कांग्रेस का सूरत विभाजन (1907): भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में वैचारिक संघर्ष

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारम्भिक चरण में, जब राष्ट्रवादी चेतना तेज़ी से विकसित हो रही थी और क्रांतिकारी गतिविधियाँ बढ़ रही थीं, दिसंबर 1907 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ। यह घटना केवल संगठनात्मक टूट नहीं थी, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उदारवादी (नरमपंथी) और उग्रवादी (अतिवादी) विचारधाराओं के गहरे वैचारिक संघर्ष का परिणाम थी।

इतिहासकारों के अनुसार, सूरत विभाजन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा बदल दी। इसने ब्रिटिश सरकार को “फूट डालो और शासन करो” की नीति लागू करने का अवसर दिया तथा आगे चलकर 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।

मतभेदों की पृष्ठभूमि

1905 के बनारस अधिवेशन में, जिसकी अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले ने की, कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए। बाल गंगाधर तिलक ने नरमपंथियों की ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोगात्मक नीति की तीखी आलोचना की। उनका उद्देश्य स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को पूरे देश में फैलाना था। वे सरकारी सेवाओं, न्यायालयों, व्यवस्थापिका सभाओं और शिक्षा संस्थाओं तक बहिष्कार आंदोलन का विस्तार चाहते थे।

इसके विपरीत, उदारवादी नेताओं का मत था कि बंगाल विभाजन का विरोध संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से किया जाना चाहिए। वे आंदोलन को बंगाल तक सीमित रखना चाहते थे और ब्रिटिश सरकार के साथ प्रत्यक्ष असहयोग के पक्ष में नहीं थे। अंततः समझौते के तहत केवल ब्रिटिश नीतियों और बंगाल विभाजन की आलोचना की गई तथा व्यापक बहिष्कार आंदोलन टाल दिया गया।

1905 के बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन ने इन मतभेदों को और गहरा कर दिया। उग्रवादी मानते थे कि याचिकाओं और प्रार्थनाओं से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, जबकि नरमपंथी क्रमिक सुधारों में विश्वास रखते थे।

उदारवादी और उग्रवादी: दो विचारधाराओं मे मूल अंतर

उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच मतभेद केवल रणनीतिक नहीं थे, वे वैचारिक और सामाजिक भी थे:

उदारवादी (नरमपंथी)उग्रवादी (अतिवादी)
सामाजिक आधार जमींदारों और उच्च मध्यवर्गीय लोगों में था।सामाजिक आधार शिक्षित एवं निम्न मध्यवर्गीय लोगों में था।
पाश्चात्य उदारवाद और यूरोपीय इतिहास से प्रेरित थे।भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मूल्यों से प्रेरित थे।
ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे।ब्रिटिश शासन पर विश्वास नहीं करते थे।
ब्रिटेन से राजनीतिक संबंधों को भारत के हित में मानते थे।मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत का आर्थिक शोषण कर रहा है।
ब्रिटिश ताज के प्रति निष्ठावान थे।ब्रिटिश ताज को भारतीय हितों के विरुद्ध मानते थे।
आंदोलन को शिक्षित वर्ग तक सीमित रखना चाहते थे।जनसामान्य की शक्ति और त्याग में विश्वास रखते थे।
संवैधानिक सुधारों और सरकारी सेवाओं में भारतीय भागीदारी की मांग करते थे।स्वराज्य को भारतीय समस्याओं का समाधान मानते थे।
केवल संवैधानिक तरीकों से संघर्ष चाहते थे।आवश्यकता पड़ने पर बहिष्कार और अहिंसात्मक प्रतिरोध का समर्थन करते थे।
पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता के समर्थक थे।भारतीय शिक्षा, साहित्य, प्रेस और सांस्कृतिक आयोजनों के समर्थक थे।

1906 का कलकत्ता अधिवेशन: “स्वराज्य” की घोषणा

दिसंबर 1906 में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित हुआ। उस समय सांप्रदायिक दंगों, क्रांतिकारी गतिविधियों और उग्रवादियों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण उदारवादियों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगा था।

उग्रवादी बाल गंगाधर तिलक या लाल लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, जबकि नरमपंथियों ने रास बिहारी घोष का नाम प्रस्तावित किया। अंततः दादाभाई नौरोजी को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया।

इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने “स्वराज्य” को अपना लक्ष्य घोषित किया। स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थन में प्रस्ताव पारित किए गए। हालांकि “स्वराज्य” की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई, जिससे आगे चलकर दोनों गुटों के बीच विवाद बढ़ गया।

इतिहासकारों के अनुसार, यह अधिवेशन कांग्रेस के राजनीतिक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत था। अब कांग्रेस केवल प्रशासनिक सुधारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वशासन की मांग खुलकर सामने आने लगी।

उग्रवादियों और नरमपंथियों के बीच बढ़ता टकराव

कलकत्ता अधिवेशन की उपलब्धियों से उत्साहित होकर उग्रवादियों ने शिक्षा संस्थाओं, व्यवस्थापिका सभाओं और नगर निकायों के बहिष्कार की मांग तेज कर दी। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन को निर्णायक चुनौती देने का समय आ गया है।

दूसरी ओर, उदारवादी नेताओं का विश्वास था कि संवैधानिक सुधारों और परिषदों में भारतीय भागीदारी के माध्यम से राजनीतिक अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं। वे अतिवादियों के दबाव में किसी भी जल्दबाज़ी भरे कदम के विरोधी थे।

दोनों पक्ष एक-दूसरे की रणनीति को गलत समझने लगे। उग्रवादियों को लगा कि नरमपंथी स्वतंत्रता संघर्ष को कमजोर कर रहे हैं, जबकि उदारवादियों को भय था कि उग्रवादी आंदोलन ब्रिटिश दमन को बढ़ावा देगा।

1907 का सूरत अधिवेशन और कांग्रेस का विभाजन

1907 के कांग्रेस अधिवेशन को लेकर विवाद चरम पर पहुँच गया। उग्रवादी चाहते थे कि अधिवेशन नागपुर में आयोजित हो तथा अध्यक्ष के रूप में तिलक या लाला लाजपत राय को चुना जाए। वे स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के पूर्ण समर्थन में प्रस्ताव पारित करवाना चाहते थे।

इसके विपरीत, उदारवादियों ने अधिवेशन सूरत में आयोजित करने का निर्णय लिया। उन्होंने मेजबान प्रांत के नेता को अध्यक्ष न बनाए जाने की परंपरा का हवाला देकर तिलक का विरोध किया, क्योंकि सूरत तत्कालीन बंबई प्रांत के अंतर्गत आता था। उन्होंने रास बिहारी घोष को अध्यक्ष बनाने की मांग की।

सूरत अधिवेशन में स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि दोनों गुटों के बीच तीखी नारेबाज़ी, कुर्सियाँ और जूते फेंके जाने तक की घटनाएँ हुईं। अंततः पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और अधिवेशन स्थगित कर दिया गया।

इस प्रकार कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हो गया। विभाजन के बाद कांग्रेस पर नरमपंथियों का नियंत्रण स्थापित हो गया। उन्होंने संवैधानिक तरीकों से स्वशासन प्राप्त करने की नीति जारी रखी।

ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और शासन करो” नीति

सूरत विभाजन से ब्रिटिश सरकार को बड़ा राजनीतिक लाभ मिला। उसने उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच दूरी बढ़ाने की रणनीति अपनाई। सरकार की नीति को तीन शब्दों—“अवरोध, सांत्वना और दमन”—से समझा जा सकता है।

पहले चरण में अतिवादियों का दमन किया गया। दूसरे चरण में उदारवादियों को संवैधानिक सुधारों का आश्वासन देकर अपने पक्ष में करने का प्रयास हुआ। यही नीति आगे चलकर 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों में दिखाई दी।

इन सुधारों के तहत विधान परिषदों का विस्तार किया गया, लेकिन साथ ही मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू की गई। इतिहासकार इसे भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत मानते हैं।

अतिवादियों पर दमन और आंदोलन की मंदी

1907 से 1911 के बीच ब्रिटिश सरकार ने कई दमनकारी कानून बनाए, जिनमें राजद्रोही सभा अधिनियम 1907, भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1908, फौजदारी कानून संशोधन अधिनियम 1908 तथा भारतीय प्रेस अधिनियम 1910 प्रमुख थे।

बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार कर मांडले जेल भेज दिया गया। अरबिंदो घोष और बिपिन चंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली, जबकि लाला लाजपत राय विदेश चले गए। इससे उग्रवादी आंदोलन कमजोर पड़ गया।

1908 के बाद राष्ट्रीय आंदोलन कुछ समय के लिए धीमा पड़ गया। आंदोलन को नई दिशा तब मिली जब 1914 में तिलक जेल से रिहा हुए तथा बाद में 1916 के लखनऊ अधिवेशन में नरमपंथियों और उग्रवादियों का पुनर्मिलन हुआ।

सूरत विभाजन का ऐतिहासिक महत्व

Congress Surat Split 1907 Infographics

सूरत विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अस्थायी झटका था, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इसने स्पष्ट किया कि वैचारिक मतभेद यदि संगठनात्मक संघर्ष में बदल जाएँ, तो राष्ट्रीय आंदोलन कमजोर हो सकता है।

फिर भी, उग्रवादियों की विचारधारा ने भारतीय राजनीति को अधिक जनोन्मुख और संघर्षशील बनाया। स्वदेशी, बहिष्कार और स्वराज्य की अवधारणाएँ आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलनों की आधारशिला बनीं।

निष्कर्ष

कांग्रेस का सूरत विभाजन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की निर्णायक घटना थी। इसने कांग्रेस के भीतर वैचारिक संघर्ष, ब्रिटिश औपनिवेशिक रणनीति और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता को उजागर किया। यह घटना बताती है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति के भीतर विचारों, रणनीतियों और नेतृत्व की दिशा तय करने का भी संघर्ष था।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गहराई से समझने के लिए सूरत विभाजन का अध्ययन आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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सूरत विभाजन जैसी निर्णायक घटनाओं को समझना न केवल परीक्षाओं के लिए, बल्कि एक सजग नागरिक के रूप में आज की राजनीति को पढ़ने के लिए भी आवश्यक है।

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