दुर्लभ खनिज: महत्व, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, भारत की स्थिति व नीति

साल 2025 में जब चीन ने कुछ महत्त्वपूर्ण दुर्लभ मृदा तत्त्वों (Rare Earth Elements-REE) के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा किया. इससे पूरी दुनिया को यह एहसास हुआ कि आधुनिक अर्थव्यवस्था केवल तेल और गैस पर निर्भर नहीं है. स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर पैनल, पवन टर्बाइन, सेमीकंडक्टर, लड़ाकू विमान, मिसाइल प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों के पीछे जिन खनिजों की निर्णायक भूमिका है, वे ही आज वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में हैं. यही कारण है कि महत्त्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) को अब अक्सर “21वीं सदी का नया तेल” कहा जाता है.

भारत के लिए यह विषय केवल खनन या उद्योग तक सीमित नहीं है. देश ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, सेमीकंडक्टर और रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर बनने का प्रयास हो रहा है तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है. इन सभी क्षेत्रों की सफलता महत्त्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित और निरंतर उपलब्धता पर निर्भर करती है. इसलिए आज खनिज सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुके हैं.

महत्त्वपूर्ण खनिज वे हैं, जिनकी आधुनिक उद्योगों, रक्षा उत्पादन, ऊर्जा परिवर्तन और उच्च प्रौद्योगिकी में अत्यधिक आवश्यकता होती है, लेकिन जिनकी वैश्विक आपूर्ति सीमित देशों में केंद्रित रहती है. किसी भी भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिबंध या युद्ध की स्थिति में इनकी आपूर्ति बाधित हो सकती है. यही कारण है कि अमेरिका, जापान, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश इन खनिजों को अब रणनीतिक संसाधन के रूप में देखते हैं.

“दुर्लभ” शब्द से यह भ्रम हो सकता है कि ये खनिज पृथ्वी पर बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि वास्तविकता अलग है. उदाहरण के लिए, सीरियम पृथ्वी की भू-पर्पटी में ताँबे से भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है. चुनौती इन तत्वों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से उपयोगी निक्षेपों से निकालने, शुद्ध करने और अलग-अलग तत्त्वों में विभाजित करने की जटिल प्रक्रिया है. यही कारण है कि जिन देशों के पास उन्नत प्रसंस्करण तकनीक है, वही वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर प्रभावी नियंत्रण बनाए हुए हैं.

आज दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण खनिज केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि तकनीकी प्रगति, औद्योगिक विकास, हरित ऊर्जा और वैश्विक शक्ति-संतुलन के आधार बन चुके हैं. इस लेख में हम इनके वैज्ञानिक आधार, भारत में उपलब्धता, सरकारी नीतियों, चीन के वैश्विक प्रभुत्व, भारत की चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन करेंगे.

इस लेख में हम जानेंगे

दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare Earth Elements-REE) के वैज्ञानिक आधार एवं उपयोगिता

दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare Earth Elements-REE) आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ऐसे रासायनिक तत्त्व हैं, जिनके बिना आज की अधिकांश उन्नत तकनीकों की कल्पना नहीं की जा सकती. इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टर्बाइन, सेमीकंडक्टर, 5G संचार, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, चिकित्सा उपकरण और आधुनिक रक्षा प्रणाली—इन सभी में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है. यही कारण है कि आज ये केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं.

दुर्लभ मृदा तत्त्वों का समूह कुल 17 रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना है. इनमें आवर्त सारणी के 15 लैंथेनाइड (Lanthanides) तथा स्कैंडियम (Scandium) और यिट्रियम (Yttrium) शामिल हैं. इन सभी के रासायनिक गुण काफी हद तक समान होते हैं, जिसके कारण इन्हें एक-दूसरे से अलग करना अत्यंत जटिल और महँगी प्रक्रिया है. यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता और चुनौती है.

हालाँकि इनके नाम में “दुर्लभ” शब्द जुड़ा है, लेकिन अधिकांश REE पृथ्वी की भू-पर्पटी में पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. उदाहरण के लिए, सीरियम (Cerium) ताँबे से भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है. वास्तविक कठिनाई इनके कम होने में नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से उपयोगी निक्षेपों में मिलने और उन्हें शुद्ध रूप में अलग करने की जटिल प्रक्रिया में है. इसलिए किसी देश की वास्तविक क्षमता उसके खनिज भंडार से अधिक उसकी प्रसंस्करण (Processing) और पृथक्करण (Separation) तकनीक से तय होती है.

व्यावसायिक दृष्टि से अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्त्व मोनाज़ाइट (Monazite), बास्टनासाइट (Bastnäsite) और ज़ेनोटाइम (Xenotime) जैसे खनिजों से प्राप्त किए जाते हैं. भारत के लिए इनमें मोनाज़ाइट विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि देश के समुद्री तटीय क्षेत्रों में इसके पर्याप्त भंडार उपलब्ध हैं.

इन तत्त्वों का उपयोग अत्यंत व्यापक है. नियोडिमियम (Neodymium) और डिस्प्रोसियम (Dysprosium) से बने स्थायी चुंबक इलेक्ट्रिक वाहनों और पवन टर्बाइनों में प्रयुक्त होते हैं. यूरोपियम (Europium) और यिट्रियम (Yttrium) LED तथा आधुनिक डिस्प्ले तकनीक में उपयोग किए जाते हैं, जबकि गैडोलिनियम (Gadolinium) MRI जैसी चिकित्सा तकनीकों में महत्त्वपूर्ण है. समारियम (Samarium) और स्कैंडियम (Scandium) रक्षा, एयरोस्पेस तथा उच्च-प्रदर्शन मिश्रधातुओं के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं. इस प्रकार आधुनिक तकनीक के लगभग प्रत्येक रणनीतिक क्षेत्र में किसी-न-किसी दुर्लभ मृदा तत्त्व की भूमिका दिखाई देती है.

संसाधनों की उपलब्धता और उनकी उपयोगिता के बीच का यही अंतर आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा का आधार बन गया है. इसलिए वर्तमान समय में किसी देश की तकनीकी शक्ति केवल उसके खनिज भंडार से नहीं, बल्कि उन्हें परिष्कृत कर उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलने की क्षमता से भी निर्धारित होती है.

आवर्त सारणी में दुर्लभ खनिज और वर्गीकरण

महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान कैसे की जाती है?

दुनिया में हजारों प्रकार के खनिज पाए जाते हैं, लेकिन सभी समान रूप से महत्त्वपूर्ण नहीं होते. किसी खनिज का “महत्त्वपूर्ण” (Critical) होना उसकी दुर्लभता से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि वह किसी देश की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और आधुनिक उद्योगों के लिए कितना आवश्यक है तथा उसकी आपूर्ति कितनी सुरक्षित है. इसलिए प्रत्येक देश अपनी औद्योगिक आवश्यकताओं, संसाधनों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर महत्त्वपूर्ण खनिजों की अलग-अलग सूची तैयार करता है.

सामान्यतः किसी खनिज की महत्ता दो प्रमुख आधारों पर निर्धारित की जाती है. पहला, उसका आर्थिक महत्त्व (Economic Importance), अर्थात वह ऊर्जा, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिवहन, दूरसंचार या अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में कितना आवश्यक है. दूसरा, आपूर्ति जोखिम (Supply Risk), अर्थात उसका उत्पादन और प्रसंस्करण कितने देशों तक सीमित है तथा वैश्विक आपूर्ति बाधित होने की कितनी संभावना है. यदि किसी खनिज का विकल्प उपलब्ध नहीं है और उसकी आपूर्ति कुछ ही देशों पर निर्भर है, तो उसे रणनीतिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है.

इन्हीं मानकों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने विशेषज्ञ समिति के माध्यम से देश की आवश्यकताओं का विस्तृत अध्ययन कराया. समिति ने विकसित देशों की नीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण, विभिन्न मंत्रालयों से परामर्श तथा आयात निर्भरता, औद्योगिक उपयोग और विकल्पों की उपलब्धता जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया. इसके आधार पर भारत के लिए 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान की गई, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, दुर्लभ मृदा तत्त्व, टंगस्टन, मोलिब्डेनम, टाइटेनियम और अन्य रणनीतिक खनिज शामिल हैं.

यह सूची केवल खनिजों की पहचान भर नहीं है, बल्कि देश की खनिज नीति का आधार भी है. इसके माध्यम से अन्वेषण, खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण, अनुसंधान तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसी गतिविधियों की प्राथमिकताएँ तय की जाती हैं. चूँकि नई तकनीकों और वैश्विक परिस्थितियों के साथ खनिजों का महत्त्व बदल सकता है, इसलिए इस सूची की समय-समय पर समीक्षा भी आवश्यक मानी जाती है.

महत्त्वपूर्ण खनिजों की मूल्य शृंखला (Value Chain)

किसी देश की खनिज शक्ति केवल उसके भंडारों से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह खनिजों की पूरी मूल्य शृंखला (Value Chain) पर कितना नियंत्रण रखता है. यदि कोई देश केवल कच्चा अयस्क निकालकर निर्यात करता है और बाद में उसी खनिज से बने उच्च मूल्य वाले उत्पाद आयात करता है, तो आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को मिल जाता है. यही कारण है कि आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा खनन से अधिक प्रसंस्करण, प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन पर केंद्रित है.

महत्त्वपूर्ण खनिजों की मूल्य शृंखला पाँच प्रमुख चरणों में विभाजित की जा सकती है.

पहला चरण—अन्वेषण (Exploration)

इसमें संभावित खनिज भंडारों की वैज्ञानिक खोज और उनका भूवैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है. भारत में यह कार्य मुख्यतः भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), परमाणु खनिज निदेशालय (AMD) तथा अन्य विशेषज्ञ संस्थानों द्वारा किया जाता है. हाल के वर्षों में अन्वेषण परियोजनाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे नए संसाधनों की पहचान तेज़ हुई है.

दूसरा चरण—खनन (Mining)

भंडारों की पहचान के बाद खनिजों का उत्खनन किया जाता है. दुर्लभ मृदा तत्त्वों का खनन अपेक्षाकृत कठिन होता है, क्योंकि ये प्रायः अन्य खनिजों के साथ मिश्रित अवस्था में पाए जाते हैं. कई बार बड़ी मात्रा में अयस्क निकालने के बाद ही सीमित मात्रा में उपयोगी खनिज प्राप्त हो पाते हैं.

तीसरा चरण—प्रसंस्करण एवं पृथक्करण (Processing and Separation)

यही पूरी मूल्य शृंखला का सबसे जटिल और सबसे महत्त्वपूर्ण चरण है. खनन से प्राप्त अयस्क को रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा शुद्ध किया जाता है तथा दुर्लभ मृदा तत्त्वों को अलग-अलग किया जाता है. यही वह क्षेत्र है जिसमें चीन ने वैश्विक बढ़त हासिल की है और अधिकांश देश अब भी उस पर निर्भर हैं.

चौथा चरण—मूल्य संवर्धन (Value Addition)

प्रसंस्कृत खनिजों से स्थायी चुंबक, बैटरियाँ, इलेक्ट्रिक वाहन मोटर, सेमीकंडक्टर उपकरण तथा अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पाद बनाए जाते हैं. इसी चरण में सबसे अधिक आर्थिक मूल्य का सृजन होता है और किसी देश की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा तय होती है.

पाँचवाँ चरण—पुनर्चक्रण (Recycling)

पुराने मोबाइल फोन, कंप्यूटर, बैटरियों, पवन टर्बाइनों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से महत्त्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति की जाती है. बढ़ती वैश्विक माँग और सीमित प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए पुनर्चक्रण भविष्य में खनिज आपूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बनने जा रहा है.

स्पष्ट है कि किसी भी देश की वास्तविक खनिज शक्ति केवल उसके भंडारों में नहीं, बल्कि इन पाँचों चरणों में विकसित क्षमता पर निर्भर करती है. इसी आधार पर भविष्य में वैश्विक औद्योगिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा भी निर्धारित होगी.

दुर्लभ खनिजों के प्रमुख उपयोग

दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण खनिज आज हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, परिवहन और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की आधारशिला बन चुके हैं. इन्हीं के कारण इन्हें 21वीं सदी का रणनीतिक संसाधन” (Strategic Resource) भी कहा जाता है. इसके मुख्य उपयोग निम्नवत हैं:

  • हरित ऊर्जा (Green Energy): पवन टर्बाइन, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) तथा ऊर्जा भंडारण (Battery Storage) में प्रयुक्त उच्च-क्षमता वाले स्थायी चुंबक और बैटरियों के निर्माण में इनका व्यापक उपयोग होता है.
  • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं डिजिटल प्रौद्योगिकी: स्मार्टफोन, लैपटॉप, हार्ड डिस्क, LED एवं OLED डिस्प्ले, सेमीकंडक्टर, लेज़र, फाइबर-ऑप्टिक संचार, सेंसर तथा माइक्रोचिप जैसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में दुर्लभ मृदा तत्त्व अनिवार्य हैं.
  • रक्षा एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: लड़ाकू विमान, निर्देशित मिसाइलें, रडार, ड्रोन, उपग्रह, नाइट-विज़न उपकरण, लेज़र प्रणाली तथा अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी रक्षा उपकरणों के निर्माण में इनका व्यापक उपयोग किया जाता है.
  • मोटर एवं शक्तिशाली चुंबक (Permanent Magnets): इलेक्ट्रिक मोटर, जनरेटर, पवन टर्बाइन, माइक्रोफोन, स्पीकर, हार्ड डिस्क ड्राइव और औद्योगिक मशीनों के लिए उच्च-क्षमता वाले स्थायी चुंबकों के निर्माण में इनकी प्रमुख भूमिका होती है.
  • धातु एवं मिश्रधातु (Metal Alloys): विमानन, एयरोस्पेस, ऑटोमोबाइल, इस्पात, मैग्नीशियम एवं एल्यूमिनियम मिश्रधातुओं तथा उच्च ताप-सहिष्णु सुपरएलॉय (Superalloys) के निर्माण में इनका उपयोग किया जाता है.
  • काँच एवं सिरेमिक उद्योग: विशेष ऑप्टिकल काँच, कैमरा लेंस, UV-प्रतिरोधी काँच, दर्पण, काँच पॉलिशिंग, रंगीन काँच, उच्च गुणवत्ता वाले सिरेमिक, सेंसर और स्किन्टिलेटर (Scintillators) के निर्माण में इनका उपयोग होता है.
  • रासायनिक उद्योग एवं उत्प्रेरक (Catalysts): पेट्रोलियम शोधन, ऑटोमोबाइल के कैटेलिटिक कन्वर्टर, रासायनिक प्रसंस्करण, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण तथा डीज़ल ईंधन योजकों (Fuel Additives) में ये महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
  • चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ: MRI मशीन, चिकित्सा इमेजिंग, पोर्टेबल एक्स-रे, कैंसर उपचार, चिकित्सा स्कैन, जैव-चिह्नक (Medical Tracers) तथा विभिन्न उन्नत चिकित्सीय उपकरणों में इनका उपयोग किया जाता है.
  • परिवहन एवं ऑटोमोबाइल उद्योग: इलेक्ट्रिक ड्राइव सिस्टम, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS), संचार प्रणाली, घर्षण-रहित बेयरिंग तथा आधुनिक वाहनों के अनेक महत्त्वपूर्ण घटकों में इनकी आवश्यकता होती है.
  • पर्यावरण एवं अन्य उपयोग: जल शोधन, फ्लोरोसेंट प्रकाश व्यवस्था, उर्वरक, विशेष कोटिंग, वर्णक (Pigments), ऊर्जा दक्ष उपकरण तथा विभिन्न वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुप्रयोगों में भी दुर्लभ खनिजों का उपयोग बढ़ता जा रहा है.

दुर्लभ खनिजों पर चीन का प्रभुत्व

यदि आज दुर्लभ मृदा तत्त्वों की वैश्विक आपूर्ति शृंखला का अध्ययन किया जाए, तो चीन उसका सबसे प्रभावशाली केंद्र दिखाई देता है. पिछले चार दशकों में उसने केवल खनिज उत्पादन ही नहीं बढ़ाया, बल्कि अन्वेषण, प्रसंस्करण, पृथक्करण, स्थायी चुंबक निर्माण और उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण तक पूरी मूल्य शृंखला विकसित कर ली. यही कारण है कि अनेक देशों के पास खनिज संसाधन होने के बावजूद वे अंतिम उपयोग योग्य उत्पादों के लिए आज भी चीन पर निर्भर हैं.

वर्ष 2024 में वैश्विक दुर्लभ मृदा उत्पादन का लगभग 69 प्रतिशत चीन से हुआ, जबकि विश्व की लगभग 87–90 प्रतिशत प्रसंस्करण एवं पृथक्करण क्षमता भी उसके पास केंद्रित है. इस प्रकार चीन की वास्तविक ताकत केवल खनन में नहीं, बल्कि उन तकनीकों और औद्योगिक अवसंरचना में है, जो कच्चे अयस्क को उच्च शुद्धता वाले दुर्लभ मृदा उत्पादों में परिवर्तित करती हैं.

चीन की यह बढ़त अचानक नहीं बनी. विशाल बायान ओबो (Bayan Obo) खनिज क्षेत्र, दीर्घकालिक सरकारी निवेश, वैज्ञानिक अनुसंधान और कम लागत पर विकसित प्रसंस्करण उद्योग ने उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे पहुँचाया. 1987 में चीन के तत्कालीन नेता देंग शियाओपिंग का प्रसिद्ध कथन—“मध्य पूर्व के पास तेल है, चीन के पास दुर्लभ मृदा है”—आज उसकी दीर्घकालिक रणनीति का प्रतीक माना जाता है.

चीन ने वर्ष 2025 में कुछ रणनीतिक दुर्लभ मृदा तत्त्वों के निर्यात पर लाइसेंस आधारित नियंत्रण लागू कर यह भी दिखा दिया कि महत्त्वपूर्ण खनिज अब केवल व्यापारिक वस्तु नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक प्रभाव का साधन भी बन चुके हैं. इस निर्णय से इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई तथा अनेक देशों ने अपनी खनिज रणनीति की पुनर्समीक्षा प्रारम्भ कर दी.

चीन के अनुभव से एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि केवल खनिज भंडार किसी देश को वैश्विक नेतृत्व नहीं दिलाते. वास्तविक बढ़त तब मिलती है, जब संसाधनों के साथ अनुसंधान, प्रसंस्करण तकनीक, मूल्य-वर्धित विनिर्माण और स्थिर औद्योगिक नीति का भी समानांतर विकास किया जाए. यही वह क्षेत्र है, जहाँ आने वाले वर्षों में भारत सहित अनेक देश अपनी क्षमता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.

Mining and Processing control on Rare Earth Minerals country wise infographic on world map in Hindi

चीनी प्रभुत्व का भारत पर प्रभाव

चीन का दुर्लभ मृदा तत्त्वों पर प्रभुत्व भारत के लिए केवल व्यापारिक चुनौती नहीं, बल्कि औद्योगिक, तकनीकी और रणनीतिक चिंता का विषय भी है. भारत के पास पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद दुर्लभ मृदा तत्त्वों के प्रसंस्करण और मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्माण की क्षमता अभी सीमित है. परिणामस्वरूप अनेक महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिए देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है.

इस निर्भरता का सबसे अधिक प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ता है, जिनका भविष्य महत्त्वपूर्ण खनिजों से जुड़ा है. इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरों, पवन टर्बाइनों, सेमीकंडक्टर उद्योग, दूरसंचार उपकरणों तथा आधुनिक रक्षा प्रणालियों में दुर्लभ मृदा तत्त्वों का व्यापक उपयोग होता है. यदि वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होती है या निर्यात नियंत्रण कड़े किए जाते हैं, तो इन उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है, परियोजनाओं में विलंब हो सकता है और घरेलू विनिर्माण की गति प्रभावित हो सकती है.

भारत की चुनौती केवल कच्चे खनिजों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण की है. वर्तमान में देश कुछ स्तर तक दुर्लभ मृदा ऑक्साइड का उत्पादन करता है, लेकिन स्थायी चुंबक, उच्च शुद्धता वाली धातुएँ तथा अन्य उन्नत उत्पादों के लिए अभी भी बाहरी स्रोतों पर निर्भर है. इससे मूल्य संवर्धन का बड़ा भाग विदेशों में होता है, जबकि भारत मुख्यतः उपभोक्ता बाज़ार बना रहता है.

वर्ष 2025 में चीन द्वारा कुछ दुर्लभ मृदा तत्त्वों के निर्यात पर लगाए गए नियंत्रणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि महत्त्वपूर्ण खनिज भविष्य में भू-राजनीतिक दबाव का साधन भी बन सकते हैं. इस घटना ने भारत सहित अनेक देशों को यह सोचने पर विवश किया कि केवल आयात आधारित व्यवस्था दीर्घकाल तक सुरक्षित नहीं रह सकती. इसलिए भारत के लिए घरेलू प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाना, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण करना और दीर्घकालिक खनिज सुरक्षा सुनिश्चित करना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है.

चीन का विकल्प

वर्ष 2025 में चीन द्वारा कुछ दुर्लभ मृदा तत्त्वों के निर्यात पर लगाए गए नियंत्रणों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर वैश्विक आपूर्ति शृंखला कितनी संवेदनशील हो सकती है. इसके बाद अनेक देशों ने महत्त्वपूर्ण खनिजों को केवल व्यापारिक वस्तु नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़े रणनीतिक संसाधन के रूप में देखना शुरू किया.

अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय देशों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी खनिज नीतियों की पुनर्समीक्षा की है. इन देशों ने नए खनिज भंडारों की खोज, घरेलू प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने, पुनर्चक्रण तकनीकों को विकसित करने तथा वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तैयार करने पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है. उद्देश्य केवल चीन पर निर्भरता कम करना नहीं, बल्कि भविष्य में किसी भी भू-राजनीतिक या व्यापारिक संकट की स्थिति में उद्योगों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है.

इसी सोच के तहत कई बहुपक्षीय सहयोग मंच भी सक्रिय हुए हैं. Minerals Security Partnership (MSP), Quad तथा Indo-Pacific Economic Framework (IPEF) जैसे मंच महत्त्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित और विविधीकृत आपूर्ति शृंखला विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं. भारत भी इन पहलों में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है तथा ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और अन्य खनिज-संपन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है.

वैश्विक अनुभव यह संकेत देता है कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल खनिज संसाधनों की नहीं होगी, बल्कि उनके वैज्ञानिक उपयोग, प्रसंस्करण क्षमता, तकनीकी नवाचार और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला की भी होगी. यही कारण है कि आज अधिकांश देश महत्त्वपूर्ण खनिजों को दीर्घकालिक आर्थिक विकास, ऊर्जा परिवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा की साझा रणनीति का आधार बना रहे हैं.

Pie Chart on Country wise Deposits of Rare Earth Minerals with other details infographic in Hindi

भारत के लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों का महत्त्व

महत्त्वपूर्ण खनिज आज भारत की आर्थिक प्रगति, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में हैं. यदि देश को वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना है, इलेक्ट्रिक वाहनों का व्यापक उपयोग बढ़ाना है, सेमीकंडक्टर निर्माण को प्रोत्साहित करना है और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना है, तो इन खनिजों की सुरक्षित एवं दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी. इसलिए खनिज सुरक्षा अब केवल खनन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की रणनीति का हिस्सा बन चुकी है.

महत्त्वपूर्ण खनिजों की उपयोगिता आधुनिक जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देती है. लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट उन्नत बैटरियों के प्रमुख घटक हैं. दुर्लभ मृदा तत्त्वों से बने शक्तिशाली स्थायी चुंबक इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और औद्योगिक मोटरों की कार्यक्षमता बढ़ाते हैं. वहीं ताँबा, टाइटेनियम और अन्य रणनीतिक खनिज विद्युत अवसंरचना, एयरोस्पेस, दूरसंचार तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की आधारशिला हैं. इस कारण इनकी माँग विश्वभर में लगातार बढ़ रही है.

रक्षा क्षेत्र में भी इन खनिजों का महत्त्व अत्यधिक है. आधुनिक मिसाइल प्रणालियाँ, रडार, उपग्रह, ड्रोन, लड़ाकू विमान और अत्याधुनिक संचार उपकरण ऐसे अनेक खनिजों पर निर्भर करते हैं. किसी भी देश की रक्षा उत्पादन क्षमता तभी मजबूत मानी जाती है, जब उसे आवश्यक कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति उपलब्ध हो. इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण खनिज राष्ट्रीय सुरक्षा का भी अभिन्न अंग बन चुके हैं.

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से हरित ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी आधारित विनिर्माण की ओर बढ़ रही है. ऐसे में महत्त्वपूर्ण खनिजों की माँग आने वाले वर्षों में और बढ़ने की संभावना है. इसलिए केवल आयात पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता. देश के लिए आवश्यक है कि वह अपने उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग करे, आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाए और भविष्य की तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप दीर्घकालिक खनिज सुरक्षा सुनिश्चित करे. यही भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और आत्मनिर्भरता का आधार बनेगा.

भारत में महत्त्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता एवं प्रमुख अनुप्रयोग

भारत अनेक महत्त्वपूर्ण खनिजों से समृद्ध है, लेकिन सभी खनिजों में उसकी स्थिति समान नहीं है. कुछ खनिजों के पर्याप्त संसाधन देश में उपलब्ध हैं, जबकि कई रणनीतिक खनिजों के लिए भारत अभी भी आयात पर निर्भर है. यही कारण है कि हाल के वर्षों में खनिज सुरक्षा को ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जाने लगा है.

ऊर्जा परिवर्तन के संदर्भ में लिथियम सबसे महत्त्वपूर्ण खनिजों में से एक है. इसका उपयोग मुख्यतः लिथियम-आयन बैटरियों में होता है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों, मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों का आधार हैं. वर्ष 2023 में जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में लगभग 5.9 मिलियन टन लिथियम संसाधन की पहचान भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई. यद्यपि इसका व्यावसायिक दोहन अभी प्रारम्भिक चरण में है, फिर भी इससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा मिलने की संभावना है.

बैटरी उद्योग में ग्रेफाइट का भी विशेष महत्त्व है. यह लिथियम-आयन बैटरियों के एनोड का प्रमुख घटक है और इस्पात, परमाणु ऊर्जा तथा अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी प्रयुक्त होता है. भारत में इसके पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं, जो भविष्य में घरेलू बैटरी विनिर्माण को मजबूत आधार प्रदान कर सकते हैं.

इसी प्रकार ताँबा (Copper) आधुनिक विद्युत अर्थव्यवस्था की आधारभूत धातु है. विद्युत तार, ट्रांसफॉर्मर, चार्जिंग अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इसका व्यापक उपयोग होता है. इसके बावजूद भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश भाग आयातित ताँबा सांद्र (Copper Concentrate) से पूरा करता है, जिससे घरेलू उद्योग वैश्विक आपूर्ति और कीमतों के उतार-चढ़ाव से प्रभावित हो सकते हैं.

इसके अतिरिक्त निकेल, कोबाल्ट, टंगस्टन, मोलिब्डेनम, टाइटेनियम, नायोबियम तथा दुर्लभ मृदा तत्त्व जैसे कई रणनीतिक खनिज आधुनिक उद्योगों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं. इनका उपयोग बैटरियों, विशेष इस्पात, एयरोस्पेस, रक्षा उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण में किया जाता है. इन क्षेत्रों की बढ़ती माँग को देखते हुए इन खनिजों की उपलब्धता भविष्य में और अधिक महत्त्वपूर्ण होती जाएगी.

स्पष्ट है कि भारत के पास अनेक महत्त्वपूर्ण खनिजों की संभावनाएँ मौजूद हैं, किंतु केवल संसाधनों का होना पर्याप्त नहीं है. उनका वैज्ञानिक अन्वेषण, व्यावसायिक दोहन और घरेलू उपयोग सुनिश्चित करना ही खनिज सुरक्षा का वास्तविक आधार बनेगा. इसी संदर्भ में दुर्लभ मृदा तत्त्वों की स्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसकी चर्चा अगले भाग में की गई है.

भारत में दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare Earth Elements-REE) की स्थिति

दुर्लभ मृदा तत्त्वों के संदर्भ में भारत की स्थिति विरोधाभासी है. एक ओर देश के पास विश्व के सबसे बड़े REE संसाधनों में से एक है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्य-वर्धित विनिर्माण के क्षेत्र में उसकी भागीदारी अभी सीमित है. दूसरे शब्दों में, भारत संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध है, लेकिन औद्योगिक क्षमता के मामले में अभी अपनी पूरी संभावनाओं का उपयोग नहीं कर पाया है.

उपलब्ध आकलनों के अनुसार भारत के पास लगभग 6.9 मिलियन मीट्रिक टन दुर्लभ मृदा तत्त्वों के संसाधन हैं, जिससे वह विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा REE संसाधन संपन्न देश माना जाता है. देश में इनका प्रमुख स्रोत समुद्री तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले मोनाज़ाइट निक्षेप हैं. केरल, तमिलनाडु और ओडिशा के समुद्री तट इसके प्रमुख क्षेत्र हैं, जबकि हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश और ओडिशा में भी नए संसाधनों की पहचान की गई है. अनुमान है कि भारत में लगभग 11.93 मिलियन टन मोनाज़ाइट संसाधन उपलब्ध हैं, जो भविष्य की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं.

इसके बावजूद वर्ष 2023 में भारत का दुर्लभ मृदा उत्पादन केवल लगभग 2,900 मीट्रिक टन रहा. यह आँकड़ा बताता है कि चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उनके व्यावसायिक दोहन और प्रसंस्करण की है. वर्तमान में भारत सीमित स्तर तक दुर्लभ मृदा ऑक्साइड का उत्पादन कर पाता है, लेकिन उच्च शुद्धता वाली REE धातुओं, स्थायी चुंबकों और अन्य मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्माण के लिए अभी भी विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर है.

भारत में REE विकास की एक विशेष चुनौती मोनाज़ाइट का परमाणु खनिज के रूप में वर्गीकरण है. इसमें दुर्लभ मृदा तत्त्वों के साथ थोरियम भी पाया जाता है, इसलिए इसके खनन और प्रसंस्करण पर परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का नियंत्रण है. वर्तमान में IREL (India) Limited इस क्षेत्र की प्रमुख सार्वजनिक कंपनी है. यह व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसके कारण उत्पादन और प्रसंस्करण की गति अपेक्षाकृत सीमित रही है.

दूसरी चुनौती प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी की है. दुर्लभ मृदा तत्त्वों को अलग करना अत्यंत जटिल रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें चीन ने कई दशकों में उल्लेखनीय विशेषज्ञता विकसित की है. परिणामस्वरूप भारत अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में REE यौगिकों और स्थायी चुंबकों का आयात करता है. उपलब्ध अनुमानों के अनुसार वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 4,010 मीट्रिक टन REE का आयात किया, और आने वाले वर्षों में इसकी माँग और बढ़ने की संभावना है.

फिर भी भारत के लिए संभावनाएँ कम नहीं हैं. नए खनिज भंडारों की खोज, अन्वेषण गतिविधियों में वृद्धि, प्रसंस्करण क्षमता के विस्तार तथा अनुसंधान पर बढ़ते निवेश से आने वाले वर्षों में भारत अपनी प्राकृतिक संपदा का बेहतर उपयोग कर सकता है. यदि संसाधनों, प्रौद्योगिकी और उद्योग के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाता है, तो भारत वैश्विक दुर्लभ मृदा आपूर्ति शृंखला में कहीं अधिक सशक्त भूमिका निभाने की स्थिति में होगा.

30 Important Minerals of India

भारत सरकार की नीति एवं संस्थागत व्यवस्था

महत्त्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती वैश्विक माँग और आपूर्ति संबंधी जोखिमों को देखते हुए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी खनिज नीति में व्यापक बदलाव किए हैं. सरकार का उद्देश्य केवल नए खनिज भंडारों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्वेषण, खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से एक सुरक्षित और दीर्घकालिक खनिज आपूर्ति शृंखला विकसित करना है.

इस दिशा में खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) में समय-समय पर संशोधन किए गए. विशेष रूप से वर्ष 2015, 2021 और 2023 के संशोधनों ने नीलामी आधारित आवंटन व्यवस्था को मजबूत किया, अन्वेषण गतिविधियों को गति दी तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों के विकास के लिए नीतिगत आधार तैयार किया. वर्ष 2023 के संशोधन के बाद केंद्र सरकार ने कई रणनीतिक खनिजों के विकास और नीलामी प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाया, जिससे देश में खनिज अन्वेषण और उत्पादन को बढ़ावा देने का मार्ग प्रशस्त हुआ.

भारत सरकार ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों की राष्ट्रीय सूची भी तैयार की है. इस सूची का उद्देश्य केवल खनिजों की पहचान करना नहीं, बल्कि अन्वेषण, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और आपूर्ति शृंखला से जुड़ी नीतिगत प्राथमिकताएँ तय करना है. बदलती तकनीक और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए इस सूची की समय-समय पर समीक्षा की जाती है.

जनवरी 2025 में स्वीकृत राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (National Critical Mineral Mission-NCMM) इस दिशा में भारत की सबसे महत्त्वाकांक्षी पहल है. लगभग ₹34,300 करोड़ के प्रस्तावित निवेश वाले इस मिशन का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण को गति देना, प्रसंस्करण क्षमता विकसित करना, पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना तथा विदेशों में रणनीतिक खनिज परिसंपत्तियों तक पहुँच सुनिश्चित करना है.

इन प्रयासों के क्रियान्वयन में अनेक संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) नए खनिज भंडारों की खोज और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का प्रमुख संस्थान है. परमाणु खनिज निदेशालय (AMD) परमाणु एवं संबंधित खनिजों के अन्वेषण का कार्य करता है, जबकि राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) अन्वेषण परियोजनाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है. IREL (India) Limited दुर्लभ मृदा तत्त्वों के क्षेत्र में प्रमुख सार्वजनिक उपक्रम है और KABIL (Khanij Bidesh India Limited) विदेशों में महत्त्वपूर्ण खनिज परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के माध्यम से भारत की दीर्घकालिक खनिज सुरक्षा को मजबूत बनाने का कार्य कर रही है.

घरेलू प्रयासों के साथ-साथ भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी विशेष बल दिया है. ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, अमेरिका, जापान तथा अन्य साझेदार देशों के साथ महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया जा रहा है. इसके अतिरिक्त Minerals Security Partnership (MSP), Quad और IPEF जैसे बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से भी भारत अपनी आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित और विविधीकृत बनाने की दिशा में कार्य कर रहा है.

कुल मिलाकर भारत की वर्तमान नीति का उद्देश्य केवल खनिजों का उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी समग्र व्यवस्था विकसित करना है, जो भविष्य की ऊर्जा, औद्योगिक और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप देश की खनिज सुरक्षा को दीर्घकालिक आधार प्रदान कर सके.

भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भारत के सामने कई संरचनात्मक चुनौतियाँ हैं. इनमें सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों को व्यावसायिक उत्पादन और उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलने की है. यदि इन बाधाओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो भविष्य में बढ़ती औद्योगिक माँग के बावजूद भारत आयात पर निर्भर बना रह सकता है.

सबसे पहली चुनौती प्रसंस्करण एवं शोधन क्षमता की है. वर्तमान में भारत सीमित स्तर तक ही दुर्लभ मृदा तत्त्वों का परिष्करण कर पाता है. उच्च शुद्धता वाली धातुओं, स्थायी चुंबकों और अन्य मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्माण के लिए आवश्यक तकनीक और औद्योगिक अवसंरचना अभी पर्याप्त विकसित नहीं हो सकी है. यही कारण है कि वैश्विक मूल्य शृंखला में भारत की भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित है.

दूसरी चुनौती अन्वेषण से उत्पादन तक की लंबी प्रक्रिया है. किसी नए खनिज भंडार की खोज से लेकर उसके व्यावसायिक दोहन तक सामान्यतः कई वर्ष लग जाते हैं. इस दौरान विस्तृत भूवैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, आधारभूत अवसंरचना और प्रसंस्करण सुविधाओं का विकास आवश्यक होता है. इसलिए यह क्षेत्र दीर्घकालिक योजना और निरंतर निवेश की माँग करता है.

पर्यावरणीय और सामाजिक पहलू भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं. दुर्लभ मृदा तत्त्वों के प्रसंस्करण में रासायनिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है और भारत में मोनाज़ाइट के साथ थोरियम की उपस्थिति इस प्रक्रिया को और संवेदनशील बना देती है. इसलिए खनिज विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भविष्य की सबसे बड़ी नीतिगत चुनौतियों में से एक रहेगा.

इसके साथ ही भारत को आयात निर्भरता कम करने, अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी क्षमता बढ़ाने, आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने तथा पुनर्चक्रण आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में भी निरंतर प्रयास करने होंगे. इन चुनौतियों का समाधान केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, कुशल नीति-निर्माण और प्रभावी संस्थागत समन्वय से ही संभव होगा.

आगे की राह

महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भारत के सामने चुनौती जितनी बड़ी है, अवसर भी उतने ही व्यापक हैं. देश के पास प्राकृतिक संसाधन, विशाल घरेलू बाज़ार और बढ़ती औद्योगिक माँग जैसी अनेक सकारात्मक परिस्थितियाँ हैं. आवश्यकता इस बात की है कि इन संसाधनों को केवल खनन तक सीमित न रखकर उन्हें आधुनिक प्रौद्योगिकी, मूल्य-वर्धित विनिर्माण और दीर्घकालिक खनिज सुरक्षा से जोड़ा जाए.

सबसे पहली आवश्यकता घरेलू अन्वेषण, खनन और प्रसंस्करण क्षमता को सुदृढ़ करने की है. केवल नए भंडारों की खोज पर्याप्त नहीं होगी; उनके समयबद्ध विकास, आधुनिक प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना तथा उच्च शुद्धता वाले उत्पादों के निर्माण पर समान रूप से ध्यान देना होगा. इससे आयात निर्भरता घटेगी और देश को अधिक आर्थिक लाभ भी प्राप्त होगा.

इसके साथ-साथ अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास को भी प्राथमिकता देनी होगी. दुर्लभ मृदा तत्त्वों के पृथक्करण, स्थायी चुंबकों, बैटरी सामग्री तथा अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों के क्षेत्र में स्वदेशी क्षमता विकसित करना आवश्यक है. विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

भविष्य की खनिज सुरक्षा केवल नए खनन पर आधारित नहीं हो सकती. इसलिए पुनर्चक्रण (Recycling) और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को भी समान महत्त्व देना होगा. ई-कचरे, पुरानी बैटरियों और औद्योगिक अपशिष्ट से महत्त्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक होगी.

भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी रणनीति मजबूत करनी होगी. खनिज-संपन्न देशों के साथ सहयोग, विदेशों में रणनीतिक खनिज परिसंपत्तियों तक पहुँच तथा विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला का विकास भविष्य की आवश्यकता है. इसके साथ ही महत्त्वपूर्ण खनिजों का सीमित रणनीतिक भंडार (Strategic Reserve) विकसित करने पर भी विचार किया जा सकता है, ताकि वैश्विक आपूर्ति व्यवधान की स्थिति में आवश्यक उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़े.

स्पष्ट है कि भारत की सफलता केवल खनिज संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्योग, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच कितना संतुलित एवं दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाता है. यही दृष्टिकोण देश को आत्मनिर्भर, सुरक्षित और प्रतिस्पर्धी खनिज अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे ले जाएगा.

निष्कर्ष

दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण खनिज आज केवल खनिज संपदा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास, उच्च प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार बन चुके हैं. वैश्विक घटनाक्रमों ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में वही देश अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे, जो इन खनिजों के अन्वेषण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और सुरक्षित आपूर्ति शृंखला पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकेंगे.

भारत के पास पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन और बढ़ती औद्योगिक क्षमता है, किंतु इनका पूरा लाभ तभी मिल सकेगा जब संसाधनों को वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक प्रौद्योगिकी, कुशल प्रसंस्करण और दीर्घकालिक नीति के साथ जोड़ा जाए. यदि देश इस दिशा में संतुलित और दूरदर्शी प्रयास करता है, तो महत्त्वपूर्ण खनिज न केवल आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 की आधारशिला बनेंगे, बल्कि भारत को वैश्विक खनिज आपूर्ति शृंखला में एक विश्वसनीय और प्रभावशाली भागीदार के रूप में भी स्थापित करेंगे.

महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

FAQ 1. दुर्लभ मृदा तत्त्व (REE) और महत्त्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) में क्या अंतर है?

उत्तर: दोनों शब्द समान नहीं हैं. दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare Earth Elements-REE) 17 विशिष्ट रासायनिक तत्त्वों का समूह है, जबकि महत्त्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) एक व्यापक श्रेणी है, जिसमें REE के अलावा लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, टंगस्टन, टाइटेनियम, ताँबा आदि अनेक खनिज शामिल होते हैं. किसी खनिज को “महत्त्वपूर्ण” उसकी आर्थिक उपयोगिता, राष्ट्रीय सुरक्षा में भूमिका तथा आपूर्ति जोखिम के आधार पर माना जाता है.

FAQ 2. हल्के (LREE) और भारी (HREE) दुर्लभ मृदा तत्त्वों में क्या अंतर है?

उत्तर: दुर्लभ मृदा तत्त्वों को सामान्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है—हल्के (Light REE) और भारी (Heavy REE). हल्के REE अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में मिलते हैं और प्रायः कार्बोनेट एवं फॉस्फेट खनिजों में पाए जाते हैं, जबकि भारी REE अपेक्षाकृत कम उपलब्ध होते हैं, उनका पृथक्करण अधिक कठिन होता है और उच्च-प्रौद्योगिकी तथा रक्षा उद्योगों में उनका रणनीतिक महत्त्व अधिक माना जाता है.

FAQ 3. दुर्लभ मृदा तत्त्व मुख्यतः किन खनिजों से प्राप्त किए जाते हैं?

उत्तर: यद्यपि वैज्ञानिकों ने लगभग 200 प्रकार के REE युक्त खनिजों की पहचान की है, लेकिन व्यावसायिक स्तर पर अधिकांश उत्पादन केवल तीन प्रमुख खनिजों—बास्टनासाइट (Bastnäsite), मोनाज़ाइट (Monazite) और ज़ेनोटाइम (Xenotime)—से प्राप्त होता है. भारत में मोनाज़ाइट का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इसके पर्याप्त भंडार देश के समुद्री तटीय क्षेत्रों में उपलब्ध हैं.

FAQ 4. क्या भविष्य में ई-कचरा (E-Waste) भी महत्त्वपूर्ण खनिजों का प्रमुख स्रोत बन सकता है?

उत्तर: हाँ. पुराने मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियाँ, पवन टर्बाइन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से महत्त्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति (Recycling) की जा सकती है. उपलब्ध आकलनों के अनुसार वर्ष 2040 तक पुनर्चक्रित खनिज वैश्विक आपूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं. इसलिए भविष्य में पुनर्चक्रण और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की भूमिका लगातार बढ़ने की संभावना है.

FAQ 5. भारत में महत्त्वपूर्ण खनिजों के विकास में KABIL की क्या भूमिका है?

उत्तर: KABIL (Khanij Bidesh India Limited) की स्थापना विदेशों में महत्त्वपूर्ण खनिज परिसंपत्तियों तक भारत की पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है. इसका कार्य लिथियम, कोबाल्ट और अन्य रणनीतिक खनिजों के लिए खनिज-संपन्न देशों में अवसर तलाशना, साझेदारी विकसित करना तथा दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा को मजबूत बनाना है. यह पहल भारत की घरेलू खनिज नीति का पूरक है और वैश्विक आपूर्ति स्रोतों के विविधीकरण में सहायक मानी जाती है.

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