सिंधु जल समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे से जुड़ी एक ऐतिहासिक संधि है. इस पर 19 सितंबर 1960 को कराची में हस्ताक्षर हुए थे. भारत की ओर से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए. विश्व बैंक ने वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई और संधि में उसे कुछ विशिष्ट प्रक्रियात्मक जिम्मेदारियां भी दी गईं.
यह संधि ऐसे समय हुई थी जब भारत और पाकिस्तान के संबंध बेहद तनावपूर्ण थे. इसके बावजूद दोनों देश जल-विवाद को एक संस्थागत ढांचे में रखने पर सहमत हुए. यही कारण है कि इसे लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय जल सहयोग की एक सफल मिसाल माना गया.
हालांकि, अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को ‘अबेयंस’ (abeyance) में रखने की घोषणा की. भारत ने इसे सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा. 2026 में भी भारत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और स्थायी रूप से छोड़ने तक संधि अबेयंस में रहेगी. इस घटनाक्रम ने सिंधु जल समझौते को एक बार फिर भारत-पाकिस्तान संबंधों के केंद्र में ला दिया है.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1947 में भारत के विभाजन के साथ सिंधु नदी तंत्र भी दो देशों में बंट गया. समस्या यह थी कि नदी तंत्र का भौगोलिक स्वरूप राजनीतिक सीमाओं के अनुरूप नहीं था. सिंधु और उसकी प्रमुख सहायक नदियों का उद्गम मुख्यतः भारत और तिब्बत क्षेत्र में है, जबकि उनका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से होकर गुजरता है.
विभाजन के बाद नहरों और उनके नियंत्रण से जुड़े प्रश्न ने जल-विवाद को जन्म दिया. 1948 में जल आपूर्ति को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा. पाकिस्तान को आशंका थी कि ऊपरी तटवर्ती देश के रूप में भारत युद्ध या गंभीर राजनीतिक संकट की स्थिति में उसके जल प्रवाह को प्रभावित कर सकता है.
इस समस्या का समाधान केवल द्विपक्षीय वार्ता से नहीं निकल पाया. विश्व बैंक ने 1951 से इस विवाद में मध्यस्थता की. लगभग नौ वर्षों की वार्ताओं के बाद दोनों देश एक समझौते पर पहुंचे और 1960 में संधि पर हस्ताक्षर हुए. इस प्रकार संधि का मूल उद्देश्य केवल पानी बांटना नहीं था. इसका उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें दोनों देशों को अपने-अपने जल संसाधनों के उपयोग के लिए स्पष्ट अधिकार और नियम मिल सकें.
संधि के प्रमुख प्रावधान
सिंधु जल समझौते ने छह प्रमुख नदियों को दो समूहों में बांटा. पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत को दी गईं. इन नदियों के जल के उपयोग पर भारत को व्यापक अधिकार प्राप्त हुए.
दूसरी ओर, पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—पाकिस्तान को आवंटित की गईं. इन नदियों पर पाकिस्तान को प्रमुख उपयोग अधिकार मिले. हालांकि, भारत को इन नदियों के जल का पूर्ण निषेध नहीं किया गया. उसे घरेलू उपयोग, कृषि तथा निर्धारित शर्तों के अंतर्गत जलविद्युत उत्पादन जैसे सीमित उपयोग की अनुमति दी गई.
इसी व्यवस्था के कारण सामान्यतः कहा जाता है कि सिंधु नदी तंत्र के कुल जल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के उपयोग के लिए उपलब्ध है, जबकि लगभग 20 प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है. लेकिन इसे केवल साधारण प्रतिशत आधारित बंटवारा समझना सही नहीं होगा. संधि में नदी-वार अधिकार और उपयोग की विस्तृत शर्तें निर्धारित की गई हैं.
पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भी विशेष नियम बनाए गए. भारत रन–ऑफ–द–रिवर परियोजनाएं बना सकता है, लेकिन बांध की ऊंचाई, जलाशय की क्षमता, जल निकासी और अन्य तकनीकी विशेषताओं पर संधि के तहत सीमाएं हैं. यही तकनीकी प्रावधान बाद में भारत और पाकिस्तान के बीच कई विवादों का आधार बने.
स्थायी सिंधु आयोग
संधि को लागू करने के लिए स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) बनाया गया. इसमें दोनों देशों की ओर से एक-एक आयुक्त होता है.
आयोग का उद्देश्य केवल विवाद सुलझाना नहीं है. यह दोनों देशों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान, परियोजनाओं से संबंधित जानकारी और संधि के कार्यान्वयन की निगरानी का संस्थागत माध्यम है. आयोग नियमित रूप से बैठक करता है और निरीक्षण यात्राएं भी कर सकता है. यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जल संबंधी मुद्दों को राजनीतिक स्तर पर पहुंचने से पहले तकनीकी स्तर पर संभालने का अवसर मिलता है.
विवाद निवारण की तीन–स्तरीय व्यवस्था
सिंधु जल समझौते की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी विवाद निवारण प्रणाली है. इसमें विवाद की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग संस्थागत रास्ते निर्धारित किए गए हैं.
पहले स्तर पर मामला स्थायी सिंधु आयोग के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया जाता है. तकनीकी प्रकृति के मतभेद होने पर मामला तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) के पास जा सकता है. गंभीर विवाद की स्थिति में मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) का प्रावधान है.
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि प्रत्येक तकनीकी असहमति सीधे अंतरराष्ट्रीय न्यायिक विवाद में न बदल जाए.
हालांकि, किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से जुड़े मामलों में यही व्यवस्था विवाद का विषय बन गई. भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया का समर्थन किया, जबकि पाकिस्तान ने मध्यस्थता न्यायालय का रास्ता अपनाया. विश्व बैंक ने दोनों प्रक्रियाओं को लेकर अपनी प्रक्रियात्मक जिम्मेदारियां निभाईं. 2022 में उसने दोनों प्रक्रियाओं के लिए नियुक्तियां फिर शुरू कीं.
इससे एक बड़ी संस्थागत समस्या सामने आई. एक ही विषय पर दो समानांतर प्रक्रियाओं के चलने से निर्णयों में संभावित टकराव और संधि की व्याख्या को लेकर जटिलता पैदा हो सकती है.

भारत के लिए संधि का महत्व
भारत के लिए सिंधु जल समझौता केवल विदेश नीति का विषय नहीं है. इसका संबंध जल सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा और जम्मू-कश्मीर के विकास से भी है.
भारत को पूर्वी नदियों पर व्यापक उपयोग अधिकार प्राप्त हैं. इससे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में सिंचाई तथा जल प्रबंधन को आधार मिला है. दूसरी ओर, पश्चिमी नदियों पर भारत के सीमित अधिकारों के कारण जम्मू-कश्मीर में उपलब्ध जलविद्युत क्षमता के पूर्ण उपयोग को लेकर लंबे समय से चिंता रही है.
किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाएं इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं. भारत का तर्क है कि संधि पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति देती है. दूसरी ओर, पाकिस्तान परियोजनाओं की डिजाइन और संभावित जल प्रवाह पर आपत्ति करता रहा है.
इसलिए भारत के लिए चुनौती दोहरी है. एक ओर संधि के दायित्वों का पालन करना है. दूसरी ओर अपनी जलविद्युत और जल-संसाधन क्षमता का अधिकतम उपयोग भी करना है.
प्रमुख विवाद और चुनौतियां
सिंधु जल समझौते के अंतर्गत सबसे अधिक विवाद जलविद्युत परियोजनाओं की तकनीकी विशेषताओं को लेकर हुए हैं. बगलिहार परियोजना में बांध की डिजाइन से संबंधित प्रश्न उठा. तटस्थ विशेषज्ञ ने 2007 में अपना निर्णय दिया.
इसके बाद किशनगंगा परियोजना पर विवाद हुआ. मध्यस्थता न्यायालय ने 2013 में अपना निर्णय दिया. इसके बाद किशनगंगा और रतले परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों ने अलग-अलग विवाद निवारण प्रक्रियाओं का सहारा लिया.
इस अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि संधि के तकनीकी प्रावधान अपने समय के लिए उपयोगी होने के बावजूद आज की जटिल जल-राजनीति के लिए पूरी तरह पर्याप्त नहीं हैं.
दूसरी चुनौती जलवायु परिवर्तन है. हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव, अनियमित मानसून, अचानक बाढ़ और लंबे सूखे की घटनाएं सिंधु बेसिन के जल प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं. ऐसे में केवल नदी-वार जल आवंटन पर्याप्त नहीं होगा. जल की मात्रा, समय और मौसमी उपलब्धता को भी ध्यान में रखना पड़ेगा.
तीसरी चुनौती जल और सुरक्षा का बढ़ता संबंध है. भारत-पाकिस्तान संबंधों में सीमा पार आतंकवाद के कारण विश्वास का स्तर बहुत कम है. ऐसी स्थिति में जल समझौता केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं रह जाता. वह व्यापक रणनीतिक संबंधों से जुड़ जाता है.
2026 में पाकिस्तान की ओर से यह चिंता भी व्यक्त की गई कि भारत पानी को राजनीतिक या रणनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है. पाकिस्तान के नेताओं ने जल सुरक्षा को देश की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा है.
2025-26 : वर्तमान संदर्भ
26 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को अबेयंस में रखने का निर्णय लिया. यह निर्णय भारत की व्यापक प्रतिक्रिया का हिस्सा था. भारत ने संकेत दिया कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता.
2026 में भारत ने इस स्थिति को दोहराया. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त करने तक संधि अबेयंस में रहेगी.
इस बीच पाकिस्तान ने भारत के निर्णय को एकतरफा और गैरकानूनी बताया. पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाना जारी रखा है. जुलाई 2026 में पाकिस्तान की ओर से ब्रिटेन के साथ बातचीत में भी सिंधु जल समझौते का मुद्दा उठाया गया.
भारत ने दूसरी ओर सिंधु बेसिन में अपनी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है. जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत और जल-संबंधी बुनियादी ढांचे के विकास को गति देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं.
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत तत्काल पाकिस्तान के हिस्से का पानी मोड़ सकता है. नदी का प्रवाह केवल राजनीतिक निर्णय से नियंत्रित नहीं होता. इसके लिए पर्याप्त भंडारण, बांध, नहर और अन्य जल-संरचनाओं की आवश्यकता होती है. इसलिए संधि के अबेयंस में होने का प्रभाव तत्काल जल-प्रवाह में परिवर्तन के बजाय दीर्घकालीन जल प्रबंधन और रणनीतिक नीति में अधिक दिखाई देता है.
कानूनी और अंतरराष्ट्रीय आयाम
सिंधु जल समझौते को लेकर सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह है कि क्या कोई पक्ष एकतरफा रूप से संधि को निलंबित या समाप्त कर सकता है.
भारत और पाकिस्तान के बीच यह एक विशिष्ट द्विपक्षीय संधि है. भारत ने अप्रैल 2025 में इसे औपचारिक रूप से समाप्त करने के बजाय ‘abeyance’ में रखने की स्थिति अपनाई है. इसलिए वर्तमान विवाद को सीधे ‘संधि समाप्त हो गई’ कहना उचित नहीं होगा.
वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ ट्रीटीज (VCLT) इस चर्चा में महत्वपूर्ण संदर्भ देता है. भारत VCLT का पक्षकार नहीं है. फिर भी उसके कुछ सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संधि कानून के व्यापक सिद्धांतों के रूप में प्रासंगिक हो सकते हैं.
विशेष रूप से rebus sic stantibus का सिद्धांत उल्लेखनीय है. इसका अर्थ है कि परिस्थितियों में अत्यंत मौलिक परिवर्तन होने पर कुछ परिस्थितियों में संधि संबंधी दायित्वों की समीक्षा का प्रश्न उठ सकता है. लेकिन इस सिद्धांत को किसी संधि से मनमाने ढंग से बाहर निकलने का सामान्य अधिकार नहीं माना जाता.
इसीलिए भारत के लिए कानूनी स्थिति जटिल है. राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर संदर्भ राजनीतिक और रणनीतिक आधार प्रदान कर सकता है, लेकिन संधि के औपचारिक कानूनी परिणाम अलग प्रश्न हैं. भारत को भविष्य में किसी भी स्थायी कानूनी कदम के लिए संधि के अपने प्रावधानों और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों पर सावधानीपूर्वक विचार करना होगा.
विश्व बैंक की भूमिका को भी सही ढंग से समझना आवश्यक है. वह भारत और पाकिस्तान के बीच जल का निर्णायक या सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकारी नहीं है. उसकी भूमिका संधि में निर्धारित है. विशेष रूप से तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय की नियुक्ति जैसी प्रक्रियाओं में उसकी भूमिका है.
इसलिए भारत-पाकिस्तान विवाद का समाधान अंततः केवल विश्व बैंक के हस्तक्षेप से नहीं हो सकता.
आगे की राह
सबसे पहले, सिंधु बेसिन को केवल जल–बंटवारे की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए. इसे साझा नदी बेसिन प्रबंधन के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है. इसमें बाढ़ प्रबंधन, जल गुणवत्ता, जलवायु जोखिम, डेटा साझाकरण और पारिस्थितिकी को भी शामिल किया जाना चाहिए.
दूसरे, संधि के आधुनिकीकरण पर विचार होना चाहिए. 1960 की परिस्थितियां और आज की परिस्थितियां अलग हैं. उस समय जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मौसम घटनाओं, आधुनिक जलविद्युत तकनीक और बढ़ती जल मांग जैसी चुनौतियां आज के स्तर पर मौजूद नहीं थीं.
तीसरे, विवाद निवारण प्रणाली को अधिक स्पष्ट बनाया जाना चाहिए. एक ही विषय पर तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय जैसी समानांतर प्रक्रियाओं की संभावना संधि की संस्थागत स्पष्टता को कमजोर कर सकती है. 2016-22 का अनुभव बताता है कि इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है.
चौथे, भारत को अपने हिस्से के जल के कुशल उपयोग पर ध्यान देना चाहिए. केवल संधि से बाहर निकलने की बहस पर्याप्त नहीं है. वास्तविक जल सुरक्षा के लिए भंडारण क्षमता, सिंचाई दक्षता, जलविद्युत परियोजनाएं, नहर नेटवर्क और आधुनिक जल प्रबंधन में निवेश जरूरी है.
पांचवें, राष्ट्रीय जल सुरक्षा और विदेश नीति के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए. भारत को एक ओर आतंकवाद के विरुद्ध अपनी सुरक्षा चिंताओं पर दृढ़ रहना होगा. दूसरी ओर जल को दीर्घकालीन क्षेत्रीय स्थिरता से भी जोड़ना होगा.
निष्कर्ष
सिंधु जल समझौता केवल पानी बांटने वाली संधि नहीं है. यह भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था है. युद्धों और गंभीर राजनीतिक तनावों के बावजूद यह छह दशकों से अधिक समय तक कायम रही. यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.
लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं. सीमा पार आतंकवाद, बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, जलवायु परिवर्तन और जल की बढ़ती मांग ने पुराने ढांचे के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और जल सुरक्षा से समझौता किए बिना अपने जल संसाधनों का अधिकतम और न्यायसंगत उपयोग करे. साथ ही, दीर्घकाल में साझा नदी बेसिन के वैज्ञानिक प्रबंधन की संभावना को भी खुला रखे.
इसलिए सिंधु जल समझौते का भविष्य केवल इस प्रश्न पर निर्भर नहीं करेगा कि संधि जारी रहती है या नहीं. वास्तविक प्रश्न यह है कि भारत और पाकिस्तान बदलती जलवायु और बदलती भू-राजनीति के बीच जल को संघर्ष का साधन बनाते हैं या सहयोग और स्थिरता का माध्यम.



