संविधान संशोधन और इसके प्रकार

संविधान संशोधन भारतीय संविधान की एक मूलभूत विशेषता है, जिसके माध्यम से इसे समयानुकूल बनाए रखा जाता है. भारतीय संविधान को अक्सर एक जीवंत दस्तावेज कहा जाता है क्योंकि इसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन करने की व्यवस्था निहित है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शासन की संरचना और प्रावधान बदलती राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बने रहें. स्वतंत्र भारत की बदलती आवश्यकताओं के कारण संविधान में समय-समय पर अनेक संविधान संशोधन किए गए हैं.

लेकिन संविधान संशोधन किसी सामान्य कानून में परिवर्तन करने जैसी सरल प्रक्रिया नहीं है. इसमें संशोधन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं—कुछ प्रावधान संसद साधारण बहुमत से बदले जा सकते हैं, कुछ के लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है, और कुछ मामलों में राज्यों की सहमति भी अनिवार्य होती है. यही व्यवस्था भारतीय संविधान की लचीलेपन और कठोरता के संतुलन को दर्शाती है.

इस लेख में हम जानेंगे

संविधान संशोधन क्या है?

संविधान के किसी प्रावधान में परिवर्तन, नया प्रावधान जोड़ना, किसी पुराने प्रावधान को हटाना या उसके स्वरूप में बदलाव करना संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) कहलाता है.

संविधान निर्माताओं को यह स्पष्ट था कि भविष्य में देश की परिस्थितियाँ बदलेंगी. इसलिए संविधान को ऐसा बनाया गया कि आवश्यक परिवर्तन किए जा सकें, लेकिन उसकी मूल भावना सुरक्षित रहे. यही कारण है कि भारतीय संविधान न तो अमेरिका की तरह पूरी तरह कठोर है और न ब्रिटेन की तरह पूरी तरह लचीला. इसमें दोनों का संतुलित रूप दिखाई देता है.

अनुच्छेद 368 और भाग XX

संविधान संशोधन का मुख्य प्रावधान अनुच्छेद 368 में है. यह संविधान के भाग XX में शामिल है और इसी भाग का विषय है—“संविधान का संशोधन”. अनुच्छेद 368 संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति और उसकी प्रक्रिया देता है. लेकिन एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रखने योग्य है—संविधान में होने वाला हर परिवर्तन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन नहीं होता. कुछ प्रावधान संसद साधारण विधायी प्रक्रिया से भी बदल सकती है. ऐसे परिवर्तन अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माने जाते.

संविधान संशोधन के तीन तरीके

प्रतियोगी परीक्षाओं में संविधान संशोधन को सामान्यतः तीन श्रेणियों में समझाया जाता है—

  1. साधारण बहुमत
  2. विशेष बहुमत
  3. विशेष बहुमत + कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति

यहाँ एक सूक्ष्म तथ्य महत्वपूर्ण है. अनुच्छेद 368 स्वयं दो प्रक्रियाओं का उल्लेख करता है—विशेष बहुमत तथा विशेष बहुमत के साथ राज्यों का अनुमोदन. साधारण बहुमत से होने वाले परिवर्तन संविधान के कुछ अन्य अनुच्छेदों में दिए गए हैं और उन्हें अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं माना जाता.

1. साधारण बहुमत से संशोधन

साधारण बहुमत का अर्थ है—उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत. ऐसे परिवर्तन सामान्य कानून की तरह संसद के दोनों सदनों से पारित किए जाते हैं. इनमें अनुच्छेद 368 वाली विशेष बहुमत की आवश्यकता नहीं होती. इसके अंतर्गत मुख्यतः वे विषय आते हैं जिन्हें संविधान ने अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया से बदलने की अनुमति दी है.

प्रमुख उदाहरण

राज्यों से संबंधित प्रावधान
अनुच्छेद 2 और 3 के तहत नए राज्यों का प्रवेश, नए राज्यों का गठन तथा राज्यों के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन साधारण बहुमत से किया जा सकता है. इसके परिणामस्वरूप प्रथम और चतुर्थ अनुसूची में होने वाले संबंधित परिवर्तन भी इसी प्रक्रिया से किए जाते हैं.

विधान परिषद
अनुच्छेद 169 के तहत किसी राज्य में विधान परिषद का गठन या उसका उन्मूलन संसद साधारण बहुमत से कर सकती है. हालांकि इसकी पहल राज्य विधानसभा के विशेष प्रस्ताव से होती है.

कुछ अनुसूचियाँ और प्रशासनिक प्रावधान
दूसरी, पाँचवीं और छठी अनुसूची के कुछ प्रावधान भी साधारण बहुमत की प्रक्रिया से बदले जा सकते हैं. इसके अलावा संसद की कार्यप्रणाली, सदस्यों के वेतन-भत्ते, विशेषाधिकार, गणपूर्ति तथा कुछ निर्वाचन एवं नागरिकता संबंधी विषयों में भी सामान्य विधायी प्रक्रिया लागू होती है.

2. विशेष बहुमत से संशोधन

संविधान के अधिकांश महत्वपूर्ण प्रावधानों में परिवर्तन के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है. विशेष बहुमत की दो शर्तें हैं— सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत.

दोनों शर्तें पूरी होना आवश्यक है. केवल दो-तिहाई उपस्थित एवं मतदान पर्याप्त नहीं है. इस प्रक्रिया का प्रयोग संविधान के अधिकांश प्रावधानों में किया जाता है. इसमें मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निदेशक तत्व और वे अन्य संवैधानिक प्रावधान शामिल हैं जो साधारण बहुमत या राज्यों की पुष्टि वाली श्रेणी में नहीं आते. उदाहरण के रूप में 42वाँ, 44वाँ, 61वाँ, 73वाँ, 74वाँ, 86वाँ और 101वाँ संविधान संशोधन महत्वपूर्ण हैं.

3. विशेष बहुमत + राज्यों की स्वीकृति

कुछ प्रावधान केवल संसद से जुड़े नहीं हैं. उनका संबंध सीधे संघीय ढाँचे से है. इसलिए ऐसे मामलों में संसद के साथ राज्यों की भूमिका भी रखी गई है. इन प्रावधानों को बदलने के लिए पहले संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत चाहिए. इसके बाद कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से अनुमोदन आवश्यक होता है.

राज्यों में यह अनुमोदन साधारण बहुमत से होता है. विधान परिषद की सहमति आवश्यक नहीं है. राज्यों के अनुमोदन के लिए संविधान ने कोई निश्चित समय-सीमा भी नहीं रखी है.

यह मुख्यतः निम्न विषयों में लागू होती है:

  • राष्ट्रपति का निर्वाचन और उसकी प्रक्रिया
  • संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति की सीमा
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों से संबंधित कुछ प्रावधान
  • संसद और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण
  • सातवीं अनुसूची की संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ
  • संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व
  • अनुच्छेद 368 स्वयं

इन विषयों में बदलाव का सीधा असर संघ और राज्यों के संबंधों पर पड़ सकता है. इसलिए राज्यों की भागीदारी आवश्यक बनाई गई है.

संविधान संशोधन के तीन तरीके: एक नजर में

संशोधन की विधिआवश्यक बहुमतराज्यों की स्वीकृतिउदाहरण
साधारण बहुमतउपस्थित एवं मतदान करने वालों का बहुमतनहींराज्य का गठन/सीमा परिवर्तन
विशेष बहुमतकुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान का 2/3नहींमौलिक अधिकार, DPSP आदि
विशेष बहुमत + राज्य अनुमोदनसंसद में विशेष बहुमतकम-से-कम आधे राज्यराष्ट्रपति निर्वाचन, सातवीं अनुसूची, संघ-राज्य शक्तियाँ

संविधान संशोधन की प्रक्रिया

संविधान संशोधन की प्रक्रिया सामान्य विधेयक से कुछ अलग है.

पहला चरण: विधेयक की शुरुआत

संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है. इसे मंत्री या निजी सदस्य दोनों प्रस्तुत कर सकते हैं. इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है. राज्य विधानमंडल संविधान संशोधन विधेयक शुरू नहीं कर सकता.

दूसरा चरण: संसद की स्वीकृति

विधेयक जिस सदन में प्रस्तुत होता है, वहाँ आवश्यक बहुमत से पारित किया जाता है. इसके बाद इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है.

तीसरा चरण: दोनों सदनों की अलग-अलग स्वीकृति

संविधान संशोधन विधेयक को दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग पारित किया जाना आवश्यक है. यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य है—**दोनों सदनों में मतभेद होने पर Joint Sitting का प्रावधान नहीं है. **इसलिए संविधान संशोधन विधेयक के मामले में लोकसभा और राज्यसभा की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है.

चौथा चरण: राज्यों की स्वीकृति

यदि संशोधन संघीय प्रावधान से संबंधित है, तो कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से अनुमोदन लिया जाता है. राज्य संशोधन विधेयक में बदलाव नहीं कर सकते. वे उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं.

पाँचवाँ चरण: राष्ट्रपति की स्वीकृति

संसद और जहाँ आवश्यक हो, राज्यों की स्वीकृति के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है. राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना अनिवार्य है. वे इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते.

अंतिम चरण

राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद विधेयक संविधान संशोधन अधिनियम बन जाता है और संविधान में उसके अनुसार परिवर्तन हो जाता है.

क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है?

यह प्रश्न भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बहसों में से एक रहा है. शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह प्रश्न आया कि क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है.

शंकरी प्रसाद (1951) और सज्जन सिंह (1965) में न्यायालय ने संसद की संशोधन शक्ति को व्यापक माना. इसके बाद गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में न्यायालय ने अलग दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को इस प्रकार संशोधित नहीं कर सकती कि वे समाप्त या सीमित हो जाएँ.

इसके बाद 24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 ने संसद की संशोधन शक्ति को स्पष्ट रूप से मजबूत किया.

केशवानंद भारती मामला और मूल ढांचा सिद्धांत

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) भारतीय संवैधानिक इतिहास का निर्णायक मामला है. 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने माना कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती. यहीं से मूल ढांचा सिद्धांत सामने आया.

सरल शब्दों में— संसद संविधान को बदल सकती है, लेकिन संविधान की पहचान को समाप्त नहीं कर सकती. मूल ढाँचे की कोई एक बंद सूची संविधान में नहीं दी गई है. यह न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है.

इसके प्रमुख तत्वों में—

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक व्यवस्था
  • धर्मनिरपेक्षता
  • संघवाद
  • विधि का शासन
  • न्यायिक समीक्षा
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • शक्तियों का पृथक्करण
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव
  • संसदीय शासन प्रणाली
  • संविधान की सीमित संशोधन शक्ति
  • मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन

जैसे तत्व शामिल माने गए हैं. सर्वोच्च न्यायालय के बाद के निर्णयों ने भी इन तत्वों को मूल ढाँचे से जोड़ा है.

मूल ढाँचा सिद्धांत के बाद के प्रमुख मामले

इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में लोकतांत्रिक चुनाव और न्यायिक समीक्षा से जुड़े मूल संवैधानिक सिद्धांतों को महत्व मिला.

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) में न्यायालय ने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित माना. मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन को भी महत्व दिया गया.

आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नौवीं अनुसूची में रखे गए कानून भी मूल ढाँचे की कसौटी से पूरी तरह बाहर नहीं हैं.

इस प्रकार Basic Structure Doctrine संसद और न्यायपालिका के बीच शक्ति-संतुलन का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा तंत्र बन गया.

संविधान संशोधन और साधारण कानून में अंतर

साधारण कानून संसद की सामान्य विधायी शक्ति से बनता है. इसके लिए सामान्यतः साधारण बहुमत पर्याप्त होता है. संविधान संशोधन में, विषय के अनुसार, साधारण बहुमत, विशेष बहुमत या विशेष बहुमत के साथ राज्यों की पुष्टि आवश्यक हो सकती है.

इसलिए हर ऐसा कानून जो संविधान के किसी प्रावधान को प्रभावित करता हुआ दिखाई दे, जरूरी नहीं कि वह अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन ही हो. संविधान स्वयं कुछ मामलों में संसद को सामान्य कानून के माध्यम से परिवर्तन की अनुमति देता है.

एक नजर में याद करें

अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन

साधारण बहुमत कुछ विशेष प्रावधान

विशेष बहुमत अधिकांश संवैधानिक प्रावधान

विशेष बहुमत + आधे राज्य संघीय प्रावधान

केशवानंद भारती, 1973 मूल ढांचा सिद्धांत

42वाँ संशोधन → लघु संविधान (Mini Constitution)

52वाँ → दल-बदल (Anti-Defection)

61वाँ मतदान आयु 18 वर्ष

73वाँ पंचायती राज

74वाँ नगरपालिकाएँ

86वाँ शिक्षा का अधिकार

101वाँ GST

103वाँ EWS आरक्षण

105वाँ राज्यों की पिछड़ा वर्ग पहचान शक्ति

106वाँ महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण से संबंधित प्रावधान

निष्कर्ष

संविधान संशोधन का उद्देश्य इसे समय के साथ प्रासंगिक बनाए रखना है. भारतीय व्यवस्था परिवर्तन की अनुमति देती है, लेकिन उसकी मूल संवैधानिक पहचान सुरक्षित रहती है. संसद की संशोधन शक्ति, राज्यों की भूमिका और मूल ढांचा सिद्धांत इसी संतुलन को बनाए रखते हैं. संक्षेप में—भारतीय संविधान बदल सकता है, लेकिन अपनी मूल आत्मा खोकर नहीं.

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