होमरूल आंदोलन को होमरूल लीग आंदोलन भी कहा जाता है. यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अहम् उत्थान है. इसलिए प्रतियोगी परीक्षार्थियों समेत अन्य शिक्षार्थियों व जनसामान्य को इसका जानकारी होना ऐतिहासिक पहलुओं के समझ के लिए आवश्यक है. तो आइए हम इस आंदोलन के पृष्ठभूमि, अवधारणाएं विकास, प्रभाव और परिणामों का विस्तृत अध्ययन करते है…
बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक संक्रमणकाल के रूप में अभिहित किया जाता है. यह वह समय था जब भारतीय राजनीति उदारवादी याचिकात्मक प्रवृत्तियों से आगे बढ़कर अधिक सक्रिय, व्यापक तथा जनोन्मुख राष्ट्रवादी स्वरूप ग्रहण कर रही थी. 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन तथा 1907 के सूरत विभाजन के उपरांत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संगठनात्मक दुर्बलता और वैचारिक विखंडन की स्थिति में पहुँच गई थी. नरमपंथियों और गरमपंथियों के मध्य उत्पन्न मतभेदों ने राष्ट्रीय आंदोलन की गति को अवरुद्ध कर दिया था. फलतः भारतीय राजनीति में एक प्रकार की निष्क्रियता तथा नेतृत्वगत शिथिलता परिलक्षित होने लगी थी.
इसके अतिरिक्त, 1909 के मार्ले–मिंटो सुधारों ने भारतीयों की संवैधानिक अपेक्षाओं को संतुष्ट करने के स्थान पर उन्हें और अधिक निराश किया. इन सुधारों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने सीमित राजनीतिक अधिकार प्रदान करते हुए पृथक निर्वाचन प्रणाली को लागू किया, जिसने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा को संस्थागत आधार प्रदान किया. फलस्वरूप राष्ट्रवादी नेतृत्व के भीतर यह भावना विकसित हुई कि ब्रिटिश शासन भारतीयों को वास्तविक स्वशासन प्रदान करने के प्रति ईमानदार नहीं है.
इसी पृष्ठभूमि में प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) का आरंभ हुआ. युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीय संसाधनों, सैनिकों तथा वित्तीय साधनों का व्यापक स्तर पर उपयोग किया. लगभग तेरह लाख भारतीय सैनिकों एवं श्रमिकों को युद्ध में सम्मिलित किया गया, जबकि युद्ध के व्यय की पूर्ति हेतु भारतीय जनता पर भारी करों का बोझ डाला गया. आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई तथा आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई. इसके परिणामस्वरूप भारतीय समाज में व्यापक असंतोष व्याप्त हो गया.
ऐसी परिस्थितियों में बाल गंगाधर तिलक तथा ऐनी बेसेंट जैसे नेताओं ने भारतीय राजनीति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इन नेताओं ने आयरलैंड के होमरूल आंदोलन से प्रेरणा ग्रहण करते हुए भारत में भी स्वशासन की मांग को संगठित स्वरूप प्रदान किया. होमरूल आंदोलन का उद्देश्य केवल संवैधानिक सुधारों की मांग करना नहीं था, बल्कि भारतीय जनमानस में राजनीतिक चेतना, राष्ट्रीय आत्मविश्वास तथा स्वशासन की आकांक्षा को व्यापक बनाना भी था. यह आंदोलन गांधी-पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक था, जिसने भारतीय राजनीति को पुनः सक्रिय किया तथा आगे चलकर गांधीवादी जनांदोलनों की आधारभूमि तैयार की.
इसी कालखंड में 1916 का लखनऊ अधिवेशन भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में विशेष महत्व रखता है. इस अधिवेशन में एक ओर कांग्रेस के नरमपंथियों और गरमपंथियों के मध्य पुनर्मिलन हुआ, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य ऐतिहासिक लखनऊ समझौता संपन्न हुआ. यह समझौता तत्कालीन भारतीय राजनीति में हिंदू–मुस्लिम सहयोग का महत्वपूर्ण प्रतीक था. यद्यपि दीर्घकालिक दृष्टि से पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करना भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक विभाजन की आधारशिला सिद्ध हुआ, तथापि तत्कालीन परिस्थितियों में इसे राष्ट्रीय एकता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया .
अतः होमरूल आंदोलन तथा लखनऊ समझौता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे ऐतिहासिक पड़ाव थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को नयी दिशा, नयी ऊर्जा तथा व्यापक राजनीतिक आधार प्रदान किया.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : राष्ट्रवादी राजनीति का पुनर्संयोजन (1905–1915)
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारतीय राजनीतिक चेतना का प्रमुख मंच बन चुकी थी. प्रारंभिक कांग्रेस नेतृत्व मुख्यतः उदारवादी विचारधारा से प्रभावित था, जो संवैधानिक उपायों, प्रार्थना-पत्रों तथा वैधानिक सुधारों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने में विश्वास रखता था. दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे नेता इस प्रवृत्ति के प्रमुख प्रतिनिधि थे. किंतु बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यह स्पष्ट होने लगा कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की मांगों के प्रति गंभीर नहीं है. फलतः कांग्रेस के भीतर एक नयी उग्र राष्ट्रवादी धारा का उदय हुआ.
1905 में लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा ने भारतीय राजनीति में व्यापक उथल-पुथल उत्पन्न कर दी. ब्रिटिश सरकार ने प्रशासनिक सुविधा का तर्क प्रस्तुत किया, किंतु भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसे “फूट डालो और शासन करो” की नीति का अंग माना. बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन प्रारंभ हुआ, जिसने भारतीय राजनीति को पहली बार व्यापक जनाधार प्रदान किया. विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उद्योगों के समर्थन, राष्ट्रीय शिक्षा तथा जनसभाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद को सामाजिक और सांस्कृतिक आधार प्राप्त हुआ .
इसी काल में बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा बिपिन चंद्र पाल के नेतृत्व में उग्रवादी राष्ट्रवाद का विकास हुआ. ये नेता उदारवादियों की धीमी एवं याचिकात्मक राजनीति से असंतुष्ट थे. उनका मत था कि स्वराज्य भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है तथा इसे संघर्ष के माध्यम से प्राप्त किया जाना चाहिए. तिलक ने गणपति उत्सव तथा शिवाजी उत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को राजनीतिक चेतना के माध्यम में परिवर्तित कर दिया. इससे राष्ट्रवाद का प्रसार शिक्षित वर्ग तक सीमित न रहकर सामान्य जनता तक होने लगा.
किंतु कांग्रेस के भीतर बढ़ते वैचारिक मतभेदों का परिणाम 1907 के सूरत अधिवेशन में सामने आया. अध्यक्ष पद के प्रश्न तथा आंदोलन की रणनीति को लेकर नरमपंथियों और गरमपंथियों के मध्य तीव्र विवाद उत्पन्न हो गया. अंततः कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई. इस विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन को गहरा आघात पहुँचाया. ब्रिटिश सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए उग्रवादी नेताओं पर दमनात्मक कार्यवाहियाँ प्रारंभ कर दीं. बाल गंगाधर तिलक को 1908 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर मांडले (बर्मा) भेज दिया गया.
इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश सरकार ने 1909 में मार्ले–मिंटो सुधार लागू किए. इन सुधारों के अंतर्गत सीमित निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया गया, किंतु साथ ही मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की स्थापना की गई. यह व्यवस्था भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत थी. ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित कर राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना था. यद्यपि मुस्लिम लीग ने इस व्यवस्था का समर्थन किया, किंतु अनेक राष्ट्रवादियों ने इसे राष्ट्रीय एकता के लिए घातक माना (सुमित सरकार, 2017).
इसी अवधि में क्रांतिकारी गतिविधियों का भी विस्तार हुआ. बंगाल में अनुशीलन समिति तथा युगांतर दल सक्रिय हुए, जबकि पंजाब और विदेशों में गदर आंदोलन का विकास हुआ. क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती देने का प्रयास किया. हालांकि इन आंदोलनों ने युवाओं में राष्ट्रवादी उत्साह उत्पन्न किया, किंतु व्यापक जनसमर्थन के अभाव तथा सरकारी दमन के कारण वे स्थायी राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सके.
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध का आरंभ भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ. ब्रिटेन ने युद्ध में भारतीय संसाधनों का व्यापक उपयोग किया. भारतीय सैनिकों को यूरोप, पश्चिम एशिया तथा अफ्रीका के मोर्चों पर भेजा गया. युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों एवं कृषि पर भारी दबाव पड़ा. महँगाई तीव्र गति से बढ़ी तथा आवश्यक वस्तुओं का संकट उत्पन्न हुआ. इसके अतिरिक्त, युद्धकालीन कानूनों के माध्यम से प्रेस तथा राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित किया गया. फलतः भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष तीव्र हो गया.
युद्ध ने भारतीयों के मानस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डाला. यूरोपीय शक्तियों के मध्य संघर्ष ने “श्वेत जाति की अजेयता” के मिथक को कमजोर कर दिया. इसके साथ ही आयरलैंड, मिस्र तथा अन्य उपनिवेशों में चल रहे राष्ट्रवादी आंदोलनों ने भारतीय नेताओं को प्रेरित किया. विशेषतः आयरलैंड के होमरूल आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रवादियों को यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए भी स्वशासन की मांग संगठित रूप से उठाई जा सकती है.
1914 में मांडले कारागार से बाल गंगाधर तिलक की रिहाई भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण घटना थी. तिलक ने परिस्थितियों का व्यावहारिक मूल्यांकन करते हुए यह समझ लिया कि राष्ट्रीय आंदोलन को पुनर्जीवित करने के लिए नरमपंथियों और गरमपंथियों के मध्य एकता आवश्यक है. दूसरी ओर, ऐनी बेसेंट भी थियोसोफिकल आंदोलन से आगे बढ़कर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगी थीं. उन्होंने स्वशासन की मांग को जन-आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया.
फलस्वरूप 1915–16 तक भारतीय राजनीति में एक नये राष्ट्रवादी पुनर्जागरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी. यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें होमरूल लीग आंदोलन तथा लखनऊ समझौते जैसी ऐतिहासिक घटनाएँ विकसित हुईं. इन घटनाओं ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को पुनः सक्रिय, संगठित तथा जनोन्मुख बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई.
होमरूल आंदोलन के उदय के कारण
बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुका था जहाँ राजनीतिक पुनर्संगठन तथा वैचारिक पुनरुत्थान की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही थी. 1907 के सूरत विभाजन के उपरांत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उत्पन्न वैचारिक संघर्ष ने राष्ट्रवादी राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया था. गरमपंथियों तथा नरमपंथियों के मध्य बढ़ती दूरी ने राष्ट्रीय आंदोलन की गति को मंद कर दिया था. इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक नीतियों ने राजनीतिक वातावरण को और अधिक निराशाजनक बना दिया था.
ऐसी परिस्थितियों में होमरूल आंदोलन का उदय भारतीय राष्ट्रवाद के पुनर्जागरण के रूप में हुआ. यह आंदोलन केवल प्रशासनिक सुधारों की मांग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य भारतीयों में राजनीतिक चेतना, स्वशासन की आकांक्षा तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास का विकास करना भी था.
होमरूल आंदोलन के उदय का एक महत्वपूर्ण कारण ब्रिटिश शासन की संवैधानिक नीतियों से उत्पन्न मोहभंग था. प्रारंभिक कांग्रेस नेतृत्व को यह विश्वास था कि ब्रिटिश शासन न्यायप्रिय तथा उदार है और वैधानिक याचिकाओं एवं संवैधानिक आग्रहों के माध्यम से भारतीयों को क्रमिक रूप से राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो सकते हैं. किंतु 1909 के मार्ले–मिंटो सुधारों ने इस विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया.
इन सुधारों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने सीमित राजनीतिक अधिकार प्रदान किए. परंतु वास्तविक सत्ता अपने हाथों में सुरक्षित रखी. इसके अतिरिक्त पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू कर भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की औपचारिक शुरुआत की गई. फलस्वरूप राष्ट्रवादी नेतृत्व के मध्य यह धारणा प्रबल होने लगी कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को वास्तविक स्वशासन प्रदान करने के प्रति ईमानदार नहीं है.
इसके अतिरिक्त, बंग-भंग विरोधी आंदोलन तथा स्वदेशी आंदोलन के पश्चात भारतीय जनता के मध्य राजनीतिक चेतना का विस्तार हो चुका था. जनता अब केवल याचिकात्मक राजनीति से संतुष्ट नहीं थी. शिक्षित मध्यमवर्ग, विद्यार्थी समुदाय तथा नवोदित राजनीतिक कार्यकर्ता अधिक सक्रिय और संघर्षशील राजनीति की अपेक्षा कर रहे थे. नरमपंथियों की सीमित संवैधानिक रणनीति उन्हें अपर्याप्त प्रतीत होने लगी थी. फलतः एक ऐसे आंदोलन की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी जो वैधानिक दायरे के भीतर रहते हुए भी जनता को व्यापक रूप से संगठित कर सके.
प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) ने भी होमरूल आंदोलन के उदय में निर्णायक भूमिका निभाई. युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को केवल संसाधनों के स्रोत के रूप में उपयोग किया. लाखों भारतीय सैनिकों को यूरोप, पश्चिम एशिया तथा अफ्रीका के युद्धक्षेत्रों में भेजा गया. युद्ध के व्यय की पूर्ति हेतु भारतीयों पर भारी कर लगाए गए. आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई तथा खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो गया. युद्धकालीन आर्थिक दबावों के कारण सामान्य जनता अत्यंत त्रस्त हो गई. इसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासन के प्रति व्यापक असंतोष विकसित हुआ.
युद्ध ने भारतीय मानस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डाला. यूरोपीय शक्तियों के मध्य संघर्ष ने पश्चिमी साम्राज्यवाद की नैतिक श्रेष्ठता के मिथक को कमजोर किया. भारतीयों ने अनुभव किया कि यूरोपीय राष्ट्र भी सत्ता और स्वार्थ की राजनीति से संचालित होते हैं. इसके अतिरिक्त युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने लोकतंत्र, स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्णय जैसे सिद्धांतों का प्रचार किया, किंतु भारत में वही सरकार दमनात्मक नीतियों का अनुसरण कर रही थी. इस द्वैध नीति ने भारतीय राष्ट्रवादियों को और अधिक आक्रोशित किया.
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव भी होमरूल आंदोलन के विकास में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. विशेषतः आयरलैंड का होमरूल आंदोलन भारतीय नेताओं के लिए प्रेरणास्रोत बना. आयरलैंड में लंबे समय से ब्रिटिश शासन के अंतर्गत स्वशासन की मांग उठाई जा रही थी. भारतीय राष्ट्रवादियों ने यह अनुभव किया कि यदि आयरलैंड ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए स्वशासन की मांग कर सकता है, तो भारत को भी इसी प्रकार का अधिकार प्राप्त होना चाहिए. ऐनी बेसेंट तथा बाल गंगाधर तिलक दोनों ही आयरिश होमरूल आंदोलन से गहराई से प्रभावित थे .
होमरूल आंदोलन के उदय का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण बाल गंगाधर तिलक की राजनीतिक पुनर्वापसी थी. 1908 में राजद्रोह के आरोप में मांडले कारागार भेजे जाने के पश्चात तिलक 1914 में रिहा होकर भारत लौटे. कारावास से लौटने के बाद उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों का व्यावहारिक विश्लेषण किया. उन्होंने यह अनुभव किया कि राष्ट्रीय आंदोलन को पुनर्जीवित करने के लिए गरमपंथियों और नरमपंथियों के मध्य सहयोग आवश्यक है. तिलक ने अपने पूर्ववर्ती उग्रवादी स्वर को अपेक्षाकृत संयमित करते हुए संवैधानिक संघर्ष की दिशा में कदम बढ़ाया. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को हिंसात्मक माध्यमों से उखाड़ फेंकना नहीं, बल्कि भारतीयों के लिए उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है.
तिलक का प्रसिद्ध उद्घोष—
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”
भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक आधारशिला बन चुका था. यह उद्घोष भारतीयों के मध्य राजनीतिक आत्मसम्मान तथा स्वशासन की चेतना का प्रतीक बन गया. तिलक ने यह समझ लिया था कि केवल सीमित अभिजात राजनीतिक गतिविधियों से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती; इसके लिए व्यापक जनसक्रियता आवश्यक है. फलतः उन्होंने होमरूल आंदोलन को जनाधारित राष्ट्रवादी अभियान का स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया.
इसी काल में ऐनी बेसेंट भी भारतीय राजनीति में अत्यंत सक्रिय हो चुकी थीं. आयरलैंड में जन्मी ऐनी बेसेंट थियोसोफिकल आंदोलन के माध्यम से भारत आई थीं, किंतु शीघ्र ही वे भारतीय स्वशासन की समर्थक बन गईं. उन्होंने भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता की प्रशंसा करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया कि भारत को भी ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासी अधिराज्य (Dominion Status) का अधिकार प्राप्त होना चाहिए. बेसेंट का मानना था कि स्वशासन केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न है.
1915 से ऐनी बेसेंट ने व्यापक राजनीतिक अभियान प्रारंभ किया. उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ तथा ‘कॉमनवील’ नामक समाचार-पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना की तथा भारतीय स्वशासन की मांग को प्रखर रूप से उठाया. उनके लेखन की भाषा तार्किक, तीक्ष्ण तथा राष्ट्रवादी चेतना से परिपूर्ण थी. उन्होंने देश के विभिन्न भागों में यात्राएँ कर जनसभाएँ आयोजित कीं तथा शिक्षित वर्ग, विद्यार्थियों एवं महिलाओं को राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया. इस प्रकार बेसेंट ने राष्ट्रवादी राजनीति को वैचारिक तथा संगठनात्मक दोनों स्तरों पर सुदृढ़ किया.
इसके अतिरिक्त कांग्रेस के भीतर पुनर्मिलन की आवश्यकता भी होमरूल आंदोलन के उदय का महत्वपूर्ण कारण थी. सूरत विभाजन के पश्चात राष्ट्रीय आंदोलन का संगठनात्मक आधार कमजोर हो गया था. गरमपंथियों तथा नरमपंथियों दोनों को यह अनुभव होने लगा था कि विभाजन से केवल ब्रिटिश सरकार को लाभ पहुँचा है. गोपाल कृष्ण गोखले तथा फिरोजशाह मेहता जैसे नेताओं की मृत्यु के पश्चात कांग्रेस में वैचारिक पुनर्संयोजन की संभावनाएँ बढ़ीं. तिलक और ऐनी बेसेंट ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए दोनों गुटों के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया .
होमरूल आंदोलन के उदय में शिक्षित मध्यमवर्ग की बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी. विश्वविद्यालयों, प्रेस तथा आधुनिक शिक्षा के प्रसार ने एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया था जो राजनीतिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक भागीदारी की मांग कर रहा था. यह वर्ग ब्रिटिश शासन के भीतर समान अवसरों तथा स्वायत्त प्रशासन की अपेक्षा रखता था. होमरूल आंदोलन ने इस वर्ग को एक वैधानिक किंतु संघर्षशील राजनीतिक मंच प्रदान किया.
अतः स्पष्ट है कि होमरूल आंदोलन का उदय किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह राजनीतिक निराशा, आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रभाव, राष्ट्रवादी पुनर्जागरण तथा नेतृत्वगत पुनर्संगठन जैसी अनेक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम था. इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को पुनः सक्रिय किया तथा स्वशासन की मांग को जन-आंदोलन के स्तर तक पहुँचाया. यही कारण है कि इतिहासकार होमरूल आंदोलन को गांधी-पूर्व राष्ट्रवादी राजनीति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुनर्जागरणकारी चरण मानते हैं.
तिलक एवं ऐनी बेसेंट की होमरूल लीग
होमरूल आंदोलन का वास्तविक संगठनात्मक स्वरूप 1916 में सामने आया, जब बाल गंगाधर तिलक तथा ऐनी बेसेंट ने पृथक-पृथक होमरूल लीगों की स्थापना की. यद्यपि दोनों संगठनों के कार्यक्षेत्र तथा कार्यप्रणाली में कुछ भिन्नताएँ थीं, तथापि उनका मूल उद्देश्य समान था—भारत में स्वशासन की मांग को संगठित जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान करना. इन लीगों ने भारतीय राजनीति में नयी चेतना का संचार किया तथा कांग्रेस की निष्क्रियता को समाप्त कर राष्ट्रवादी आंदोलन को पुनः गतिशील बनाया.
तिलक की होमरूल लीग
बाल गंगाधर तिलक ने अप्रैल 1916 में बेलगाम में अपनी होमरूल लीग की स्थापना की. इस लीग का कार्यक्षेत्र मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रांत तथा बरार तक सीमित था. संगठनात्मक दृष्टि से इसे छह प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया गया था. तिलक का उद्देश्य एक सुदृढ़ तथा अनुशासित राजनीतिक संगठन का निर्माण करना था, जो स्थानीय स्तर तक राष्ट्रवादी चेतना का प्रसार कर सके.
तिलक की लीग ने स्वराज्य, भाषायी प्रांतों की स्थापना तथा राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार को अपने प्रमुख उद्देश्यों के रूप में घोषित किया. तिलक का मत था कि प्रशासनिक इकाइयों का गठन भाषायी आधार पर होना चाहिए, क्योंकि इससे जनता और प्रशासन के मध्य संबंध अधिक सुदृढ़ होंगे. यह विचार बाद के भारतीय राजनीतिक विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ.
तिलक ने अपने समाचार-पत्र ‘केसरी’ तथा ‘मराठा’ के माध्यम से होमरूल आंदोलन का व्यापक प्रचार किया. उनकी लेखनी अत्यंत प्रभावशाली तथा जनोन्मुख थी. वे स्वशासन को भारतीयों का नैसर्गिक अधिकार बताते थे तथा जनता से राजनीतिक रूप से सक्रिय होने का आह्वान करते थे. इसके अतिरिक्त उन्होंने जनसभाओं, व्याख्यानों तथा राजनीतिक यात्राओं के माध्यम से आंदोलन को लोकप्रिय बनाया.
तिलक की सबसे बड़ी विशेषता उनकी व्यावहारिक राजनीतिक दृष्टि थी. उन्होंने यह समझ लिया था कि केवल उग्र राष्ट्रवादी भाषणों से राजनीतिक परिवर्तन संभव नहीं है. फलतः उन्होंने संवैधानिक संघर्ष, राजनीतिक शिक्षा तथा जनसंगठन पर बल दिया. इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंसात्मक गतिविधियाँ राष्ट्रीय आंदोलन को नुकसान पहुँचा सकती हैं. यह परिवर्तन उनके राजनीतिक दृष्टिकोण की परिपक्वता को दर्शाता है .
ऐनी बेसेंट की होमरूल लीग
सितंबर 1916 में ऐनी बेसेंट ने मद्रास में अपनी होमरूल लीग की स्थापना की. तिलक की लीग के विपरीत बेसेंट की लीग का कार्यक्षेत्र लगभग संपूर्ण भारत था. मद्रास, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत तथा अन्य क्षेत्रों में इसकी शाखाएँ स्थापित की गईं. कुछ ही समय में इसकी लगभग दो सौ शाखाएँ सक्रिय हो गईं.
ऐनी बेसेंट की लीग का संगठनात्मक ढाँचा अपेक्षाकृत उदार एवं व्यापक था. जॉर्ज अरुंडेल को इसका संगठन सचिव नियुक्त किया गया, जबकि बी.पी. वाडिया तथा सी.पी. रामास्वामी अय्यर जैसे नेताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़े अनेक शिक्षित व्यक्तियों ने इस आंदोलन का समर्थन किया.
बेसेंट ने अपने समाचार-पत्र ‘न्यू इंडिया’ तथा ‘कॉमनवील’ के माध्यम से ब्रिटिश सरकार की तीव्र आलोचना की. वे तर्क देती थीं कि यदि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड जैसे उपनिवेशों को स्वशासन प्राप्त हो सकता है, तो भारत को इस अधिकार से वंचित क्यों रखा जाए. उनके लेखन में राजनीतिक तर्क, ऐतिहासिक संदर्भ तथा नैतिक आग्रह का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है.
ऐनी बेसेंट ने महिलाओं तथा विद्यार्थियों को राजनीतिक गतिविधियों में सम्मिलित करने का विशेष प्रयास किया. उन्होंने राजनीतिक शिक्षा को राष्ट्रवादी आंदोलन का अनिवार्य अंग माना. उनके नेतृत्व में अनेक स्थानों पर अध्ययन मंडल, पुस्तकालय तथा राजनीतिक व्याख्यान आयोजित किए गए. इससे राष्ट्रवादी राजनीति का सामाजिक आधार विस्तृत हुआ.
दोनों लीगों की समानताएँ और भिन्नताएँ
यद्यपि तिलक तथा बेसेंट की होमरूल लीगें पृथक संगठन थीं, तथापि दोनों के उद्देश्य समान थे. दोनों ही भारत में उत्तरदायी शासन तथा स्वशासन की मांग कर रही थीं. दोनों ने राजनीतिक शिक्षा, जनसभाओं तथा प्रेस को आंदोलन के प्रमुख साधन के रूप में अपनाया. दोनों ही नेताओं ने कांग्रेस के पुनर्जीवन तथा नरमपंथी–गरमपंथी एकता को प्रोत्साहित किया.
इसके विपरीत दोनों की कार्यशैली में कुछ अंतर भी थे. तिलक की राजनीति अधिक जनोन्मुख एवं संघर्षशील थी, जबकि बेसेंट का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार संवैधानिक था. तिलक भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों एवं जनभावनाओं का प्रभावी उपयोग करते थे, जबकि बेसेंट बौद्धिक एवं वैचारिक प्रचार पर अधिक बल देती थीं.
फिर भी दोनों नेताओं का संयुक्त योगदान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ. होमरूल लीग आंदोलन ने भारतीय राजनीति को पुनर्जीवित किया, स्वशासन की मांग को व्यापक बनाया तथा आगे चलकर गांधीवादी जनांदोलनों की आधारभूमि तैयार की. इस प्रकार 1916 का होमरूल आंदोलन भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में राजनीतिक पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया.
होमरूल आंदोलन की कार्यप्रणाली एवं प्रचार–प्रसार
होमरूल आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी संगठित, योजनाबद्ध तथा बहुआयामी कार्यप्रणाली थी. इससे पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति मुख्यतः वार्षिक अधिवेशनों, याचिकाओं तथा सीमित अभिजात राजनीतिक गतिविधियों तक केंद्रित थी, किंतु होमरूल आंदोलन ने पहली बार राजनीतिक शिक्षा, जनसंपर्क तथा प्रचार को राष्ट्रवादी संघर्ष का केंद्रीय तत्व बना दिया. इस आंदोलन का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधारों की मांग करना नहीं था, बल्कि भारतीय जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक एवं संगठित बनाना भी था. फलस्वरूप इस आंदोलन ने राष्ट्रवाद को शहरी शिक्षित वर्ग की सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया.
होमरूल लीगों ने देश के विभिन्न भागों में शाखाओं की स्थापना कर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संगठन का निर्माण किया. इन शाखाओं के माध्यम से नियमित सभाएँ, व्याख्यान, अध्ययन-वृत्तियाँ तथा विचार-गोष्ठियाँ आयोजित की जाती थीं. आंदोलन के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया जाता था कि वे ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक पहुँचकर जनता को स्वशासन की अवधारणा से परिचित कराएँ. इस प्रकार राजनीतिक चेतना को स्थानीय सामाजिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया.
राजनीतिक शिक्षा होमरूल आंदोलन की केंद्रीय रणनीति थी. आंदोलन के नेताओं का मत था कि जब तक जनता राजनीतिक अधिकारों तथा प्रशासनिक संरचनाओं के विषय में जागरूक नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय आंदोलन व्यापक जनाधार प्राप्त नहीं कर सकेगा. फलतः विभिन्न नगरों में पुस्तकालयों, अध्ययन-कक्षों तथा वाचनालयों की स्थापना की गई. इन केंद्रों में राष्ट्रीय आंदोलन, विश्व राजनीति, संवैधानिक विकास तथा स्वशासन से संबंधित साहित्य उपलब्ध कराया जाता था. अनेक स्थानों पर विद्यार्थियों के लिए विशेष राजनीतिक कक्षाओं का आयोजन किया गया, जिनमें भारतीय इतिहास, उपनिवेशवाद तथा राष्ट्रवाद के सिद्धांतों पर चर्चा की जाती थी.
इसके अतिरिक्त होमरूल आंदोलन ने प्रचार-प्रसार के आधुनिक साधनों का प्रभावशाली उपयोग किया. समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं, पोस्टरों तथा पैम्फलेटों के माध्यम से आंदोलन के विचारों को जनता तक पहुँचाया गया. ऐनी बेसेंट के ‘न्यू इंडिया’ तथा ‘कॉमनवील’ और तिलक के ‘केसरी’ एवं ‘मराठा’ जैसे पत्र राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रमुख माध्यम बन गए. इन पत्रों में प्रकाशित लेख ब्रिटिश शासन की आलोचना करते थे तथा भारतीयों के स्वशासन के अधिकार का समर्थन करते थे. राष्ट्रवादी पत्रकारिता ने जनता में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .
आंदोलन की कार्यप्रणाली का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उसने सांस्कृतिक माध्यमों का भी प्रभावी उपयोग किया. विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रवादी गीतों, नाटकों तथा सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से स्वदेशी चेतना का प्रसार किया गया. विशेषतः महाराष्ट्र में तिलक द्वारा प्रारंभ किए गए सार्वजनिक गणपति उत्सव तथा शिवाजी उत्सव ने राजनीतिक संगठन को सांस्कृतिक आधार प्रदान किया. इन आयोजनों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीय गौरव तथा ऐतिहासिक चेतना का विकास हुआ.
इसके अतिरिक्त होमरूल आंदोलन ने युवाओं तथा विद्यार्थियों को राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अनेक विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थी आंदोलन की शाखाओं से जुड़ने लगे. युवाओं को राष्ट्रवाद का भविष्य माना गया तथा उन्हें राजनीतिक संगठन, भाषण-कला तथा जनसंपर्क का प्रशिक्षण दिया गया. आगे चलकर यही शिक्षित युवा वर्ग गांधीवादी आंदोलनों की प्रमुख शक्ति बना.
होमरूल आंदोलन की एक अन्य विशेषता इसकी भौगोलिक व्यापकता थी. यद्यपि आंदोलन का प्रभाव सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचा, फिर भी इसने गुजरात, सिंध, मद्रास तथा मध्य भारत जैसे अपेक्षाकृत राजनीतिक दृष्टि से निष्क्रिय क्षेत्रों में राष्ट्रवादी चेतना का प्रसार किया. इससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त करने में सहायता मिली.
आंदोलन की कार्यप्रणाली में स्थानीय समस्याओं को भी सम्मिलित किया गया. अनेक स्थानों पर लीग के कार्यकर्ताओं ने नगरपालिका, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा स्थानीय प्रशासन से जुड़े प्रश्नों पर जनता को संगठित किया. इससे राष्ट्रवादी राजनीति का संबंध सामान्य जनजीवन से स्थापित हुआ. राष्ट्रवाद अब केवल वैचारिक अवधारणा न रहकर सामाजिक अनुभव का हिस्सा बनने लगा .
होमरूल आंदोलन के प्रति सरकार का दृष्टिकोण एवं दमनात्मक नीति
ब्रिटिश सरकार ने प्रारंभ में होमरूल आंदोलन को सीमित राजनीतिक गतिविधि मानकर अधिक गंभीरता से नहीं लिया. किंतु जैसे-जैसे आंदोलन की लोकप्रियता बढ़ने लगी तथा विभिन्न प्रांतों में इसकी शाखाएँ सक्रिय होने लगीं, सरकार को यह अनुभव होने लगा कि यह आंदोलन भारतीय राजनीति को पुनर्जीवित कर सकता है. फलतः सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए दमनात्मक उपायों का सहारा लिया.
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार पहले से ही सुरक्षा संबंधी आशंकाओं से ग्रस्त थी. क्रांतिकारी गतिविधियों तथा गदर आंदोलन के कारण प्रशासन किसी भी प्रकार की राजनीतिक सक्रियता को संभावित खतरे के रूप में देख रहा था. इसी संदर्भ में 1915 का ‘डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट’ लागू किया गया, जिसके अंतर्गत सरकार को प्रेस पर नियंत्रण, गिरफ्तारियाँ तथा राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के व्यापक अधिकार प्राप्त हो गए.
सरकार ने सबसे पहले राष्ट्रवादी प्रेस को लक्ष्य बनाया. होमरूल समर्थक समाचार-पत्रों पर जुर्माने लगाए गए तथा उनकी सामग्री की कठोर सेंसरशिप की गई. राष्ट्रवादी लेखकों एवं पत्रकारों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाने लगी. इसके अतिरिक्त अनेक स्थानों पर राजनीतिक सभाओं एवं जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
मद्रास सरकार ने विद्यार्थियों की राजनीतिक भागीदारी को रोकने के लिए विशेष कठोरता अपनाई. शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों को राजनीतिक सभाओं में भाग लेने से रोका गया तथा अनेक स्थानों पर प्रशासनिक दबाव डाला गया कि शिक्षक एवं विद्यार्थी राष्ट्रवादी गतिविधियों से दूर रहें. सरकार को भय था कि यदि शिक्षित युवा वर्ग आंदोलन से व्यापक रूप से जुड़ गया, तो राजनीतिक असंतोष और अधिक तीव्र हो जाएगा.
बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध भी प्रशासनिक कार्यवाहियाँ की गईं. उनके सार्वजनिक भाषणों एवं राजनीतिक यात्राओं पर निगरानी रखी गई तथा पंजाब एवं दिल्ली में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया. ब्रिटिश प्रशासन तिलक को अत्यंत प्रभावशाली जननेता मानता था और उसे आशंका थी कि उनकी लोकप्रियता आंदोलन को अधिक उग्र दिशा दे सकती है.
सरकारी दमन की पराकाष्ठा जून 1917 में दिखाई दी, जब ऐनी बेसेंट, बी.पी. वाडिया तथा जॉर्ज अरुंडेल को नजरबंद कर दिया गया. सरकार का उद्देश्य आंदोलन के नेतृत्व को निष्क्रिय बनाना था, किंतु इसका परिणाम इसके विपरीत हुआ. ऐनी बेसेंट की गिरफ्तारी के विरुद्ध देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए. अनेक उदारवादी नेता, जो अब तक आंदोलन से दूरी बनाए हुए थे, सरकारी दमन से क्षुब्ध होकर होमरूल आंदोलन के समर्थन में सामने आए.
सर सुब्रह्मण्यम अय्यर ने विरोधस्वरूप अपनी ‘सर’ की उपाधि त्याग दी. विभिन्न नगरों में विरोध सभाएँ आयोजित की गईं तथा प्रेस ने भी सरकार की आलोचना की. तिलक ने घोषणा की कि यदि ऐनी बेसेंट को रिहा नहीं किया गया तो राष्ट्रव्यापी अहिंसात्मक प्रतिरोध प्रारंभ किया जाएगा. इस प्रकार सरकारी दमन ने आंदोलन को दबाने के स्थान पर उसे अधिक लोकप्रिय बना दिया .
अंततः ब्रिटिश सरकार को अपनी नीति में आंशिक परिवर्तन करना पड़ा. 20 अगस्त 1917 को भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने घोषणा की कि ब्रिटिश नीति का उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है. यद्यपि यह घोषणा अस्पष्ट एवं सीमित थी, तथापि इसे राष्ट्रवादी आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया. इसके पश्चात सितंबर 1917 में ऐनी बेसेंट को रिहा कर दिया गया .
होमरूल आंदोलन की उपलब्धियाँ
होमरूल आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धियों वाला आंदोलन था. यद्यपि यह आंदोलन अपने घोषित लक्ष्य—पूर्ण स्वशासन—को प्राप्त नहीं कर सका, तथापि इसने भारतीय राजनीति की दिशा एवं स्वरूप को गहरे स्तर पर प्रभावित किया. इतिहासकारों के अनुसार यह आंदोलन गांधी युग के पूर्व राष्ट्रवादी राजनीति के पुनर्जागरण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण था.
इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का पुनर्जीवन था. सूरत विभाजन के पश्चात कांग्रेस की राजनीतिक सक्रियता में उल्लेखनीय कमी आ गई थी. होमरूल आंदोलन ने इस निष्क्रियता को समाप्त कर राष्ट्रवादी राजनीति को पुनः गतिशील बनाया. इससे जनता में राजनीतिक चेतना तथा स्वशासन की आकांक्षा का विस्तार हुआ.
आंदोलन ने नरमपंथियों तथा गरमपंथियों के मध्य पुनर्मिलन का मार्ग भी प्रशस्त किया. तिलक एवं ऐनी बेसेंट के प्रयासों के परिणामस्वरूप कांग्रेस के भीतर वैचारिक समन्वय स्थापित हुआ. 1916 का लखनऊ अधिवेशन इसी प्रक्रिया का परिणाम था. यह पुनर्मिलन राष्ट्रीय आंदोलन की एकता के लिए अत्यंत आवश्यक था.
इसके अतिरिक्त होमरूल आंदोलन ने भारतीय राजनीति को अधिक जनोन्मुख बनाया. पूर्ववर्ती राष्ट्रवादी राजनीति मुख्यतः शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित थी, जबकि होमरूल आंदोलन ने विद्यार्थियों, नवशिक्षित मध्यमवर्ग तथा स्थानीय संगठनों को सक्रिय रूप से राजनीति से जोड़ा. फलस्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार विस्तृत हुआ.
आंदोलन ने राजनीतिक शिक्षा को भी राष्ट्रीय संघर्ष का महत्वपूर्ण अंग बनाया. पुस्तकालयों, वाचनालयों, अध्ययन-मंडलों तथा राजनीतिक सभाओं के माध्यम से जनता को स्वशासन, प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक अधिकारों के विषय में शिक्षित किया गया. इससे भारतीय राजनीति में वैचारिक परिपक्वता का विकास हुआ.
होमरूल आंदोलन की एक दीर्घकालिक उपलब्धि यह थी कि इसने गांधीवादी जनांदोलनों के लिए आधारभूमि तैयार की. आंदोलन के दौरान विकसित संगठनात्मक नेटवर्क, राजनीतिक प्रशिक्षण तथा जनसंपर्क की पद्धतियाँ आगे चलकर असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आंदोलनों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुईं. जवाहरलाल नेहरू सहित अनेक युवा नेता इसी काल में सक्रिय राजनीति से जुड़े.
इसके अतिरिक्त मॉन्टेग्यू घोषणा (1917) तथा बाद के मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों पर भी होमरूल आंदोलन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. ब्रिटिश सरकार यह समझ चुकी थी कि भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं की उपेक्षा लंबे समय तक संभव नहीं है. यद्यपि सुधार सीमित थे, तथापि उन्होंने उत्तरदायी शासन की अवधारणा को औपचारिक मान्यता प्रदान की.
होमरूल आंदोलन की सीमाएँ व पतन के कारण
यद्यपि होमरूल आंदोलन अत्यंत प्रभावशाली था, तथापि इसकी कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ भी थीं. सबसे पहले, आंदोलन का सामाजिक आधार अपेक्षाकृत सीमित था. इसका प्रभाव मुख्यतः शिक्षित मध्यमवर्ग, विद्यार्थियों तथा शहरी वर्गों तक केंद्रित रहा. किसानों, मजदूरों तथा ग्रामीण जनता की व्यापक भागीदारी इसमें दिखाई नहीं देती.
इसके अतिरिक्त आंदोलन अत्यधिक रूप से नेतृत्व-निर्भर था. तिलक तथा ऐनी बेसेंट इसकी प्रमुख प्रेरक शक्तियाँ थे. सितंबर 1918 में तिलक के इंग्लैंड जाने तथा ऐनी बेसेंट के वैचारिक विचलन के पश्चात आंदोलन का नेतृत्व कमजोर पड़ गया. संगठनात्मक स्तर पर ऐसा कोई वैकल्पिक नेतृत्व विकसित नहीं हो सका जो आंदोलन को निरंतर गति प्रदान कर पाता.
मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा ने भी राष्ट्रवादी नेतृत्व को विभाजित कर दिया. कुछ उदारवादी नेता इन सुधारों से संतुष्ट हो गए, जबकि उग्र राष्ट्रवादी उन्हें अपर्याप्त मानते थे. फलतः आंदोलन की एकता कमजोर पड़ने लगी.
1917–18 के दौरान उत्पन्न सांप्रदायिक तनावों ने भी आंदोलन को प्रभावित किया. अनेक मुसलमान तथा दक्षिण भारत के गैर-ब्राह्मण समुदाय आंदोलन से दूरी बनाए हुए थे. उन्हें आशंका थी कि स्वशासन का अर्थ उच्चवर्णीय हिंदू प्रभुत्व की स्थापना हो सकता है. इस प्रकार आंदोलन पूर्णतः समावेशी स्वरूप ग्रहण नहीं कर सका.
इसके अतिरिक्त 1919 के पश्चात भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का उदय होने लगा. गांधी ने सत्याग्रह, असहयोग तथा जन-आधारित संघर्ष की नई रणनीति प्रस्तुत की, जिसने होमरूल आंदोलन की सीमित संवैधानिक राजनीति को पीछे छोड़ दिया. फलतः होमरूल आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से हट गया.
संक्षेप में, यद्यपि होमरूल आंदोलन अपनी सीमाओं के कारण दीर्घकालिक जनांदोलन के रूप में विकसित नहीं हो सका, तथापि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में उसका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था. इस आंदोलन ने राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित किया, स्वशासन की मांग को वैध राजनीतिक लक्ष्य बनाया तथा भारतीय राजनीति को गांधी युग के लिए तैयार किया. इसी कारण इतिहासकार इसे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन आंदोलन मानते हैं.
कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन (1916)
1916 का लखनऊ अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना के रूप में स्मरण किया जाता है. यह अधिवेशन केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति के पुनर्गठन, वैचारिक समन्वय तथा संगठनात्मक पुनर्जीवन का ऐतिहासिक मंच भी था. इस अधिवेशन में एक ओर कांग्रेस के नरमपंथी और गरमपंथी गुटों के मध्य लगभग एक दशक पुराना विभाजन समाप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के मध्य ऐतिहासिक समझौता भी संपन्न हुआ. फलतः लखनऊ अधिवेशन भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक संघर्ष तथा सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व—तीनों प्रवृत्तियों के समागम का केंद्र बन गया.
लखनऊ अधिवेशन दिसंबर 1916 में आयोजित हुआ तथा इसकी अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की. मजूमदार उस समय कांग्रेस के प्रमुख उदारवादी नेताओं में गिने जाते थे. अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक सहयोग तथा स्वशासन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत की राजनीतिक उन्नति तभी संभव है जब विभिन्न राजनीतिक धाराएँ अपने मतभेदों को समाप्त कर संयुक्त रूप से उपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष करें.
नरमपंथियों और गरमपंथियों का पुनर्मिलन
लखनऊ अधिवेशन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में कांग्रेस के दोनों प्रमुख गुटों—नरमपंथियों एवं गरमपंथियों—का पुनर्मिलन था. 1907 के सूरत अधिवेशन में उत्पन्न विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन को गंभीर क्षति पहुँचाई थी. उदारवादी नेतृत्व संवैधानिक सुधारों, प्रार्थना-पत्रों तथा क्रमिक राजनीतिक प्रगति में विश्वास रखता था, जबकि गरमपंथी नेता प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष, स्वदेशी, बहिष्कार तथा जनसक्रियता को अधिक प्रभावी मानते थे. परिणामस्वरूप कांग्रेस संगठन वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन गया था.
किन्तु 1916 तक परिस्थितियाँ पर्याप्त रूप से परिवर्तित हो चुकी थीं. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने दोनों गुटों को यह अनुभव करा दिया कि राष्ट्रीय एकता के अभाव में भारतीय राजनीतिक मांगों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. इसके अतिरिक्त कांग्रेस की निष्क्रियता से राष्ट्रवादी राजनीति कमजोर हो रही थी. फलतः दोनों पक्षों में समझौते की भावना विकसित होने लगी.
बाल गंगाधर तिलक ने इस पुनर्मिलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कारावास से लौटने के पश्चात उन्होंने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण में व्यावहारिकता का परिचय दिया. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को हिंसात्मक माध्यमों से समाप्त करना नहीं, बल्कि भारतीयों के लिए उत्तरदायी शासन की स्थापना करना है. तिलक ने नरमपंथियों की संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हुए संवैधानिक संघर्ष की आवश्यकता को स्वीकार किया.
दूसरी ओर ऐनी बेसेंट ने भी कांग्रेस के भीतर वैचारिक समन्वय स्थापित करने का सतत प्रयास किया. उनका मत था कि होमरूल आंदोलन की सफलता तभी संभव है जब कांग्रेस पुनः एकजुट होकर कार्य करे. उन्होंने नरमपंथी तथा गरमपंथी नेताओं के मध्य संवाद स्थापित करने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई.
इसके अतिरिक्त कुछ परिस्थितिजन्य कारणों ने भी पुनर्मिलन को संभव बनाया. गोपाल कृष्ण गोखले तथा फिरोजशाह मेहता जैसे प्रभावशाली उदारवादी नेताओं की मृत्यु हो चुकी थी. ये दोनों नेता गरमपंथियों के प्रति अत्यंत कठोर दृष्टिकोण रखते थे तथा किसी प्रकार के समझौते के पक्षधर नहीं थे. उनके निधन के पश्चात कांग्रेस में वैचारिक लचीलापन बढ़ा.
लखनऊ अधिवेशन में गरमपंथियों को पुनः कांग्रेस में औपचारिक रूप से सम्मिलित कर लिया गया. यह घटना केवल संगठनात्मक पुनर्मिलन नहीं थी, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की नयी दिशा का संकेत भी थी. इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय राष्ट्रवाद अब वैचारिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर व्यापक राजनीतिक एकता की ओर अग्रसर हो रहा है.
कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग का लखनऊ समझौता
लखनऊ अधिवेशन की दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि कांग्रेस तथा अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के मध्य हुआ समझौता था, जिसे इतिहास में “लखनऊ समझौता” के नाम से जाना जाता है. यह भारतीय राजनीति में हिंदू–मुस्लिम राजनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण था. यद्यपि दीर्घकालिक दृष्टि से इसके कुछ प्रावधान विवादास्पद सिद्ध हुए, तथापि तत्कालीन परिस्थितियों में इसे राष्ट्रीय एकता की महान उपलब्धि माना गया.
1906 में स्थापित मुस्लिम लीग प्रारंभिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार के प्रति अपेक्षाकृत सहयोगात्मक दृष्टिकोण रखती थी. उसका प्रमुख उद्देश्य मुस्लिम अभिजात वर्ग के राजनीतिक हितों की रक्षा करना था. किंतु धीरे-धीरे लीग के भीतर एक नई राष्ट्रवादी धारा विकसित होने लगी. विशेषतः युवा मुस्लिम नेताओं ने यह अनुभव किया कि ब्रिटिश शासन की नीतियाँ केवल भारतीयों को विभाजित कर अपने शासन को सुदृढ़ करना चाहती हैं.
1912–13 के बाल्कन युद्धों ने भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया. उस समय तुर्की के सुल्तान को विश्व मुस्लिम समुदाय का खलीफा माना जाता था. बाल्कन युद्धों में ब्रिटेन द्वारा तुर्की का समर्थन न किए जाने से भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति असंतोष उत्पन्न हुआ. इसके अतिरिक्त प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की के विरुद्ध ब्रिटिश नीतियों ने भी मुस्लिम जनमत को प्रभावित किया.
दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक नीतियों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों एवं राष्ट्रवादी नेताओं को भी प्रभावित किया. मौलाना अबुल कलाम आजाद के ‘अल-हिलाल’ तथा मोहम्मद अली के ‘कॉमरेड’ जैसे राष्ट्रवादी पत्रों पर प्रतिबंध लगाए गए. अली बंधुओं, हसरत मोहानी तथा अन्य राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं को नजरबंद किया गया. फलस्वरूप मुस्लिम राजनीति का एक महत्वपूर्ण वर्ग साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवाद की ओर उन्मुख होने लगा.
1913 में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन कर “भारत के लिए स्वशासन” को अपने लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया. यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे कांग्रेस और लीग के मध्य वैचारिक दूरी कम होने लगी. लीग अब केवल मुस्लिम हितों की सुरक्षा तक सीमित संगठन नहीं रही, बल्कि उसने भारतीय राजनीतिक सुधारों के प्रश्न पर व्यापक दृष्टिकोण अपनाना प्रारंभ किया.
इस प्रक्रिया में मोहम्मद अली जिन्ना की भूमिका विशेष उल्लेखनीय थी. जिन्ना उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के सदस्य थे तथा उन्हें “हिंदू–मुस्लिम एकता का राजदूत” कहा जाता था. वे संवैधानिक राजनीति, राजनीतिक सहयोग तथा संयुक्त राष्ट्रीय संघर्ष के समर्थक थे. जिन्ना ने दोनों संगठनों के मध्य संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
लखनऊ समझौते के प्रमुख प्रावधान
लखनऊ समझौते के अंतर्गत कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने संयुक्त रूप से संवैधानिक सुधारों की मांग प्रस्तुत की. इन मांगों का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में प्रगति सुनिश्चित करना था. दोनों संगठनों ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जो उस समय की भारतीय राजनीति में अभूतपूर्व घटना थी.
समझौते का सबसे महत्वपूर्ण एवं विवादास्पद प्रावधान मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को कांग्रेस द्वारा स्वीकार किया जाना था. पृथक निर्वाचन का अर्थ यह था कि मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही निर्वाचित करेंगे. कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता बनाए रखने तथा मुस्लिम लीग का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से इस व्यवस्था को स्वीकार किया.
इसके अतिरिक्त प्रांतीय विधान परिषदों में मुसलमानों के लिए निश्चित प्रतिनिधित्व निर्धारित किया गया. पंजाब में 50 प्रतिशत, बंगाल में 40 प्रतिशत, बंबई (सिंध सहित) में 33 प्रतिशत, संयुक्त प्रांत में 30 प्रतिशत, बिहार में 25 प्रतिशत, मध्य प्रांत में 15 प्रतिशत तथा मद्रास में 15 प्रतिशत सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित की गईं. यह व्यवस्था “वेटेज प्रणाली” (Weightage System) के रूप में जानी गई, जिसके अंतर्गत कुछ प्रांतों में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया.
केंद्रीय विधान परिषद में भी मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व की व्यवस्था स्वीकार की गई. इसके अतिरिक्त यह प्रस्ताव रखा गया कि विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हो तथा उन्हें बजट, प्रशासन एवं विधायी मामलों पर अधिक अधिकार प्रदान किए जाएँ.
समझौते का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान “सांप्रदायिक वीटो” से संबंधित था. इसके अनुसार यदि किसी समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य किसी प्रस्ताव को अपने समुदाय के हितों के विरुद्ध मानते हुए उसका विरोध करें, तो उस प्रस्ताव को पारित नहीं किया जाएगा. इस व्यवस्था का उद्देश्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था.
इसके अतिरिक्त कांग्रेस और लीग ने संयुक्त रूप से यह मांग की कि भारत सचिव की परिषद में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए तथा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में आधे से अधिक सदस्य भारतीय हों. प्रांतीय स्वायत्तता तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में भी व्यापक सुधारों की मांग की गई.
लखनऊ समझौते का राजनीतिक महत्व
लखनऊ समझौता तत्कालीन भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया. इससे यह संदेश गया कि भारत के प्रमुख राजनीतिक संगठन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संयुक्त संवैधानिक संघर्ष करने के लिए तैयार हैं. हिंदू–मुस्लिम सहयोग की यह भावना राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध हुई.
समझौते ने कांग्रेस को अधिक व्यापक राजनीतिक आधार प्रदान किया. मुस्लिम लीग के सहयोग से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व अधिक सर्वसमावेशी प्रतीत होने लगा. दूसरी ओर मुस्लिम लीग को भी अखिल भारतीय राजनीति में अधिक वैधता प्राप्त हुई.
ब्रिटिश सरकार ने भी इस एकता को गंभीरता से लिया. इतिहासकारों के अनुसार 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा पर लखनऊ समझौते तथा होमरूल आंदोलन दोनों का महत्वपूर्ण प्रभाव था. ब्रिटिश शासन यह समझ चुका था कि भारतीय राजनीतिक मांगों की पूर्ण उपेक्षा अब संभव नहीं है.
फिर भी इस समझौते के भीतर भविष्य के सांप्रदायिक तनावों के बीज निहित थे. पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को औपचारिक वैधता प्राप्त हुई. बाद के वर्षों में यही व्यवस्था हिंदू–मुस्लिम राजनीतिक विभाजन का आधार बनी. इस दृष्टि से अनेक इतिहासकार लखनऊ समझौते को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की “आंशिक सफलता तथा दीर्घकालिक राजनीतिक भूल”—दोनों रूपों में देखते हैं.
लखनऊ समझौते का आलोचनात्मक मूल्यांकन
1916 का लखनऊ समझौता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जिनका मूल्यांकन केवल तत्कालीन राजनीतिक संदर्भों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर ही उसकी ऐतिहासिक सार्थकता को समझा जा सकता है. यह समझौता एक ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य अभूतपूर्व राजनीतिक सहयोग का प्रतीक था, वहीं दूसरी ओर इसने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा को स्थायी वैधता भी प्रदान की. फलतः इतिहासकारों के मध्य इसके संबंध में गहन मतभेद दिखाई देते हैं. कुछ इतिहासकार इसे राष्ट्रीय आंदोलन की महान उपलब्धि मानते हैं, जबकि अन्य इसे भविष्य के सांप्रदायिक विभाजन की आधारभूमि के रूप में देखते हैं.
लखनऊ समझौते का तत्कालीन राजनीतिक महत्व अत्यंत व्यापक था. 1907 के सूरत विभाजन के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन संगठनात्मक विखंडन तथा वैचारिक अस्थिरता से ग्रस्त था. कांग्रेस के भीतर नरमपंथियों और गरमपंथियों के संघर्ष ने राष्ट्रीय राजनीति को कमजोर कर दिया था. इसके अतिरिक्त कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य भी पर्याप्त दूरी विद्यमान थी. ऐसी परिस्थितियों में 1916 का समझौता भारतीय राजनीति में सहयोग, समन्वय तथा संयुक्त संघर्ष की नई संभावनाओं का प्रतीक बनकर उभरा.
समझौते का एक महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष यह था कि इसने हिंदू–मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को औपचारिक स्वरूप प्रदान किया. पहली बार भारत के दो प्रमुख राजनीतिक संगठन ब्रिटिश सरकार के समक्ष संयुक्त संवैधानिक मांगें प्रस्तुत कर रहे थे. इससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक वैधता प्राप्त हुई तथा ब्रिटिश शासन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा. राष्ट्रवादी नेताओं का यह विश्वास था कि यदि भारत के प्रमुख धार्मिक समुदाय राजनीतिक स्तर पर एकजुट हो जाएँ, तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की “फूट डालो और शासन करो” की नीति को प्रभावी रूप से चुनौती दी जा सकती है.
इसके अतिरिक्त समझौते ने मुस्लिम लीग को अखिल भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति की मुख्यधारा के निकट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1906 में स्थापना के पश्चात लीग को प्रायः मुस्लिम अभिजात वर्ग के सीमित राजनीतिक संगठन के रूप में देखा जाता था. किंतु लखनऊ समझौते के माध्यम से वह भारतीय संवैधानिक सुधारों तथा स्वशासन की व्यापक बहस का अंग बन गई. इससे मुस्लिम राजनीति के भीतर राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को भी प्रोत्साहन मिला.
लखनऊ समझौते ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन को प्रतिबिंबित किया. कांग्रेस नेतृत्व ने यह स्वीकार किया कि भारतीय समाज की विविधता तथा धार्मिक संवेदनशीलताओं की उपेक्षा कर राष्ट्रीय एकता स्थापित नहीं की जा सकती. फलतः उसने मुसलमानों की पृथक राजनीतिक आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए समझौते की नीति अपनाई. इस दृष्टि से यह समझौता भारतीय राष्ट्रवाद की समावेशी प्रवृत्ति का उदाहरण भी माना जा सकता है.
इसके अतिरिक्त समझौते का एक व्यावहारिक राजनीतिक प्रभाव यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों की राजनीतिक मांगों को पूर्णतः अनदेखा नहीं कर सकी. 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा, जिसमें भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन की स्थापना का आश्वासन दिया गया था, पर लखनऊ समझौते तथा होमरूल आंदोलन दोनों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. ब्रिटिश प्रशासन यह समझ चुका था कि भारतीय राजनीतिक वर्ग अब अधिक संगठित एवं सक्रिय हो चुका है.
किन्तु इन सकारात्मक उपलब्धियों के साथ-साथ लखनऊ समझौते की कुछ गंभीर सीमाएँ एवं दीर्घकालिक नकारात्मक परिणाम भी थे. समझौते की सबसे अधिक आलोचना कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार किए जाने के कारण की जाती है. पृथक निर्वाचन प्रणाली मूलतः ब्रिटिश शासन की सांप्रदायिक नीति का परिणाम थी, जिसे 1909 के मार्ले–मिंटो सुधारों के माध्यम से लागू किया गया था. कांग्रेस ने प्रारंभिक वर्षों में इस व्यवस्था का विरोध किया था, क्योंकि यह राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध मानी जाती थी. किंतु लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने राजनीतिक सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से इसे स्वीकार कर लिया.
इतिहासकारों का मत है कि यही वह बिंदु था जहाँ भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को राष्ट्रीय स्तर पर वैधता प्राप्त हुई. पृथक निर्वाचन प्रणाली ने भारतीयों को नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक समुदायों के सदस्यों के रूप में परिभाषित करना प्रारंभ किया. फलतः राजनीति का आधार राष्ट्रीय हितों के स्थान पर सांप्रदायिक हित बनने लगा.
वेटेज प्रणाली (Weightage System) भी विवाद का विषय बनी. कुछ प्रांतों में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया. उदाहरणार्थ पंजाब और बंगाल में मुसलमानों को अत्यधिक प्रतिनिधित्व मिला, जबकि संयुक्त प्रांत जैसे क्षेत्रों में अल्पसंख्यक होने के बावजूद उन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया गया. कांग्रेस नेतृत्व का उद्देश्य मुस्लिम समुदाय की आशंकाओं को दूर करना था, किंतु इससे प्रतिनिधित्व के लोकतांत्रिक सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न भी उत्पन्न हुए.
इसके अतिरिक्त समझौते की आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि यह राजनीतिक नेतृत्व के स्तर तक सीमित रहा. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं ने परस्पर सहयोग की व्यवस्था तो स्थापित कर ली, किंतु व्यापक सामाजिक स्तर पर हिंदू–मुस्लिम एकता को सुदृढ़ करने के पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए. ग्रामीण समाज, धार्मिक संगठनों तथा स्थानीय समुदायों के मध्य सांप्रदायिक तनावों को दूर करने हेतु कोई संगठित सामाजिक कार्यक्रम विकसित नहीं किया गया. फलतः राजनीतिक समझौता सामाजिक एकता में पूर्णतः परिवर्तित नहीं हो सका.
कई इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व ने तत्कालीन राजनीतिक लाभ के लिए दीर्घकालिक परिणामों की उपेक्षा की. पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार कर कांग्रेस ने अनजाने में उस राजनीतिक प्रवृत्ति को वैधता प्रदान कर दी, जो आगे चलकर द्विराष्ट्र सिद्धांत की पृष्ठभूमि बनी. यद्यपि 1916 में किसी भी प्रमुख नेता ने भारत के विभाजन की कल्पना नहीं की थी, तथापि सांप्रदायिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की स्वीकृति ने भविष्य के विभाजनकारी राजनीतिक विमर्श को आधार अवश्य प्रदान किया.
इतिहासलेखन की दृष्टि से भी लखनऊ समझौते का मूल्यांकन अत्यंत रोचक है. बिपिन चंद्र जैसे इतिहासकार इसे तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय आंदोलन की व्यावहारिक आवश्यकता मानते हैं. उनके अनुसार कांग्रेस के पास मुस्लिम लीग को साथ लाने के लिए कुछ रियायतें देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था. इसके विपरीत आर.सी. मजूमदार जैसे इतिहासकार इसे कांग्रेस की गंभीर राजनीतिक भूल मानते हैं, जिसने सांप्रदायिक राजनीति को वैधता प्रदान की.
सुमित सरकार का मत अपेक्षाकृत संतुलित है. उनके अनुसार लखनऊ समझौते को केवल “गलती” अथवा “उपलब्धि” के रूप में नहीं देखा जा सकता. यह समझौता उस ऐतिहासिक परिस्थिति का परिणाम था, जिसमें भारतीय राष्ट्रवाद एक ओर व्यापक राजनीतिक एकता स्थापित करना चाहता था, जबकि दूसरी ओर भारतीय समाज की सांप्रदायिक जटिलताओं से भी जूझ रहा था.
निष्कर्ष (Conclusion)
होमरूल आंदोलन तथा लखनऊ समझौता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन घटनाएँ थीं. इन दोनों ने मिलकर भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा, नई ऊर्जा तथा व्यापक राजनीतिक आधार प्रदान किया. होमरूल आंदोलन ने भारतीय राजनीति को पुनर्जीवित किया, स्वशासन की मांग को जनचेतना का विषय बनाया तथा राष्ट्रवादी आंदोलन को अधिक संगठित एवं जनोन्मुख स्वरूप प्रदान किया. इसके अतिरिक्त इस आंदोलन ने गांधीवादी युग की आधारभूमि तैयार की, क्योंकि राजनीतिक शिक्षा, जनसंपर्क, संगठनात्मक विस्तार तथा अहिंसात्मक प्रतिरोध जैसी प्रवृत्तियाँ आगे चलकर गांधी के नेतृत्व में व्यापक जनांदोलनों का अंग बनीं.
दूसरी ओर 1916 का लखनऊ अधिवेशन भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय एकता की चरम अभिव्यक्ति था. नरमपंथियों और गरमपंथियों का पुनर्मिलन तथा कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग का सहयोग इस तथ्य का प्रमाण था कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष की आवश्यकता को समझ चुका था. यह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की संगठनात्मक परिपक्वता का प्रतीक था.
तथापि लखनऊ समझौते की ऐतिहासिक विरासत जटिल एवं अंतर्विरोधपूर्ण रही. एक ओर इसने हिंदू–मुस्लिम सहयोग को प्रोत्साहित किया, वहीं दूसरी ओर पृथक निर्वाचन प्रणाली को वैधता प्रदान कर सांप्रदायिक राजनीति की संस्थागत नींव भी मजबूत की. इस प्रकार यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की उपलब्धियों तथा उसकी सीमाओं—दोनों का प्रतिनिधित्व करता है.
संक्षेप में कहा जा सकता है कि होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के विकासक्रम में ऐसे ऐतिहासिक पड़ाव थे, जिन्होंने राष्ट्रवादी राजनीति को पुनर्परिभाषित किया. इन घटनाओं ने भारतीयों में राजनीतिक आत्मविश्वास, संगठनात्मक क्षमता तथा स्वशासन की आकांक्षा को सुदृढ़ किया. यद्यपि इनके भीतर कुछ अंतर्विरोध निहित थे, फिर भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनाधार तथा वैचारिक गहराई प्रदान करने में इनकी भूमिका निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक एवं निर्णायक थी.




