बेरोजगारी: परिभाषा, कारण, प्रकार, मापन और समाधान

बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने की समस्या नहीं है. यह अर्थव्यवस्था में उपलब्ध श्रम और उपलब्ध रोजगार के बीच असंतुलन को भी दिखाती है. जब कोई व्यक्ति काम करने में सक्षम है, काम करना चाहता है और रोजगार की तलाश कर रहा है, लेकिन उसे काम नहीं मिलता, तो उसे बेरोजगार माना जाता है.

किसी देश के लिए बेरोजगारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रम उसकी सबसे बड़ी उत्पादक शक्तियों में से एक है. लंबे समय तक रोजगार न मिलने से व्यक्ति की आय और कौशल प्रभावित होते हैं तथा अर्थव्यवस्था की उपलब्ध मानव क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाता.

इस लेख में हम जानेंगे

बेरोजगारी की परिभाषा

बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें काम करने की क्षमता और इच्छा रखने वाला व्यक्ति रोजगार की तलाश के बावजूद काम प्राप्त नहीं कर पाता. लेकिन आर्थिक आँकड़ों में केवल नौकरी न होना पर्याप्त नहीं है. बेरोजगारी की गणना के लिए यह भी देखा जाता है कि व्यक्ति श्रम बल में शामिल है या नहीं और उसने काम पाने के लिए प्रयास किया है या नहीं.

श्रम बल क्या है?

श्रम बल (Labour Force) में वे व्यक्ति शामिल होते हैं जो आर्थिक गतिविधियों में काम कर रहे हैं या काम की तलाश कर रहे हैं. भारत में PLFS के प्रमुख संकेतक सामान्यतः 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी के आधार पर प्रस्तुत किए जाते हैं. इसलिए श्रम बल को केवल 15–60 वर्ष की आबादी मानना सही नहीं है.

कार्यरत व्यक्ति

जो व्यक्ति आर्थिक गतिविधि में लगा हुआ है, वह नियोजित या कार्यरत माना जाता है. रोजगार केवल नियमित सरकारी या निजी नौकरी तक सीमित नहीं है; इसमें स्वरोजगार और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ भी शामिल हो सकती हैं.

इसलिए सरल रूप में—

बेरोजगार = श्रम बल में शामिल व्यक्ति जो काम नहीं कर रहा है और रोजगार की तलाश में है.

बेरोजगारी दर

बेरोजगारी दर = (बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या ÷ श्रम बल) × 100

यहाँ कुल जनसंख्या को हर में नहीं लिया जाता. यही कारण है कि बेरोजगारी दर और श्रम बल भागीदारी दर अलग-अलग बातें बताती हैं.

बेरोजगारी के मुख्य कारण

1. जनसंख्या और श्रम बल में वृद्धि

हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग काम की उम्र में प्रवेश करते हैं. यदि रोजगार का विस्तार उसी गति से न हो, तो नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है.

2. रोजगारहीन या कम रोजगार वाला विकास

GDP बढ़ने मात्र से पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं होता. यदि विकास अधिक पूंजी या तकनीक-आधारित हो और श्रम की मांग कम बढ़े, तो रोजगार सृजन अपेक्षाकृत धीमा रह सकता है.

3. कौशल और बाजार की मांग में अंतर

डिग्री होने के बावजूद रोजगार मिलना सुनिश्चित नहीं होता. उद्योग को जिन कौशलों की आवश्यकता है, यदि शिक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था उन्हें पर्याप्त रूप से विकसित नहीं करती, तो skill mismatch पैदा होता है.

4. कृषि पर अधिक निर्भरता

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि का मौसमी स्वरूप और सीमित भूमि कई लोगों को वर्ष भर पर्याप्त काम नहीं दे पाता. इससे मौसमी तथा प्रच्छन्न बेरोजगारी जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं.

5. तकनीकी परिवर्तन

नई तकनीक कुछ पुराने रोजगारों की मांग कम कर सकती है, जबकि नए प्रकार के रोजगार पैदा भी करती है. समस्या तब बढ़ती है जब श्रमिक नए कौशल जल्दी नहीं सीख पाते.

6. क्षेत्रीय असमानता

रोजगार के अवसर सभी राज्यों और क्षेत्रों में समान नहीं होते. उद्योग, सेवाएँ और निवेश कुछ क्षेत्रों में अधिक केंद्रित होने से दूसरे क्षेत्रों के लोगों को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता है.

7. कमजोर उद्यमशीलता और निवेश

निवेश तथा नए व्यवसायों की कमी का सीधा असर रोजगार सृजन पर पड़ता है. विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय उद्यम रोजगार का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं.

बेरोजगारी के प्रकार

बेरोजगारी एक समान प्रकृति की समस्या नहीं है. इसके कारण और अवधि के आधार पर इसके कई रूप देखे जाते हैं.

1. संरचनात्मक बेरोजगारी

जब अर्थव्यवस्था में उपलब्ध श्रमिकों के कौशल और उपलब्ध नौकरियों की आवश्यकताओं के बीच लंबे समय का असंतुलन हो, तो इसे संरचनात्मक बेरोजगारी (Structural Unemployment) कहा जाता है. उदाहरण के लिए, किसी उद्योग में नई तकनीक आने के बाद पुराने कौशल वाले श्रमिकों की मांग घट जाए और नए कौशल वाली नौकरियाँ बढ़ जाएँ. ऐसी स्थिति केवल अधिक नौकरियाँ पैदा करने से नहीं, बल्कि कौशल परिवर्तन और प्रशिक्षण से भी जुड़ी होती है.

2. प्रच्छन्न बेरोजगारी

जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हों और कुछ श्रमिकों को हटाने पर भी उत्पादन में उल्लेखनीय कमी न आए, तो इसे प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) कहते हैं. यह स्थिति कृषि में अधिक दिखाई देती है. उदाहरण के लिए, यदि पाँच लोगों से होने वाला काम दस लोग कर रहे हों, तो अतिरिक्त पाँच लोगों की सीमांत उत्पादकता बहुत कम हो सकती है.

3. मौसमी बेरोजगारी

जब रोजगार केवल वर्ष के किसी विशेष मौसम या अवधि में उपलब्ध हो और बाकी समय काम न मिले, तो इसे मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment) कहते हैं. कृषि इसका प्रमुख उदाहरण है. पर्यटन, निर्माण और कुछ अन्य गतिविधियों में भी मौसम के अनुसार रोजगार बदल सकता है.

4. शिक्षित बेरोजगारी

जब शिक्षित व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार प्राप्त नहीं कर पाता, तो इसे सामान्यतः शिक्षित बेरोजगारी कहा जाता है. इसका संबंध केवल डिग्री की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार की उपलब्धता, कौशल, अनुभव और अपेक्षित वेतन के बीच असंतुलन से भी है. भारत में शिक्षित युवाओं का रोजगार इस कारण एक महत्वपूर्ण नीति-विषय बना हुआ है. PLFS 2025 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के माध्यमिक या उससे ऊपर शिक्षित व्यक्तियों की बेरोजगारी दर 6.5% रही, जो 2024 के 7.0% से कम थी.

5. चक्रीय बेरोजगारी

व्यापार चक्र में मंदी आने पर वस्तुओं और सेवाओं की मांग घट सकती है. इससे उत्पादन कम होता है और कंपनियाँ भर्ती रोक सकती हैं या कर्मचारियों की संख्या घटा सकती हैं. इसे चक्रीय बेरोजगारी (Cyclical Unemployment) कहा जाता है. आर्थिक गतिविधियों में सुधार आने पर इसमें कमी आ सकती है.

6. घर्षणात्मक बेरोजगारी

एक नौकरी छोड़ने और दूसरी नौकरी मिलने के बीच का छोटा अंतराल घर्षणात्मक बेरोजगारी (Frictional Unemployment) कहलाता है. नौकरी बदलना, नई नौकरी की तलाश या शिक्षा पूरी करने के बाद पहली नौकरी खोजना इसके सामान्य उदाहरण हैं. इसे पूरी तरह समाप्त करना न तो आवश्यक है और न ही व्यावहारिक.

7. अल्प रोजगार

जब व्यक्ति काम तो कर रहा हो, लेकिन उसकी उपलब्ध क्षमता, समय या कौशल की तुलना में उसे पर्याप्त काम न मिल रहा हो, तो इसे अल्प रोजगार (Underemployment) कहा जाता है. उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति सप्ताह में कुछ ही घंटे काम कर पाता है जबकि वह अधिक काम करना चाहता है. यह स्थिति बेरोजगारी से अलग है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण संकेत देती है.

8. स्वैच्छिक बेरोजगारी

जब व्यक्ति उपलब्ध काम को स्वीकार करने के बजाय अपनी पसंद या अपेक्षा के अनुसार दूसरे रोजगार की प्रतीक्षा करता है, तो इसे स्वैच्छिक बेरोजगारी कहा जाता है.

9. अनैच्छिक बेरोजगारी

जब व्यक्ति प्रचलित परिस्थितियों में काम करने के लिए तैयार हो, लेकिन पर्याप्त रोजगार उपलब्ध न हो, तो यह अनैच्छिक बेरोजगारी है. आर्थिक मंदी या रोजगार की कमी में इसका महत्व बढ़ जाता है.

10. महिला और पुरुषों में रोजगार का अंतर

महिला रोजगार की समस्या को केवल बेरोजगारी दर से नहीं समझा जा सकता. श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी, घरेलू जिम्मेदारियाँ, सुरक्षित परिवहन, देखभाल की सुविधाएँ और उपलब्ध रोजगार की प्रकृति भी महत्वपूर्ण हैं. PLFS 2025 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुषों और महिलाओं दोनों की सामान्य स्थिति वाली बेरोजगारी दर 3.1% थी, लेकिन महिला श्रम बल भागीदारी पुरुषों से काफी कम रही. इसलिए भारत में महिला रोजगार की बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि श्रम बाजार में भागीदारी और रोजगार की गुणवत्ता भी है.

बेरोजगारी का मापन

भारत में रोजगार और बेरोजगारी के आधिकारिक आँकड़ों के लिए Periodic Labour Force Survey (PLFS) प्रमुख स्रोत है. इसे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) संचालित करता है. PLFS 2017 में शुरू किया गया था और यह श्रम बल, रोजगार तथा बेरोजगारी से संबंधित प्रमुख आँकड़े उपलब्ध कराता है.

भारत में बेरोजगारी मापन के विकास में भगवती समिति (Committee on Unemployment) का भी महत्वपूर्ण स्थान है. भारत सरकार ने दिसंबर 1970 में बी. भगवती की अध्यक्षता में समिति गठित की थी. समिति ने बेरोजगारी और अल्प रोजगार के आकलन तथा रोजगार सृजन की रणनीतियों पर विचार किया और इसकी अंतिम रिपोर्ट 1973 में प्रस्तुत हुई.

आज परीक्षा की दृष्टि से बेरोजगारी मापन को मुख्यतः तीन अवधारणाओं से समझना उपयोगी है—

1. सामान्य स्थिति (Usual Status)

इसमें व्यक्ति की गतिविधि को अपेक्षाकृत लंबी संदर्भ अवधि में देखा जाता है. यह लंबे समय की रोजगार स्थिति को समझने में उपयोगी है.

2. वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status)

इसमें सर्वेक्षण से पहले के एक सप्ताह की गतिविधि देखी जाती है. इससे सप्ताह के दौरान रोजगार की स्थिति का आकलन किया जाता है.

3. वर्तमान दैनिक स्थिति (Current Daily Status)

इसमें संदर्भ सप्ताह के प्रत्येक दिन की गतिविधि को देखा जाता है. इसलिए यह रोजगार की दैनिक स्थिति तथा अल्प रोजगार को अधिक सूक्ष्मता से पकड़ सकती है.

इस प्रकार अलग-अलग मापन पद्धतियाँ बेरोजगारी की अलग तस्वीर देती हैं. किसी एक दर को देखकर पूरे श्रम बाजार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है.

बेरोजगारी के प्रभाव

व्यक्तिगत प्रभाव

रोजगार न होने से आय घटती है और परिवार की आर्थिक सुरक्षा कमजोर होती है. लंबे समय तक बेरोजगारी आत्मविश्वास और भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित कर सकती है.

सामाजिक प्रभाव

बड़े पैमाने पर रोजगार की कमी सामाजिक असंतोष, पलायन और परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव को जन्म दे सकती है. हालांकि बेरोजगारी और अपराध के बीच संबंध को सीधे और सार्वभौमिक रूप से नहीं समझना चाहिए; सामाजिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण होती हैं.

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

बेरोजगार श्रम का अर्थ है कि उपलब्ध मानव संसाधन का एक हिस्सा उत्पादन में उपयोग नहीं हो रहा है. इससे संभावित उत्पादन कम हो सकता है और परिवारों की खपत पर भी दबाव पड़ सकता है.

राजकोषीय प्रभाव

आय और उत्पादन कम होने पर कुछ कर-स्रोतों से सरकार की संभावित आय प्रभावित हो सकती है. दूसरी ओर, रोजगार सहायता और सामाजिक सुरक्षा पर सार्वजनिक व्यय की आवश्यकता बढ़ सकती है.

मानव पूंजी पर प्रभाव

लंबे समय तक काम से बाहर रहने पर कौशल और अनुभव का क्षरण हो सकता है. युवाओं के लिए यह प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार की शुरुआत में लंबा अंतराल उनके भविष्य के श्रम बाजार परिणामों को प्रभावित कर सकता है.

बेरोजगारी उन्मूलन के उपाय

बेरोजगारी का कोई एक समाधान नहीं है. रोजगार नीति को आर्थिक वृद्धि, कौशल, निवेश और क्षेत्रीय विकास को साथ लेकर चलना पड़ता है.

अल्पकालीन उपाय

सार्वजनिक कार्य कार्यक्रम ग्रामीण और कमजोर क्षेत्रों में तत्काल रोजगार दे सकते हैं. सड़क, जल संरक्षण और सामुदायिक परिसंपत्तियों से जुड़े कार्य इसके उदाहरण हैं.

कौशल प्रशिक्षण को केवल प्रमाणपत्र देने तक सीमित न रखकर उद्योग की वास्तविक मांग से जोड़ना आवश्यक है.

स्वरोजगार और छोटे उद्यम के लिए ऋण, बाजार, प्रशिक्षण और डिजिटल सुविधाओं का संयोजन रोजगार पैदा करने में मदद कर सकता है.

दीर्घकालीन उपाय

शिक्षा और कौशल का मेल रोजगार नीति का आधार होना चाहिए. व्यावसायिक शिक्षा, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-आधारित प्रशिक्षण को अधिक महत्व देना उपयोगी होगा.

श्रम-प्रधान विनिर्माण में निवेश भारत जैसे बड़े श्रम बाजार के लिए महत्वपूर्ण है. वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा, पर्यटन और अन्य रोजगार-सघन क्षेत्रों में विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ हैं.

अवसंरचना निवेश परिवहन, बिजली, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक सुविधाओं के माध्यम से निजी निवेश और रोजगार दोनों को बढ़ा सकता है.

कृषि से गैर-कृषि रोजगार की ओर संक्रमण केवल कृषि से लोगों को हटाने का प्रश्न नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स, छोटे उद्योग और सेवाओं का विकास अधिक टिकाऊ रास्ता हो सकता है.

महिला रोजगार बढ़ाने के लिए सुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल की सुविधाएँ, बाल देखभाल और लचीले रोजगार विकल्पों पर ध्यान देना आवश्यक है.

क्षेत्रीय संतुलन के लिए निवेश को केवल बड़े महानगरों तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और पिछड़े क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों का आधार विकसित करना होगा.

भारत में बेरोजगारी की स्थिति

भारत की रोजगार स्थिति को केवल एक बेरोजगारी दर से समझना पर्याप्त नहीं है. श्रम बल भागीदारी, रोजगार का प्रकार, युवाओं की बेरोजगारी, महिलाओं की भागीदारी और काम की नियमितता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं.

PLFS 2025 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की सामान्य स्थिति पर आधारित बेरोजगारी दर 3.1% थी. पुरुष और महिला दोनों के लिए यह दर 3.1% रही. इसी रिपोर्ट में 15–29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 9.9% रही, जबकि शहरी युवाओं में यह 13.6% थी. इससे स्पष्ट होता है कि समग्र बेरोजगारी दर कम होने के बावजूद युवा श्रम बाजार की चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है.

2025 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लिए श्रम बल भागीदारी दर 59.3% रही. पुरुषों के लिए यह 79.1% और महिलाओं के लिए 40.0% थी. इसका अर्थ है कि भारत की रोजगार चुनौती केवल बेरोजगार लोगों को काम देने की नहीं, बल्कि अधिक लोगों—विशेषकर महिलाओं—को श्रम बाजार में सार्थक रूप से जोड़ने की भी है.

रोजगार की प्रकृति में भी बदलाव दिखाई देता है. 2025 में नियमित वेतन/वेतनभोगी रोजगार में श्रमिकों की हिस्सेदारी 23.6% रही, जो 2024 के 22.4% से अधिक थी. इसी अवधि में स्वरोजगार की हिस्सेदारी 2023 के 58.2% से घटकर 2025 में 56.2% हुई.

इसलिए भारत की बेरोजगारी की चर्चा करते समय तीन बातों को साथ देखना चाहिए—कितने लोगों को काम नहीं मिला, कितने लोग श्रम बाजार में शामिल ही नहीं हैं और जिन लोगों को काम मिला है, उस काम की गुणवत्ता कैसी है.

बेरोजगारी दर में क्षेत्रीय अंतर

भारत में राज्यों के बीच बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय अंतर है. PLFS 2025 के सामान्य स्थिति के आँकड़ों के अनुसार प्रमुख राज्यों में गुजरात की बेरोजगारी दर 0.9%, मध्य प्रदेश की 1.5%, महाराष्ट्र की 2.4%, उत्तर प्रदेश की 2.7%, बिहार की 3.8%, राजस्थान की 4.3%, हरियाणा की 4.5%, केरल की 4.4% और तेलंगाना की 5.0% रही.

राज्यबेरोजगारी दर, 2025
गुजरात0.9%
मध्य प्रदेश1.5%
महाराष्ट्र2.4%
उत्तर प्रदेश2.7%
बिहार3.8%
केरल4.4%
राजस्थान4.3%
हरियाणा4.5%
तेलंगाना5.0%
पंजाब5.3%
असम3.7%
पश्चिम बंगाल2.8%

कुछ राज्यों में ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी के बीच भी बड़ा अंतर दिखाई देता है. उदाहरण के लिए बिहार में ग्रामीण बेरोजगारी दर 3.0%, जबकि शहरी दर 10.4% थी. राजस्थान में ग्रामीण दर 2.5% और शहरी दर 10.1% रही. इससे स्पष्ट होता है कि भारत में बेरोजगारी की प्रकृति राज्यों की आर्थिक संरचना, शहरीकरण, उद्योग और स्थानीय रोजगार अवसरों के अनुसार बदलती है.

सरकारी पहल

मनरेगा (MGNREGA) ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर अकुशल श्रम से जुड़े रोजगार का कानूनी ढाँचा प्रदान करता है. (अब विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण), जिसे आधिकारिक रूप से VB–G RAM G अधिनियम, 2025 के तहत VB–G RAM G के रूप में संक्षिप्त किया गया है.)

स्किल इंडिया का उद्देश्य कौशल विकास और रोजगार-योग्यता को बढ़ाना है.

स्टार्टअप इंडिया उद्यमिता और नए व्यवसायों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाने पर केंद्रित है.

डिजिटल इंडिया ने डिजिटल अवसंरचना और सेवाओं के विस्तार के साथ रोजगार के नए अवसरों के लिए आधार तैयार किया है.

इन योजनाओं की सफलता केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि स्थायी आय, उत्पादकता और बेहतर रोजगार में उनके योगदान से भी मापी जानी चाहिए.

महत्वपूर्ण संकेतक

संकेतकअर्थ
बेरोजगारी दर (UR)श्रम बल में बेरोजगार व्यक्तियों का प्रतिशत
श्रम बल भागीदारी दर (LFPR)कुल संबंधित आबादी में श्रम बल का प्रतिशत
कार्यकर्ताजनसंख्या अनुपात (WPR)कुल संबंधित आबादी में कार्यरत व्यक्तियों का प्रतिशत
युवा बेरोजगारी दरनिर्धारित युवा आयु वर्ग के श्रम बल में बेरोजगार युवाओं का प्रतिशत
अल्प रोजगारउपलब्ध श्रम क्षमता या इच्छित काम की तुलना में अपर्याप्त रोजगार

PLFS में इन संकेतकों को अलग-अलग आयु, लिंग, ग्रामीण-शहरी क्षेत्र और रोजगार की स्थिति के आधार पर देखा जाता है. इसलिए किसी आँकड़े के साथ उसकी आयु सीमा, संदर्भ अवधि और मापन पद्धति देखना जरूरी है.

निष्कर्ष

बेरोजगारी को केवल नौकरी की कमी के रूप में देखना समस्या को छोटा कर देता है. भारत में रोजगार की चुनौती में युवा बेरोजगारी, कौशल-अंतर, महिला श्रम भागीदारी, कृषि पर निर्भरता और रोजगार की गुणवत्ता जैसे कई पहलू शामिल हैं. इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए.

बेहतर शिक्षा और कौशल, रोजगार-सघन उद्योग, ग्रामीण गैर-कृषि गतिविधियों का विस्तार, महिला रोजगार के लिए अनुकूल वातावरण और निजी निवेश को बढ़ावा—ये सभी मिलकर रोजगार के अवसरों को मजबूत कर सकते हैं. अंततः किसी अर्थव्यवस्था की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने लोगों के पास काम है, बल्कि इससे भी कि काम कितना उत्पादक, स्थिर और सम्मानजनक है.

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