निर्धनता (गरीबी): अर्थ, प्रकार, कारण, प्रभाव एवं निवारण

निर्धनता केवल कम आय या खाली जेब का नाम नहीं है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं, क्षमताओं और सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी संसाधनों से वंचित रह जाता है. भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा—इनमें से किसी एक की कमी भी जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है.

भारत में आर्थिक विकास के साथ निर्धनता में उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. अब चुनौती केवल गरीबों की संख्या घटाने की नहीं, बल्कि उन्हें स्थायी आय, बेहतर अवसर और गुणवत्तापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने की है.

इस लेख में हम जानेंगे

निर्धनता क्या है?

सरल शब्दों में, निर्धनता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति या परिवार अपनी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की पर्याप्त पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता. पुराने दृष्टिकोण में निर्धनता का संबंध मुख्यतः आय और उपभोग से जोड़ा जाता था. आधुनिक अर्थशास्त्र इसे अधिक व्यापक रूप में देखता है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, स्वच्छता, बिजली और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं.

निर्धनता का सामाजिक अर्थ

निर्धनता व्यक्ति की वर्तमान स्थिति के साथ उसके भविष्य को भी प्रभावित करती है. गरीब परिवारों में बच्चों की शिक्षा छूट सकती है, स्वास्थ्य पर खर्च करना कठिन हो सकता है और रोजगार के अवसर सीमित रह सकते हैं. इस प्रकार निर्धनता सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले अभाव का रूप ले सकती है.

निर्धनता के प्रमुख आयाम

निर्धनता को मुख्यतः तीन दृष्टियों से समझा जा सकता है—

  • आय आधारित निर्धनता – आय या उपभोग का न्यून स्तर.
  • बहुआयामी निर्धनता – स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर में एक साथ अभाव.
  • आजीविका आधारित निर्धनता – स्थिर और पर्याप्त रोजगार तथा आय के साधनों का अभाव.

इसलिए किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति समझने के लिए केवल उसकी आय देखना पर्याप्त नहीं है.

निर्धनता : दो दार्शनिक दृष्टिकोण
अरस्तू ने कहा, “गरीबी क्रांति और अपराध की जननी है.” जब मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, रोजगार और अवसर सीमित होते हैं तब असंतोष, अपराध और व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों की संभावना बढ़ सकती है.

प्लेटो का कथन है, “गरीबी धन की कमी से नहीं, बल्कि इच्छाओं के बढ़ने से पैदा होती है.” वे निर्धनता के मनोवैज्ञानिक और नैतिक पक्ष को सामने रखते हैं. अनियंत्रित इच्छाएँ व्यक्ति को संसाधनों के बावजूद अभावग्रस्त महसूस करा सकती हैं.

दोनों कथन पूर्णतः विरोधाभासी नहीं हैं. अरस्तू वास्तविक या संरचनात्मक गरीबी के परिणाम बताते हैं, जबकि प्लेटो सापेक्ष या अनुभूत गरीबी की ओर संकेत करते हैं. आधुनिक दृष्टि से निर्धनता केवल आय की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, रोजगार और अवसरों की कमी भी है. अतः निर्धनता को समझने के लिए आर्थिक परिस्थितियों के साथ मानवीय इच्छाओं, सामाजिक परिस्थितियों और अवसरों को समान रूप से समझना और आवश्यक है.

निर्धनता के प्रकार

निर्धनता को समझने के लिए निरपेक्ष और सापेक्ष निर्धनता का पारंपरिक वर्गीकरण उपयोगी है. इसके साथ आज बहुआयामी निर्धनता भी महत्वपूर्ण हो गई है.

1. निरपेक्ष निर्धनता (Absolute Poverty)

निरपेक्ष निर्धनता उस स्थिति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति न्यूनतम जीवन-आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधनों से नीचे रहता है. इसमें एक निर्धारित मानक के आधार पर यह देखा जाता है कि व्यक्ति या परिवार न्यूनतम आवश्यक उपभोग कर पा रहा है या नहीं. इसी विचार से निर्धनता रेखा की अवधारणा विकसित हुई.

निरपेक्ष निर्धनता का पारंपरिक मापन

भारत में समय-समय पर निर्धनता मापने के लिए अलग-अलग समितियों ने पद्धतियां सुझाईं.

(क) कैलोरी अन्तर्ग्रहण विधि

पुरानी पद्धतियों में निर्धनता को न्यूनतम कैलोरी आवश्यकता से जोड़ा गया था. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2,400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2,100 कैलोरी प्रतिदिन जैसे मानक लंबे समय तक चर्चा में रहे. बाद में इस पद्धति की आलोचना हुई. केवल कैलोरी को आधार मानने से स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और अन्य आवश्यकताओं की वास्तविक लागत पूरी तरह सामने नहीं आती थी.

(ख) लकड़ावाला समिति

लकड़ावाला समिति की पद्धति ने निर्धनता रेखा को उपभोग और मूल्य स्तर से जोड़ने का प्रयास किया. राज्यों में कीमतों के अंतर को भी ध्यान में रखा गया. हालांकि, समय के साथ उपभोग के स्वरूप में बदलाव आया. शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य गैर-खाद्य खर्चों का महत्व बढ़ा. इसलिए पुरानी पद्धति पर्याप्त नहीं मानी गई.

(ग) सुरेश तेंदुलकर समिति

तेंदुलकर समिति ने निर्धनता के आकलन में महत्वपूर्ण बदलाव किया. इसमें केवल कैलोरी को अलग से आधार बनाने के बजाय उपभोग व्यय की व्यापक टोकरी को महत्व दिया गया. 2011-12 के लिए तेंदुलकर पद्धति के अनुसार अखिल भारतीय निर्धनता रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में ₹816 और शहरी क्षेत्रों में ₹1,000 प्रति व्यक्ति प्रति माह थी. इसी आधार पर भारत की निर्धनता दर 2004-05 के 37.2% से घटकर 2011-12 में 21.9% हुई. यह आंकड़ा ऐतिहासिक तुलना के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे वर्तमान भारत की गरीबी दर नहीं माना जाना चाहिए.

(घ) रंगराजन समिति

सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाले विशेषज्ञ समूह ने निर्धनता रेखा को अधिक व्यापक उपभोग आवश्यकताओं के आधार पर पुनर्विचार किया. 2011-12 के लिए समिति ने ग्रामीण क्षेत्र में ₹972 और शहरी क्षेत्र में ₹1,407 प्रति व्यक्ति प्रति माह का निर्धनता-रेखा व्यय सुझाया. इस पद्धति के अनुसार 2011-12 में भारत की निर्धनता दर 29.5% थी. इससे स्पष्ट होता है कि निर्धनता का आंकड़ा केवल वास्तविक परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मापन की पद्धति से भी प्रभावित होता है.

2. सापेक्ष निर्धनता (Relative Poverty)

सापेक्ष निर्धनता में व्यक्ति की स्थिति को समाज या अर्थव्यवस्था के सामान्य जीवन-स्तर की तुलना में देखा जाता है. यदि किसी व्यक्ति की आय समाज के औसत या मध्य आय स्तर से बहुत नीचे है, तो वह व्यक्ति मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने के बावजूद सामाजिक और आर्थिक अवसरों से वंचित हो सकता है. इसलिए सापेक्ष निर्धनता केवल भूख या आवास की समस्या नहीं है. इसमें अवसर, सामाजिक भागीदारी और जीवन-स्तर का अंतर भी शामिल है.

अंतरराष्ट्रीय मानक

देशों के बीच तुलना के लिए विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखाओं का उपयोग करता है. जून 2025 के संशोधन के बाद अत्यंत निर्धनता के लिए सीमा $3.00 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है. निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए $4.20 और उच्च-मध्यम आय वाले देशों के लिए $8.30 प्रति दिन की तुलनात्मक रेखाएं हैं. ये 2021 PPP पर आधारित हैं. इसलिए पुराने $1.90 आंकड़े को वर्तमान अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा.

बहुआयामी निर्धनता

आधुनिक समय में गरीबी को केवल पैसे से मापना पर्याप्त नहीं माना जाता. एक परिवार की आय कुछ हद तक ठीक हो सकती है, लेकिन यदि उसके बच्चों को शिक्षा नहीं मिल रही, परिवार को स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा या स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो अभाव बना रहता है. भारत का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर की 12 संकेतकों के माध्यम से अभावों को मापता है.

NITI Aayog के अनुसार बहुआयामी निर्धनता 2015-16 के 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हुई. इस अवधि में लगभग 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी निर्धनता से बाहर आए. इससे निर्धनता की एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—गरीबी घटाना केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता सुधारना भी है.

निर्धनता के कारण

निर्धनता किसी एक कारण का परिणाम नहीं है. आर्थिक, सामाजिक, जनसांख्यिकीय, संस्थागत और पर्यावरणीय कारण एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं.

1. आर्थिक कारण

बेरोजगारी और कम मजदूरी निर्धनता के प्रमुख कारण हैं. रोजगार उपलब्ध होने के बावजूद यदि काम अनियमित या कम आय वाला है, तो परिवार गरीबी से बाहर नहीं निकल पाता. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, कम उत्पादकता, छोटे जोत आकार, पूंजी की कमी और बाजार तक सीमित पहुंच भी ग्रामीण निर्धनता को बढ़ा सकते हैं. आर्थिक विकास का लाभ यदि सभी क्षेत्रों और सामाजिक समूहों तक समान रूप से नहीं पहुंचता, तो विकास के साथ असमानता भी बनी रह सकती है.

2. सामाजिक कारण

शिक्षा का अभाव व्यक्ति की रोजगार क्षमता को सीमित करता है. जाति, लिंग और सामाजिक स्थिति से जुड़ा भेदभाव भी अवसरों तक पहुंच को प्रभावित कर सकता है. महिलाओं की कम श्रम भागीदारी और संपत्ति तथा वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुंच परिवार की आर्थिक क्षमता को प्रभावित करती है.

3. जनसांख्यिकीय कारण

बड़े परिवार में उपलब्ध आय कई सदस्यों में विभाजित होती है. यदि रोजगार और उत्पादक अवसर पर्याप्त न हों, तो प्रति व्यक्ति संसाधन कम हो सकते हैं. हालांकि, आज केवल जनसंख्या वृद्धि को गरीबी का कारण मानना उचित नहीं है. जनसंख्या की गुणवत्ता, शिक्षा, कौशल और रोजगार क्षमता अधिक महत्वपूर्ण हैं.

4. राजनीतिक एवं संस्थागत कारण

कमजोर शासन, भ्रष्टाचार, योजनाओं का खराब क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक संसाधनों की सीमित पहुंच निर्धनता उन्मूलन की गति को कम कर सकती है. अच्छी नीति तभी प्रभावी होती है जब उसका लाभ सही व्यक्ति तक समय पर पहुंचे.

5. पर्यावरणीय कारण

बाढ़, सूखा, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाएं गरीब परिवारों पर अधिक प्रभाव डालती हैं क्योंकि उनके पास आर्थिक झटकों से बचने के साधन सीमित होते हैं. जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और गंभीर बना सकता है. कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर परिवार विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं.

6. जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण

भारत में निर्धनता का इतिहास केवल आर्थिक कारणों से नहीं जुड़ा है. जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण ने लंबे समय तक अधिकांश समुदायों की शिक्षा, भूमि, सम्मानजनक रोजगार, संसाधनों और सामाजिक अवसरों तक पहुंच को सीमित किया. इसका प्रभाव केवल तत्काल आय पर नहीं पड़ा, बल्कि मानव पूंजी और संपत्ति निर्माण की क्षमता पर भी पड़ा.

ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर सीमित रहने से गरीबी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बनी रही. आज संवैधानिक अधिकार, आरक्षण, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं ने इस असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, फिर भी सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमान पहुंच कुछ चुनौती बनी हुई है.

इसलिए भारत में बहुआयामी निर्धनता को समझते समय आय के साथ सामाजिक स्थिति, अवसरों और संस्थागत पहुंच को भी ध्यान में रखना आवश्यक है.

निर्धनता के प्रभाव

निर्धनता का प्रभाव केवल व्यक्ति की आय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक स्थिति और जीवन की संभावनाओं को भी प्रभावित करता है. इसका असर परिवार से आगे बढ़कर समाज और अर्थव्यवस्था की उत्पादकता पर भी पड़ता है.

व्यक्तिगत प्रभाव

गरीबी का सीधा असर भोजन, पोषण, स्वास्थ्य और जीवन-स्तर पर पड़ता है. पर्याप्त आय न होने पर परिवार बीमारी के समय कर्ज में फंस सकता है. बच्चों में कुपोषण और शिक्षा से वंचित होने का खतरा भी बढ़ सकता है. इससे भविष्य की आय क्षमता प्रभावित होती है.

सामाजिक प्रभाव

गरीबी बाल श्रम, बाल विवाह, स्कूल छोड़ने और सामाजिक बहिष्करण जैसी समस्याओं से जुड़ सकती है. जब अवसर सीमित होते हैं, तो सामाजिक गतिशीलता भी कम हो जाती है.

आर्थिक प्रभाव

निर्धनता मानव पूंजी के विकास को रोकती है. कम शिक्षा और खराब स्वास्थ्य से उत्पादकता घट सकती है. इससे व्यक्ति की आय कम रहती है और अर्थव्यवस्था को भी अपनी संभावित उत्पादक क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल पाता.

राष्ट्रीय प्रभाव

बड़ी आबादी का लंबे समय तक निर्धन रहना समावेशी विकास के लिए चुनौती है. यह सामाजिक तनाव, क्षेत्रीय असमानता और सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ा सकता है. इसीलिए गरीबी उन्मूलन केवल कल्याणकारी नीति नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की रणनीति भी है.

भारत में निर्धनता

स्वतंत्रता के बाद भारत ने नियोजित विकास, कृषि सुधार, औद्योगीकरण और सामाजिक क्षेत्र में निवेश के माध्यम से निर्धनता कम करने का प्रयास किया. ऐतिहासिक रूप से तेंदुलकर पद्धति के अनुसार भारत की गरीबी दर 1993-94 में 45.3%, 2004-05 में 37.2% और 2011-12 में 21.9% थी. 2011-12 में लगभग 26.93 करोड़ लोग इस निर्धनता रेखा के नीचे थे.

लेकिन इन आंकड़ों को आज की गरीबी स्थिति के रूप में इस्तेमाल करना उचित नहीं है. भारत में बाद के उपभोग सर्वेक्षण और अंतरराष्ट्रीय मापन पद्धतियों ने तस्वीर को काफी बदला है.

विश्व बैंक के अप्रैल 2026 के विश्लेषण के अनुसार, 2023-24 के उपभोग सर्वेक्षण को शामिल करने पर $4.20 प्रतिदिन की 2021 PPP रेखा के आधार पर भारत में गरीबी 2011-12 के लगभग 57.7% से घटकर 2023-24 में 16.1% रह गई. उसी अध्ययन में अत्यंत गरीबी $3.00 प्रतिदिन की रेखा पर 27.1% से घटकर 2.6% आंकी गई. यहां ध्यान रखना चाहिए कि अलग-अलग पद्धतियों के आंकड़ों को सीधे एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता.

ग्रामीण और शहरी निर्धनता

भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता की प्रकृति लंबे समय से अलग रही है. कृषि पर निर्भरता, मौसमी रोजगार और सीमित गैर-कृषि अवसर इसके प्रमुख कारण हैं. दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में गरीबी का संबंध अनौपचारिक रोजगार, अस्थायी आय, महंगे आवास और बुनियादी सेवाओं तक असमान पहुंच से जुड़ सकता है.

विश्व बैंक के 2026 के विश्लेषण में 2023 तक $4.20 की रेखा पर ग्रामीण गरीबी लगभग 19.3% और शहरी गरीबी 8.6% बताई गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की संख्या अभी भी अधिक है, इसलिए ग्रामीण विकास गरीबी उन्मूलन की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा.

निर्धनता रेखा

निर्धनता रेखा एक ऐसा सांख्यिकीय मानक है जिसके नीचे रहने वाले व्यक्ति या परिवार को किसी निर्धारित पद्धति के अनुसार गरीब माना जाता है. इसका उपयोग केवल आंकड़ा तैयार करने के लिए नहीं होता. सरकारों के लिए यह नीति निर्माण, संसाधन आवंटन और लक्षित कल्याण कार्यक्रमों में भी उपयोगी हो सकता है. भारत में निर्धनता मापन में लकड़ावाला, तेंदुलकर और रंगराजन समितियों का विशेष महत्व है.

निर्धनता रेखा निर्धारण की प्रमुख चुनौतियां

  • अलग-अलग राज्यों में कीमतों का अंतर.
  • ग्रामीण और शहरी जीवन-यापन लागत का अंतर.
  • समय के साथ उपभोग की बदलती आदतें.
  • स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे खर्चों का बढ़ता महत्व.
  • आय और उपभोग के सही आंकड़ों की उपलब्धता.
  • गरीबी को केवल धन से मापने की सीमा.

इसलिए एक निश्चित संख्या को गरीबी का अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है.

निर्धनता निवारण के उपाय

गरीबी कम करने के लिए केवल नकद सहायता पर्याप्त नहीं है. राहत के साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सामाजिक सुरक्षा को जोड़ना आवश्यक है.

1. रोजगार और आजीविका

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) ग्रामीण परिवारों को मांग के आधार पर मजदूरी रोजगार की सुरक्षा देता है. यह ग्रामीण आय को सहारा देने के साथ संकट के समय सुरक्षा-कवच की भूमिका निभाता है. कौशल विकास और स्वरोजगार कार्यक्रमों का उद्देश्य व्यक्ति को केवल सहायता देना नहीं, बल्कि उसकी आय अर्जित करने की क्षमता बढ़ाना होना चाहिए.

2. सामाजिक सुरक्षा

वृद्धावस्था, विधवापन, दिव्यांगता और अन्य कमजोर परिस्थितियों में सामाजिक सुरक्षा योजनाएं परिवार को आर्थिक झटके से बचाने में सहायता करती हैं. गरीबी उन्मूलन में सामाजिक सुरक्षा का महत्व इसलिए बढ़ता है क्योंकि हर गरीब व्यक्ति को तुरंत स्थायी रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा सकता.

3. शिक्षा और कौशल

शिक्षा गरीबी से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी दीर्घकालीन साधन है. प्राथमिक शिक्षा के साथ माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगारोन्मुख कौशल पर भी ध्यान देना जरूरी है. एक गरीब परिवार के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना केवल वर्तमान गरीबी को नहीं घटाता, बल्कि अगली पीढ़ी की गरीबी की संभावना भी कम करता है.

4. स्वास्थ्य और पोषण

बीमारी गरीब परिवार की आय को दो तरफ से प्रभावित करती है—काम करने की क्षमता घटती है और इलाज का खर्च बढ़ता है. इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, पोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और स्वास्थ्य बीमा को गरीबी उन्मूलन की नीति से अलग नहीं किया जा सकता.

5. आवास और बुनियादी सुविधाएं

प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छता, पेयजल, बिजली और स्वच्छ ईंधन जैसी सुविधाएं जीवन-स्तर में प्रत्यक्ष सुधार करती हैं. बहुआयामी गरीबी को कम करने में ऐसी सुविधाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है.

6. वित्तीय समावेशन

जन धन खाते, डिजिटल भुगतान, बैंकिंग सेवाएं, सूक्ष्म ऋण और स्वयं सहायता समूह गरीब परिवारों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ते हैं. लेकिन केवल बैंक खाता खोलना पर्याप्त नहीं है. वित्तीय सेवाओं का वास्तविक उपयोग और उचित ऋण तक पहुंच अधिक महत्वपूर्ण है.

निर्धनता उन्मूलन में संरचनात्मक सुधार

गरीबी का स्थायी समाधान आर्थिक अवसरों का विस्तार है.

इसके लिए—

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,
  • बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था,
  • कृषि उत्पादकता,
  • MSME और उद्योगों का विस्तार,
  • बुनियादी ढांचे का विकास,
  • महिला रोजगार,
  • कौशल विकास,
  • सामाजिक सुरक्षा और
  • वित्तीय समावेशन

को एक साथ आगे बढ़ाना होगा.

गरीबों को केवल सहायता का लाभार्थी नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाना अधिक टिकाऊ रणनीति है.

अंतरराष्ट्रीय प्रयास

गरीबी उन्मूलन वैश्विक विकास एजेंडा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में SDG-1 का लक्ष्य सभी रूपों में गरीबी समाप्त करना है. इससे जुड़ी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसी प्राथमिकताएं अन्य SDGs से भी जुड़ी हुई हैं.

विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखाओं के माध्यम से देशों के बीच तुलनात्मक आकलन करता है. साथ ही, वह यह भी स्पष्ट करता है कि किसी देश की नीति और लक्षित योजनाओं के लिए उसकी राष्ट्रीय गरीबी रेखा अधिक उपयुक्त हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग में UNDP, UNICEF और World Food Programme जैसी संस्थाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.

निर्धनता से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

कुछ आंकड़े गरीबी की बदलती तस्वीर को समझने में विशेष रूप से उपयोगी हैं—

  • तेंदुलकर पद्धति के अनुसार 2011-12 में भारत की गरीबी दर 21.9% थी.
  • NITI Aayog के राष्ट्रीय MPI के अनुसार बहुआयामी गरीबी 2015-16 के 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हुई.
  • NITI Aayog के अनुमान के अनुसार 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए. यह एक अनुमानित प्रक्षेपण है, इसलिए इसे प्रत्यक्ष सर्वेक्षण आंकड़े के रूप में नहीं प्रस्तुत करना चाहिए.
  • विश्व बैंक के 2026 के विश्लेषण के अनुसार 2023-24 में $4.20 की 2021 PPP रेखा पर भारत की गरीबी 16.1% थी.
  • उसी अध्ययन के अनुसार 2023-24 में लगभग 23.3 करोड़ लोग इस LMIC गरीबी रेखा से नीचे थे.

इन आंकड़ों में अंतर का मुख्य कारण परिभाषा, सर्वेक्षण और मापन पद्धति का अंतर है.

निर्धनता उन्मूलन की प्रमुख चुनौतियां

गरीबी में कमी के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं.

संस्थागत चुनौती

योजनाओं का सही लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना अभी भी महत्वपूर्ण है. प्रशासनिक क्षमता और स्थानीय स्तर की निगरानी इसमें निर्णायक हैं.

रोजगार की चुनौती

गरीबी से स्थायी रूप से बाहर निकलने के लिए पर्याप्त और उत्पादक रोजगार जरूरी है. केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं; रोजगार की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है.

सामाजिक चुनौती

महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर समूहों को समान अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है.

क्षेत्रीय चुनौती

देश के सभी राज्य और जिले समान गति से विकसित नहीं हुए हैं. इसलिए एक समान नीति के साथ-साथ क्षेत्र-विशेष रणनीति भी आवश्यक है.

जलवायु चुनौती

जलवायु परिवर्तन से कृषि, जल और आजीविका प्रभावित हो सकती है. भविष्य की गरीबी उन्मूलन नीति में जलवायु-लचीली आजीविका को शामिल करना होगा.

निर्धनता उन्मूलन की रणनीति

निर्धनता कम करने के लिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है. राहत, रोजगार, मानव पूंजी और सामाजिक सुरक्षा को जोड़कर ऐसी रणनीति बनानी होगी, जो तत्काल जरूरतों के साथ दीर्घकालीन आत्मनिर्भरता पर भी ध्यान दे.

अल्पकालीन रणनीति

अचानक आय संकट या आपदा की स्थिति में गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा, रोजगार सहायता और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना आवश्यक है. इससे परिवार अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है और गंभीर आर्थिक संकट से बच सकता है.

मध्यकालीन रणनीति

अगला कदम व्यक्ति की आय क्षमता बढ़ाना होना चाहिए. इसके लिए कौशल विकास, रोजगार, स्वरोजगार, छोटे व्यवसाय और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच जरूरी है.

दीर्घकालीन रणनीति

दीर्घकाल में मानव पूंजी और उत्पादक क्षमता पर निवेश सबसे महत्वपूर्ण है. शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, बुनियादी ढांचा, महिला रोजगार और बेहतर संस्थाएं गरीबी के मूल कारणों को कमजोर करती हैं. इसलिए सबसे प्रभावी नीति का क्रम हो सकता है—

राहत अवसर क्षमता स्थायी आय.

निर्धनता और आर्थिक विकास का संबंध

आर्थिक विकास और गरीबी में कमी के बीच मजबूत संबंध है, लेकिन केवल GDP वृद्धि से गरीबी अपने आप समाप्त नहीं होती. यदि आर्थिक वृद्धि रोजगार पैदा करती है, मजदूरी बढ़ाती है और गरीब परिवारों की उत्पादकता सुधारती है, तो इसका प्रभाव व्यापक होता है. इसके विपरीत, यदि विकास का लाभ सीमित समूहों तक केंद्रित रहे, तो आय और अवसर की असमानता बनी रह सकती है. इसीलिए समावेशी विकास महत्वपूर्ण है.

गरीबी उन्मूलन की सफलता का आकलन केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि कितने लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए. यह भी देखना चाहिए कि उनकी आय कितनी स्थिर है, बच्चों की शिक्षा कैसी है, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सुलभ हैं और परिवार आर्थिक संकट का सामना कितना कर सकता है.

भविष्य की संभावनाएं

भारत में गरीबी कम करने के लिए कई सकारात्मक आधार मौजूद हैं. डिजिटल वित्तीय सेवाओं का विस्तार, आधारभूत सुविधाओं में सुधार, सामाजिक सुरक्षा, बेहतर उपभोग आंकड़े और बढ़ती आर्थिक गतिविधियां नए अवसर पैदा कर रही हैं.

NITI Aayog के अनुसार भारत की बहुआयामी गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है. वहीं विश्व बैंक के नवीनतम विश्लेषण में भी पिछले दशक में मौद्रिक गरीबी में बड़ी गिरावट दिखाई गई है. फिर भी भविष्य की चुनौतियां अलग प्रकार की होंगी. रोजगार की गुणवत्ता, शहरी गरीबी, जलवायु परिवर्तन, कौशल का बदलता स्वरूप और आर्थिक असमानता पर अधिक ध्यान देना होगा.

डिजिटल अर्थव्यवस्था और हरित अर्थव्यवस्था नई नौकरियां पैदा कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए गरीब और कमजोर वर्गों को नए कौशल से जोड़ना जरूरी होगा.

निष्कर्ष

निर्धनता का स्थायी समाधान केवल सहायता देना नहीं है. लोगों के लिए स्थिर आय और बेहतर अवसर पैदा करना जरूरी है. विकास का लाभ उन वर्गों और क्षेत्रों तक भी पहुंचना चाहिए, जो लंबे समय से पीछे रहे हैं. सफल निर्धनता उन्मूलन का अर्थ केवल गरीबी रेखा से ऊपर उठना नहीं है. असली सफलता तब होगी, जब लोग आत्मनिर्भर, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें.

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