भारतीय विकास बैंक: प्रमुख Development Banks, कार्य एवं तथ्य

विकासशील अर्थव्यवस्था में उद्योग, अवसंरचना, कृषि और छोटे उद्यमों के लिए दीर्घकालीन पूंजी आवश्यक होती है. सामान्य बैंकिंग व्यवस्था इन सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती. इसी कारण विकास बैंकों और विकास वित्तीय संस्थाओं का विकास हुआ.

स्वतंत्रता के बाद भारत में औद्योगीकरण, कृषि, रोजगार और अवसंरचना के लिए विशेषीकृत वित्तीय संस्थाएँ बनाई गईं. IFCI की स्थापना 1948 में हुई. इसके बाद IDBI, NABARD, SIDBI, EXIM Bank और NHB जैसी संस्थाएँ विकसित हुईं.

समय के साथ विकास वित्त का स्वरूप भी बदला. कुछ संस्थाएँ बैंक बनीं, कुछ का विलय हुआ और कुछ नई संस्थाएँ MSME तथा अवसंरचना जैसे क्षेत्रों के लिए स्थापित की गईं. इसलिए आज भारतीय विकास बैंकिंग को विकास वित्तीय संस्थाओं (DFIs), विशेषीकृत बैंकों तथा ग्रामीण और क्षेत्रीय वित्तीय संस्थाओं के व्यापक ढाँचे में समझना अधिक उचित है.

इस लेख में हम जानेंगे

विकास बैंक क्या है?

विकास बैंक ऐसी विशेषीकृत वित्तीय संस्था है जो विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों और विकासात्मक परियोजनाओं को मध्यम एवं दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराती है. इसका उद्देश्य केवल जमा और ऋण का कारोबार नहीं, बल्कि निवेश, उत्पादन, रोजगार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है.

बड़ी औद्योगिक, अवसंरचनात्मक और कृषि परियोजनाओं में पूंजी लंबे समय तक लगी रहती है. इसलिए विकास बैंक उन क्षेत्रों को वित्त उपलब्ध कराते हैं जहाँ सामान्य बैंकिंग या वित्तीय बाजार से पर्याप्त दीर्घकालीन पूंजी मिलना कठिन हो सकता है.

विकास बैंकों की प्रमुख विशेषताएँ

विकास वित्तीय संस्थाओं की कुछ सामान्य विशेषताएँ हैं—

  • विशेष क्षेत्र पर ध्यान
  • मध्यम एवं दीर्घकालीन वित्त
  • परियोजना आधारित ऋण
  • पुनर्वित्त सुविधा
  • पूंजी निर्माण को प्रोत्साहन
  • तकनीकी एवं संस्थागत सहायता
  • उद्यमिता को बढ़ावा
  • आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान

हालाँकि सभी विकास संस्थाओं की कार्यप्रणाली एक जैसी नहीं होती. उदाहरण के लिए NABARD का मुख्य क्षेत्र कृषि और ग्रामीण विकास है, SIDBI MSME क्षेत्र पर केंद्रित है, EXIM Bank अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ा है और NaBFID का मुख्य क्षेत्र अवसंरचना वित्त है.

इसलिए विकास बैंक को केवल “लंबी अवधि का ऋण देने वाला बैंक” मानना पर्याप्त नहीं होगा. यह वित्त और विकास के बीच पुल का काम करता है.

विकास बैंकों की आवश्यकता

भारत में विकास बैंकों की आवश्यकता को समझने के लिए स्वतंत्रता के बाद की अर्थव्यवस्था को देखना उपयोगी है. उस समय भारत को औद्योगिक आधार तैयार करना था. भारी उद्योग, मशीनरी, बिजली, परिवहन और आधारभूत संरचना में बड़े निवेश की आवश्यकता थी.

इन क्षेत्रों में निवेश की अवधि लंबी होती है. पूंजी का प्रतिफल भी तुरंत प्राप्त नहीं होता. ऐसे में सामान्य बैंकिंग व्यवस्था के लिए इन परियोजनाओं को बड़े पैमाने पर वित्त देना कठिन था.

दूसरी समस्या थी—जोखिम. नई औद्योगिक इकाइयों, पिछड़े क्षेत्रों या ग्रामीण परियोजनाओं में जोखिम अधिक हो सकता है. विकास वित्तीय संस्थाएँ ऐसे क्षेत्रों को केवल वर्तमान लाभ के आधार पर नहीं देखतीं, बल्कि उनके व्यापक आर्थिक प्रभाव को भी ध्यान में रखती हैं.

तीसरी आवश्यकता थी क्षेत्रीय संतुलन. यदि पूंजी केवल उन क्षेत्रों में जाती जहाँ पहले से उद्योग और बाजार मौजूद थे, तो देश के पिछड़े क्षेत्र पीछे रह जाते. इसलिए विकास वित्त का एक उद्देश्य क्षेत्रीय असमानता को कम करना भी रहा.

वित्त प्रदान करने की अवधि

वित्त की अवधि के आधार पर ऋण को सामान्यतः अल्पावधि, मध्यावधि और दीर्घावधि में समझा जाता है.

अल्पावधि ऋण

अल्पावधि वित्त का उपयोग ऐसी जरूरतों के लिए होता है जिनमें धन की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम समय के लिए होती है. कार्यशील पूंजी, कच्चे माल की खरीद या दैनिक परिचालन जैसी आवश्यकताएँ इसके उदाहरण हैं.

मध्यावधि ऋण

मध्यावधि वित्त कुछ वर्षों की आवश्यकता पूरी करता है. मशीनरी बदलने, व्यवसाय के विस्तार या उत्पादन क्षमता बढ़ाने जैसी गतिविधियों में इसका उपयोग हो सकता है.

दीर्घावधि ऋण

बड़ी औद्योगिक, अवसंरचनात्मक और विकास परियोजनाओं के लिए दीर्घकालीन वित्त आवश्यक होता है. बिजली संयंत्र, सड़क, रेलवे, बंदरगाह, बड़ी विनिर्माण इकाई या सिंचाई परियोजना इसका उदाहरण हो सकती है.

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि 15 माह, 5 वर्ष आदि की निश्चित सीमाएँ हर विकास वित्तीय संस्था पर समान रूप से लागू नहीं होतीं. वास्तविक ऋण अवधि संस्था, परियोजना और वित्तीय उत्पाद के अनुसार बदल सकती है.

भारत के प्रमुख विकास बैंक एवं विकास वित्तीय संस्थान

भारत में विकास वित्त का संस्थागत ढाँचा समय के साथ काफी विस्तृत हुआ है. कुछ संस्थाएँ आज भी विकास वित्त में सक्रिय हैं, जबकि कुछ ऐतिहासिक संस्थाएँ बाद में बैंक या अन्य संस्थागत ढाँचे में बदल गईं.

1. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम — IFCI

Industrial Finance Corporation of India (IFCI) की स्थापना 1948 में हुई. यह स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख विकास वित्तीय संस्था थी. इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है. स्वतंत्रता के बाद देश को औद्योगिक आधार तैयार करना था. लेकिन उद्योगों को दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने वाली संस्थागत व्यवस्था कमजोर थी. IFCI की स्थापना इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से हुई.

IFCI ने औद्योगिक परियोजनाओं को दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने के साथ-साथ पूंजी निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत किया. उस दौर में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि देश में निजी उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर दीर्घकालीन पूंजी जुटाना आसान नहीं था.

IFCI की भूमिका

IFCI का काम केवल ऋण देने तक सीमित नहीं था. इसने औद्योगिक परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध कराया और देश में विकास वित्त की संस्थागत परंपरा को मजबूत किया. बाद में भारत में IDBI और अन्य विशेषीकृत वित्तीय संस्थाओं की स्थापना हुई. इस तरह IFCI ने भारत के विकास वित्तीय ढाँचे की नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वर्तमान संदर्भ

आज IFCI को उसी रूप में नहीं देखा जाता जिस रूप में स्वतंत्रता के बाद इसकी भूमिका थी. लेकिन भारतीय विकास बैंकिंग के इतिहास में इसका स्थान महत्वपूर्ण है. यदि भारत के विकास वित्त की यात्रा को क्रम में समझें, तो IFCI से शुरू होकर IDBI और फिर क्षेत्र-विशेष की संस्थाओं तक पहुँचना इस विकास की प्रमुख कड़ी है.

2. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक — IDBI

Industrial Development Bank of India (IDBI) की स्थापना 1 जुलाई 1964 को हुई. इसका मुख्यालय मुंबई, महाराष्ट्र में है. प्रारंभ में यह एक विकास वित्तीय संस्था थी और भारतीय उद्योगों के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराने वाली प्रमुख संस्था बन गई.

IDBI की स्थापना उस समय हुई जब भारत औद्योगीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा था. बड़े उद्योगों, मशीनरी, उत्पादन इकाइयों और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता थी.

IDBI का उद्देश्य

IDBI का मूल उद्देश्य औद्योगिक विकास को वित्तीय सहायता देना था. इसके माध्यम से औद्योगिक परियोजनाओं को दीर्घकालीन ऋण, पुनर्वित्त तथा अन्य वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई. इसने केवल बड़े औद्योगिक घरानों पर ध्यान नहीं दिया. पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों के विकास और देश में औद्योगिक गतिविधियों के संतुलित विस्तार को भी महत्व दिया गया.

IDBI के प्रमुख कार्य

विकास वित्तीय संस्था के रूप में IDBI ने औद्योगिक इकाइयों को विभिन्न प्रकार की वित्तीय सहायता दी. परियोजना वित्त, पुनर्वित्त, प्रतिभूतियों से जुड़ी सहायता तथा औद्योगिक विकास से संबंधित वित्तीय गतिविधियाँ इसकी भूमिका का हिस्सा थीं. IDBI ने अन्य वित्तीय संस्थाओं के साथ भी समन्वय किया. इससे भारत में औद्योगिक वित्त का एक व्यापक संस्थागत ढाँचा विकसित हुआ.

IDBI में ऐतिहासिक परिवर्तन

IDBI की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका स्वरूप समय के साथ बदल गया. 1 अक्टूबर 2004 को पूर्ववर्ती IDBI को बैंकिंग कंपनी में परिवर्तित कर दिया गया. इसके बाद यह सामान्य बैंकिंग गतिविधियाँ करने लगा. IDBI Bank स्वयं बताता है कि पूर्ववर्ती IDBI ने 1964 से 2004 तक लगभग 40 वर्षों तक विकास वित्तीय संस्था के रूप में कार्य किया.

इसलिए आज “IDBI” को पारंपरिक विकास बैंक कहना सही नहीं होगा. IDBI Bank अब एक सार्वभौमिक बैंक है, जबकि उसका विकास वित्तीय संस्था वाला स्वरूप ऐतिहासिक महत्व रखता है.

3. राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक — NABARD

National Bank for Agriculture and Rural Development (NABARD) की स्थापना 12 जुलाई 1982 को संसद के अधिनियम द्वारा हुई. NABARD का मुख्यालय मुंबई में है.

NABARD की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संस्थागत वित्त व्यवस्था को मजबूत करना था. ग्रामीण भारत में कृषि के साथ-साथ पशुपालन, ग्रामीण उद्योग, हस्तशिल्प और अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए भी वित्त की आवश्यकता थी.

NABARD आज भी भारत की ग्रामीण विकास वित्त व्यवस्था की प्रमुख संस्था है. NABARD के अनुसार, इसका उद्देश्य कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण समृद्धि के लिए वित्तीय और गैर-वित्तीय हस्तक्षेप करना है.

NABARD की भूमिका

NABARD ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रकार की शीर्ष विकास वित्तीय संस्था की भूमिका निभाता है. इसका कार्य केवल किसानों को ऋण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है. यह ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं को मजबूत करता है और उनके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण प्रवाह बढ़ाने में सहायता करता है.

पुनर्वित्त की भूमिका

NABARD की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक पुनर्वित्त (Refinance) है. ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और अन्य संस्थाएँ ऋण देती हैं. इन संस्थाओं की ऋण देने की क्षमता बढ़ाने में NABARD का पुनर्वित्त महत्वपूर्ण होता है.

इस व्यवस्था को सरल रूप में ऐसे समझ सकते हैं—

NABARD → वित्तीय संस्थाएँ → ग्रामीण क्षेत्र → किसान एवं ग्रामीण उद्यम

इससे NABARD ग्रामीण वित्त व्यवस्था की शीर्ष कड़ी के रूप में काम करता है.

ग्रामीण अवसंरचना

ग्रामीण विकास केवल किसान को ऋण देने से पूरा नहीं होता. सड़क, सिंचाई, भंडारण, बाजार और अन्य सुविधाएँ भी जरूरी हैं. इसलिए NABARD ग्रामीण अवसंरचना से जुड़ी परियोजनाओं को भी वित्तीय समर्थन देता है.

स्वामित्व

पुराने स्रोतों में NABARD की स्थापना के समय RBI और भारत सरकार की हिस्सेदारी का उल्लेख मिलता है. वर्तमान स्थिति अलग है. NABARD अब पूर्णतः भारत सरकार के स्वामित्व में है. इसलिए पुराने नोट्स में दी गई RBI की हिस्सेदारी को वर्तमान तथ्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए.

4. औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक — IRBI

Industrial Reconstruction Corporation of India (IRCI) की स्थापना 12 अप्रैल 1971 को हुई थी. इसे 20 मार्च 1985 को Industrial Reconstruction Bank of India (IRBI) में परिवर्तित किया गया. इसका मुख्यालय कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में था. 1997 में इसका पुनर्गठन Industrial Investment Bank of India (IIBI) के रूप में किया गया.

प्रमुख कार्य

IRBI पुनरुद्धार योग्य बीमार उद्योगों को वित्तीय सहायता देता था. साथ ही, पुनर्गठन, प्रबंधन सुधार और तकनीकी उन्नयन में भी सहायता करता था. वर्तमान में यह सक्रिय विकास बैंक नहीं है, लेकिन भारत में विकास वित्त के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए इसका उल्लेख महत्वपूर्ण है.

5. भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक — SIDBI

Small Industries Development Bank of India (SIDBI) की स्थापना 2 अप्रैल 1990 को संसद के अधिनियम के तहत हुई. इसका मुख्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश में है. इसका मुख्य उद्देश्य छोटे उद्योगों को वित्तीय और विकासात्मक सहायता उपलब्ध कराना था. बाद में MSME क्षेत्र के विस्तार के साथ SIDBI की भूमिका भी व्यापक हुई. SIDBI स्वयं इसे MSME क्षेत्र के promotion, financing and development के लिए प्रमुख वित्तीय संस्था के रूप में परिभाषित करता है.

SIDBI की आवश्यकता

भारत में लाखों छोटे उद्यम रोजगार और उत्पादन में योगदान देते हैं. लेकिन छोटे व्यवसायों के सामने पूंजी, तकनीक, बाजार और वित्तीय विश्वसनीयता जैसी समस्याएँ रहती हैं. SIDBI इन समस्याओं को केवल ऋण देकर नहीं, बल्कि व्यापक विकास सहायता के माध्यम से संबोधित करता है.

SIDBI के प्रमुख कार्य

SIDBI प्रत्यक्ष वित्त के साथ-साथ पुनर्वित्त और अन्य वित्तीय माध्यमों का उपयोग करता है. इसका उद्देश्य MSME क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता बढ़ाना है. छोटे उद्योगों के लिए तकनीकी उन्नयन भी महत्वपूर्ण है. पुरानी तकनीक से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कठिनाई हो सकती है. इसलिए SIDBI की विकासात्मक भूमिका में तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मकता भी शामिल है.

SIDBI और उद्यमिता

छोटे व्यवसाय अक्सर बड़े उद्योगों की तरह आसानी से पूंजी बाजार तक नहीं पहुँच सकते. इसलिए उनके लिए संस्थागत वित्त का महत्व अधिक है. SIDBI ऐसे उद्यमों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आज SIDBI की भूमिका पारंपरिक छोटे उद्योगों से आगे बढ़कर स्टार्टअप, डिजिटल वित्त, हरित वित्त और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं तक पहुँच रही है. SIDBI की वर्तमान रणनीति MSME के credit और non-credit दोनों प्रकार की आवश्यकताओं को संबोधित करने पर जोर देती है.

6. राष्ट्रीय आवास बैंक — NHB

National Housing Bank (NHB) की स्थापना 9 जुलाई 1988 को National Housing Bank Act, 1987 के तहत हुई. इसका उद्देश्य भारत में आवास वित्त व्यवस्था का विकास करना था. इसका मुख्यालय नई दिल्ली, भारत में हैं.

घर केवल रहने की आवश्यकता नहीं है. आवास निर्माण से निर्माण क्षेत्र, सीमेंट, स्टील, बिजली, परिवहन और रोजगार जैसे कई क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ पैदा होती हैं. इसलिए आवास वित्त का विकास अर्थव्यवस्था के व्यापक विकास से जुड़ा हुआ है.

NHB की भूमिका

NHB का मूल उद्देश्य आवास वित्त संस्थाओं को बढ़ावा देना और आवास वित्त क्षेत्र को विकसित करना है. यह आवास वित्त से संबंधित संस्थाओं को वित्तीय तथा अन्य प्रकार की सहायता उपलब्ध कराने में भूमिका निभाता है.

नियामक भूमिका में बदलाव

NHB से संबंधित पुराने लेखों में अक्सर लिखा मिलता है कि NHB सभी Housing Finance Companies का नियामक है. यह वर्तमान स्थिति नहीं है. 9 अगस्त 2019 से Housing Finance Companies की regulatory powers, including registration, RBI को हस्तांतरित कर दी गईं. NHB की वर्तमान भूमिका मुख्यतः आवास वित्त के विकास और वित्तीय समर्थन से जुड़ी है.

7. भारतीय आयात-निर्यात बैंक — EXIM Bank

Export-Import Bank of India (EXIM Bank) भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश को वित्तीय सहायता देने वाली प्रमुख संस्था है. इसने 1982 में अपना कार्य शुरू किया. इसका मुख्यालय मुंबई, महाराष्ट्र में है. जब कोई भारतीय कंपनी विदेश में परियोजना स्थापित करती है, विदेश से मशीनरी खरीदती है या भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजार में बेचती है, तो उसे सामान्य घरेलू बैंकिंग से अलग प्रकार की वित्तीय जरूरत होती है. यहीं EXIM Bank की भूमिका सामने आती है.

EXIM Bank का उद्देश्य

इसका व्यापक उद्देश्य भारतीय निर्यात और आयात को वित्तीय समर्थन देना तथा भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है.

प्रमुख कार्य

EXIM Bank निर्यातकों को वित्त उपलब्ध कराने के साथ-साथ विदेशी खरीदारों और भारतीय कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय विस्तार से संबंधित वित्तीय आवश्यकताओं को भी पूरा करता है. विदेशों में भारतीय परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है.

भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूमिका

आज भारत की कंपनियाँ केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं हैं. वे विदेशों में विनिर्माण, सेवा, निर्माण और अवसंरचना परियोजनाओं में भी भाग ले रही हैं. ऐसी स्थिति में EXIM Bank भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए वित्तीय आधार देता है. इसलिए EXIM Bank को केवल “निर्यात बैंक” समझना अधूरा होगा. यह भारत के cross-border trade और investment ecosystem का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

8. राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण एवं विकास बैंक — NaBFID

भारत की अर्थव्यवस्था के आकार के बढ़ने के साथ अवसंरचना के लिए दीर्घकालीन वित्त की आवश्यकता भी बढ़ी. सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा, संचार और शहरी अवसंरचना जैसी परियोजनाओं में बहुत बड़ी पूंजी लगती है. इन परियोजनाओं का वित्तीय प्रतिफल भी लंबे समय में प्राप्त होता है.

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए National Bank for Financing Infrastructure and Development (NaBFID) की स्थापना 2021 में संसद के अधिनियम द्वारा की गई. इसका का मुख्यालय मुंबई, महाराष्ट्र में है.

NaBFID का उद्देश्य

NaBFID का मुख्य उद्देश्य भारत में अवसंरचना के लिए दीर्घकालीन वित्त की कमी को दूर करना है. यह सीधे वित्त उपलब्ध कराने के साथ-साथ निजी और संस्थागत निवेश को आकर्षित करने की भूमिका भी निभाता है. NaBFID के अनुसार इसका उद्देश्य infrastructure projects के लिए long-term non-recourse finance की कमी को दूर करना तथा bond और derivatives markets के विकास को मजबूत करना है.

नई विकास वित्त व्यवस्था

NaBFID इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत में विकास वित्तीय संस्थाओं के एक नए दौर का प्रतिनिधित्व करता है. पहले भारत में IDBI जैसी संस्थाएँ बड़े पैमाने पर विकास वित्त देती थीं. आर्थिक सुधारों के बाद उनका स्वरूप बदला. अब विशाल अवसंरचना परियोजनाओं के लिए विशेषीकृत DFI की आवश्यकता ने NaBFID को जन्म दिया. इस दृष्टि से NaBFID को भारत में आधुनिक विकास वित्त की वापसी के रूप में भी देखा जा सकता है.

9. भूमि विकास बैंक

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में केवल अल्पकालीन फसल ऋण पर्याप्त नहीं होता. किसान को सिंचाई, भूमि सुधार, कृषि उपकरण, बागवानी, पशुपालन या अन्य दीर्घकालीन निवेश के लिए भी धन की आवश्यकता होती है. भूमि विकास बैंकों की अवधारणा इसी दीर्घकालीन कृषि ऋण से जुड़ी रही है.

भारत में दीर्घकालीन कृषि ऋण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भूमि बंधक बैंकों का विकास हुआ. पहला सहकारी भूमि बंधक बैंक 1920 में झंग, पंजाब में स्थापित हुआ था. भारत में भूमि विकास बैंकिंग की वास्तविक संस्थागत शुरुआत 1929 में मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में Central Land Mortgage Bank की स्थापना से मानी जाती है. बाद में ऐसे बैंक विभिन्न राज्यों में स्थापित हुए और भूमि विकास तथा कृषि की दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने लगे. इनका कोई एक अखिल-भारतीय मुख्यालय नहीं है.

भूमि विकास बैंक का उद्देश्य

इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य कृषि भूमि और उससे संबंधित गतिविधियों के लिए दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराना रहा है. भूमि को ऋण की सुरक्षा के रूप में उपयोग करते हुए किसानों को अपेक्षाकृत लंबी अवधि के लिए वित्त उपलब्ध कराया जाता रहा है.

प्रमुख क्षेत्र

इनके माध्यम से निम्न प्रकार की गतिविधियों को वित्त उपलब्ध कराया जा सकता है—

  • भूमि सुधार
  • सिंचाई
  • कृषि विकास
  • बागवानी
  • पशुपालन
  • कृषि उपकरण
  • ग्रामीण आर्थिक गतिविधियाँ

संरचना

कई राज्यों में भूमि विकास बैंक व्यवस्था को दो स्तरों पर समझाया जाता है— केंद्रीय/राज्य स्तर की संस्था → प्राथमिक भूमि विकास बैंक

लेकिन इसकी संरचना पूरे भारत में एक जैसी नहीं है. राज्यों के अनुसार संगठनात्मक स्वरूप अलग हो सकता है. इसलिए इसे एक समान राष्ट्रीय बैंकिंग संस्था मानना उचित नहीं होगा.

10. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक — RRB

Regional Rural Banks (RRBs) की शुरुआत 2 अक्टूबर 1975 को हुई. इनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार करना था. विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान, कृषि मजदूर, ग्रामीण कारीगर और छोटे उद्यमी औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से पर्याप्त रूप से जुड़े नहीं थे. RRBs को इस कमी को दूर करने के लिए बनाया गया.

प्रारंभिक चरण

भारत में पहले पाँच RRB 2 अक्टूबर 1975 को स्थापित किए गए थे. पहला RRB Prathama Bank था, जिसका मुख्यालय मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश में था. इसके साथ चार अन्य RRB भी स्थापित किए गए थे. इनका मॉडल ऐसा बनाया गया जिसमें स्थानीय क्षेत्र की जानकारी और बैंकिंग प्रणाली दोनों का उपयोग किया जा सके.

RRBस्थानप्रायोजक बैंक
प्रथमा बैंक (Prathama Bank)मुरादाबाद, उत्तर प्रदेशसिंडिकेट बैंक
गौर ग्रामीण बैंक (Gaur Gramin Bank)गौर, उत्तर प्रदेशUCO Bank
गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकगोरखपुर, उत्तर प्रदेशभारतीय स्टेट बैंक
हरियाणा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकहरियाणापंजाब नेशनल बैंक
जयपुर-नागौर आंचलिक ग्रामीण बैंकराजस्थानUCO Bank

RRB का उद्देश्य

RRB के प्रमुख उद्देश्य थे—

  • ग्रामीण बैंकिंग का विस्तार
  • छोटे और सीमांत किसानों को ऋण
  • कृषि क्षेत्र को वित्त
  • ग्रामीण उद्यमिता को सहायता
  • वित्तीय समावेशन

स्वामित्व

RRB की पारंपरिक ownership structure में केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकार और sponsor bank की भागीदारी रही है. इस संरचना का उद्देश्य केंद्र, राज्य और बैंकिंग व्यवस्था के बीच समन्वय स्थापित करना था.

RRB का विकास

शुरुआत के बाद RRB की संख्या तेजी से बढ़ी. लेकिन बड़ी संख्या में छोटी संस्थाओं के सामने पूंजी, तकनीक, प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता जैसी समस्याएँ आईं. इसलिए समय के साथ RRB के amalgamation की प्रक्रिया शुरू हुई.

वर्तमान स्थिति

2025 के पुनर्गठन के बाद RRB की संख्या घटकर 28 हो गई. सरकार ने 1 मई 2025 से कई RRB के amalgamation को प्रभावी किया.

RRB का महत्व

RRB आज भी ग्रामीण वित्तीय समावेशन की महत्वपूर्ण कड़ी हैं. ग्रामीण क्षेत्र में केवल कृषि ही नहीं, बल्कि छोटे व्यवसाय, स्वरोजगार, ग्रामीण सेवा गतिविधियाँ और अन्य गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियाँ भी बढ़ रही हैं. इस बदलाव के साथ RRB की भूमिका भी पारंपरिक कृषि ऋण से आगे बढ़ रही है.

11. सहकारी बैंक

सहकारी बैंक पारंपरिक अर्थ में विकास बैंक नहीं हैं, लेकिन भारत की ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था में इनका महत्व इतना अधिक है कि विकास वित्त की चर्चा इनके बिना अधूरी रहती है. सहकारी बैंक सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित होते हैं. इनका उद्देश्य सदस्य-आधारित वित्तीय व्यवस्था के माध्यम से कृषि और अन्य स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को ऋण उपलब्ध कराना है.

सहकारी बैंक की संरचना

ग्रामीण अल्पकालीन सहकारी ऋण व्यवस्था को सामान्यतः तीन स्तरों पर समझा जाता है—

राज्य सहकारी बैंक → जिला केंद्रीय सहकारी बैंक → प्राथमिक कृषि साख समितियाँ (PACS)

PACS ग्रामीण स्तर पर किसानों से सबसे निकट जुड़ी संस्थाएँ हैं.

सहकारी बैंकों का महत्व

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय जानकारी बहुत महत्वपूर्ण होती है. किसान की ऋण आवश्यकता, फसल, स्थानीय बाजार और आर्थिक स्थिति की जानकारी स्थानीय संस्थाओं को अपेक्षाकृत बेहतर होती है. इसी कारण सहकारी संस्थाएँ ग्रामीण ऋण वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं.

वर्तमान संदर्भ

सहकारी बैंकिंग व्यवस्था भी समय के साथ बदल रही है. डिजिटल बैंकिंग, बेहतर governance, लेखांकन और निगरानी की आवश्यकता ने इनके काम करने के तरीके को प्रभावित किया है. इसलिए सहकारी बैंक केवल पारंपरिक ग्रामीण ऋण संस्था नहीं हैं. वे ग्रामीण वित्तीय समावेशन के बदलते ढाँचे का हिस्सा हैं.

12. भारतीय महिला बैंक — एक ऐतिहासिक पहल

भारत में महिलाओं की वित्तीय भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय महिला बैंक (Bharatiya Mahila Bank) की स्थापना 19 नवंबर 2013 को की गई. इसका उद्देश्य महिलाओं को बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ना तथा महिला उद्यमियों के लिए ऋण की उपलब्धता बढ़ाना था.

महिला उद्यमिता के सामने वित्त तक पहुँच एक महत्वपूर्ण समस्या रही है. इसलिए अलग बैंक के माध्यम से महिला-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था बनाने का विचार महत्वपूर्ण था.

भारतीय महिला बैंक की विशेषता

महिला उद्यमियों को ऋण देने और महिलाओं की वित्तीय भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया. लेकिन यह बैंक लंबे समय तक स्वतंत्र संस्था के रूप में नहीं रहा. 2017 में भारतीय महिला बैंक का SBI में विलय कर दिया गया. इसलिए आज इसे सक्रिय विकास बैंक के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा. इसका उल्लेख भारत में gender-focused banking की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहल के रूप में किया जाना चाहिए.

13. मुद्रा — MUDRA

छोटे व्यवसायों को औपचारिक ऋण व्यवस्था से जोड़ने के लिए MUDRA (Micro Units Development and Refinance Agency) की शुरुआत 2015 में हुई. भारत में बड़ी संख्या में छोटे कारोबारी सीमित पूंजी के साथ काम करते हैं. इनमें दुकानदार, छोटे निर्माता, सेवा प्रदाता, कारीगर और स्वरोजगार से जुड़े लोग शामिल हैं. इनके लिए छोटे आकार के ऋण की आवश्यकता होती है. MUDRA का उद्देश्य इसी स्तर पर संस्थागत वित्त की पहुँच बढ़ाना है.

MUDRA को बैंक समझना चाहिए?

“मुद्रा बैंक” शब्द आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसे सामान्य commercial bank की तरह समझना ठीक नहीं है. MUDRA का मूल विचार छोटे उद्यमों को refinance और credit ecosystem के माध्यम से सहायता देना है.

ऋण की श्रेणियाँ

MUDRA से जुड़ी प्रमुख श्रेणियाँ हैं—

शिशु — ₹50,000 तक

किशोर — ₹50,000 से ₹5 लाख

तरुण — ₹5 लाख से ₹10 लाख

बाद में तरुण प्लस श्रेणी शुरू की गई, जिसमें सफलतापूर्वक तरुण श्रेणी का ऋण चुकाने वाले पात्र उद्यमियों के लिए ₹10 लाख से ₹20 लाख तक के ऋण का प्रावधान किया गया.

MUDRA का महत्व

MUDRA का महत्व केवल छोटे ऋण तक सीमित नहीं है. इसका व्यापक उद्देश्य छोटे व्यवसायों को अनौपचारिक उधार व्यवस्था से निकालकर औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ना है. इससे छोटे व्यवसायों के विस्तार, रोजगार और स्वरोजगार को सहायता मिल सकती है.

विकास बैंकों के मुख्य कार्य

विकास वित्तीय संस्थाओं के कार्यों को केवल ऋण देने तक सीमित नहीं किया जा सकता.

1. दीर्घकालीन वित्त: बड़ी परियोजनाओं में लंबे समय तक पूंजी लगी रहती है. विकास संस्थाएँ ऐसी परियोजनाओं के लिए दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराती हैं.

2. पुनर्वित्त: कुछ संस्थाएँ स्वयं अंतिम ऋणदाता बनने की बजाय अन्य वित्तीय संस्थाओं को पुनर्वित्त उपलब्ध कराती हैं. NABARD और SIDBI की भूमिका इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है.

3. परियोजना वित्त: किसी परियोजना की व्यवहार्यता, लागत, संभावित आय और जोखिम का अध्ययन करके वित्त उपलब्ध कराया जाता है.

4. पूंजी निर्माण: जब किसी देश में नई फैक्ट्री, सड़क, ऊर्जा परियोजना या सिंचाई व्यवस्था बनती है, तो वह अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता बढ़ाती है. विकास वित्त इस पूंजी निर्माण को समर्थन देता है.

5. तकनीकी सहायता: कुछ संस्थाएँ केवल पैसा नहीं देतीं. वे परियोजना की क्षमता, तकनीक और प्रबंधन सुधार में भी सहायता करती हैं.

6. उद्यमिता को बढ़ावा: MSME और छोटे उद्यमों के लिए वित्त उपलब्ध कराकर विकास संस्थाएँ नए व्यवसायों को शुरू करने और पुराने व्यवसायों का विस्तार करने में सहायता करती हैं.

भारतीय विकास बैंकों का विकास

स्वतंत्रता के बाद का प्रारंभिक दौर

1948 में IFCI की स्थापना के साथ भारत में संस्थागत विकास वित्त का औपचारिक आधार मजबूत हुआ. उस समय औद्योगिक विकास राष्ट्रीय आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था.

1960–1980 का दौर

इस अवधि में IDBI सहित अनेक संस्थाएँ विकसित हुईं. औद्योगिक वित्त का नेटवर्क विस्तृत हुआ और पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने की नीति को भी वित्तीय समर्थन मिला.

1980–2000 का दौर

इस समय विकास वित्त का क्षेत्र और अधिक विविध हुआ. NABARD ने कृषि एवं ग्रामीण विकास को, EXIM Bank ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को, NHB ने आवास वित्त को और SIDBI ने छोटे उद्योगों को विशेष संस्थागत समर्थन दिया.

2000 के बाद

आर्थिक सुधारों के बाद पारंपरिक विकास बैंकिंग का स्वरूप बदल गया. IDBI बैंक में परिवर्तित हुआ. विकास वित्त की कुछ पारंपरिक गतिविधियाँ वाणिज्यिक बैंकिंग से जुड़ने लगीं. इसके साथ ही वित्तीय बाजारों का विस्तार हुआ और निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी.

आधुनिक दौर

आज विकास वित्त का एक नया चरण दिखाई देता है. MSME, डिजिटल वित्त, हरित वित्त और विशाल अवसंरचना परियोजनाओं के लिए विशेषीकृत संस्थाओं की आवश्यकता फिर सामने आई है. NaBFID इसी नए चरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है.

विकास बैंकों के बीच अंतर

संस्थामुख्य क्षेत्रवर्तमान भूमिका
IFCIऔद्योगिक विकासऐतिहासिक विकास वित्त
IDBIउद्योगअब सार्वभौमिक बैंक
NABARDकृषि एवं ग्रामीण विकाससक्रिय विकास वित्त संस्था
SIDBIMSMEसक्रिय विकास वित्त संस्था
NHBआवास वित्तआवास वित्त विकास
EXIM Bankअंतरराष्ट्रीय व्यापारसक्रिय
NaBFIDअवसंरचनासक्रिय DFI
RRBग्रामीण बैंकिंगसक्रिय
भूमि विकास बैंकदीर्घकालीन कृषि ऋणराज्य-आधारित व्यवस्था
सहकारी बैंककृषि एवं ग्रामीण ऋणसक्रिय सहकारी व्यवस्था
MUDRAसूक्ष्म इकाइयाँविकास/पुनर्वित्त ढाँचा

विकास बैंक और वाणिज्यिक बैंक में अंतर

आधारविकास वित्तीय संस्थावाणिज्यिक बैंक
उद्देश्यआर्थिक एवं क्षेत्रीय विकासबैंकिंग सेवाएँ एवं लाभ
क्षेत्रविशेषीकृतव्यापक
वित्तप्रायः मध्यम/दीर्घकालीनविभिन्न अवधि
दृष्टिकोणपरियोजना एवं विकास केंद्रितग्राहक एवं कारोबार केंद्रित
जोखिमविकास परियोजनाओं पर ध्यानऋण जोखिम एवं वाणिज्यिक व्यवहार्यता
भूमिकावित्त + विकासमुख्यतः बैंकिंग
उदाहरणNABARD, SIDBI, NaBFIDSBI, PNB आदि

हालाँकि यह अंतर आज पहले जितना स्पष्ट नहीं है. बैंकिंग सुधारों के बाद कई संस्थाओं के कार्यों में बदलाव आया है.

IDBI इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास बैंकों का योगदान

औद्योगिक विकास

भारत में बड़े उद्योगों के विकास के लिए दीर्घकालीन वित्त की आवश्यकता थी. विकास वित्तीय संस्थाओं ने इस जरूरत को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. औद्योगिक वित्त से केवल उत्पादन नहीं बढ़ता. इसके साथ रोजगार, सहायक उद्योग, परिवहन और बाजार भी विकसित होते हैं.

कृषि विकास

कृषि क्षेत्र की ऋण आवश्यकता केवल फसल ऋण तक सीमित नहीं है. सिंचाई, भूमि सुधार, पशुपालन, बागवानी और ग्रामीण अवसंरचना के लिए भी वित्त चाहिए. NABARD और ग्रामीण वित्तीय संस्थाओं ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

MSME विकास

MSME भारत में रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का बड़ा आधार हैं. SIDBI और MUDRA जैसे संस्थागत माध्यम छोटे व्यवसायों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में सहायता करते हैं.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार

EXIM Bank भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रवेश करने और विदेशों में व्यापार एवं निवेश करने के लिए वित्तीय सहायता देता है.

अवसंरचना विकास

आर्थिक विकास के लिए सड़क, रेलवे, बिजली, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल संचार जैसी सुविधाएँ जरूरी हैं. NaBFID जैसी संस्था इसी दीर्घकालीन अवसंरचना वित्त की आवश्यकता को संबोधित करती है.

विकास बैंकों से संबंधित महत्वपूर्ण समितियाँ

भारत में विकास वित्तीय संस्थाओं के विकास के पीछे कई महत्वपूर्ण समितियों और कार्यसमूहों की भूमिका रही है. इन समितियों ने कृषि ऋण, ग्रामीण बैंकिंग और व्यापक बैंकिंग सुधारों के लिए संस्थागत ढाँचे को दिशा दी.

शिवरामन समिति

कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए संस्थागत ऋण व्यवस्था की समीक्षा हेतु बी. शिवरामन की अध्यक्षता में CRAFICARD समिति का गठन 30 मार्च 1979 को किया गया. समिति ने 28 नवंबर 1979 को अपनी अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की और कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए एक शीर्ष विकास वित्तीय संस्था की आवश्यकता पर जोर दिया. इसकी सिफारिशों के आधार पर NABARD की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ और अंततः NABARD 12 जुलाई 1982 को अस्तित्व में आया.

नरसिम्हम कार्यसमूह

ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे एवं सीमांत किसानों, कृषि मजदूरों और ग्रामीण कारीगरों तक संस्थागत ऋण पहुँचाने के लिए एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता में 1975 में कार्यसमूह गठित किया गया. इसने ऐसे क्षेत्रीय बैंकों की स्थापना की सिफारिश की जो स्थानीय स्तर पर सहकारी बैंकों की समझ और वाणिज्यिक बैंकों की कार्यकुशलता का उपयोग कर सकें. इसी सिफारिश की पृष्ठभूमि में 2 अक्टूबर 1975 को पहले पाँच RRB स्थापित हुए और Regional Rural Banks Act, 1976 ने इन्हें वैधानिक आधार दिया.

नरसिम्हम समिति-I

भारत में व्यापक बैंकिंग एवं वित्तीय सुधारों के लिए एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता में 1991 में समिति गठित की गई. समिति की रिपोर्ट ने बैंकिंग व्यवस्था में दक्षता, प्रतिस्पर्धा, पूंजी पर्याप्तता और prudential norms को मजबूत करने पर जोर दिया. इसकी सिफारिशें 1990 के दशक के बैंकिंग सुधारों की महत्वपूर्ण आधारशिला बनीं.

नरसिम्हम समिति-II

बैंकिंग सुधारों की आगे समीक्षा के लिए 1997 में दूसरी नरसिम्हम समिति गठित की गई. समिति ने अपनी रिपोर्ट 22 अप्रैल 1998 को प्रस्तुत की. इसमें NPA, पूंजी पर्याप्तता, बैंकिंग संरचना, बैंक विलय और corporate governance जैसे विषयों पर सुधारों की सिफारिश की गई. इस रिपोर्ट ने भारत में बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

विकास बैंकों की प्रमुख चुनौतियाँ

1. गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ

यदि वित्त प्राप्त करने वाली परियोजना अपेक्षित प्रदर्शन नहीं करती, तो ऋण की वापसी प्रभावित हो सकती है. बड़ी विकास परियोजनाओं में यह जोखिम अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि उनमें बड़ी मात्रा में पूंजी लगी होती है.

2. दीर्घकालीन पूंजी की उपलब्धता

विकास वित्त की प्रकृति ही दीर्घकालीन होती है. इसलिए संस्थाओं को भी स्थिर और पर्याप्त दीर्घकालीन संसाधनों की आवश्यकता होती है.

3. क्षेत्रीय असमानता

वित्तीय संस्थाओं के विस्तार के बावजूद देश के सभी क्षेत्रों में वित्तीय पहुँच समान नहीं है. दूरस्थ और पिछड़े क्षेत्रों में ऋण वितरण की लागत और जोखिम अधिक हो सकता है.

4. तकनीकी परिवर्तन

FinTech, Artificial Intelligence, डिजिटल पहचान और डेटा आधारित ऋण प्रणाली ने वित्तीय क्षेत्र को बदल दिया है. विकास संस्थाओं को भी इन तकनीकों के साथ आगे बढ़ना होगा.

5. जलवायु परिवर्तन

अब विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं किया जा सकता. ऊर्जा, परिवहन, उद्योग और अवसंरचना में पर्यावरणीय जोखिम भी महत्वपूर्ण हो गए हैं. इसलिए भविष्य का विकास वित्त Green Finance और climate-resilient investment से अधिक जुड़ा होगा.

निष्कर्ष

भारत में विकास वित्त का स्वरूप समय के साथ बदला है. IFCI और IDBI से शुरू होकर यह व्यवस्था NABARD, SIDBI, EXIM Bank, NHB, RRB और NaBFID जैसे संस्थानों तक पहुँची. आज इसकी प्राथमिकताएँ MSME, अवसंरचना, ग्रामीण विकास और हरित वित्त हैं. भविष्य में विकास वित्त की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पूंजी सही क्षेत्र, परियोजना और उद्यमी तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुँचती है.

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