्य
राज्य सरकारों के अधीन कार्य करती है.
स्थानीय आपदाओं में प्रथम प्रतिक्रिया बल के रूप में कार्य करती है.
NDRF के साथ समन्वय स्थापित करती है.
4. केंद्रीय जल आयोग (CWC)
केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission – CWC) भारत की प्रमुख जल संसाधन संस्था है. यह देश की नदियों के जलस्तर की निगरानी करती है तथा बाढ़ पूर्वानुमान जारी करती है.
देशभर में स्थापित विभिन्न जलमापन केंद्रों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर CWC संभावित बाढ़ की चेतावनी जारी करता है. इससे प्रशासन और स्थानीय लोगों को समय रहते तैयारी करने का अवसर मिलता है.
गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी और महानंदा जैसी नदियों में बाढ़ पूर्वानुमान जारी करने में CWC की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
परीक्षाहेतुतथ्य
स्थापना : 1945
मुख्यालय : नई दिल्ली
मुख्य कार्य : जल संसाधन प्रबंधन एवं बाढ़ पूर्वानुमान
5. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department – IMD) देश की आधिकारिक मौसम एजेंसी है. यह वर्षा, चक्रवात, तूफान और अन्य मौसम संबंधी घटनाओं का पूर्वानुमान जारी करती है.
बाढ़ प्रबंधन में IMD की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश बाढ़ अत्यधिक वर्षा से जुड़ी होती हैं. मौसम संबंधी सटीक जानकारी मिलने पर प्रशासन पहले से तैयारी कर सकता है.
उदाहरण के लिए, बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवातों और उनसे होने वाली भारी वर्षा के संबंध में IMD नियमित चेतावनी जारी करता है.
परीक्षाहेतुतथ्य
स्थापना : 1875
मुख्यालय : नई दिल्ली
मुख्य कार्य : मौसम पूर्वानुमान एवं चेतावनी जारी करना
बाढ़ प्रबंधन में इन संस्थाओं का समन्वय
बाढ़ के दौरान इन सभी संस्थाओं की भूमिकाएँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं. IMD मौसम का पूर्वानुमान जारी करता है. CWC नदी जलस्तर की निगरानी करता है. NDMA नीतिगत दिशा प्रदान करता है. SDRF और NDRF राहत एवं बचाव कार्यों को जमीन पर लागू करते हैं.
इन्हीं संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से समय पर चेतावनी, प्रभावी बचाव और बेहतर पुनर्वास सुनिश्चित किया जा सकता है.
एकनजरमें
संस्था
मुख्य कार्य
NDMA
आपदा प्रबंधन नीति एवं दिशा-निर्देश
NDRF
राहत और बचाव अभियान
SDRF
राज्य स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया
CWC
बाढ़ पूर्वानुमान और जलस्तर निगरानी
IMD
मौसम और वर्षा का पूर्वानुमान
यह संस्थाएँ भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली की रीढ़ मानी जाती हैं. ये बाढ़ नियंत्रण तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं.
राष्ट्रिय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (National Disaster Management Act, 2005 in Hindi)
भारत सरकार ने 23 दिसंबर, 2005 को ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ अधिनियमित किया है. इसी अधिनियम के तहत, ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (NDMA) एवं ‘राष्ट्रीय आपदा मोचन बल’ (NDRF) का गठन किया गया. पुनः एनडीआरएफ के तर्ज पर, राज्यों द्वारा राजकीय आपदा मोचन बल (SDRF) का गठन किया गया. यह गठन भी इसी अधिनियम के प्रावधानों के तहत हुआ है.
राष्ट्रीय जल निति, 2012 (National Water Policy, 2012 in Hindi)
यह नीति फिलहाल जलशक्ति मंत्रालय के द्वारा संचालित है. इसमें जल के प्रबंधन के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा की गई है.
इसमें माना गया है कि जल एक दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन है; जो जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का अधार है. भारत में संसार की 18% से अधिक अबादी है, जबकि विश्व का केवल 4% नवीकरणीय जल संसाधन और विश्व के भू क्षेत्र का 2.4% भू क्षेत्र भारत में है. इसमें यह भी वर्णित है कि जल के संबंध में नीतियां, कानून बनाने या कार्यान्वयित करने या विनियमन करने का अधिकार राज्य को प्राप्त है.
इस निति के तहत निम्न उपाय के लिए नियम बनाने या इन्हें लागु करने के लिए प्रेरित किया गया है-
बाढ़ एवं सूखे जैसी जल संबंधी आपदाओं को रोकना व निति निर्माण
प्राकृतिक जल निकास प्रणाली के पुनर्स्थापन
भूमि, मृदा, ऊर्जा एवं जल प्रबंधन की व्यवस्था
समेकित खेती प्रणालियों और गैर-कृषि विकास पर विचार का आह्वाहन
जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए भूमि कटाव रोकना
बाढ़ पूर्वानुमान और वास्तविक समय आँकड़ा संग्रहण प्रणाली (Real Time Data Collection System) का उपयोग, इसे पूर्वानुमान मॉडल से जोड़ने का सुझाव
जलाशयों को बाढ़ रोकने में सक्षम बनाना
बाढ़ व सूखा से निपटने के लिए समुदायों को शामिल करने पर जोर
पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर, झील टूटने से बाढ़ तथा भू-स्खलन और बांध टूटने से बाढ़ आने संबंधी अध्ययन और इनका यंत्रीकरण
आकस्मिक बाढ़ से संबंधित आपदाओं से निपटने के लिये तैयारी
बाढ़: क्या करें तथा क्या ना करें (Flood: Dos and Donts in Hindi)
यदि आप बाढ़ ऐसे इलाके में रहते है जहाँ हरेक साल बाढ़ आती है तो आपको यह बाढ़ पूर्व तैयारी कर लेना चाहिए. साथ, ही बाढ़ के दौरान व बाढ़ के बाद क्या करें, ये जानना भी जरुरी है. इस जानकारी से आप बाढ़जनित महामारियों से बच सकते है.
बाढ़ आने से पहले क्या किया जाए (Before Flood)
इससे निपटने की तैयारी के लिए, आपको निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
मकान बनाने से बचे, पहले से बने मकान को मजबूत करें.
भट्टी (फर्निस), जल तापक (वाटर हीटर) तथा इलेक्ट्रिक पैनल (बिजली बोर्ड) को घर के ऊंचे स्थान पर रखें.
बाढ़ का पानी घर में घुसने से रोकने के लिए नालियों के मोरी की जालियों (सीवर ट्रैप्स) में “चेक वाल्व” लगवाएं.
अपने इलाके में बाढ़ रोकने के लिए बने संरचनाओं, यथा तटबंध की जानकारी प्राप्त करते रहे.
रिसाव (सीपेज) को रोकने के लिए अपने बेसमेन्ट में वाटर प्रूफिंग कम्पाउंड से दीवारों को सील करवाएं.
आपके इलाके में बाढ़ प्रवेश करने वाला हो तो (Just before Flood Entrance)
रेडियो या टेलीविजन से सुचना प्राप्त करना.
आकस्मिक बाढ़ की संभावना होते ही ऊँचे व सुरक्षित स्थान पर चले जाएं. किसी हिदायत का इंतजार न करें.
पूर्व में बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोगों को आकस्मिक बाढ़ के लिए भी तैयार रहना चाहिए.
संभावित बाढ़ से पूर्व घर छोड़ते वक्त (Leaving Home at Flood)
यदि बाढ़ की आशंका से आप अपना घर खाली करने को तैयार हों, तो आपको निम्न काम करना चाहिएः
जरुरी वस्तुओं को ऊपरी तल या घर के ऊँचे स्थान पर रखे. घर के बाहर कोई भी सामान नहीं छोड़े. बाढ़ में ये सामान बहकर खो सकते है.
बिजली सप्लाई बंद कर दे. पानी में उतारकर या भींगे हाथों या बदन से बिजली का कोई भी उपकरण न छुए. बिजली के उपकरणों को अलग कर सुरक्षित स्थान पर रख दे.
घर को अच्छे से तालाबंद (Lock) व सुरक्षित करने के बाद ही प्रस्थान करें.
बाढ़ के पानी से गुजरते वक्त (Passing through Flood Water)
6 इंच की गहराई वाले बहते पानी (Flood Water) में आप गिर सकते हैं. इस बहते पानी के बदले शांत पानी से चले. अपने आगे जमीन की सतह की मजबूती को जांचने के लिए छड़ी का प्रयोग करें.
ड्राइविंग न करें. यदि आपकी कार के आस-पास बाढ़ का पानी जमा हो जाए तो कार को छोड़कर सुरक्षित स्थान पर निकल लें. पानी का तेज बहाव कार के साथ आपको भी बहा सकता है.
बाढ़ और बाढ़ प्रबंधन पर इन्फोग्राफिक
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बाढ़ क्या है?
जब किसी नदी, झील, नाले या अन्य जल स्रोत में उसकी वहन क्षमता से अधिक जल भर जाता है और वह आसपास के क्षेत्रों में फैल जाता है, तो उसे बाढ़ कहा जाता है. यह एक प्राकृतिक आपदा है, जो मानव जीवन, कृषि, पशुधन, परिवहन और संपत्ति को प्रभावित कर सकती है.
बाढ़ के प्रमुख कारण क्या हैं?
बाढ़ के कई प्राकृतिक और मानवीय कारण हो सकते हैं. अत्यधिक वर्षा, चक्रवात, बादल फटना, हिमनदों का पिघलना और नदी तटबंधों का टूटना इसके प्रमुख प्राकृतिक कारण हैं. वहीं अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई, जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन भी बाढ़ की समस्या को बढ़ाते हैं.
फ्लैश फ्लड (Flash Flood) क्या होती है?
फ्लैश फ्लड एक ऐसी बाढ़ है, जो बहुत कम समय में अचानक उत्पन्न हो जाती है. यह सामान्यतः भारी वर्षा, बादल फटने, बांध टूटने या पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक जलप्रवाह बढ़ने के कारण आती है. इसमें लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, इसलिए इसे बाढ़ का सबसे खतरनाक प्रकार माना जाता है.
शहरी बाढ़ (Urban Flood) क्या है?
जब किसी शहर में भारी वर्षा के बाद सड़कें, कॉलोनियाँ और अन्य शहरी क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं, तो उसे शहरी बाढ़ कहा जाता है. यह समस्या प्रायः खराब जल निकासी व्यवस्था, नालों पर अतिक्रमण, कंक्रीट निर्माण और अनियोजित शहरी विकास के कारण उत्पन्न होती है. मुंबई और चेन्नई की बाढ़ इसके प्रमुख उदाहरण हैं.
भारत में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य कौन सा है?
भारत में बिहार और असम को सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्यों में गिना जाता है. बिहार में कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियाँ नियमित रूप से बाढ़ लाती हैं. वहीं असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ हर वर्ष बड़े क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं.
कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ क्यों कहा जाता है?
कोसी नदी बार-बार अपना मार्ग बदलने के लिए प्रसिद्ध है. इसके कारण बिहार के बड़े भूभाग में बार-बार बाढ़ आती है और भारी जन-धन की हानि होती है. इसी कारण इसे लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है.
तटीय बाढ़ (Coastal Flood) किसे कहते हैं?
समुद्र तट के निकट क्षेत्रों में समुद्री जल के असामान्य रूप से बढ़ जाने पर तटीय बाढ़ आती है. यह सामान्यतः चक्रवात, तूफानी ज्वार (Storm Surge), उच्च ज्वार और समुद्र-स्तर वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है. भारत के पूर्वी तट पर यह समस्या अधिक देखने को मिलती है.
जलवायु परिवर्तन और बाढ़ का क्या संबंध है?
जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है. इससे वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ती है और अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ अधिक होने लगती हैं. साथ ही समुद्र-स्तर वृद्धि और हिमनदों के पिघलने से भी बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है. इसलिए वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता का एक प्रमुख कारण मानते हैं.
NDMA की भूमिका क्या है?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भारत में आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च संस्था है. यह बाढ़ सहित विभिन्न आपदाओं के लिए नीतियाँ, दिशा-निर्देश और रणनीतियाँ तैयार करती है. इसका उद्देश्य आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करना और बेहतर आपदा प्रबंधन सुनिश्चित करना है.
बाढ़ से बचाव के प्रमुख उपाय क्या हैं?
बाढ़ से बचाव के लिए प्रभावी जल निकासी व्यवस्था, तटबंध निर्माण, बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, वनीकरण, आर्द्रभूमियों का संरक्षण और आपदा जागरूकता कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं. इसके अतिरिक्त बाढ़ संभावित क्षेत्रों में नियोजित विकास और वैज्ञानिक भूमि उपयोग भी जोखिम को कम करने में सहायता करते हैं.
बाढ़ और जलभराव में क्या अंतर है?
बाढ़ एक व्यापक प्राकृतिक आपदा है, जिसमें नदी, झील या अन्य जल स्रोत का पानी बड़े क्षेत्र में फैल जाता है. जबकि जलभराव सामान्यतः किसी क्षेत्र में वर्षा जल के अस्थायी रूप से जमा होने को कहा जाता है. सभी जलभराव बाढ़ नहीं होते, लेकिन लंबे समय तक बना जलभराव गंभीर समस्या बन सकता है.