विद्युत धारा (Electric Current) क्या है? प्रकार, प्रभाव और उपयोग

हम जानते हैं कि किसी धातु के भीतर बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन उपस्थित रहते हैं. सामान्य अवस्था में ये इलेक्ट्रॉन अनियमित (Random) गति करते रहते हैं. इस कारण इनकी कुल गति किसी एक निश्चित दिशा में नहीं होती और धातु में विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती. जब किसी चालक (Conductor) के सिरों के बीच विभवान्तर (Potential Difference) लगाया जाता है, तब चालक के भीतर एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है. यह विद्युत क्षेत्र मुक्त इलेक्ट्रॉनों पर बल लगाता है. परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन अपनी अनियमित गति के साथ-साथ एक निश्चित दिशा में धीरे-धीरे खिसकने लगते हैं. इलेक्ट्रॉनों की इस सामूहिक दिशा-गत गति को अपवाह (Drift Motion) कहा जाता है.

चूँकि इलेक्ट्रॉन आवेशित कण हैं, इसलिए उनके स्थानान्तरण के साथ विद्युत आवेश का भी स्थानान्तरण होता है. किसी चालक में विद्युत आवेश के व्यवस्थित प्रवाह को विद्युत धारा (Electric Current) कहते हैं. विद्युत धारा केवल इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह से ही उत्पन्न नहीं होती. किसी भी प्रकार के आवेशित कणों, जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन या आयनों की गति से भी विद्युत धारा उत्पन्न हो सकती है. उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रोलाइट विलयनों में धारा का प्रवाह आयनों के कारण होता है.

इस लेख में हम जानेंगे

विद्युत धारा क्या है?

विद्युत धारा किसी चालक में विद्युत आवेशों के व्यवस्थित प्रवाह को कहते हैं. इसका SI मात्रक एम्पियर (A) है. धातुओं में यह मुख्यतः इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के कारण तथा इलेक्ट्रोलाइट्स में आयनों के प्रवाह के कारण उत्पन्न होती है.

I=Q/t

जहाँ,

  • I = विद्युत धारा
  • Q = प्रवाहित आवेश
  • t = समय

विद्युत धारा की दिशा

विद्युत आवेश दो प्रकार के होते हैं—

  • धनात्मक आवेश (Positive Charge)
  • ऋणात्मक आवेश (Negative Charge)

परंपरागत रूप से विद्युत धारा की दिशा उस दिशा में मानी जाती है, जिस दिशा में धनात्मक आवेश गति करता है. इसलिए यदि किसी चालक में केवल इलेक्ट्रॉन प्रवाहित हो रहे हों, तो धारा की दिशा इलेक्ट्रॉनों की वास्तविक गति की दिशा के विपरीत मानी जाती है.

बैटरी, बल्ब और स्विच सहित विद्युत परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह की दिशा दर्शाने वाला लेबलयुक्त आरेख.
बैटरी के धन टर्मिनल (+) से ऋण टर्मिनल (−) तक विद्युत धारा के प्रवाह को दर्शाता एक सरल परिपथ आरेख,

उदाहरण के लिए, धातु के तार में इलेक्ट्रॉन निम्न विभव से उच्च विभव की ओर गति करते हैं, जबकि परंपरागत विद्युत धारा की दिशा उच्च विभव से निम्न विभव की ओर मानी जाती है.

विभवान्तर और धारा का प्रवाह

किसी चालक में विद्युत धारा को निरंतर बनाए रखने के लिए उसके दोनों सिरों के बीच विभवान्तर होना आवश्यक है. इसके लिए चालक के एक सिरे पर इलेक्ट्रॉनों की अधिकता तथा दूसरे सिरे पर उनकी कमी रखी जाती है.

जिस सिरे का विभव अधिक होता है, उसे उच्च विभव (High Potential) तथा जिस सिरे का विभव कम होता है, उसे निम्न विभव (Low Potential) कहते हैं. इन दोनों के बीच के अंतर को विभवान्तर (Potential Difference) कहा जाता है.

विभवान्तर का SI मात्रक वोल्ट (Volt) है. इसी कारण विभवान्तर को सामान्य भाषा में वोल्टेज (Voltage) भी कहा जाता है.

विद्युत धारा, प्रतिरोध और ऊर्जा स्रोत

विद्युत धारा का SI मात्रक एम्पियर (Ampere) है. जब धारा किसी चालक से होकर गुजरती है, तो चालक उसके प्रवाह का विरोध करता है. चालक द्वारा धारा के प्रवाह में उत्पन्न इस विरोध को प्रतिरोध (Resistance) कहते हैं. प्रतिरोध का SI मात्रक ओम (Ω) है.

किसी चालक में विद्युत धारा को लगातार प्रवाहित रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है. यह ऊर्जा बैटरी, सेल, जनरेटर या अन्य विद्युत स्रोतों द्वारा प्रदान की जाती है. यही स्रोत चालक में विभवान्तर बनाए रखते हैं और इलेक्ट्रॉनों को निरंतर गति प्रदान करते हैं.

अर्द्धचालकों में विद्युत धारा

कुछ पदार्थ, जैसे सिलिकॉन (Silicon) और जर्मेनियम (Germanium), सामान्य परिस्थितियों में बहुत कम विद्युत चालकता प्रदर्शित करते हैं. इन्हें अर्द्धचालक (Semiconductors) कहा जाता है. जब इनमें नियंत्रित मात्रा में अशुद्धियाँ (Impurities) मिलाई जाती हैं, तो इनकी चालकता काफी बढ़ जाती है. इस प्रक्रिया को डोपिंग (Doping) कहते हैं.

अर्द्धचालकों में विद्युत धारा का प्रवाह दो प्रकार के आवेश वाहकों द्वारा होता है—

  1. मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons)
  2. होल या रिक्तियाँ (Holes)

होल वास्तव में इलेक्ट्रॉनों की कमी से उत्पन्न स्थान होते हैं, जो धनात्मक आवेश की तरह व्यवहार करते हैं. इसलिए अर्द्धचालकों में विद्युत धारा इलेक्ट्रॉनों तथा होलों दोनों की गति के कारण प्रवाहित हो सकती है.

आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, जैसे ट्रांजिस्टर, डायोड, रेडियो, कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल परिपथों का कार्य अर्द्धचालकों में होने वाले इसी नियंत्रित विद्युत धारा प्रवाह पर आधारित है.

विद्युत वाहक बल के स्रोत (Sources of Electromotive Force)

किसी विद्युत परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है. यह ऊर्जा विभिन्न स्रोतों द्वारा प्रदान की जाती है. जब कोई स्रोत किसी अन्य प्रकार की ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है और चालक में आवेशों को गति प्रदान करता है, तो वह विद्युत वाहक बल (Electromotive Force या EMF) उत्पन्न करता है.

सरल शब्दों में, विद्युत वाहक बल वह ऊर्जा है जो किसी स्रोत द्वारा प्रति इकाई आवेश को परिपथ में प्रवाहित करने के लिए प्रदान की जाती है.

विद्युत वाहक बल उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं—

1. विद्युत सेल (Electric Cell)

विद्युत सेल विद्युत वाहक बल का सबसे सामान्य स्रोत है. इसमें होने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती हैं.

जब सेल के दोनों सिरों को किसी चालक से जोड़ा जाता है, तो रासायनिक क्रियाओं के कारण विभवान्तर उत्पन्न होता है और विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है.

ऊर्जा रूपांतरण :

रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

उदाहरण :

  • वोल्टाइक सेल (Voltaic Cell)
  • डेनियल सेल (Daniell Cell)
  • लेक्लांशे सेल (Leclanché Cell)
  • शुष्क सेल (Dry Cell)
  • सीसा-संचायक सेल (Lead Acid Battery)

आज मोबाइल फोन, टॉर्च, घड़ियों और वाहनों की बैटरियाँ इसी सिद्धांत पर कार्य करती हैं.

2. डायनमो या विद्युत जनित्र (Dynamo / Electric Generator)

जब किसी चालक को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है या उसकी स्थिति बदली जाती है, तो उसमें विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के कारण विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है.

यही सिद्धांत विद्युत जनित्र (Generator) का आधार है.

ऊर्जा रूपांतरण :

यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

बिजलीघरों में टरबाइन की सहायता से जनित्रों को घुमाया जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है.

उदाहरण :

  • जलविद्युत संयंत्र
  • ताप विद्युत संयंत्र
  • पवन ऊर्जा संयंत्र
  • डीज़ल जनरेटर

3. तापयुग्म (Thermocouple)

यदि दो भिन्न धातुओं या चालकों को जोड़कर दो संधियाँ बनाई जाएँ और उनमें से एक संधि को गर्म तथा दूसरी को ठंडा रखा जाए, तो उनके बीच विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है. इस व्यवस्था को ताप-युग्म (Thermocouple) कहते हैं.

यह घटना सीबेक प्रभाव (Seebeck Effect) पर आधारित है.

ऊर्जा रूपांतरण :

ऊष्मीय ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

ताप-युग्म का उपयोग उद्योगों, भट्टियों तथा वैज्ञानिक उपकरणों में तापमान मापने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है.

4. प्रकाश विद्युत सेल (Photoelectric Cell)

कुछ धातुओं और पदार्थों, जैसे सीज़ियम, पोटैशियम, जस्ता तथा सेलेनियम पर जब पर्याप्त ऊर्जा वाला प्रकाश या पराबैंगनी विकिरण पड़ता है, तो उनकी सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं. इस घटना को प्रकाश विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) कहा जाता है.

इन उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की सहायता से विद्युत वाहक बल उत्पन्न किया जा सकता है. इसी सिद्धांत पर आधारित युक्तियों को प्रकाश विद्युत सेल कहा जाता है.

ऊर्जा रूपांतरण :

प्रकाशीय ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

उपयोग :

  • स्वचालित दरवाजे
  • प्रकाश संवेदक (Light Sensors)
  • सुरक्षा प्रणाली
  • अंतरिक्ष अनुसंधान उपकरण

इसी सिद्धांत के विकसित रूप का उपयोग सौर कोशिकाओं (Solar Cells) और सौर पैनलों में किया जाता है.

5. पीजोविद्युत स्रोत (Piezoelectric Source)

कुछ विशेष क्रिस्टल, जैसे क्वार्ट्ज (Quartz), रोशेल लवण (Rochelle Salt) तथा कुछ सिरेमिक पदार्थ, यांत्रिक दाब या तनाव लगाए जाने पर अपने सिरों के बीच विभवान्तर उत्पन्न कर देते हैं. इस घटना को पीजो-विद्युत प्रभाव (Piezoelectric Effect) कहते हैं.

इस सिद्धांत पर कार्य करने वाले स्रोतों को पीजो-विद्युत स्रोत कहा जाता है.

ऊर्जा रूपांतरण :

यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

उपयोग :

  • संवेदनशील माइक्रोफोन
  • ग्रामोफोन पिक-अप
  • गैस लाइटर
  • दबाव सेंसर
  • अल्ट्रासोनिक उपकरण

जब क्रिस्टल पर दाब डाला जाता है, तो उसकी आंतरिक संरचना में आवेशों का असंतुलन उत्पन्न हो जाता है, जिससे विद्युत वाहक बल पैदा होता है.

विद्युत वाहक बल के विभिन्न स्रोत अलग-अलग प्रकार की ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं. यही स्रोत परिपथ में आवेशों को गति प्रदान करते हैं और विद्युत धारा के प्रवाह को संभव बनाते हैं.

स्रोतऊर्जा रूपांतरण
विद्युत सेलरासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
डायनमोयांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
ताप-युग्मऊष्मीय ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
प्रकाश विद्युत सेलप्रकाशीय ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
पीजो-विद्युत स्रोतयांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

इस प्रकार विद्युत वाहक बल विभिन्न ऊर्जा स्रोतों और आधुनिक विद्युत उपकरणों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करता है.

विद्युत धारा के प्रभाव (Effects of Electric Current)

जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो वह केवल आवेशों का प्रवाह ही नहीं करती, बल्कि अपने आसपास कई भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन भी उत्पन्न करती है. इन परिवर्तनों को विद्युत धारा के प्रभाव कहा जाता है.

विद्युत धारा के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं—

1. उष्मीय प्रभाव (Heating Effect of Electric Current)

जब विद्युत धारा किसी चालक से होकर गुजरती है, तो चालक के भीतर गतिमान इलेक्ट्रॉन परमाणुओं एवं आयनों से बार-बार टकराते हैं. इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनों की कुछ ऊर्जा ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है.

फलस्वरूप चालक का तापमान बढ़ने लगता है. इस घटना को विद्युत धारा का उष्मीय प्रभाव कहा जाता है.

यह प्रभाव चालक के प्रतिरोध पर निर्भर करता है. चालक का प्रतिरोध जितना अधिक होगा, उतनी ही अधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी.

दैनिक जीवन में उपयोग

  • विद्युत हीटर (Electric Heater)
  • विद्युत इस्त्री (Electric Iron)
  • गीजर (Geyser)
  • इलेक्ट्रिक केतली (Electric Kettle)
  • टोस्टर (Toaster)
  • तंतुयुक्त विद्युत बल्ब (Incandescent Bulb)

इन सभी उपकरणों में विद्युत ऊर्जा का रूपांतरण ऊष्मीय ऊर्जा में होता है.

2. चुम्बकीय प्रभाव (Magnetic Effect of Electric Current)

जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Field) उत्पन्न हो जाता है. इस घटना को विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव कहा जाता है.

इस प्रभाव की खोज 1820 में Hans Christian Ørsted ने की थी. उन्होंने पाया कि धारा प्रवाहित तार के पास रखी चुंबकीय सुई विक्षेपित हो जाती है.

प्रमुख अनुप्रयोग

  • विद्युत घंटी (Electric Bell)
  • टेलीफोन
  • लाउडस्पीकर
  • विद्युत मोटर (Electric Motor)
  • विद्युत पंखा
  • विद्युत चुंबक (Electromagnet)

इसी सिद्धांत का उपयोग विद्युत जनित्र (Generator) और डायनमो में भी किया जाता है. जब किसी चुंबकीय क्षेत्र में तार की कुंडली को घुमाया जाता है, तो उसमें विद्युत धारा प्रेरित होती है. इस प्रक्रिया को विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहते हैं.

3. रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect of Electric Current)

जब विद्युत धारा किसी विद्युत अपघट्य (Electrolyte) के विलयन या उसकी गलित (Molten) अवस्था में प्रवाहित की जाती है, तो उसमें रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं.

कई बार यह परिवर्तन इतना अधिक होता है कि पदार्थ अपने घटक तत्वों में टूट जाता है. इस प्रक्रिया को विद्युत अपघटन (Electrolysis) कहा जाता है.

उदाहरण

यदि अम्लीकृत जल (Acidified Water) में विद्युत धारा प्रवाहित की जाए, तो वह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस में विघटित हो जाता है.

प्रमुख उपयोग

  • विद्युत लेपन (Electroplating)
  • धातुओं का शुद्धिकरण
  • रासायनिक उद्योग
  • बैटरी निर्माण
  • धातुओं का निष्कर्षण

इस प्रभाव में विद्युत ऊर्जा का रूपांतरण रासायनिक ऊर्जा में होता है.

विद्युत् धारा के प्रकार

विद्युत धारा के तीन प्रमुख प्रभाव—उष्मीय, चुम्बकीय और रासायनिक प्रभाव—आधुनिक विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक तकनीक की नींव हैं. वहीं विद्युत धारा मुख्यतः दो प्रकार की होती है—प्रत्यावर्ती धारा (AC) और दिष्ट धारा (DC). आज घरों में प्रयुक्त बिजली AC के रूप में उपलब्ध होती है, जबकि अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक उपकरण DC पर कार्य करते हैं.

AC (Alternating Current) और DC (Direct Current) वेवफॉर्म की तुलना दर्शाता शैक्षिक आरेख, जिसमें AC का साइन तरंग (Sinusoidal Wave) और DC का स्थिर वोल्टेज स्तर समय के साथ प्रदर्शित किया गया है.
AC और DC वेवफॉर्म का तुलनात्मक चित्र – AC धारा समय के साथ दिशा और परिमाण बदलती है, जबकि DC धारा स्थिर रहती है.

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current – AC)

वह विद्युत धारा जिसका परिमाण (Magnitude) और दिशा (Direction) समय के साथ नियमित रूप से बदलते रहते हैं, प्रत्यावर्ती धारा (AC) कहलाती है.

भारत में घरेलू विद्युत आपूर्ति सामान्यतः 50 हर्ट्ज (50 Hz) आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा होती है. इसका अर्थ है कि धारा प्रति सेकंड 50 चक्र पूरे करती है.

विशेषताएँ

  • धारा की दिशा समय-समय पर बदलती रहती है.
  • परिमाण भी लगातार परिवर्तित होता रहता है.
  • लंबी दूरी तक विद्युत ऊर्जा के संचरण में अधिक उपयोगी होती है.
  • विद्युत उत्पादन एवं वितरण प्रणाली का आधार है.

उपयोग

  • घरेलू विद्युत आपूर्ति
  • औद्योगिक संयंत्र
  • विद्युत ग्रिड
  • एयर कंडीशनर
  • रेफ्रिजरेटर
  • पंखे एवं अन्य घरेलू उपकरण

दिष्ट धारा (Direct Current – DC)

वह विद्युत धारा जिसका परिमाण लगभग स्थिर रहता है तथा जिसकी दिशा समय के साथ नहीं बदलती, दिष्ट धारा (DC) कहलाती है. इस प्रकार की धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है. इनमें धारा की दिशा स्थिर रहती है. सामान्यतः परिमाण भी स्थिर रहता है. ये  इलेक्ट्रॉनिक परिपथों के लिए उपयुक्त होती है.

विद्युत सेल, बैटरी, सौर सेल (Solar Cell), डीसी जनित्र (DC Generator) इत्यादि इनके स्त्रोत है. इनका उपयोग मोबाइल फोन, लैपटॉप, कैलकुलेटर, एलईडी लाइट, इलेक्ट्रॉनिक परिपथ और विद्युत वाहन (EV) में होता है.

AC और DC में अंतर

आधारप्रत्यावर्ती धारा (AC)दिष्ट धारा (DC)
दिशासमय के साथ बदलती हैस्थिर रहती है
परिमाणलगातार बदलता हैलगभग स्थिर रहता है
आवृत्तिनिश्चित आवृत्ति होती हैआवृत्ति शून्य होती है
प्रमुख स्रोतजनित्र एवं विद्युत ग्रिडसेल एवं बैटरी
उपयोगविद्युत वितरण एवं घरेलू आपूर्तिइलेक्ट्रॉनिक उपकरण एवं बैटरियाँ

ओम का नियम (Ohm’s Law)

सन् 1827 में Georg Simon Ohm ने विद्युत धारा, विभवान्तर और प्रतिरोध के बीच संबंध स्थापित किया. उनके अनुसार, यदि तापमान तथा अन्य भौतिक परिस्थितियाँ स्थिर रहें, तो किसी चालक में प्रवाहित धारा उसके सिरों के बीच लगाए गए विभवान्तर के समानुपाती होती है. इसे ओम का नियम कहते हैं.

𝑉=𝐼 x R

जहाँ V विभवान्तर, I विद्युत धारा तथा R प्रतिरोध को दर्शाते हैं.

ओम के नियम का ग्राफ जिसमें धारा (I) और विभवान्तर (V) के बीच सीधा रैखिक संबंध दर्शाया गया है.
ओम के नियम का ग्राफ दर्शाता है कि नियत ताप पर धारा (I) विभवान्तर (V) के समानुपाती होती है, इसलिए I–V ग्राफ एक सीधी रेखा बनाता है.

ओम का नियम विद्युत परिपथों की गणना का आधार है. इसका उपयोग विद्युत उपकरणों के निर्माण, विद्युत शक्ति के निर्धारण तथा घरेलू वायरिंग के डिजाइन में किया जाता है. हालांकि यह नियम सभी पदार्थों पर लागू नहीं होता. अर्द्धचालक, डायोड तथा कुछ विशेष पदार्थ ओम के नियम का पूर्णतः पालन नहीं करते.

जल विद्युत (Hydroelectric Power)

बहते या ऊँचाई पर संग्रहीत जल की ऊर्जा का उपयोग करके उत्पन्न की गई विद्युत ऊर्जा को जल विद्युत (Hydroelectric Power) कहा जाता है. यह विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में से एक है.

जल विद्युत उत्पादन के लिए सामान्यतः किसी नदी पर बाँध (Dam) बनाया जाता है. बाँध के पीछे बड़ी मात्रा में जल एकत्र किया जाता है. ऊँचाई पर स्थित होने के कारण इस जल में पर्याप्त स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) संचित रहती है.

जब इस जल को नियंत्रित रूप से पाइपों के माध्यम से नीचे छोड़ा जाता है, तो उसकी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है. तीव्र वेग से बहता हुआ जल टरबाइन (Turbine) के ब्लेडों को घुमाता है.

टरबाइन जनित्र (Generator) से जुड़ा होता है. टरबाइन के घूमने पर जनित्र भी घूमता है और विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत के अनुसार विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है.

जल विद्युत उत्पादन में ऊर्जा रूपांतरण

स्थितिज ऊर्जा → गतिज ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

जल विद्युत के प्रमुख लाभ

  • यह नवीकरणीय (Renewable) ऊर्जा स्रोत है.
  • उत्पादन के दौरान वायु प्रदूषण बहुत कम होता है.
  • बड़े पैमाने पर विद्युत उत्पादन संभव है.
  • संचालन लागत अपेक्षाकृत कम होती है.

भारत के प्रमुख जल विद्युत परियोजनाएँ

  • भाखड़ा नांगल बाँध
  • टिहरी बाँध
  • हीराकुंड बाँध
  • सरदार सरोवर बाँध

ट्रांसफॉर्मर (Transformer)

ट्रांसफॉर्मर एक विद्युत उपकरण है जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) के विभव (Voltage) को बढ़ाने या घटाने के लिए प्रयोग किया जाता है. यह अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है.

जल विद्युत में जल की स्थितिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है, जबकि ट्रांसफॉर्मर विद्युत ऊर्जा के वोल्टेज स्तर को आवश्यकता अनुसार बढ़ाने या घटाने का कार्य करता है. आधुनिक विद्युत उत्पादन, संचरण और वितरण प्रणाली में इन दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है.

विद्युत ट्रांसफॉर्मर का लेबलयुक्त चित्र जिसमें बुशिंग, कंजर्वेटर टैंक, रेडिएटर, मुख्य तेल टैंक, ऑयल लेवल गेज और अन्य प्रमुख भागों को दर्शाया गया है.
ट्रांसफॉर्मर के प्रमुख भागों का लेबलयुक्त आरेख, जिसमें उच्च वोल्टेज बुशिंग, न्यूट्रल बुशिंग, कंजर्वेटर टैंक, रेडिएटर, ऑयल लेवल गेज तथा मुख्य टैंक को दर्शाया गया है.

ट्रांसफॉर्मर में सामान्यतः दो कुंडलियाँ (Coils) होती हैं—

  1. प्राथमिक कुंडली (Primary Coil)
  2. द्वितीयक कुंडली (Secondary Coil)

जब प्राथमिक कुंडली में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके आसपास परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है. यह परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र द्वितीयक कुंडली में विद्युत वाहक बल प्रेरित करता है. परिणामस्वरूप द्वितीयक कुंडली में भी प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न हो जाती है.

ट्रांसफॉर्मर के प्रकार

1. अपचायी ट्रांसफॉर्मर (Step-down Transformer)

यह उच्च विभव (High Voltage) वाली प्रत्यावर्ती धारा को निम्न विभव (Low Voltage) वाली धारा में परिवर्तित करता है. वोल्टेज घटने पर धारा की प्रबलता बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए, विद्युत वितरण लाइन से आने वाले उच्च वोल्टेज को घरों में उपयोग योग्य वोल्टेज में बदलने के लिए अपचायी ट्रांसफॉर्मर का उपयोग किया जाता है.

उपयोग

  • घरेलू विद्युत उपकरण
  • मोबाइल चार्जर
  • एडाप्टर
  • इलेक्ट्रॉनिक परिपथ

2. उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step-up Transformer)

यह निम्न विभव वाली प्रत्यावर्ती धारा को उच्च विभव वाली धारा में परिवर्तित करता है. वोल्टेज बढ़ने पर धारा की प्रबलता कम हो जाती है. विद्युत उत्पादन केंद्रों में जनित्र द्वारा उत्पन्न वोल्टेज को लंबी दूरी तक भेजने से पहले उच्चायी ट्रांसफॉर्मर की सहायता से बढ़ाया जाता है.

उपयोग

  • विद्युत उत्पादन केंद्र
  • विद्युत संचरण (Power Transmission)
  • औद्योगिक संयंत्र

विद्युत संचरण में ट्रांसफॉर्मर का महत्व

विद्युत ऊर्जा को लंबी दूरी तक भेजते समय यदि वोल्टेज कम रखा जाए, तो तारों में अधिक ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है. इसी कारण विद्युत संयंत्रों में पहले वोल्टेज को बहुत अधिक बढ़ाया जाता है. फिर उपभोक्ताओं के निकट पहुँचने पर उसे पुनः कम किया जाता है. इस प्रक्रिया से ऊर्जा की हानि कम होती है और विद्युत वितरण अधिक दक्ष बनता है.

ट्रांसफॉर्मर केवल AC पर ही क्यों कार्य करता है?

ट्रांसफॉर्मर का कार्य सिद्धांत अन्योन्य प्रेरण पर आधारित है. अन्योन्य प्रेरण के लिए परिवर्तित (Changing) चुम्बकीय क्षेत्र आवश्यक होता है. प्रत्यावर्ती धारा (AC) लगातार अपना मान और दिशा बदलती रहती है, इसलिए वह परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है. इसी कारण ट्रांसफॉर्मर AC के साथ प्रभावी रूप से कार्य करता है.

इसके विपरीत दिष्ट धारा (DC) का मान और दिशा स्थिर रहते हैं. इसलिए DC परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न नहीं करती. परिणामस्वरूप द्वितीयक कुंडली में विद्युत वाहक बल प्रेरित नहीं होता और ट्रांसफॉर्मर कार्य नहीं कर पाता.

विद्युत सेलों के प्रकार (Types of Electric Cells)

घरों, प्रयोगशालाओं, टॉर्च, रेडियो, घड़ियों, मोबाइल उपकरणों तथा मोटर-कारों जैसे अनेक उपकरणों में विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति के लिए विद्युत सेलों का उपयोग किया जाता है. विद्युत सेल ऐसे उपकरण होते हैं जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं. उनकी संरचना और कार्यप्रणाली के आधार पर इन्हें मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—प्राथमिक सेल और द्वितीयक सेल.

प्राथमिक सेल (Primary Cell)

प्राथमिक सेल ऐसे विद्युत सेल होते हैं जिनमें रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से सीधे रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है. एक बार सेल के भीतर उपस्थित रासायनिक पदार्थ समाप्त हो जाने पर यह पुनः उपयोग योग्य नहीं रहता. अर्थात् इसे दोबारा आवेशित (Recharge) नहीं किया जा सकता.

प्रयुक्त रासायनिक पदार्थों के आधार पर प्राथमिक सेलों के अनेक प्रकार विकसित किए गए हैं, जिनमें वोल्टाइक सेल, लेक्लांशे सेल, डेनियल सेल, बुनसेन सेल तथा बाइक्रोमेट सेल प्रमुख हैं. दैनिक जीवन में सबसे अधिक उपयोग होने वाला शुष्क सेल (Dry Cell) भी लेक्लांशे सेल का ही संशोधित रूप है.

प्राथमिक सेल सरल संरचना वाले होते हैं और इन्हें उपयोग से पहले चार्ज करने की आवश्यकता नहीं होती. यही कारण है कि छोटे और पोर्टेबल उपकरणों में इनका व्यापक उपयोग किया जाता है.

द्वितीयक सेल (Secondary Cell)

द्वितीयक सेल वे सेल हैं जिन्हें उपयोग में लाने से पहले किसी बाहरी स्रोत से विद्युत ऊर्जा देकर आवेशित (Charging) किया जाता है. आवेशन की प्रक्रिया में विद्युत ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित हो जाती है.

जब इस सेल को किसी परिपथ में जोड़ा जाता है, तब संग्रहित रासायनिक ऊर्जा पुनः विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होकर धारा उत्पन्न करती है. इस प्रक्रिया को निरावेशन (Discharging) कहा जाता है.

द्वितीयक सेलों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन्हें बार-बार आवेशित करके पुनः उपयोग में लाया जा सकता है. इसी कारण इन्हें संचायक सेल (Storage Cell) या संचायक (Accumulator) भी कहा जाता है.

मोटर-कारों में प्रयुक्त लेड-अम्ल संचायक (Lead-Acid Battery), इन्वर्टर बैटरियाँ तथा आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त रिचार्जेबल बैटरियाँ इसी श्रेणी में आती हैं. निकेल-आयरन (Ni-Fe) तथा अन्य क्षारीय सेल भी द्वितीयक सेलों के उदाहरण हैं.

प्राथमिक और द्वितीयक सेलों की तुलना

प्राथमिक और द्वितीयक सेल दोनों का उद्देश्य विद्युत ऊर्जा उपलब्ध कराना है, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली और उपयोगिता में महत्वपूर्ण अंतर होता है.

प्राथमिक सेल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे उपयोग से पहले चार्ज करने की आवश्यकता नहीं होती. रासायनिक पदार्थों को उचित रूप से संयोजित करने के बाद इसे सीधे प्रयोग में लाया जा सकता है. इसके विपरीत द्वितीयक सेल को उपयोग से पहले आवेशित करना आवश्यक होता है.

हालाँकि, प्राथमिक सेल एक बार पूर्ण रूप से निरावेशित हो जाने पर अनुपयोगी हो जाता है. उसमें पुनः ऊर्जा संग्रहित नहीं की जा सकती. दूसरी ओर द्वितीयक सेल को बार-बार चार्ज करके कई वर्षों तक उपयोग में लाया जा सकता है. यही कारण है कि आधुनिक ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में द्वितीयक सेलों का महत्व अधिक है.

प्राथमिक सेलों का आंतरिक प्रतिरोध अपेक्षाकृत अधिक होता है और उनका विद्युत वाहक बल भी सीमित होता है. इसलिए उनसे अधिक धारा प्राप्त नहीं की जा सकती. इसके विपरीत द्वितीयक सेलों का आंतरिक प्रतिरोध कम होता है, जिससे वे अधिक तीव्र धारा प्रदान करने में सक्षम होते हैं. यही कारण है कि वाहन, इन्वर्टर तथा ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में द्वितीयक सेल अधिक उपयुक्त माने जाते हैं.

शुष्क सेल (Dry Cell)

कार्बन रॉड, मैंगनीज डाइऑक्साइड, इलेक्ट्रोलाइट पेस्ट और जिंक पात्र सहित शुष्क सेल की आंतरिक संरचना का लेबलयुक्त कट-अवे चित्र.
शुष्क सेल की आंतरिक संरचना दर्शाने वाला चित्र, जिसमें धनात्मक टर्मिनल, कार्बन रॉड, इलेक्ट्रोलाइट पेस्ट, मैंगनीज डाइऑक्साइड मिश्रण और जिंक पात्र को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है.

शुष्क सेल दैनिक जीवन में सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले विद्युत स्रोतों में से एक है. यह वास्तव में लेक्लांशे सेल का संशोधित रूप है. यद्यपि इसे “शुष्क सेल” कहा जाता है, फिर भी यह पूरी तरह शुष्क नहीं होता. इसके भीतर प्रयुक्त रासायनिक मिश्रण में पर्याप्त नमी उपस्थित रहती है, जो विद्युत चालकता और रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए आवश्यक होती है.

शुष्क सेल में जस्ते (Zinc) का बेलनाकार पात्र ऋणात्मक इलेक्ट्रोड का कार्य करता है. इस पात्र के भीतर अमोनियम क्लोराइड, मैंगनीज डाइऑक्साइड, कार्बन चूर्ण तथा अन्य सहायक पदार्थों से बनी गाढ़ी लेई भरी रहती है. सेल के मध्य में स्थापित कार्बन की छड़ धनात्मक इलेक्ट्रोड का कार्य करती है.

कार्बन छड़ के ऊपरी भाग पर लगी धातु की टोपी बाहरी परिपथ से संपर्क स्थापित करने के लिए प्रयुक्त होती है. वहीं सेल के ऊपरी हिस्से को मोम, पिच या अन्य रोधक पदार्थ से सील कर दिया जाता है ताकि रासायनिक मिश्रण बाहर न निकल सके.

शुष्क सेल का विद्युत वाहक बल सामान्यतः लगभग 1.5 वोल्ट होता है. इसके भीतर उपस्थित मैंगनीज डाइऑक्साइड, रासायनिक अभिक्रियाओं के दौरान उत्पन्न हाइड्रोजन गैस को हटाने का कार्य करता है. इससे ध्रुवण (Polarization) की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है और सेल अपेक्षाकृत लंबे समय तक निरंतर कार्य कर सकता है.

अपनी सरल संरचना, कम लागत और पोर्टेबल आकार के कारण शुष्क सेल का उपयोग टॉर्च, दीवार घड़ियों, रिमोट कंट्रोल, रेडियो, खिलौनों, कैलकुलेटर तथा अनेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में व्यापक रूप से किया जाता है.

आज भले ही रिचार्जेबल बैटरियों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा हो, फिर भी कम ऊर्जा की आवश्यकता वाले उपकरणों में शुष्क सेल अपनी उपयोगिता बनाए हुए हैं.

विद्युत धारा और चुंबकत्व का संबंध

विद्युत धारा और चुंबकत्व के बीच गहरा संबंध होता है. सन् 1820 में Hans Christian Ørsted ने यह सिद्ध किया कि किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है. इसके बाद André-Marie Ampère ने विद्युत धारा और चुम्बकीय बलों के संबंध का विस्तार से अध्ययन किया तथा विद्युतचुंबकत्व के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

विद्युत धारा के इसी चुम्बकीय प्रभाव के आधार पर विद्युत मोटर कार्य करती है. जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखी कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उस पर बल लगता है और वह घूमने लगती है. आधुनिक पंखे, मिक्सर, पंप तथा अनेक विद्युत उपकरण इसी सिद्धांत पर आधारित हैं.

विद्युत शक्ति (Electric Power)

विद्युत शक्ति उस दर को दर्शाती है, जिस पर विद्युत ऊर्जा का उपयोग या रूपांतरण होता है. किसी विद्युत उपकरण द्वारा एक सेकंड में खर्च की गई विद्युत ऊर्जा को उसकी शक्ति कहते हैं. इसका SI मात्रक वाट (Watt) है.

P=VI

विद्युत शक्ति का उपयोग बल्ब, हीटर, गीजर, पंखा, मोटर और अन्य विद्युत उपकरणों की कार्यक्षमता निर्धारित करने में किया जाता है. किसी उपकरण की वाट क्षमता जितनी अधिक होगी, वह उतनी ही अधिक विद्युत ऊर्जा का उपयोग करेगा.

जूल का उष्मा नियम (Joule’s Law of Heating)

जब किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है. उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा धारा, प्रतिरोध और समय पर निर्भर करती है. इस संबंध को जूल के उष्मा नियम द्वारा व्यक्त किया जाता है.

H=I^2Rt

इसी सिद्धांत के आधार पर विद्युत हीटर, इस्त्री, गीजर तथा इलेक्ट्रिक केतली जैसे उपकरण कार्य करते हैं.

घरेलू विद्युत आपूर्ति (Household Electricity Supply)

भारत में घरों को सामान्यतः 220 से 240 वोल्ट तथा 50 हर्ट्ज आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा (AC) प्रदान की जाती है. घरेलू वायरिंग में मुख्य रूप से फेज, न्यूट्रल और अर्थिंग तार का उपयोग किया जाता है. फेज तार विद्युत ऊर्जा लाता है, न्यूट्रल तार परिपथ को पूर्ण करता है और अर्थिंग सुरक्षा प्रदान करती है.

विद्युत सुरक्षा (Electrical Safety)

विद्युत उपकरणों का उपयोग करते समय सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए. गीले हाथों से स्विच या उपकरणों को नहीं छूना चाहिए. क्षतिग्रस्त तारों का उपयोग नहीं करना चाहिए. अर्थिंग युक्त उपकरणों का प्रयोग अधिक सुरक्षित माना जाता है. साथ ही परिपथ को ओवरलोड होने से बचाना चाहिए.

फ्यूज और MCB

फ्यूज तथा MCB (Miniature Circuit Breaker) विद्युत सुरक्षा उपकरण हैं. जब परिपथ में आवश्यकता से अधिक धारा प्रवाहित होने लगती है, तो फ्यूज का तार पिघल जाता है और विद्युत आपूर्ति बंद हो जाती है.

MCB भी इसी प्रकार सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन इसमें तार नहीं बदलना पड़ता. अधिक धारा या शॉर्ट सर्किट होने पर यह स्वतः ट्रिप होकर परिपथ को बंद कर देती है. आधुनिक घरों और कार्यालयों में MCB का उपयोग अधिक किया जाता है क्योंकि यह सुरक्षित और सुविधाजनक होती है.

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