सेमीकंडक्टर चिप क्या है? कैसे काम करती है, उपयोग, प्रकार और भारत में चिप निर्माण

सेमीकंडक्टर चिप एक सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक परिपथ (Microelectronic Circuit) है जो सिलिकॉन जैसे अर्धचालक पदार्थ से बनाई जाती है. इसमें लाखों से अरबों ट्रांजिस्टर होते हैं, जो विद्युत संकेतों को नियंत्रित करके मोबाइल, कंप्यूटर, कार, AI सिस्टम और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को संचालित करते हैं.

साल 2021 व 2022 में वाहन निर्माण उद्योग से सेमीकंडक्टर चिप की कमी की शिकायतें मिल रही थ. इसके बाद जनसामान्य को सेमीकंडक्टर चिप की जानकारी मिली. आज के समय में सेमीकंडक्टर चिप का वृहत उपयोग हो रहा हैं. इसलिए, इसे सुगम जीवन के लिए एक मुलभुत अवयव माना जा सकता हैं.

इस लेख में हम जानेंगे

सेमीकंडक्टर चिप का इतिहास (History of Semiconductor Chips in Hindi)

1874 में रेक्टिफायर (एसी-डीसी कन्वर्टर) के आविष्कार से ही सेमीकंडक्टर चिप का इतिहास शुरू हो जाता हैं. दशकों बाद, 1947 में अमेरिका के बेल लेबोरेटरीज में बर्डीन और ब्रेटन ने पॉइंट-कॉन्टैक्ट ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया. 1948 में शॉक्ले ने जंक्शन ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया. इन आविष्कारों के बाद, ट्रांजिस्टर युग का शुरुआत हो गया.

1946 में, अमेरिका में पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय ने वैक्यूम ट्यूबों का उपयोग करके एक कंप्यूटर बनाया। कंप्यूटर इतना बड़ा था कि उसकी वैक्यूम ट्यूब से पूरा इमारत पर भर गया. इसे चलाने में काफी बिजली लगी और गर्मी भी काफी अधिक पैदा हुई.

इसके बाद, आधुनिक ट्रांजिस्टर कैलकुलेटर (कंप्यूटर) विकसित किया गया. इस आविष्कार के बाद कंप्यूटर उद्योग में क्रांति आ गई और सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग भी बढ़ने लगा.

1956 में, अर्धचालक अनुसंधान और ट्रांजिस्टर के विकास में उनके योगदान के लिए शॉक्ले, बारडीन और ब्रेटन को संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया.

सेमीकंडक्टर चिप उद्योग का विकास (Development of Semiconductor Chips Industry in Hindi)

ट्रांजिस्टर के आविष्कार के बाद सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से विकसित हुआ. 1957 में, यह उद्योग 100 मिलियन डॉलर के पैमाने को पार कर चुका था.

1959 में, अमेरिका में टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स के किल्बी और फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर के नॉयस द्वारा बाइपोलर इंटीग्रेटेड सर्किट (ICs) का आविष्कार किया गया. इस आविष्कार का अर्धचालकों के इतिहास पर एक बड़ा प्रभाव पड़ा. इसने आईसी युग का शुरुआत किया. आकार में छोटा और हल्का होने के कारण, विभिन्न प्रकार के विद्युत उपकरणों में IC का व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा.

1967 में, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स ने IC का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिक डेस्कटॉप कैलकुलेटर (कैलकुलेटर) विकसित किया. जापान में, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माताओं ने एक के बाद एक कैलकुलेटर के वर्जन जारी किए.

कंपनियों के बीच कांटे की “कैलकुलेटर युद्ध” 1970 के दशक के अंत तक जारी रहे. आईसी एकीकरण और भी आगे बढ़ा. बड़े पैमाने पर एकीकृत सर्किट (एलएसआई) विकसित किया गया. इसकी प्रौद्योगिकियां आगे बढ़ती रही.

वीएलएसआई (प्रति चिप 100 हजार से 10 मिलियन इलेक्ट्रॉनिक घटक) 1980 के दशक में विकसित किया गया था. फिर, 90 के दशक में, यूएलएसआई (प्रति चिप 10 मिलियन से अधिक इलेक्ट्रॉनिक घटक) विकसित किया गया. आगे, 2000 के दशक में, सिस्टम एलएसआई (एक चिप में एकीकृत कई कार्यों के साथ एक बहुक्रिया एलएसआई) का विकास हुआ और इसका उत्पादन भी शुरू हो गया.

जैसे-जैसे IC विकसित होते गए, इनका प्रदर्शन भी बढ़ते गया. धीरे-धीरे इसका प्रयोग कई क्षेत्रों में होने लगा. आज यह हमारे जीवन के रोजमर्रा के कई चीजों में उपयोग में आता हैं. इससे जीवन सुगम हुआ हैं.

बेल लैब्स (Bell Labs)

बेल लैब्स आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान संस्थाओं में से एक है. इसकी स्थापना वर्ष 1925 में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी. यह प्रारम्भ में दूरसंचार कंपनी AT&T के अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित हुआ. बेल लैब्स ने बीसवीं शताब्दी की अनेक क्रांतिकारी तकनीकों को जन्म दिया. ट्रांजिस्टर, लेजर तकनीक, सूचना सिद्धांत (Information Theory), सौर सेल तथा यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम जैसी उपलब्धियाँ इसी संस्थान से जुड़ी हैं.

इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में बेल लैब्स का सबसे बड़ा योगदान ट्रांजिस्टर का विकास माना जाता है. इस खोज ने वैक्यूम ट्यूब आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स को पीछे छोड़ दिया और आधुनिक डिजिटल युग की नींव रखी. आज भी बेल लैब्स को औद्योगिक अनुसंधान एवं नवाचार का एक आदर्श मॉडल माना जाता है. सामान्य अध्ययन की परीक्षाओं में इसे ट्रांजिस्टर के आविष्कार से संबंधित संस्था के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है.

ट्रांजिस्टर का आविष्कार: विकास, उपयोगिता और महत्व

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में रेडियो, टेलीफोन और कंप्यूटर जैसी प्रणालियाँ मुख्यतः वैक्यूम ट्यूबों पर आधारित थीं. ये आकार में बड़ी, अधिक ऊर्जा खपत करने वाली तथा अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय थीं. वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे विकल्प की खोज में थे जो छोटा, टिकाऊ और अधिक दक्ष हो.

इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता दिसंबर 1947 में बेल लैब्स में मिली. वैज्ञानिक जॉन बार्डीन, वाल्टर ब्रैटेन और विलियम शॉक्ली ने प्रथम कार्यशील ट्रांजिस्टर का विकास किया. इस खोज के लिए उन्हें वर्ष 1956 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया.

ट्रांजिस्टर एक अर्धचालक युक्ति है जो विद्युत संकेतों को नियंत्रित, प्रवर्धित अथवा स्विच करने का कार्य करती है. डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में यह 0 और 1 की अवस्थाओं को नियंत्रित करने वाला मूलभूत घटक है. आधुनिक चिपों में लाखों से लेकर अरबों ट्रांजिस्टर समाहित हो सकते हैं.

ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अधिक छोटा, तेज, विश्वसनीय और ऊर्जा-कुशल बनाया. यही आविष्कार बाद में एकीकृत परिपथ (IC), माइक्रोप्रोसेसर, कंप्यूटर, स्मार्टफोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के विकास का आधार बना. इसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति का प्रारम्भिक बिंदु माना जाता है.

Transistor Working Diagram

सेमीकंडक्टर चिप क्या हैं? (What is Semiconductor Chips in Hindi)

सेमीकंडक्टर चिप एक सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक परिपथ (Microelectronic Circuit) है, जिसका निर्माण मुख्यतः सिलिकॉन जैसे अर्धचालक पदार्थों से किया जाता है. इसमें लाखों अथवा अरबों ट्रांजिस्टर समाहित होते हैं, जो विद्युत संकेतों को नियंत्रित और संसाधित करते हैं. आधुनिक कंप्यूटर, स्मार्टफोन, संचार उपकरण, वाहन, चिकित्सा यंत्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ इन्हीं चिपों पर निर्भर करती हैं. किसी भी डिजिटल उपकरण की गणना, डेटा भंडारण और नियंत्रण संबंधी अधिकांश गतिविधियाँ सेमीकंडक्टर चिप द्वारा संचालित होती हैं. इसी कारण इसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की आधारभूत इकाई माना जाता है.

मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयोग की जानेवाली सेमीकंडक्टर चिप, सेमीकंडक्टर (अर्धचालक तत्त्व) से बनी होती है. इस तत्व में चालक (Conductor) व कुचालक (Insulator) दोनों का गुण होता है. इसलिए, यह चालक और कुचालकों के बीच का तत्व है. इसका यही गुण इसे सेमीकंडक्टर चिप के निर्माण के लिए उपयुक्त बनाता है. डायोड, इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) और ट्रांजिस्टर, सेमीकंडक्टर से बने होते हैं.

यह आम तौर पर एक ठोस रासायनिक तत्व या यौगिक से बना होता है. यह कुछ ख़ास परिस्तिथियों में ही बिजली का प्रवाह होने देता है, अन्यथा नही. इससे रोजमर्रा के उपयोग में आनेवाले बिजली उपकरणों में बिजली प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए आदर्श स्थिति उपलब्ध हो जाती हैं.

सेमीकंडक्टर चिप का निर्माण सिलिकॉन और जर्मेनियम उपयुक्त है. लेकिन, सबसे अधिक इस्तेमाल सिलिकॉन का किया जाता है. पृथ्वी पर, ऑक्सीज़न के बाद सबसे अधिक पाया जानेवाला तत्त्व सिलिकॉन है. यह मिटटी, बालू, चट्टान, पानी, जीवधारियों व पेड़ -पौधों में पाया जाता हैं. सेमीकंडक्टर गैलियम, आर्सेनाइड या कैडमियम सेलेनाइड जैसे यौगिकों के रूप में भी पाया जाता है.

Semiconductor Chip Photo
सेमीकंडक्टर चिप

सेमीकंडक्टर कैसे काम करता हैं ? (How do Semiconductor work in Hindi)

तापमान में वृद्धि के साथ अर्धचालक का प्रतिरोध घटता है और विद्युत चालकता बढती है. इसमें धातु (चालक) या अधातु (कुचालक) मिलाकर इसकी चालकता क्रमशः अधिक या कम किया जा सकता हैं.

अधिकांश अर्धचालक कई सामग्रियों के क्रिस्टल से बने होते हैं. इसके काम करने के तरीके को समझने के लिए परमाणु की आंतरिक संरचना और इसमें इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को समझना आवश्यक हैं. इलेक्ट्रॉन खुद को एक परमाणु के अंदर कोश (Cell) में व्यवस्थित रहते हैं. परमाणु के सबसे बाहरी कोश को संयोजकता कोश (Valence Cells) कहते हैं.

वैलेंस शेल के इलेक्ट्रॉन, पड़ोसी परमाणुओं से बंधन बनाते हैं. ऐसे बंधनों को सहसंयोजक बंधन कहा जाता है. अधिकांश कंडक्टरों के वैलेंस शेल में एक से तीन इलेक्ट्रॉन होता है.

दूसरी ओर, अर्धचालकों के वैलेंस शेल में मुख्यतः चार इलेक्ट्रॉन होते हैं. हालाँकि, यदि आस-पास के परमाणु समान संयोजकता से बने हैं, तो इलेक्ट्रॉन अन्य परमाणुओं के संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के साथ बंध जाते है. जब भी ऐसा होता है, परमाणु खुद को क्रिस्टल संरचनाओं में व्यवस्थित करते हैं.

अर्धचालक ऐसे ही क्रिस्टलीय पदार्थों से बनाए जाते है. सिलिकॉन भी इसी तरह का एक क्रिस्टल हैं. जब इनका तापमान बढ़ाया जाता है तो कुछ इलेक्ट्रॉन विमुक्त होता है और यह चालक की भांति काम करने लगता हैं. अशुद्धियों को बढ़ाकर भी इसे कम या अधिक किया जा सकता हैं.

सिलिकॉन (Silicon)

सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की आधारशिला माना जाता है. यह एक रासायनिक तत्व है जिसका परमाणु क्रमांक 14 है. पृथ्वी की पर्पटी में ऑक्सीजन के बाद यह दूसरा सर्वाधिक प्रचुर तत्व है. प्राकृतिक रूप से यह मुख्यतः सिलिका (SiO₂) तथा विभिन्न सिलिकेट खनिजों के रूप में पाया जाता है.

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में जर्मेनियम का उपयोग अधिक होता था. बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि सिलिकॉन उच्च तापमान पर अधिक स्थिर रहता है तथा इसके ऊपर बनने वाली सिलिकॉन डाइऑक्साइड की परत उत्कृष्ट विद्युत रोधक का कार्य करती है. इसी गुण ने इसे एकीकृत परिपथों (Integrated Circuits) और सूक्ष्म ट्रांजिस्टरों के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त पदार्थ बना दिया.

आज लगभग सभी माइक्रोप्रोसेसर, मेमोरी चिप, सेंसर और संचार उपकरण सिलिकॉन आधारित तकनीक पर कार्य करते हैं. स्मार्टफोन, कंप्यूटर, उपग्रह, चिकित्सा उपकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों का संचालन भी इसी पर निर्भर है. इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में इसके व्यापक उपयोग के कारण कैलिफोर्निया के प्रसिद्ध तकनीकी क्षेत्र को “सिलिकॉन वैली” नाम दिया गया. प्रतियोगी परीक्षाओं में सिलिकॉन को सर्वाधिक प्रयुक्त अर्धचालक पदार्थ के रूप में अक्सर पूछा जाता है.

Silicon Wafer
सिलिकॉन वेफर

अर्धचालक के प्रकार (Type of semiconductor in Hindi)

सेमीकंडक्टर मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं. पहला आंतरिक और दूसरा बाह्य अर्धचालक.

आतंरिक सेमीकंडक्टर (Intrinsic Semiconductor in Hindi)

यह पूरी तरह से शुद्ध अर्धचालक तत्वों, जैसे जर्मेनियम या सिलिकॉन, से बने होते हैं. ये सिर्फ एक ही प्रकार के अर्धचालत तत्व का उपयोग कर बनाए जाते हैं. इनमे किसी प्रकार की अशुद्धि नहीं मिलाई जाती हैं.

बाह्य सेमीकंडक्टर (Extrinsic Semiconductor in Hindi)

इस प्रकार के सेमीकंडक्टर्स में बाहर से एक या एक से अधिक अशुद्धियाँ मिलाई जाती हैं. इन अशुद्धियों की संयोजकता तीन या पांच होती है. इस मिलावट से इनकी चालकता बढ़ जाती है. अर्धचालकों में मिलावट की यह प्रक्रिया डोपन कहलाती है. इस तकनीक को डोपिंग (doping) कहते हैं.

बाह्य सेमीकंडक्टर भी दो प्रकार के होते हैं-

एन प्रकार के अर्धचालक (N Type Semiconductor)
पी प्रकार के अर्धचालक (P Type Semiconductor)

N Type Semiconductor क्या हैं? (n-Type Semiconductor in Hindi)

किसी शुद्ध अर्धचालक में पांच संयोजकता वाले चालक को को मिलाने से इस प्रकार के अर्धचालक बनते हैं. इस मिलावट से, पांच संयोजकता वाले पदार्थ का चार इलेक्ट्रॉन, अर्धचालक के चार इलेक्ट्रॉन से जुड़ जाता हैं. बाहरी पदार्थ का एक इलेक्ट्रॉन मुक्त रहता है, जो चालकता के काम आता हैं.

चालक अशुद्धि की मात्रा जितना अधिक होता है, अर्धचालक की चालकता उतना ही अधिक बढ़ जाता हैं. इस प्रकार अर्धचालक के चालकता को नियंत्रित किया जाता हैं. इन्हें “एन टाइप सेमीकंडक्टर” कहा जाता हैं. ये आवेश में ऋणात्मक (Negative) होते हैं.

n-Type Semiconductor
n-Type Semiconductor

P Type Semiconductor क्या होते हैं? (p-Type Semiconductor in Hindi)

किसी अर्धचालक में तीन संयोजकता वाले चालक पदार्थ को मिलाकर, पी टाइप सेमीकंडक्टर बनाया जाता हैं. जब तीन संयोजकता वाले पदार्थ को अर्धचालक से मिलाया जाता है, तो अशुद्धि का तीन इलेक्ट्रॉन, अर्धचालक के तीन इलेक्ट्रॉन से जुड़ जाता हैं. अर्धचालक का एक इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता हैं.

शेष इलेक्ट्रॉन के पास दूसरे इलेक्ट्रॉन को जोड़ने के लिए स्थान रिक्त रह जाता हैं. यह स्थान कोटर कहलाता हैं. बाहर से विद्युत् प्रवाहित करने पर कोटर में पड़ोसी जर्मेनियम परमाणु से बंधा हुआ एक इलेक्ट्रॉन आ जाता है, इससे पड़ोसी परमाणु में एक स्थान रिक्त होकर कोटर बन जाता है.

इस प्रकार कोटर, क्रिस्टल के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर विद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में चलने लगता है. मतलब, कोटर धनावेशित कण के तुल्य होता है, जो इलेक्ट्रॉन के सापेक्ष विपरीत दिशा में चलता है.

इस प्रकार के अपद्रव्य मिले जर्मेनियम क्रिस्टल को पी-टाइप अर्धचालक कहते हैं, क्योंकि इसमें आवेश वाहक धनात्मक होते हैं. अपद्रव्य परमाणुओं को ग्राही परमाणु कहते हैं, क्योंकि वह शुद्ध अर्धचालक से इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करता है.

p-Type Semiconductor
p-Type Semiconductor

कुछ अर्धचालक युक्तियाँ (Some Semiconductor Devices in Hindi)

पीएन संधि (P-N Junction in Hindi)

PN संधि में, n-क्षेत्रों से क्षेत्रा से इलेक्ट्रॉन की हानि तथा p क्षेत्रों को प्राप्ति होती हैं. इस प्रकार दो संधि के बीच विभवांतर उत्पन्न हो जाता हैं. इस विभव की ध्रुवता इस प्रकार होती हैं कि यह आवेश वाहकों और प्रवाह का विरोध करता हैं. इसके फलस्वरूप साम्यावस्था की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इस तरह के संधि का प्रयोग कर कई सेमीकंडक्टर उत्पाद बनाए जाते है, जो इलेक्ट्रॉनिक समेत कई क्षेत्रों में उपयोग किए जाते हैं.

अर्धचालक डायोड (Semiconductor Diode in Hindi)

सेमीकंडक्टर डायोड मुख्यतः एक P-N संधि होता हैं. इसके संधि पर धात्विक सम्पर्क जुड़े होते है ताकि इस संधि पर कोई बाहरी वोल्टता प्रयोग की जा सकें. सेमीकंडक्टर डायोड में दो टर्मिनल होते हैं.

प्रकाश उत्सर्जक डायोड (Light Emitting Diode in Hindi)

यह एक अत्यधिक अपमिश्रित p-n संधि डायोड होता है, जो पूर्व निर्धारित दिशा में प्रकाश का उत्सर्जन करता हैं. यह एक पारदर्शी पदार्थ से ढका होता हैं, ताकि प्रकाश बाहर आ सकें. LED बल्ब इसी सिद्धांत पर काम करते हैं.

प्रकाश डायोड (Photo Diode in Hindi)

यह भी p-n संधि के सिद्धांत पर बना होता है. यह प्रकाश-संवेदी पदार्थों से बना होता है. यह पारदर्शी पदार्थ से ढका होता है, जिसपर प्रकाश डालकर इसे सुचना दिया जाता हैं. इसका उपयोग प्रकाश संचालित कुंजियों व कंप्यूटर पंचकार्डों को पढ़ने में किया जाता हैं.

ट्रांजिस्टर (Transistor in Hindi)

यह भी p-n संधि प्रकार का डायोड हैं. इसका उपयोग ट्रायोड वाल्व के स्थान पर किया जाती है. इससे प्रवर्धक, स्विच, वोल्टेज नियामक (Voltage Regulator), संकेत न्यूनाधिक (Signal Modulator), ओसिलेटर (Oscillator) आदि बनाया जाता हैं.

अर्धचालक प्रकाश संवर्धन (Semiconductor Optical Amplifier in Hindi)

यह अर्धचालकों में प्रकाश की गति बढ़ाने की युक्ति हैं. इसका उपयोग डेटा केंद्रों के बीच संचार को त्तेजी देने के लिए ऑप्टिकल ट्रांसीवर मॉड्यूल में किया जाता हैं.

इस तरह, यह ईथरनेट संचार के लिए उपयोग किए जाने वाले ऑप्टिकल सिग्नल को तेज करता हैं. इस तरह यह डाटा के आदान-प्रदान में हो रही समय-क्षति को कम करता हैं.

सेमीकंडक्टर चिप कैसे बनती है?

सेमीकंडक्टर चिप का निर्माण विश्व की सबसे जटिल औद्योगिक प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है. इसमें पदार्थ विज्ञान, रसायन विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सूक्ष्म विनिर्माण तकनीकों का उपयोग किया जाता है. एक आधुनिक चिप के निर्माण में सैकड़ों चरण शामिल हो सकते हैं. किन्तु इसकी मूल प्रक्रिया को निम्न प्रकार समझा जा सकता है:

1. सिलिकॉन का शुद्धीकरण (Silicon Purification)

चिप निर्माण का प्रमुख कच्चा पदार्थ सिलिकॉन है. इसे सामान्यतः सिलिका युक्त रेत से प्राप्त किया जाता है. प्रारम्भिक अवस्था में सिलिकॉन में अनेक अशुद्धियाँ उपस्थित होती हैं. इन्हें विशेष रासायनिक एवं तापीय प्रक्रियाओं द्वारा हटाया जाता है. इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक शुद्ध सिलिकॉन प्राप्त होता है, जिसकी शुद्धता लगभग 99.9999999 प्रतिशत तक हो सकती है.

2. वेफर निर्माण (Wafer Preparation)

शुद्ध सिलिकॉन को पिघलाकर एकल क्रिस्टल (Single Crystal) के रूप में विकसित किया जाता है. इस क्रिस्टल को बेलनाकार आकार में तैयार किया जाता है. इसके बाद इसे अत्यंत पतली गोल डिस्कों में काटा जाता है, जिन्हें वेफर (Wafer) कहा जाता है. वेफर की सतह को चिकना और समतल बनाया जाता है ताकि उस पर सूक्ष्म परिपथ निर्मित किए जा सकें.

3. फोटोलिथोग्राफी (Photolithography)

यह चिप निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है. वेफर की सतह पर प्रकाश-संवेदनशील पदार्थ की एक पतली परत चढ़ाई जाती है. इसके बाद परिपथ की डिजाइन को विशेष प्रकाश प्रणाली की सहायता से वेफर पर स्थानांतरित किया जाता है. इस प्रक्रिया से चिप के सूक्ष्म ट्रांजिस्टर तथा अन्य संरचनाओं का प्रारूप तैयार होता है.

4. एचिंग (Etching)

फोटोलिथोग्राफी के बाद वेफर के उन भागों को हटाया जाता है जिनकी आवश्यकता नहीं होती. यह कार्य रासायनिक अथवा प्लाज्मा आधारित तकनीकों द्वारा किया जाता है. एचिंग के परिणामस्वरूप परिपथ की वास्तविक संरचना वेफर पर उभरकर सामने आती है.

5. डोपिंग (Doping)

शुद्ध सिलिकॉन विद्युत प्रवाह का सीमित संचालन करता है. इसकी विद्युत विशेषताओं को नियंत्रित करने के लिए इसमें सूक्ष्म मात्रा में अन्य तत्व मिलाए जाते हैं. इस प्रक्रिया को डोपिंग कहा जाता है. डोपिंग के माध्यम से पी-टाइप तथा एन-टाइप क्षेत्र निर्मित किए जाते हैं, जो ट्रांजिस्टर और अन्य अर्धचालक युक्तियों के संचालन के लिए आवश्यक होते हैं.

6. पैकेजिंग (Packaging)

वेफर पर निर्मित चिपों को अलग-अलग काटा जाता है. प्रत्येक चिप को एक सुरक्षात्मक आवरण में स्थापित किया जाता है. इसी चरण में बाहरी संपर्क पिन अथवा टर्मिनल जोड़े जाते हैं. पैकेजिंग चिप को नमी, धूल, ताप तथा यांत्रिक क्षति से सुरक्षा प्रदान करती है.

7. परीक्षण (Testing)

निर्माण प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद प्रत्येक चिप का परीक्षण किया जाता है. इसमें विद्युत प्रदर्शन, कार्यक्षमता, विश्वसनीयता तथा गुणवत्ता की जांच की जाती है. केवल वे चिपें बाजार में भेजी जाती हैं जो निर्धारित मानकों पर खरी उतरती हैं.

इस प्रकार अनेक सूक्ष्म और नियंत्रित प्रक्रियाओं के माध्यम से एक सेमीकंडक्टर चिप तैयार होती है. यही चिप आधुनिक कंप्यूटरों, स्मार्टफोन, संचार उपकरणों, वाहनों, चिकित्सा यंत्रों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों की आधारभूत इकाई है.

Semiconductor Chip Making Process Flowchart

सेमीकंडक्टर चिप कैसे कार्य करती है?

सेमीकंडक्टर चिप आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का मूल घटक है. इसका निर्माण मुख्यतः सिलिकॉन (Silicon) जैसे अर्धचालक पदार्थ से किया जाता है. सिलिकॉन की विशेषता यह है कि यह चालक (Conductor) और कुचालक (Insulator) के बीच के गुण प्रदर्शित करता है. इसी कारण इसके माध्यम से विद्युत धारा के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकता है.

एक सेमीकंडक्टर चिप में लाखों से लेकर अरबों ट्रांजिस्टर होते हैं. ट्रांजिस्टर सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक स्विच के रूप में कार्य करते हैं. ये विद्युत संकेतों को चालू (ON) अथवा बंद (OFF) करने का कार्य करते हैं. डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में इन दोनों अवस्थाओं को क्रमशः 1 और 0 द्वारा व्यक्त किया जाता है.

जब किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को निर्देश प्राप्त होता है, तब चिप के भीतर स्थित ट्रांजिस्टर अत्यंत तीव्र गति से अपनी अवस्थाएँ बदलते हैं. इन परिवर्तनों के माध्यम से गणनाएँ की जाती हैं, डेटा संसाधित होता है तथा विभिन्न कार्य निष्पादित होते हैं. उदाहरण के लिए, मोबाइल फोन में संदेश भेजना, कंप्यूटर में गणना करना अथवा किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली द्वारा उत्तर उत्पन्न करना—सभी कार्य इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक संकेतों के प्रसंस्करण पर आधारित होते हैं.

चिप के भीतर ट्रांजिस्टरों को विभिन्न प्रकार के परिपथों (Circuits) में व्यवस्थित किया जाता है. ये परिपथ तर्क संचालन (Logic Operations), स्मृति भंडारण (Memory Storage), संकेत प्रसंस्करण (Signal Processing) तथा नियंत्रण कार्यों को संपन्न करते हैं. किसी चिप की क्षमता मुख्यतः उसमें प्रयुक्त ट्रांजिस्टरों की संख्या, उनकी संरचना तथा निर्माण तकनीक पर निर्भर करती है.

वर्तमान समय में उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स कुछ नैनोमीटर (nm) स्तर की तकनीक पर निर्मित की जाती हैं. ट्रांजिस्टरों का आकार जितना छोटा होता है, सामान्यतः चिप उतनी अधिक शक्तिशाली, ऊर्जा-कुशल और तीव्र गति वाली होती है. यही कारण है कि स्मार्टफोन, कंप्यूटर, संचार उपकरण, वाहन, उपग्रह तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों में उच्च क्षमता वाली सेमीकंडक्टर चिप्स का व्यापक उपयोग किया जाता है.

Working of Semiconductor Chip Flow Chart

रेडियो फ्रीक्वेंसी सेमीकंडक्टर क्या हैं? (Radio Frequency Semiconductor in Hindi)

आरएफ एक उपकरण है जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में बिजली प्रवाह को शुरू या सुधारने के लिए किया जाता है. ये लगभग 3KHz से लेकर 300GHz की बीच के रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम में काम करते हैं.

फेबल सेमीकंडक्टर किसे कहते हैं? (Fable Semiconductor in Hindi)

वे कंपनियां जो हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर चिप का डिज़ाइन, निर्माण और बिक्री करती हैं. लेकिन अपने स्वयं के सिलिकॉन वेफर्स या सेमीकंडक्टर चिप का निर्माण नहीं करती हैं. इसके बजाय, वे फैब्रिकेशन को किसी फाउंड्री या किसी अन्य मैन्युफैक्चरिंग प्लांट को आउटसोर्स करते हैं.

सेमीकंडक्टर फेब इसकी निर्माण इकाई होती है. इसके स्थापना में बड़ी पूंजी कि आवश्यकता होती हैं. साथ ही, जल की भी बड़े पैमाने पर जरुरत होती हैं. भारत में सेमीकंडक्टर चिप का फेब, पंजाब के मोहाली में स्थित हैं. इसरो व डीआरडीओ के भी अपने चिप फैब हैं, लेकिन ये विश्वस्तरीय नहीं हैं.

सेमीकंडक्टर चिप के फायदे (advantage of semiconductor devices in hindi)

आप ये जान ले कि सेमीकंडक्टर चिप के स्थान पर पहले वैक्यूम ट्यूब्स का इस्तेमाल किया जाता था. वैक्यूम ट्यूब्स की क्षमता कम होती थी. इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध के समय इसके प्रतिस्थापन की खोज की जाने लगी. इसी क्रम में सेमीकंडक्टर चिप का खोज हुआ. सेमीकंडक्टर चिप का सबसे पहले इस्तेमाल राडार सिस्टम में किया गया था. इसके फायदे इस प्रकार हैं:-

  1. इन्हें गर्म करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, सर्किट को चालु करते ही ये काम करना शुरू कर देते है. ऐसा इनमें फिलामेंट न होने की वजह से होता हैं.
  2. यह कम वोल्टेज पर काम करता हैं.
  3. यह वैक्यूम ट्यूब की तुलना में सस्ते और अधिक क्षमता वाले होते हैं.
  4. इनका जीवनकाल अनंत होता हैं.

सेमीकंडक्टर चिप के नुकसान (disadvantages of semiconductor devices in hindi)

  • वैक्यूम ट्यूब जहाँ कम शोर करते है, वहीं सेमीकंडक्टर चिप अधिक शोर करते हैं.
  • सेमीकंडक्टर चिप अधिक बिजली यानि उच्च वोल्टता को नहीं सह पाते हैं.

सेमीकंडक्टर चिप के उपयोग (Uses of Semiconductor Chips in Hindi)

हम इस बात से वाकिफ हैं कि हमारे कंप्यूटर में सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग होता हैं. लेकिन, कई ऐसे वस्तुएं और क्षेत्र हैं, जहां इसका उपयोग होता हैं. ये हैं-

  1. कई प्रकार के उपभोक्ता विद्युत् उपकरणों में : मोबाइल फोन/स्मार्टफोन, डिजिटल कैमरा, टीवी, वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर और एलईडी बल्ब भी सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग होता हैं.
  2. आटोमेटिक राइस कुकर का ताप संवेदी यंत्र भी सेमीकंडक्टर चिप से बना होता हैं.
  3. बैंक एटीएम, ट्रेन, इंटरनेट, संचार के उपकरणों में भी सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग होता हैं. स्वच्छ ऊर्जा, एयरोस्पेस व चिकित्सा क्षेत्र में भी इसका इस्तेमाल होता हैं.
  4. आजकल वाहनों के निर्माण में भी सेमीकंडकर चिप का उपयोग होने लगा हैं. ऐसे कई क्षेत्र है, जहाँ सेमीकंडक्टर चिप का उपयोग होता हैं. इससे हमारा जीवन आसान हो गया हैं.

सेमीकंडक्टर चिप उद्योग (Semiconductor Chips Industry in Hindi)

दुनिया के कई कापनापियाँ सेमीकंडक्टर चिप के निर्माण में लगी हैं. 1975 के समय टीआई, मोटोरोला व फिलिप्स जैसी कम्पनियाँ इस क्षेत्र में आगे थे. वहीं, साल 2020 में इंटेल, सैमसंग व टीएसएमसी जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में अग्रणी हैं.

इसका अधिकांश उत्पादन दक्षिण कोरिया, चीन, ताइवान व अमेरिका में होता हैं. भारत इस उद्योग में काफी पिछड़ा हैं. भारत की वेदांत समूह और ताइवान की फॉक्सकॉन भारत के गुजरात में सेमीकंडक्टर चिप का इकाई लगाने पर काम कर रहे हैं. ये दोनों कंपनियां 1.54 लाख करोड़ रूपये का निवेश करेगी. इससे करीब एक लाख लोगों को रोजगार मिलने की संभावना हैं.

अहमदाबाद में बन रही इस इकाई से अगले दो साल में उत्पादन शुरू हो जाने की उम्मीद हैं. भारत सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम से इस योजना को फायदा पहुँचाने का निर्णय लिया हैं.

भारत में 2021 तक सेमीकंडक्टर चिप का बाजार 27.2 बिलियन डॉलर का था. इसके साल 2026 तक बढ़कर 64 बिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान हैं.

वैश्विक चिप युद्ध (Global Chip War)

इक्कीसवीं शताब्दी में सेमीकंडक्टर चिप केवल एक इलेक्ट्रॉनिक घटक नहीं रह गई है. यह आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा प्रौद्योगिकी और डिजिटल अवसंरचना का आधार बन चुकी है. यही कारण है कि प्रमुख देशों के बीच सेमीकंडक्टर उद्योग पर नियंत्रण और तकनीकी श्रेष्ठता को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है. इस स्थिति को प्रायः “वैश्विक चिप युद्ध” कहा जाता है.

साल 2022 में अमेरिका ने चीन पर सेमीकंडक्टर चिप के सम्बन्ध में प्रतिबन्ध लगा दिया. अमेरिका ने चीन के सैन्य महत्वाकांक्षा को देखते हुए किया. इससे चीन की, कम्प्यूटरीकृत हथियारों के निर्माण के लिए जरुरी सेमीकंडक्टर चिप, तक पहुँच सिमित हो गई.

इस प्रतिबन्ध में चीन को कुछ विशेष प्रकार के कम्प्यूटरीकृत सेमीकंडक्टर चिप के आपूर्ति पर रोक लगा दी गई. इस आदेश में एकीकृत सेमीकंडक्टर चिप पर प्रतिबंध भी शामिल हैं. हालाँकि, अमेरिका के इस कदम की आलोचना भी हुई. इस कदम को व्यापर युद्ध बढ़ाने वाला माना गया.

अमेरिकाचीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा

वर्तमान चिप युद्ध का केंद्र अमेरिका और चीन हैं. चीन उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहा है. दूसरी ओर, अमेरिका उच्च स्तरीय चिप निर्माण तकनीकों और उपकरणों पर अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है. हाल के वर्षों में अमेरिका ने चीन को उन्नत चिपों तथा चिप निर्माण उपकरणों की आपूर्ति पर कई प्रतिबंध लगाए हैं. इसका उद्देश्य संवेदनशील प्रौद्योगिकियों तक चीन की पहुँच को सीमित करना है.

ताइवान की रणनीतिक भूमिका

ताइवान वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग का एक महत्वपूर्ण केंद्र है. विश्व की बड़ी मात्रा में उन्नत चिपों का उत्पादन यहीं होता है. आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखला ताइवान पर काफी हद तक निर्भर है. इसलिए ताइवान से जुड़ा कोई भी भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक उद्योगों को प्रभावित कर सकता है.

टीएसएमसी का महत्व

Taiwan Semiconductor Manufacturing Company विश्व की सबसे बड़ी स्वतंत्र सेमीकंडक्टर फाउंड्री है. यह अनेक वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए उन्नत चिपों का निर्माण करती है. अत्याधुनिक निर्माण प्रक्रियाओं में इसकी अग्रणी स्थिति के कारण टीएसएमसी वैश्विक चिप उद्योग का केंद्रीय स्तंभ मानी जाती है.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत चिपों की मांग

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग के विस्तार ने उन्नत चिपों की मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा दिया है. एआई मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए विशेष प्रकार के प्रोसेसर तथा त्वरक (Accelerators) आवश्यक होते हैं. इससे उन्नत विनिर्माण क्षमता रखने वाले देशों और कंपनियों का महत्व और बढ़ गया है.

आपूर्ति श्रृंखला के जोखिम

कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियाँ स्पष्ट रूप से सामने आईं. उत्पादन में व्यवधान के कारण ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार उद्योगों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इसके बाद अनेक देशों ने सेमीकंडक्टर आपूर्ति को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखना शुरू किया.

चिप्स अधिनियम (CHIPS Act)

संयुक्त राज्य अमेरिका ने घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए CHIPS and Science Act लागू किया. इस पहल का उद्देश्य देश के भीतर उत्पादन क्षमता बढ़ाना, अनुसंधान को प्रोत्साहित करना तथा विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम करना है. इसके अतिरिक्त यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत ने भी अपने-अपने सेमीकंडक्टर कार्यक्रम प्रारम्भ किए हैं.

सेमीकंडक्टर संप्रभुता (Semiconductor Sovereignty)

वर्तमान समय में अनेक देश सेमीकंडक्टर संप्रभुता प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं. इसका अर्थ है कि कोई राष्ट्र महत्वपूर्ण चिपों की आपूर्ति के लिए पूर्णतः बाहरी स्रोतों पर निर्भर न रहे. घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान क्षमता और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला को राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है. भविष्य में तकनीकी शक्ति और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण आधार सेमीकंडक्टर क्षेत्र ही होगा.

इस प्रकार वैश्विक चिप युद्ध केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं है. यह तकनीकी नेतृत्व, आर्थिक सुरक्षा, औद्योगिक क्षमता और भू-राजनीतिक प्रभाव से जुड़ा एक व्यापक संघर्ष है, जिसका प्रभाव पूरी दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग

डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ सेमीकंडक्टर भारत के लिए एक रणनीतिक क्षेत्र बन गया है. मोबाइल फोन, कंप्यूटर, दूरसंचार उपकरण, रक्षा प्रणालियाँ, विद्युत वाहन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों की बढ़ती मांग ने घरेलू चिप उद्योग के विकास को नई गति प्रदान की है. लंबे समय तक भारत मुख्यतः चिप डिज़ाइन और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का उपभोक्ता रहा. वर्तमान में देश सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है.

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (India Semiconductor Mission)

भारत सरकार ने 21 दिसंबर 2021 को इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की घोषणा की. इसका उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण के लिए एक सशक्त औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है. यह मिशन इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधीन संचालित किया जाता है.

इस पहल का मुख्य लक्ष्य भारत को केवल चिप उपभोक्ता देश से आगे बढ़ाकर चिप निर्माण और नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करना है. मिशन निवेश आकर्षित करने, वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी विकसित करने तथा घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने पर बल देता है.

हाल के वर्षों में इस मिशन के अंतर्गत कई सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति मिली है. चिप पैकेजिंग, परीक्षण और विनिर्माण सुविधाओं की स्थापना की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. इस मिशन से तकनीकी आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन, विदेशी निवेश में वृद्धि तथा रणनीतिक क्षेत्रों की आपूर्ति सुरक्षा को मजबूती मिलने की अपेक्षा है.

सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम (Semicon India Programme)

सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए आरम्भ की गई एक व्यापक सरकारी पहल है. इसे वर्ष 2021 में प्रारम्भ किया गया तथा इसके लिए 76,000 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज स्वीकृत किया गया. इसका संचालन इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा किया जाता है.

इस कार्यक्रम के अंतर्गत सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन इकाइयों, डिस्प्ले निर्माण संयंत्रों, एटीएमपी (Assembly, Testing, Marking and Packaging) तथा ओएसएटी (Outsourced Semiconductor Assembly and Test) सुविधाओं को प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है. कार्यक्रम का उद्देश्य सम्पूर्ण सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला को भारत में विकसित करना है.

कार्यक्रम के परिणामस्वरूप भारत में वैश्विक निवेशकों की रुचि बढ़ी है. कई बड़ी कंपनियों ने विनिर्माण एवं पैकेजिंग सुविधाओं की स्थापना की दिशा में कदम उठाए हैं. इससे इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को गति मिलेगी, आयात निर्भरता कम होगी और भारत वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा.

दीर्घकाल में यह कार्यक्रम उच्च तकनीकी उद्योगों के विकास, अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के विस्तार तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है.

टाटा सेमीकंडक्टर परियोजनाएँ

टाटा समूह ने भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षेत्र में बड़े निवेश की घोषणा की है. समूह की परियोजनाएँ वेफर फैब्रिकेशन, चिप पैकेजिंग तथा परीक्षण सुविधाओं के विकास पर केंद्रित हैं. इन परियोजनाओं से देश में उच्च प्रौद्योगिकी विनिर्माण को बढ़ावा मिलने तथा कुशल रोजगार के नए अवसर सृजित होने की अपेक्षा है.

माइक्रोन सुविधा (Micron Facility)

अमेरिकी कंपनी Micron Technology ने भारत में उन्नत चिप पैकेजिंग और परीक्षण सुविधा स्थापित करने की पहल की है. यह परियोजना सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में भारत की उपस्थिति को सुदृढ़ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसके माध्यम से देश को उन्नत विनिर्माण तकनीकों और वैश्विक विशेषज्ञता का लाभ प्राप्त होगा.

असम में उभरता सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र

पूर्वोत्तर भारत भी अब सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. असम में स्थापित की जा रही नई इकाइयाँ चिप पैकेजिंग, परीक्षण तथा इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण गतिविधियों को प्रोत्साहित करेंगी. इससे क्षेत्रीय औद्योगिक विकास के साथ-साथ तकनीकी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा.

मेड इन इंडिया चिप पहल

भारत का लक्ष्य केवल चिपों का उपभोग करना नहीं, बल्कि उन्हें देश में विकसित और निर्मित करना भी है. इसी दृष्टिकोण को प्रायः “मेड इन इंडिया चिप” पहल के रूप में देखा जाता है. इसका उद्देश्य विदेशी निर्भरता कम करना, तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करना है.

एससीएल मोहाली का आधुनिकीकरण

सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL), मोहाली भारत की प्रमुख अर्धचालक अनुसंधान एवं विनिर्माण संस्थाओं में से एक है. इसकी स्थापना मुख्यतः रणनीतिक तथा अंतरिक्ष संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गई थी. वर्तमान में इसके आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि उन्नत विनिर्माण तकनीकों को अपनाया जा सके और घरेलू अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को सशक्त बनाया जा सके.

भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग अभी विकास के प्रारम्भिक चरण में है, किन्तु सरकारी नीतियों, निजी निवेश, वैश्विक साझेदारियों तथा बढ़ती घरेलू मांग के कारण इसके तीव्र विस्तार की संभावना है. यदि वर्तमान प्रयास सफल होते हैं, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.

सेमीकंडक्टर चिप उद्योग की चुनौतियाँ (Challenges before Industry in Hindi)

भारत ने हाल ही में $10 अरब से अधिक निवेश के लिए अपने ‘सेमी-कॉन इंडिया कार्यक्रम‘ की घोषणा की है. इस योजना का उद्देश्य में भारत में सेमीकंडक्टर चिप इकाइयां लगाने वाले कंपनियों को वित्तीय मदद पहुँचाना हैं.

वर्तमान में सेमीकंडक्टर चिप के कुल उत्पादन का 92 फीसदी ताइवान व 8 फीसदी दक्षिणी कोरिया में होता हैं. थोड़े-बहुत उत्पादन दुनिया के अन्य हिस्सों में होते हैं.

इसके लिए अत्यधिक कुशल श्रम की आवश्यकता होती है, क्योंकि फैब्रिकेशन प्रोसेस काफी जटिल होता हैं. इसमें 400- 1400 जटिल चरण शामिल होते हैं. अलग-अलग चरणों में कमोडिटी केमिकल्स, स्पेशलिटी केमिकल्स और कई अलग-अलग प्रकार के प्रोसेसिंग की जाती हैं. इसके लिए विशेष टेस्टिंग उपकरण की आवश्यकता होती है. इसलिए इसके उत्पादन के लिए अत्यधिक कुशल श्रम की आवश्यकता होती है.

सेमीकंडक्टर चिप का उत्पादन स्वच्छ क्षेत्रों में ही किया जा सकता हैं. प्रदूषित हवा सेमीकंडक्टर चिप के गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं.

साथ ही, सेमीकंडक्टर चिप के डिज़ाइन बदलते रहते हैं. इसलिए नए डिज़ाइन से उत्पादन के लिए नए तकनीक की जरुरत पड़ती है. इस वजह से इस उद्योग में भारी निवेश की जरूरत होती हैं. उदाहरण के लिए, टीएसएमसी अगले तीन वर्षों में अपने फैब्रिकेशन संयंत्रों में $100 बिलियन का निवेश करेगा.

FAQ

सेमीकंडक्टर चिप में Silicon का उपयोग क्यों किया जाता है?

सिलिकॉन इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में सबसे अधिक प्रयुक्त अर्धचालक पदार्थ है. इसकी विद्युत चालकता को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ट्रांजिस्टर और एकीकृत परिपथों का निर्माण संभव होता है. यह उच्च तापमान पर भी स्थिर रहता है और इसकी सतह पर बनने वाली सिलिकॉन डाइऑक्साइड की परत उत्कृष्ट विद्युत रोधक का कार्य करती है. इसके अतिरिक्त पृथ्वी की पर्पटी में इसकी प्रचुर उपलब्धता तथा अपेक्षाकृत कम लागत भी इसे व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त बनाती है. इन्हीं गुणों के कारण अधिकांश माइक्रोप्रोसेसर, मेमोरी चिप और सेंसर सिलिकॉन आधारित तकनीक पर निर्मित किए जाते हैं.

AI Chip क्या होती है?

एआई चिप (Artificial Intelligence Chip) विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग अनुप्रयोगों के लिए विकसित की गई प्रोसेसिंग चिप होती है. पारंपरिक प्रोसेसर की तुलना में यह बड़े पैमाने पर समानांतर गणनाएँ अधिक दक्षता से कर सकती है. एआई मॉडल के प्रशिक्षण, डेटा विश्लेषण, चित्र पहचान, भाषा प्रसंस्करण और स्वायत्त प्रणालियों में इनका व्यापक उपयोग किया जाता है. ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU), टेन्सर प्रोसेसिंग यूनिट (TPU) तथा न्यूरल प्रोसेसिंग यूनिट (NPU) इसके प्रमुख उदाहरण हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों के तीव्र विकास के साथ एआई चिप्स की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है.

2nm Chip क्या है?

2 नैनोमीटर (2nm) चिप उन्नत सेमीकंडक्टर निर्माण तकनीक की एक पीढ़ी को दर्शाती है. यहाँ “2nm” शब्द किसी एक भौतिक माप का प्रत्यक्ष संकेत नहीं है, बल्कि निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी श्रेणी को व्यक्त करता है. इस श्रेणी की चिपों में ट्रांजिस्टरों का घनत्व अधिक होता है, जिससे कम स्थान में अधिक कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध कराई जा सकती है. ऐसी चिपें कम ऊर्जा की खपत करती हैं और उच्च प्रदर्शन प्रदान करती हैं. भविष्य के स्मार्टफोन, डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ तथा उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग उपकरण मुख्यतः इसी प्रकार की उन्नत निर्माण तकनीकों से लाभान्वित होंगे.

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