भारत की बैंकिंग व्यवस्था मुख्यतः द्वि-स्तरीय (Two-tier) है. इसके शीर्ष पर भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य करता है. RBI मौद्रिक नीति बनाता है, मुद्रा जारी करता है तथा सभी बैंकों का नियमन और पर्यवेक्षण करता है. इसके अधीन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी बैंक, विदेशी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक, लघु वित्त बैंक तथा भुगतान बैंक कार्य करते हैं.
बैंकिंग व्यवस्था किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला है. बैंक जनता से जमा (Deposit) स्वीकार करते हैं और उन्हें ऋण (Loan) के रूप में उत्पादक क्षेत्रों तक पहुँचाते हैं. इससे बचत, निवेश, उद्योग, व्यापार, कृषि तथा रोजगार को बढ़ावा मिलता है. इसके साथ ही बैंक भुगतान प्रणाली को सुचारु बनाकर आर्थिक गतिविधियों में गति लाते हैं.
इस लेख में भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के विकास, RBI की स्थापना, संगठनात्मक ढाँचे, कार्यों, बैंकों के प्रकार, नियामकीय व्यवस्था, डिजिटल बैंकिंग, वित्तीय समावेशन, प्रमुख समितियों, करेंसी प्रबंधन तथा वर्तमान चुनौतियों का संक्षिप्त एवं परीक्षा-उपयोगी अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.
भारतीय बैंकिंग का ऐतिहासिक विकास
भारत में आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई. बैंक ऑफ बंगाल (1806), बैंक ऑफ बॉम्बे (1840) तथा बैंक ऑफ मद्रास (1843) को प्रेसीडेंसी बैंक कहा जाता था. वर्ष 1921 में इन तीनों का विलय कर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई. बाद में 1955 में इनका राष्ट्रीयकरण कर भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) नाम रखा गया.
स्वतंत्रता के बाद बैंकिंग व्यवस्था का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक किया गया. भारतीय रिज़र्व बैंक का 1949 में राष्ट्रीयकरण हुआ तथा बैंकिंग क्षेत्र के नियमन के लिए बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 लागू किया गया.
बैंकिंग सेवाओं को आम जनता तक पहुँचाने के उद्देश्य से 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों तथा 15 अप्रैल 1980 को 6 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. इससे कृषि, लघु उद्योग और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराने में उल्लेखनीय वृद्धि हुई.
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक सुधार किए गए. नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के आधार पर निजी क्षेत्र के नए बैंकों को लाइसेंस दिए गए तथा विदेशी बैंकों के संचालन को भी प्रोत्साहन मिला. साथ ही पूंजी पर्याप्तता, प्रतिस्पर्धा, तकनीकी आधुनिकीकरण और जोखिम प्रबंधन जैसे वैश्विक मानकों को अपनाया गया. परिणामस्वरूप भारतीय बैंकिंग प्रणाली अधिक प्रतिस्पर्धी, डिजिटल और ग्राहक-केंद्रित बनी.
RBI का गठन एवं संगठनात्मक ढांचा
भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है. इसकी स्थापना की संस्तुति 1926 के रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस, जिसे हिल्टन यंग कमीशन (Hilton Young Commission) भी कहा जाता है, ने की थी. इसी सिफारिश के आधार पर भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 पारित हुआ और 1 अप्रैल 1935 को RBI की स्थापना हुई. प्रारंभ में यह एक निजी शेयरधारिता (Shareholder) संस्था थी, किंतु 1 जनवरी 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण कर इसे पूर्णतः भारत सरकार के स्वामित्व में लाया गया.
RBI का केंद्रीय कार्यालय (Central Office) मुंबई में स्थित है. प्रारंभिक मुख्यालय कोलकाता में था, जिसे 1937 में मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया. RBI के प्रतीक चिन्ह (Seal) में ताड़ (Palm) के वृक्ष के सामने खड़ा बाघ दर्शाया गया है, जो भारत की आर्थिक शक्ति, स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.

RBI का संचालन केंद्रीय निदेशक मंडल (Central Board of Directors) द्वारा किया जाता है, जिसका गठन केंद्र सरकार करती है. इसमें एक गवर्नर, अधिकतम चार उप-गवर्नर, विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले निदेशक तथा सरकार द्वारा नामित अधिकारी शामिल होते हैं. बैंकिंग, कृषि, उद्योग, अर्थशास्त्र और वित्त के विशेषज्ञ भी निदेशक मंडल का हिस्सा बनाए जाते हैं.
क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए RBI के चार स्थानीय बोर्ड—मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और नई दिल्ली—कार्य करते हैं. इनके अतिरिक्त देशभर में क्षेत्रीय कार्यालय एवं उप-कार्यालय स्थापित हैं, जो मुद्रा प्रबंधन, बैंकिंग पर्यवेक्षण और भुगतान प्रणाली से संबंधित कार्यों का संचालन करते हैं.
RBI समय-समय पर कई महत्वपूर्ण प्रकाशन जारी करता है. इनमें वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report), वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report – FSR), मौद्रिक नीति रिपोर्ट (Monetary Policy Report), Report on Trend and Progress of Banking in India तथा Handbook of Statistics on Indian Economy विशेष रूप से परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं.
RBI प्रत्येक वर्ष अपनी बैलेंस शीट प्रकाशित करता है, जिसमें उसकी परिसंपत्तियों, देनदारियों तथा आय-व्यय का विवरण होता है. आवश्यक प्रावधान और आकस्मिक निधि (Contingency Buffer) सुरक्षित रखने के बाद शेष अधिशेष (Surplus) भारत सरकार को हस्तांतरित किया जाता है. 2019 में बिमल जालान समिति ने Economic Capital Framework (ECF) की सिफारिश की, जिसके आधार पर RBI के आर्थिक पूंजी भंडार तथा सरकार को अधिशेष हस्तांतरण की प्रक्रिया निर्धारित की जाती है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- RBI अधिनियम : 1934
- स्थापना : 1 अप्रैल 1935
- राष्ट्रीयकरण : 1 जनवरी 1949
- मुख्यालय : मुंबई (1937 से)
- स्थानीय बोर्ड : 4 (मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और नई दिल्ली)
- RBI का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय : केंद्रीय निदेशक मंडल (Central Board of Directors)
- Economic Capital Framework (ECF) : बिमल जालान समिति (2019) द्वारा अनुशंसित.

केंद्रीय बैंक के रूप में RBI
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक (Central Bank) है. इसका प्रमुख उद्देश्य मूल्य स्थिरता (Price Stability) बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को समर्थन देना है. RBI मौद्रिक नीति का संचालन करता है, मुद्रा जारी करता है तथा बैंकिंग प्रणाली में तरलता और ऋण प्रवाह को नियंत्रित करता है.
मौद्रिक नीति एवं मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण
RBI देश की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) निर्धारित करता है. इसका मुख्य उद्देश्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना, वित्तीय स्थिरता बनाए रखना तथा आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना है. वर्तमान में भारत में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) लागू है, जिसके अंतर्गत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% (±2%) निर्धारित किया गया है.
मौद्रिक नीति समिति (MPC)
मौद्रिक नीति संबंधी निर्णय मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) द्वारा लिए जाते हैं. यह 6 सदस्यीय समिति है, जिसमें 3 सदस्य RBI तथा 3 सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. RBI के गवर्नर इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं. समिति सामान्यतः प्रत्येक दो माह में बैठक कर नीतिगत ब्याज दरों की समीक्षा करती है.
साख (Credit) नियंत्रण के उपकरण
RBI अर्थव्यवस्था में मुद्रा और ऋण की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों का उपयोग करता है.
(क) मात्रात्मक उपकरण
- रेपो रेट (Repo Rate) – RBI द्वारा बैंकों को अल्पकालीन ऋण देने की दर.
- रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) – बैंकों की अतिरिक्त राशि RBI में जमा करने की दर.
- CRR (Cash Reserve Ratio) – बैंकों द्वारा RBI के पास रखी जाने वाली नकद आरक्षित राशि.
- SLR (Statutory Liquidity Ratio) – तरल परिसंपत्तियों में रखा जाने वाला अनिवार्य अनुपात.
- बैंक रेट (Bank Rate) – दीर्घकालीन ऋण हेतु RBI की मानक दर.
- खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations – OMO) – सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री द्वारा तरलता का नियंत्रण.
(ख) गुणात्मक उपकरण
- मार्जिन आवश्यकता (Margin Requirement)
- नैतिक दबाव (Moral Suasion)
- प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action)
- उपभोक्ता साख नियमन (Consumer Credit Regulation)
आधुनिक तरलता प्रबंधन उपकरण
बदलती वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरूप RBI ने Liquidity Adjustment Facility (LAF), Marginal Standing Facility (MSF) तथा Standing Deposit Facility (SDF) जैसे उपकरण विकसित किए हैं. इनका उपयोग बैंकिंग प्रणाली में अल्पकालीन तरलता को संतुलित रखने के लिए किया जाता है.
मुद्रा निर्गमन एवं मूल्य स्थिरता
₹1 के नोट और सभी सिक्कों को छोड़कर सभी बैंक नोट जारी करने का अधिकार RBI को प्राप्त है. यह मुद्रा की उपलब्धता, गुणवत्ता तथा सुरक्षित वितरण सुनिश्चित करता है. ब्याज दरों और तरलता का संतुलित प्रबंधन कर RBI मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने तथा मूल्य स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करता है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- मुद्रास्फीति लक्ष्य : 4% (±2%) (CPI आधारित)
- MPC : 6 सदस्य (3 RBI + 3 केंद्र सरकार)
- MPC के अध्यक्ष : RBI के गवर्नर
- मुख्य मात्रात्मक उपकरण : Repo, Reverse Repo, CRR, SLR, Bank Rate, OMO
- आधुनिक उपकरण : LAF, MSF, SDF
- ₹1 का नोट भारत सरकार जारी करती है; अन्य सभी बैंक नोट RBI जारी करता है.
बैंकों के बैंक के रूप में RBI
भारतीय रिज़र्व बैंक केवल जनता का केंद्रीय बैंक नहीं, बल्कि ‘बैंकों का बैंक’ (Banker’s Bank) भी है. सभी अनुसूचित बैंक RBI के साथ खाते रखते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर उसी से वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं. इससे बैंकिंग प्रणाली में विश्वास, तरलता और स्थिरता बनी रहती है.
बैंकों का लाइसेंसिंग एवं पंजीकरण
भारत में नए बैंक की स्थापना के लिए RBI से लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत RBI बैंक की पूंजी, प्रबंधन, व्यवसाय योजना तथा वित्तीय क्षमता का मूल्यांकन कर लाइसेंस प्रदान करता है. आवश्यकता पड़ने पर RBI लाइसेंस को निलंबित या रद्द भी कर सकता है.
पर्यवेक्षण, निरीक्षण एवं ऑडिट
RBI बैंकों के कार्यों की नियमित निगरानी (Supervision) एवं निरीक्षण (Inspection) करता है. इसका उद्देश्य जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना तथा बैंकिंग प्रणाली को सुरक्षित बनाए रखना है. RBI पूंजी पर्याप्तता, NPA, जोखिम प्रबंधन, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियामकीय अनुपालन की समीक्षा करता है. आवश्यकता पड़ने पर सुधारात्मक निर्देश और दंडात्मक कार्रवाई भी कर सकता है.
अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort)
यदि किसी बैंक को अस्थायी नकदी संकट का सामना करना पड़े और उसे अन्य स्रोतों से धन उपलब्ध न हो, तो RBI अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort) के रूप में सहायता प्रदान करता है. इसका उद्देश्य किसी एक बैंक की समस्या को पूरे वित्तीय तंत्र में फैलने से रोकना और जमाकर्ताओं का विश्वास बनाए रखना है.
क्लियरिंग हाउस एवं भुगतान-निपटान प्रणाली
RBI देश की भुगतान एवं निपटान प्रणाली (Payment and Settlement System) का नियमन और पर्यवेक्षण करता है. यह बैंकों के बीच चेक, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान तथा अन्य वित्तीय लेन-देन का सुरक्षित और समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करता है. RTGS और NEFT जैसी प्रणालियाँ RBI के अधीन संचालित होती हैं, जबकि UPI एवं IMPS का संचालन NPCI द्वारा RBI के नियामकीय ढाँचे के अंतर्गत किया जाता है.

बैंकों के बीच निधि हस्तांतरण
RBI बैंकों के बीच धन के सुरक्षित एवं त्वरित हस्तांतरण की व्यवस्था उपलब्ध कराता है. इसके लिए अंतर-बैंक निपटान खाते (Settlement Accounts), RTGS तथा अन्य भुगतान प्रणालियों का उपयोग किया जाता है, जिससे पूरे बैंकिंग तंत्र में धन का निर्बाध प्रवाह बना रहता है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- बैंकों का लाइसेंस जारी करने वाला प्राधिकरण : RBI
- Lender of Last Resort : RBI
- RTGS एवं NEFT : RBI द्वारा विनियमित और संचालित भुगतान प्रणालियाँ.
- UPI एवं IMPS : NPCI द्वारा संचालित, RBI द्वारा विनियमित.
सरकार के बैंकर एवं सलाहकार के रूप में RBI
RBI केंद्र एवं राज्य सरकारों का बैंकर, एजेंट तथा वित्तीय सलाहकार है. यह सरकार के बैंक खातों का संचालन करता है तथा सरकारी प्राप्तियों और भुगतानों का प्रबंधन करता है. जहाँ RBI की शाखाएँ उपलब्ध नहीं होतीं, वहाँ यह कार्य प्रायः भारतीय स्टेट बैंक (SBI) एवं उसके अधिकृत बैंकों के माध्यम से संपन्न होता है.
RBI सरकार की ओर से सार्वजनिक ऋण (Public Debt) का प्रबंधन करता है. यह सरकारी उधारी की योजना बनाता है तथा सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities/G-Secs), ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) आदि के निर्गमन, नीलामी और भुगतान की प्रक्रिया का संचालन करता है.
इसके अतिरिक्त RBI आर्थिक, मौद्रिक एवं वित्तीय विषयों पर सरकार को विशेषज्ञ परामर्श देता है. बजट प्रबंधन, ऋण बाजार, वित्तीय स्थिरता, मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा तथा बैंकिंग सुधारों से जुड़े अनेक निर्णयों में RBI की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- RBI केंद्र एवं अधिकांश राज्य सरकारों का बैंकर है.
- सार्वजनिक ऋण प्रबंधन और सरकारी प्रतिभूतियों का निर्गमन RBI की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है.
- आर्थिक एवं मौद्रिक नीतियों के निर्माण में RBI सरकार का प्रमुख सलाहकार है.
विदेशी मुद्रा प्रबंधन में RBI की भूमिका
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) का प्रबंधन RBI करता है. इन भंडारों में मुख्यतः विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ (Foreign Currency Assets), स्वर्ण भंडार (Gold Reserves), विशेष आहरण अधिकार (SDRs) तथा IMF में आरक्षित स्थिति (Reserve Position in IMF) शामिल होते हैं. पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार देश की बाह्य भुगतान क्षमता और आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाता है.
विदेशी मुद्रा लेन-देन का नियमन विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (Foreign Exchange Management Act – FEMA) के अंतर्गत किया जाता है. RBI FEMA के प्रावधानों के अनुसार अधिकृत डीलरों (Authorised Dealers), विदेशी निवेश, प्रेषण (Remittances) तथा अन्य विदेशी मुद्रा लेन-देन का नियमन करता है.
RBI का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना भी है. इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर RBI विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर या अन्य विदेशी मुद्राओं की खरीद-बिक्री कर हस्तक्षेप करता है. इसका उद्देश्य किसी निश्चित विनिमय दर को बनाए रखना नहीं, बल्कि बाजार में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को कम करना है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- FEMA लागू : 1999 (FERA, 1973 का स्थान लिया).
- भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन : RBI.
- विदेशी मुद्रा भंडार के प्रमुख घटक : Foreign Currency Assets, Gold, SDRs एवं IMF Reserve Position.
- RBI प्रबंधित फ्लोट (Managed Float) व्यवस्था के अनुरूप विनिमय बाजार में आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करता है.
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का स्वरूप — RBI के अधीन बैंकों के प्रकार
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था विभिन्न प्रकार के बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से मिलकर बनी है. इनकी संरचना का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना है. अधिकांश बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के नियमन एवं पर्यवेक्षण के अंतर्गत कार्य करते हैं.
अनुसूचित एवं गैर-अनुसूचित बैंक
अनुसूचित बैंक (Scheduled Banks) वे बैंक हैं, जिनका नाम RBI अधिनियम, 1934 की द्वितीय अनुसूची में दर्ज होता है. इन्हें RBI से पुनर्वित्त एवं अन्य नियामकीय सुविधाएँ प्राप्त होती हैं. इसके विपरीत गैर-अनुसूचित बैंक द्वितीय अनुसूची में शामिल नहीं होते और उनकी संख्या बहुत कम है.
1. वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks)
ये जनता से जमा स्वीकार करते हैं तथा ऋण, निवेश, भुगतान एवं अन्य बैंकिंग सेवाएँ प्रदान करते हैं.
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSBs): इनमें केंद्र सरकार की बहुमत हिस्सेदारी होती है. इनका उद्देश्य बैंकिंग सेवाओं का विस्तार तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराना है. उदाहरण—SBI, PNB, Bank of Baroda.
- निजी क्षेत्र के बैंक: इनका स्वामित्व मुख्यतः निजी निवेशकों के पास होता है. ये आधुनिक एवं डिजिटल बैंकिंग सेवाओं के लिए प्रसिद्ध हैं. उदाहरण—HDFC Bank, ICICI Bank, Axis Bank.
- विदेशी बैंक: इनका मुख्यालय भारत के बाहर होता है, लेकिन RBI की अनुमति से भारत में शाखाएँ संचालित करते हैं. उदाहरण—HSBC, Standard Chartered.
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs): 1976 में ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों एवं लघु उद्यमियों को बैंकिंग एवं ऋण सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किए गए.
2. सहकारी बैंक (Co-operative Banks)
ये सहकारिता के सिद्धांत पर कार्य करते हैं तथा कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय समुदाय की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करते हैं. प्रमुख प्रकार हैं—
- शहरी सहकारी बैंक (Urban Co-operative Banks – UCBs) – शहरी एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में कार्यरत.
- ग्रामीण सहकारी बैंक – राज्य सहकारी बैंक, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक तथा प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का त्रिस्तरीय ढाँचा.
3. लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks)
इनकी शुरुआत 2015 में वित्तीय समावेशन बढ़ाने के लिए की गई. ये छोटे किसानों, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों (MSMEs), असंगठित क्षेत्र तथा निम्न आय वर्ग को बैंकिंग एवं ऋण सेवाएँ प्रदान करते हैं.
4. भुगतान बैंक (Payments Banks)
इनका उद्देश्य डिजिटल भुगतान एवं छोटे बचत खातों को बढ़ावा देना है. ये जमा स्वीकार कर सकते हैं और भुगतान/प्रेषण सेवाएँ प्रदान करते हैं, लेकिन सामान्य ऋण नहीं दे सकते.
5. स्थानीय क्षेत्र बैंक (Local Area Banks)
ये सीमित भौगोलिक क्षेत्र में कार्य करने वाले छोटे निजी बैंक हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करना है.
6. विकास वित्तीय संस्थान (Development Financial Institutions – DFIs)
ये सामान्य बैंक नहीं हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था के विशिष्ट क्षेत्रों को दीर्घकालीन वित्त उपलब्ध कराते हैं.
| संस्था | प्रमुख उद्देश्य |
| NABARD | कृषि एवं ग्रामीण विकास |
| SIDBI | MSME क्षेत्र का विकास |
| NHB | आवास वित्त को बढ़ावा |
| EXIM Bank | निर्यात-आयात व्यापार को वित्तीय सहायता |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- अनुसूचित बैंक : RBI अधिनियम, 1934 की द्वितीय अनुसूची में सूचीबद्ध.
- RRBs : स्थापना 1976.
- Small Finance Banks : शुरुआत 2015.
- Payments Banks : ऋण नहीं दे सकते.
- NABARD–कृषि, SIDBI–MSME, NHB–आवास, EXIM Bank–विदेशी व्यापार.

बैंकों का नियमन एवं विधिक ढांचा
भारत की बैंकिंग व्यवस्था एक सुदृढ़ कानूनी एवं नियामकीय ढाँचे पर आधारित है. इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को सुरक्षित, पारदर्शी और वित्तीय रूप से मजबूत बनाए रखना है. इस पूरे ढाँचे का प्रमुख नियामक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है.
बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949
बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 भारत में बैंकिंग व्यवसाय का प्रमुख कानून है. इसके अंतर्गत बैंकों की स्थापना, लाइसेंस, प्रबंधन, निरीक्षण, विलय तथा परिसमापन से संबंधित प्रावधान निर्धारित किए गए हैं. इसी अधिनियम के आधार पर RBI बैंकों को लाइसेंस जारी करता है और आवश्यक नियामकीय निर्देश देता है.
RBI अधिनियम, 1934
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 RBI की स्थापना, मुद्रा निर्गमन, मौद्रिक नीति, बैंकिंग नियमन तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन का वैधानिक आधार प्रदान करता है.
पूंजी पर्याप्तता (CRAR) एवं Basel मानदंड
बैंकों की वित्तीय मजबूती सुनिश्चित करने के लिए Basel I, Basel II एवं Basel III मानदंड अपनाए गए हैं. इनका उद्देश्य जोखिम के अनुरूप पर्याप्त पूंजी बनाए रखना, तरलता बढ़ाना तथा वित्तीय संकटों से बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा करना है. इसके लिए बैंकों को पूंजी-जोखिम भारित परिसंपत्ति अनुपात (Capital to Risk-weighted Assets Ratio – CRAR) बनाए रखना अनिवार्य होता है.
परिसंपत्ति वर्गीकरण एवं NPA
RBI के अनुसार यदि किसी ऋण का ब्याज या मूलधन 90 दिनों से अधिक समय तक बकाया रहता है, तो वह गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (Non-Performing Asset – NPA) कहलाता है. NPA को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है—मानक (Standard), अवमानक (Sub-standard), संदिग्ध (Doubtful) तथा हानि परिसंपत्ति (Loss Asset).
PCA, SARFAESI एवं IBC
कमजोर वित्तीय स्थिति वाले बैंकों के लिए RBI Prompt Corrective Action (PCA) फ्रेमवर्क लागू करता है. ऋण वसूली को प्रभावी बनाने हेतु SARFAESI अधिनियम, 2002 तथा कॉर्पोरेट दिवालियापन के समाधान के लिए दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 लागू की गई है.
ऋण ब्याज दर व्यवस्था
भारत में ऋण ब्याज निर्धारण प्रणाली समय के साथ अधिक पारदर्शी बनी है. इसका विकास क्रम इस प्रकार है—
Base Rate → MCLR → Repo/External Benchmark Linked Lending Rate (RLLR/EBLR)
वर्तमान में अधिकांश खुदरा एवं MSME ऋण रेपो-लिंक्ड अथवा अन्य बाह्य बेंचमार्क आधारित ब्याज दरों से जुड़े हैं.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- बैंकिंग विनियमन अधिनियम : 1949
- RBI अधिनियम : 1934
- NPA : 90 दिन से अधिक बकाया ऋण.
- Basel III : पूंजी एवं तरलता को मजबूत बनाने पर केंद्रित.
- SARFAESI अधिनियम : 2002
- IBC : 2016
- ब्याज दर व्यवस्था : Base Rate → MCLR → RLLR/EBLR
RBI की शक्तियां एवं उत्तरदायित्व
भारतीय रिज़र्व बैंक को RBI अधिनियम, 1934 एवं बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत व्यापक नियामकीय शक्तियाँ प्राप्त हैं. इनका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को सुरक्षित, पारदर्शी और स्थिर बनाए रखना है.
लाइसेंस देने एवं रद्द करने की शक्ति
RBI नए बैंकों को लाइसेंस प्रदान करता है तथा उनके व्यवसाय की प्रकृति, पूंजी, प्रबंधन और वित्तीय क्षमता का मूल्यांकन करता है. यदि कोई बैंक नियामकीय प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन करता है या जमाकर्ताओं के हितों को खतरा उत्पन्न करता है, तो RBI उसका लाइसेंस निलंबित या रद्द कर सकता है.
निरीक्षण एवं जांच की शक्ति
RBI समय-समय पर बैंकों का निरीक्षण (Inspection) और पर्यवेक्षण (Supervision) करता है. इसके अंतर्गत वित्तीय स्थिति, जोखिम प्रबंधन, NPA, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियामकीय अनुपालन की समीक्षा की जाती है. आवश्यकता पड़ने पर विशेष जांच भी कराई जा सकती है.
निर्देश जारी करने एवं दंड लगाने की शक्ति
RBI बैंकों को संचालन, ऋण वितरण, पूंजी पर्याप्तता, ग्राहक सेवा तथा डिजिटल सुरक्षा से संबंधित निर्देश जारी करता है. नियमों के उल्लंघन की स्थिति में वह मौद्रिक दंड लगा सकता है तथा सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश भी दे सकता है.
बैंक विलय एवं पुनर्गठन में भूमिका
किसी बैंक के वित्तीय संकट की स्थिति में RBI पुनर्गठन (Reconstruction), पुनर्पूंजीकरण अथवा विलय (Merger) की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसका उद्देश्य जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना तथा बैंकिंग प्रणाली में विश्वास बनाए रखना है.
जवाबदेही
यद्यपि RBI एक स्वायत्त केंद्रीय बैंक है, फिर भी वह भारत सरकार और संसद के प्रति जवाबदेह है. इसकी वार्षिक रिपोर्ट, लेखा-जोखा तथा नीतिगत निर्णय सार्वजनिक किए जाते हैं और सरकार के साथ नियमित समन्वय बनाए रखा जाता है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- बैंकों को लाइसेंस जारी एवं रद्द करने का अधिकार : RBI.
- RBI बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत निरीक्षण एवं नियामकीय कार्रवाई कर सकता है.
- बैंकों के पुनर्गठन एवं विलय में RBI की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
RBI की स्वायत्तता एवं सरकार से संबंध
केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता (Autonomy) प्रभावी मौद्रिक नीति और वित्तीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानी जाती है. यदि केंद्रीय बैंक स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सके, तो वह अल्पकालिक राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर मुद्रास्फीति नियंत्रण, ब्याज दर निर्धारण और वित्तीय प्रणाली की स्थिरता पर ध्यान केंद्रित कर सकता है.
हालाँकि RBI पूर्णतः स्वतंत्र संस्था नहीं है. यह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत कार्य करता है तथा अनेक विषयों पर केंद्र सरकार के साथ समन्वय बनाए रखता है. मौद्रिक नीति, सार्वजनिक ऋण, वित्तीय स्थिरता, डिजिटल भुगतान और आर्थिक सुधार जैसे विषयों पर दोनों संस्थाएँ मिलकर कार्य करती हैं.
समय-समय पर ब्याज दरों, अधिशेष (Surplus) हस्तांतरण, विनियामक नीतियों तथा आर्थिक विकास की प्राथमिकताओं को लेकर सरकार और RBI के बीच मतभेद भी देखने को मिले हैं. फिर भी दोनों का साझा उद्देश्य देश की आर्थिक एवं वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- RBI कार्यात्मक रूप से स्वायत्त, परंतु वैधानिक रूप से संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन कार्य करता है.
- सरकार और RBI के बीच समन्वय आर्थिक नीति की सफलता के लिए आवश्यक है.
वित्तीय स्थिरता एवं संकट प्रबंधन में RBI की भूमिका
RBI का एक प्रमुख दायित्व देश की वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) बनाए रखना है. किसी बैंक या वित्तीय संस्था के संकट में आने पर RBI आवश्यक नियामकीय हस्तक्षेप करता है ताकि बैंकिंग प्रणाली में विश्वास बना रहे और संकट अन्य संस्थानों तक न फैले.
हाल के वर्षों में PMC बैंक तथा यस बैंक (Yes Bank) जैसे मामलों में RBI ने पुनर्गठन, निकासी सीमा, नए निवेशकों की भागीदारी तथा अन्य सुधारात्मक उपायों के माध्यम से जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने का प्रयास किया.
जमाकर्ताओं की सुरक्षा के लिए जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation – DICGC) कार्य करता है. वर्तमान में प्रत्येक जमाकर्ता को प्रति बैंक ₹5 लाख तक की जमा राशि पर बीमा सुरक्षा उपलब्ध है. DICGC, RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था है.
RBI वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (Financial Stability and Development Council – FSDC) का महत्वपूर्ण सदस्य है. यह परिषद वित्तीय क्षेत्र के विभिन्न नियामकों के बीच समन्वय स्थापित करती है तथा प्रणालीगत जोखिमों की निगरानी करती है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- DICGC : RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था.
- जमा बीमा सीमा : ₹5 लाख प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक.
- FSDC का उद्देश्य : वित्तीय स्थिरता और विभिन्न नियामकों के बीच समन्वय.
डिजिटल बैंकिंग एवं वित्तीय समावेशन में RBI की पहल
RBI ने डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. इनका उद्देश्य बैंकिंग सेवाओं को सुरक्षित, सुलभ और कम लागत पर देश के प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाना है.
वित्तीय समावेशन
RBI ने प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY), बैंकिंग संवाददाता (Business Correspondent) मॉडल तथा आधार-आधारित बैंकिंग सेवाओं को समर्थन देकर ग्रामीण एवं वंचित वर्गों तक बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार किया है.
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL)
RBI बैंकों को कृषि, MSME, शिक्षा, आवास, निर्यात तथा समाज के कमजोर वर्गों जैसे प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को निर्धारित अनुपात में ऋण उपलब्ध कराने का निर्देश देता है. इसका उद्देश्य समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है.
डिजिटल भुगतान प्रणाली
RBI देश की प्रमुख डिजिटल भुगतान प्रणालियों का नियमन करता है. इनमें प्रमुख हैं—
- NEFT (National Electronic Funds Transfer) – बैच आधारित इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण.
- RTGS (Real Time Gross Settlement) – उच्च मूल्य के लेन-देन का वास्तविक समय में निपटान.
- UPI (Unified Payments Interface) – तत्काल डिजिटल भुगतान प्रणाली, जिसे NPCI संचालित करता है और RBI विनियमित करता है.
- IMPS (Immediate Payment Service) – 24×7 तत्काल धन अंतरण सेवा.
रेगुलेटरी सैंडबॉक्स
RBI ने Regulatory Sandbox की शुरुआत फिनटेक नवाचारों को नियंत्रित वातावरण में परखने के लिए की. इससे नई वित्तीय तकनीकों का परीक्षण उपभोक्ता हितों और वित्तीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जा सकता है.
एकीकृत लोकपाल योजना, 2021
ग्राहकों की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए RBI ने एकीकृत लोकपाल योजना (Integrated Ombudsman Scheme), 2021 लागू की. इसके अंतर्गत बैंक, NBFC और भुगतान प्रणाली से संबंधित अधिकांश शिकायतों के लिए “One Nation, One Ombudsman” की व्यवस्था लागू की गई.
केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC – e₹)
RBI ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (Central Bank Digital Currency – e₹) का चरणबद्ध पायलट प्रारंभ किया. e₹, RBI द्वारा जारी वैध डिजिटल मुद्रा (Legal Tender) है और इसका उद्देश्य सुरक्षित, कुशल तथा कम लागत वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था विकसित करना है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- PMJDY : वित्तीय समावेशन की प्रमुख योजना.
- PSL : कृषि, MSME, शिक्षा, आवास आदि क्षेत्रों को अनिवार्य ऋण प्रवाह सुनिश्चित करता है.
- UPI एवं IMPS : NPCI द्वारा संचालित, RBI द्वारा विनियमित.
- RTGS : वास्तविक समय में उच्च-मूल्य भुगतान प्रणाली.
- Integrated Ombudsman Scheme : 2021.
- e₹ (CBDC) : RBI द्वारा जारी भारत की आधिकारिक डिजिटल मुद्रा.
RBI से संबंधित महत्वपूर्ण समितियां
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था एवं मौद्रिक नीति में समय-समय पर सुधार लाने के लिए अनेक विशेषज्ञ समितियों का गठन किया गया. इन समितियों की सिफारिशों के आधार पर बैंकिंग क्षेत्र, वित्तीय समावेशन, मुद्रास्फीति नियंत्रण तथा नियामकीय ढाँचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए. प्रतियोगी परीक्षाओं में इन समितियों से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं.
| समिति | गठन/वर्ष | प्रमुख सिफारिशें एवं योगदान |
| नरसिम्हम समिति-I | 1991 | बैंकिंग क्षेत्र में उदारीकरण, SLR एवं CRR में कमी, निजी बैंकों के प्रवेश तथा प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की सिफारिश. |
| नरसिम्हम समिति-II | 1998 | पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy), NPA प्रबंधन, बैंक विलय, जोखिम प्रबंधन तथा बैंकिंग प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने पर बल. |
| उर्जित पटेल समिति | 2014 | लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting) तथा मौद्रिक नीति समिति (MPC) के गठन की सिफारिश. |
| नचिकेत मोर समिति | 2013 | वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने, Payments Banks एवं Small Finance Banks की स्थापना तथा सभी नागरिकों तक बैंकिंग सेवाएँ पहुँचाने की सिफारिश. |
| बिमल जालान समिति | 2018–19 | RBI के Economic Capital Framework (ECF) तथा सरकार को अधिशेष (Surplus) हस्तांतरण के सिद्धांत निर्धारित किए. |
| वाई.एच. मालेगाम समिति | 2011 | माइक्रोफाइनेंस संस्थानों एवं NBFC-MFI के नियमन, पारदर्शिता और ग्राहक संरक्षण को मजबूत करने की सिफारिश. |
| रघुराम राजन समिति | 2008 | वित्तीय क्षेत्र सुधार, बैंकिंग प्रतिस्पर्धा, वित्तीय समावेशन तथा बाजार-आधारित वित्तीय प्रणाली को सुदृढ़ करने के सुझाव. |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- नरसिम्हम समिति को भारतीय बैंकिंग सुधारों की आधारशिला माना जाता है.
- उर्जित पटेल समिति की सिफारिश पर मौद्रिक नीति समिति (MPC) एवं मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण व्यवस्था लागू की गई.
- नचिकेत मोर समिति की सिफारिशों के बाद Payments Banks एवं Small Finance Banks की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ.
- बिमल जालान समिति का संबंध RBI के Economic Capital Framework (ECF) और Surplus Transfer से है.
- वाई.एच. मालेगाम समिति का संबंध माइक्रोफाइनेंस एवं NBFC-MFI के नियमन से है.
- रघुराम राजन समिति ने वित्तीय क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और समावेशन बढ़ाने पर विशेष बल दिया.
करेंसी प्रबंधन
भारत में मुद्रा का निर्गमन एवं प्रबंधन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की प्रमुख जिम्मेदारी है. ₹1 के नोट एवं सभी सिक्के भारत सरकार जारी करती है, जबकि अन्य सभी बैंक नोट RBI जारी करता है. RBI मुद्रा की छपाई, वितरण, पुराने नोटों की वापसी तथा नकदी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करता है.
प्रमुख नोट मुद्रण प्रेस
| नोट प्रेस | स्थान | संचालन |
| करेंसी नोट प्रेस (CNP) | नासिक | SPMCIL |
| बैंक नोट प्रेस (BNP) | देवास | SPMCIL |
| BRBNMPL | मैसूर | RBI की सहायक कंपनी |
| BRBNMPL | सालबोनी | RBI की सहायक कंपनी |
प्रमुख सुरक्षा विशेषताएँ
- वॉटरमार्क (Watermark)
- सुरक्षा धागा (Security Thread)
- माइक्रो लेटरिंग
- लेटेंट इमेज
- रंग बदलने वाली स्याही
- दृष्टिबाधितों हेतु उभरे हुए चिन्ह
सिक्का ढलाई
सिक्कों का निर्गमन Coinage Act, 2011 के अंतर्गत भारत सरकार करती है. प्रमुख टकसाल मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और नोएडा में स्थित हैं.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- ₹1 का नोट एवं सभी सिक्के – भारत सरकार
- अन्य सभी बैंक नोट – RBI
- नोट प्रेस – नासिक, देवास, मैसूर, सालबोनी
- Coinage Act – 2011
RBI के गवर्नर एवं उनका योगदान
RBI के गवर्नर केंद्रीय बैंक के सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होते हैं. वे मौद्रिक नीति, बैंकिंग नियमन तथा वित्तीय स्थिरता से जुड़े प्रमुख निर्णयों का नेतृत्व करते हैं.
| गवर्नर | प्रमुख योगदान |
| सर ऑसबोर्न स्मिथ | RBI के प्रथम गवर्नर |
| सी. डी. देशमुख | प्रथम भारतीय गवर्नर; राष्ट्रीयकरण के समय नेतृत्व |
| सी. रंगराजन | उदारीकरण के बाद बैंकिंग सुधार |
| वाई. वी. रेड्डी | वैश्विक वित्तीय संकट से पूर्व सतर्क नियमन |
| डी. सुब्बाराव | 2008 वैश्विक वित्तीय संकट का प्रबंधन |
| रघुराम राजन | AQR एवं मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की आधारशिला |
| उर्जित पटेल | MPC व्यवस्था का कार्यान्वयन |
| शक्तिकांत दास | COVID-19 प्रबंधन, डिजिटल भुगतान एवं CBDC पहल |
| संजय मल्होत्रा | डिजिटल बैंकिंग एवं वित्तीय स्थिरता पर बल |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रथम गवर्नर – सर ऑसबोर्न स्मिथ
- प्रथम भारतीय गवर्नर – सी. डी. देशमुख
- AQR – रघुराम राजन
- MPC का कार्यान्वयन – उर्जित पटेल
नोट: भविष्य में वर्तमान गवर्नर से संबंधित तथ्य बदल सकते हैं. प्रकाशन से पहले नवीनतम पदधारी का सत्यापन कर लें.
अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं समकक्ष संस्थाएं
RBI वैश्विक केंद्रीय बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के साथ मिलकर वित्तीय स्थिरता, बैंकिंग मानकों और भुगतान प्रणाली के विकास में सहयोग करता है.
प्रमुख केंद्रीय बैंकों की तुलना
| केंद्रीय बैंक | क्षेत्र |
| RBI | भारत |
| Federal Reserve (Fed) | संयुक्त राज्य अमेरिका |
| European Central Bank (ECB) | यूरो क्षेत्र |
| Bank of England (BoE) | यूनाइटेड किंगडम |
RBI का अंतरराष्ट्रीय सहयोग
- IMF के साथ विदेशी मुद्रा एवं वैश्विक वित्तीय सहयोग.
- Bank for International Settlements (BIS) का सदस्य; Basel मानकों के विकास में भागीदारी.
- Basel Committee on Banking Supervision (BCBS) द्वारा विकसित Basel I, II एवं III मानकों का पालन.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- Fed – अमेरिका का केंद्रीय बैंक.
- ECB – यूरो क्षेत्र का केंद्रीय बैंक.
- BoE – यूनाइटेड किंगडम का केंद्रीय बैंक.
- BIS – केंद्रीय बैंकों का बैंक.
- Basel मानक – BCBS द्वारा विकसित.
RBI के समक्ष चुनौतियां एवं आलोचनाएं
भारतीय रिज़र्व बैंक ने देश की बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, फिर भी बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और तकनीकी विकास के कारण इसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ बनी हुई हैं. इनका प्रभाव मौद्रिक नीति, वित्तीय स्थिरता तथा बैंकिंग क्षेत्र की दक्षता पर पड़ता है.
बढ़ते NPA की समस्या
बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (Non-Performing Assets – NPAs) की वृद्धि बैंकिंग प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है. अधिक NPA से बैंकों की ऋण देने की क्षमता प्रभावित होती है तथा लाभप्रदता घटती है. RBI ने Asset Quality Review (AQR), Prompt Corrective Action (PCA) तथा IBC, 2016 जैसे उपायों के माध्यम से इस समस्या को नियंत्रित करने का प्रयास किया है. फिर भी बड़े कॉर्पोरेट ऋण, MSME क्षेत्र और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के कारण NPA प्रबंधन निरंतर चुनौती बना हुआ है.
स्वायत्तता बनाम सरकारी हस्तक्षेप
RBI की कार्यात्मक स्वायत्तता और सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण विषय है. ब्याज दर निर्धारण, बैंकिंग सुधार, अधिशेष (Surplus) हस्तांतरण तथा वित्तीय क्षेत्र के नियमन जैसे मुद्दों पर समय-समय पर सरकार और RBI के बीच मतभेद देखने को मिले हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावी मौद्रिक नीति के लिए RBI की संस्थागत स्वायत्तता आवश्यक है, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के साथ समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
वैश्विक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव तथा विनिमय दर की अस्थिरता जैसी परिस्थितियाँ RBI के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं. इसके अतिरिक्त साइबर सुरक्षा, फिनटेक, क्रिप्टो परिसंपत्तियाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित वित्तीय सेवाएँ तथा केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) जैसे नए क्षेत्रों में भी संतुलित नियमन की आवश्यकता बढ़ रही है.
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
- NPA बैंकिंग क्षेत्र की प्रमुख संरचनात्मक चुनौती है.
- PCA Framework एवं IBC, 2016 NPA प्रबंधन के प्रमुख साधन हैं.
- RBI के समक्ष वर्तमान प्रमुख चुनौतियाँ हैं—डिजिटल वित्त, साइबर सुरक्षा, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता तथा मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना.
निष्कर्ष
भारतीय रिज़र्व बैंक देश की मौद्रिक एवं वित्तीय प्रणाली का केंद्रीय स्तंभ है. यह केवल मुद्रा जारी करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि मौद्रिक नीति निर्धारण, बैंकिंग नियमन, विदेशी मुद्रा प्रबंधन, भुगतान प्रणाली, वित्तीय समावेशन तथा आर्थिक स्थिरता का प्रमुख संरक्षक भी है. पिछले कई दशकों में RBI ने बैंकिंग सुधार, डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन तथा संकट प्रबंधन के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
भविष्य में डिजिटल बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, फिनटेक, साइबर सुरक्षा, जलवायु संबंधी वित्तीय जोखिम तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच RBI की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी. तकनीकी नवाचार, प्रभावी नियमन, संस्थागत स्वायत्तता तथा वित्तीय समावेशन के संतुलित समन्वय से RBI एक सुरक्षित, पारदर्शी और समावेशी बैंकिंग प्रणाली के निर्माण में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाता रहेगा. भारत के विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य में RBI की सुदृढ़, उत्तरदायी और दूरदर्शी नीतियाँ निर्णायक महत्व रखती हैं.



