पंचवर्षीय योजनाएँ (Five Year Plans) भारत सरकार द्वारा निर्धारित पाँच वर्षों की अवधि के लिए तैयार की जाने वाली समग्र आर्थिक एवं सामाजिक विकास योजनाएँ थीं. इनका उद्देश्य देश के उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक एवं नियोजित उपयोग कर कृषि, उद्योग, अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरीबी उन्मूलन तथा सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में संतुलित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करना था.
भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल 1951 को प्रारम्भ हुई. वर्ष 1951 से 2017 के बीच कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं. इन योजनाओं का निर्माण, क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन योजना आयोग (Planning Commission) द्वारा किया जाता था. वर्ष 2015 में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई और वर्ष 2017 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था समाप्त कर दी गई. इसके स्थान पर दीर्घकालिक रणनीति, मध्यम अवधि की कार्ययोजना तथा सतत नीति-निर्माण की प्रणाली अपनाई गई.
सरल शब्दों में, पंचवर्षीय योजना वह सरकारी विकास कार्यक्रम है जिसके अंतर्गत पाँच वर्षों के लिए आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों का निर्धारण किया जाता है तथा उन्हें प्राप्त करने हेतु आवश्यक नीतियाँ, योजनाएँ एवं वित्तीय प्रावधान तैयार किए जाते हैं.
पंचवर्षीय योजनाओं का इतिहास (History of Five Year Plans)
भारत में आर्थिक नियोजन की अवधारणा स्वतंत्रता से पहले ही विकसित होने लगी थी. औपनिवेशिक शासन से विरासत में मिली कमजोर अर्थव्यवस्था, व्यापक गरीबी, बेरोजगारी तथा औद्योगिक पिछड़ेपन ने नियोजित विकास की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट किया.
वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee) का गठन किया, जिसने भारत में योजनाबद्ध विकास की आधारशिला रखी. इसके बाद 1944 में देश के प्रमुख उद्योगपतियों—जैसे जे.आर.डी. टाटा, जी.डी. बिड़ला एवं अन्य—ने बॉम्बे प्लान (Bombay Plan) प्रस्तुत किया, जिसमें औद्योगिकीकरण एवं सरकारी निवेश पर बल दिया गया.
इसी अवधि में एम.एन. रॉय द्वारा People’s Plan तथा श्रीमान नारायण अग्रवाल द्वारा Gandhian Plan भी प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने नियोजन के विभिन्न वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने रखे.
विश्व स्तर पर सोवियत संघ ने 1928 में जोसेफ स्टालिन के नेतृत्व में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की थी. इसकी सफलता से प्रभावित होकर अनेक देशों ने नियोजित आर्थिक विकास की नीति अपनाई.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) के मॉडल को अपनाया, जिसमें सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों को विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई. इसी उद्देश्य से 15 मार्च 1950 को योजना आयोग की स्थापना की गई और इसके पश्चात 1951 से पंचवर्षीय योजनाओं का क्रम प्रारम्भ हुआ.
पंचवर्षीय योजनाओं की अवधारणा (Concept of Five Year Plans)
पंचवर्षीय योजना का मूल सिद्धांत यह था कि सरकार आगामी पाँच वर्षों के लिए देश की आर्थिक आवश्यकताओं, उपलब्ध संसाधनों तथा विकास की प्राथमिकताओं का समग्र आकलन कर योजनाबद्ध निवेश करे. इसका उद्देश्य सीमित संसाधनों का अधिकतम एवं न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित करना था.
इस व्यवस्था में केंद्र एवं राज्य सरकारों के व्यय को सामान्यतः योजना व्यय (Plan Expenditure) तथा गैर–योजना व्यय (Non-Plan Expenditure) में विभाजित किया जाता था. योजना व्यय विकासात्मक परियोजनाओं—जैसे सिंचाई, सड़क, उद्योग, शिक्षा एवं स्वास्थ्य—पर किया जाता था, जबकि गैर-योजना व्यय में प्रशासन, वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान तथा अन्य नियमित खर्च शामिल होते थे. वर्ष 2017-18 से इस वर्गीकरण को समाप्त कर राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) एवं पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) की प्रणाली अपनाई गई.
भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ मुख्यतः लोकतांत्रिक नियोजन (Democratic Planning) और मिश्रित अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों पर आधारित थीं. इनका निर्माण योजना आयोग द्वारा किया जाता था, जबकि राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council) राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर योजनाओं को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी.
वर्ष 2015 में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना की गई, जिसने सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद (Cooperative and Competitive Federalism) को बढ़ावा देते हुए नई विकास रणनीति अपनाई. नीति आयोग ने 3-वर्षीय कार्यसूची (Action Agenda), 7-वर्षीय रणनीति (Strategy Paper) तथा 15-वर्षीय दृष्टि दस्तावेज़ (Vision Document) के माध्यम से दीर्घकालिक विकास की नई रूपरेखा प्रस्तुत की.
इस प्रकार, पंचवर्षीय योजनाओं ने लगभग छह दशकों तक भारत के कृषि, उद्योग, ऊर्जा, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव को सुदृढ़ बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई.
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–1956)
- अवधि: 1 अप्रैल 1951 – 31 मार्च 1956
- प्रधानमंत्री: जवाहरलाल नेहरू
- योजना मॉडल: हैरॉड-डोमर (Harrod-Domar Model)
- मुख्य उद्देश्य: कृषि उत्पादन बढ़ाना, सिंचाई का विस्तार तथा खाद्यान्न संकट से उबरना.
- स्वतंत्र भारत की पहली संगठित विकास योजना थी.
- कृषि एवं ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई.
- भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड और दामोदर घाटी जैसी बहुउद्देशीय परियोजनाओं पर विशेष बल दिया गया.
- सामुदायिक विकास कार्यक्रम (Community Development Programme) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा (National Extension Service) का विस्तार किया गया.
- भूमि सुधार एवं सहकारी आंदोलन को प्रोत्साहित किया गया.
- वर्ष 1955 में इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की स्थापना की गई.
- इस योजना के दौरान पाँच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) की स्थापना की आधारशिला रखी गई.
- लक्षित वृद्धि दर: 2.1%
- वास्तविक वृद्धि दर: 3.6%
- स्थिति: लक्ष्य से अधिक वृद्धि प्राप्त होने के कारण यह योजना अत्यंत सफल मानी गई.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–1961)
- अवधि: 1 अप्रैल 1956 – 31 मार्च 1961
- प्रधानमंत्री: जवाहरलाल नेहरू
- योजना मॉडल: महालनोबिस मॉडल (Mahalanobis Model)
- मुख्य उद्देश्य: तीव्र औद्योगिकीकरण तथा भारी उद्योगों का विकास.
- इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) को विकास का प्रमुख आधार बनाया गया.
- इस्पात, मशीन निर्माण एवं भारी इंजीनियरिंग उद्योगों पर विशेष बल दिया गया.
- भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर इस्पात संयंत्रों की स्थापना इसी अवधि में हुई.
- आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) नीति को बढ़ावा दिया गया.
- लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास पर भी ध्यान दिया गया.
- वर्ष 1956 में औद्योगिक नीति संकल्प (Industrial Policy Resolution, 1956) लागू किया गया, जिसने सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को और मजबूत किया.
- भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की स्थापना 1956 में हुई.
- लक्षित वृद्धि दर: 4.5%
- वास्तविक वृद्धि दर: 4.27%
- स्थिति: औद्योगिक आधार मजबूत हुआ, यद्यपि लक्ष्य से थोड़ी कम वृद्धि प्राप्त हुई.
तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961–1966)
- अवधि: 1 अप्रैल 1961 – 31 मार्च 1966
- प्रधानमंत्री: जवाहरलाल नेहरू (1964 तक), तत्पश्चात लाल बहादुर शास्त्री.
- मुख्य उद्देश्य: कृषि में आत्मनिर्भरता तथा संतुलित आर्थिक विकास.
- खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया गया.
- शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास को प्राथमिकता दी गई.
- राज्यों को विकास योजनाओं में अधिक जिम्मेदारी प्रदान की गई.
- पंचायती राज संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने के प्रयास किए गए.
- इस योजना के दौरान 1962 का भारत–चीन युद्ध, 1965 का भारत–पाकिस्तान युद्ध तथा 1965–66 के भीषण सूखे ने अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया.
- इन परिस्थितियों के कारण योजना अपने अधिकांश लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकी.
- लक्षित वृद्धि दर: 5.6%
- वास्तविक वृद्धि दर: 2.4%
- स्थिति: योजना असफल रही और इसके बाद 1966–1969 के बीच योजना अवकाश (Plan Holiday) लागू किया गया.
चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969–1974)
- अवधि: 1 अप्रैल 1969 – 31 मार्च 1974
- प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी
- योजना मॉडल: गाडगिल सूत्र (Gadgil Formula)
- मुख्य उद्देश्य: आर्थिक विकास के साथ स्थिरता एवं आत्मनिर्भरता (Growth with Stability and Self-Reliance).
- तीन वर्ष के योजना अवकाश (1966–69) के बाद यह योजना प्रारम्भ हुई.
- कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा हरित क्रांति (Green Revolution) को गति देने पर विशेष बल दिया गया.
- वर्ष 1969 में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया.
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों के विकास हेतु Drought Prone Areas Programme (DPAP) प्रारम्भ किया गया.
- परिवार नियोजन एवं जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों का विस्तार किया गया.
- ग्रामीण विद्युतीकरण तथा सिंचाई परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 5.6%
- वास्तविक वृद्धि दर: 3.3%
- स्थिति: युद्ध, महँगाई तथा वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के कारण लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सका. हालांकि, बैंक राष्ट्रीयकरण और हरित क्रांति इस योजना की प्रमुख उपलब्धियाँ रहीं.
पंचम पंचवर्षीय योजना (1974–1978)
- अवधि: 1 अप्रैल 1974 – 31 मार्च 1978 (निर्धारित अवधि 1974–79 थी, परन्तु 1978 में समाप्त कर दी गई.)
- प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी (बाद में मोरारजी देसाई सरकार)
- मुख्य उद्देश्य: गरीबी हटाओ (Garibi Hatao) तथा रोजगार के अवसर बढ़ाना.
- आत्मनिर्भरता एवं निर्धन वर्ग के जीवन स्तर में सुधार पर विशेष बल दिया गया.
- न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme – MNP) प्रारम्भ किया गया, जिसके अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल एवं ग्रामीण सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान दिया गया.
- बीस सूत्रीय कार्यक्रम (Twenty Point Programme) वर्ष 1975 में लागू किया गया.
- विद्युत उत्पादन एवं राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास को प्रोत्साहन दिया गया.
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को और मजबूत बनाया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 4.4%
- वास्तविक वृद्धि दर: 4.8%
- स्थिति: योजना ने लक्ष्य से अधिक वृद्धि प्राप्त की, किन्तु 1978 में जनता पार्टी सरकार ने इसे समय से पहले समाप्त कर रोलिंग प्लान लागू कर दिया.
रोलिंग योजना (Rolling Plan) (1978–1980)
- अवधि: 1978–1980
- प्रधानमंत्री: मोरारजी देसाई (जनता पार्टी सरकार)
- प्रस्तावक: योजना आयोग के उपाध्यक्ष डी. टी. लकड़ावाला (D.T. Lakdawala).
- जनता पार्टी सरकार ने पंचम पंचवर्षीय योजना को समाप्त कर रोलिंग योजना लागू की.
- इस योजना में प्रत्येक वर्ष योजनाओं की समीक्षा (Review) की जाती थी.
- समीक्षा के आधार पर अगले वर्ष के लिए नए लक्ष्य एवं बजटीय प्रावधान निर्धारित किए जाते थे.
- इसका उद्देश्य बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं को अधिक लचीला (Flexible) बनाना था.
- इस प्रणाली में एक निश्चित पाँच वर्षीय योजना के स्थान पर निरंतर अद्यतन (Continuous Updating) की व्यवस्था अपनाई गई.
- वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी के पुनः प्रधानमंत्री बनने के बाद रोलिंग योजना समाप्त कर दी गई तथा षष्ठ पंचवर्षीय योजना लागू की गई.
षष्ठ पंचवर्षीय योजना (1980–1985)
- अवधि: 1 अप्रैल 1980 – 31 मार्च 1985
- प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी
- मुख्य उद्देश्य: गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन तथा तकनीकी आधुनिकीकरण.
- आर्थिक उदारीकरण की प्रारम्भिक नीतियों की शुरुआत इसी योजना में दिखाई दी.
- मूल्य नियंत्रण (Price Controls) में क्रमिक कमी लाने का प्रयास किया गया.
- कृषि एवं ग्रामीण विकास के साथ ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष बल दिया गया.
- परिवार नियोजन कार्यक्रम को जनसंख्या नियंत्रण के प्रमुख साधन के रूप में प्रोत्साहित किया गया.
- राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) की स्थापना 1982 में शिवारामन समिति की सिफारिश पर की गई.
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उपयोग तथा उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया.
- ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 5.2%
- वास्तविक वृद्धि दर: 5.7%
- स्थिति: यह योजना सफल रही तथा आर्थिक विकास की नई दिशा प्रदान करने वाली योजना मानी जाती है.
सप्तम पंचवर्षीय योजना (1985–1990)
- अवधि: 1 अप्रैल 1985 – 31 मार्च 1990
- प्रधानमंत्री: राजीव गांधी
- मुख्य उद्देश्य: उत्पादक रोजगार, खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि तथा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण.
- इस योजना का मुख्य विषय था “उत्पादकता, रोजगार एवं सामाजिक न्याय“.
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT), दूरसंचार तथा आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दिया गया.
- औद्योगिक उत्पादकता एवं दक्षता बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया.
- गरीबी उन्मूलन एवं ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का विस्तार किया गया.
- शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मानव संसाधन विकास को प्राथमिकता दी गई.
- जवाहर रोजगार योजना (Jawahar Rozgar Yojana) वर्ष 1989 में प्रारम्भ की गई.
- सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र दोनों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 5.0%
- वास्तविक वृद्धि दर: 6.01%
- स्थिति: लक्ष्य से अधिक आर्थिक वृद्धि प्राप्त हुई और यह योजना सफल मानी गई.
वार्षिक योजनाएँ (Annual Plans) (1990–1992)
- अवधि: 1990–91 एवं 1991–92
- प्रधानमंत्री: विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर तथा पी. वी. नरसिंह राव (कार्यकालानुसार).
- राजनीतिक अस्थिरता एवं गंभीर आर्थिक संकट के कारण अष्टम पंचवर्षीय योजना समय पर प्रारम्भ नहीं हो सकी.
- इसलिए 1990–91 और 1991–92 को दो वार्षिक योजनाओं के रूप में संचालित किया गया.
- इस अवधि में भारत को विदेशी मुद्रा (Balance of Payments) का गंभीर संकट झेलना पड़ा.
- वर्ष 1991 में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार का एक भाग गिरवी रखकर विदेशी ऋण प्राप्त किया.
- नई आर्थिक नीति (New Economic Policy), 1991 लागू की गई.
- इसके अंतर्गत उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) अर्थात LPG सुधार प्रारम्भ हुए.
- औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली में व्यापक ढील दी गई तथा विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिला.
- इन आर्थिक सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को नियोजित नियंत्रण से बाजारोन्मुख (Market-Oriented) व्यवस्था की ओर अग्रसर किया.
- स्थिति: वार्षिक योजनाओं ने आर्थिक स्थिरता स्थापित करने में सहायता की और अष्टम पंचवर्षीय योजना (1992–97) के लिए आधार तैयार किया.
अष्टम पंचवर्षीय योजना (1992–1997)
- अवधि: 1 अप्रैल 1992 – 31 मार्च 1997
- प्रधानमंत्री: पी. वी. नरसिंह राव
- मुख्य उद्देश्य: आर्थिक सुधारों को गति देना तथा मानव संसाधन विकास को बढ़ावा देना.
- यह योजना नई आर्थिक नीति (1991) के बाद लागू होने वाली पहली पंचवर्षीय योजना थी.
- उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं निजी क्षेत्र की भागीदारी पर विशेष बल दिया गया.
- रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन तथा जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई.
- आधारभूत संरचना (Infrastructure) एवं ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाया गया.
- पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरीय निकायों को सशक्त बनाने पर बल दिया गया.
- 73वाँ एवं 74वाँ संविधान संशोधन (1992) लागू हुए, जिससे स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक दर्जा मिला.
- 1 जनवरी 1995 को भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना.
- लक्षित वृद्धि दर: 5.6%
- वास्तविक वृद्धि दर: 6.8%
- स्थिति: आर्थिक उदारीकरण के बाद यह पहली सफल योजना मानी जाती है.
नवम पंचवर्षीय योजना (1997–2002)
- अवधि: 1 अप्रैल 1997 – 31 मार्च 2002
- प्रधानमंत्री: प्रारम्भ में इन्द्र कुमार गुजराल, बाद में अटल बिहारी वाजपेयी.
- मुख्य उद्देश्य: सामाजिक न्याय के साथ समान एवं समावेशी विकास.
- यह योजना भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती (50 वर्ष) के अवसर पर प्रारम्भ हुई.
- कृषि एवं ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई.
- गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन तथा बुनियादी सेवाओं के विस्तार पर बल दिया गया.
- सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया गया.
- निर्यात वृद्धि एवं आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के निर्माण को प्रोत्साहन दिया गया.
- आधारभूत संरचना एवं ऊर्जा क्षेत्र के विकास के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई गई.
- प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) वर्ष 2000 में प्रारम्भ की गई.
- लक्षित वृद्धि दर: 7.1%
- वास्तविक वृद्धि दर: 6.8%
- स्थिति: सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई, लेकिन आर्थिक वृद्धि लक्ष्य से कुछ कम रही.
दशम पंचवर्षीय योजना (2002–2007)
- अवधि: 1 अप्रैल 2002 – 31 मार्च 2007
- प्रधानमंत्री: अटल बिहारी वाजपेयी (प्रारम्भ), बाद में डॉ. मनमोहन सिंह.
- मुख्य उद्देश्य: तीव्र एवं समावेशी आर्थिक विकास (Inclusive Growth).
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की औसत 8% वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया गया.
- गरीबी में उल्लेखनीय कमी तथा 8 करोड़ (80 मिलियन) नए रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा गया.
- क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने पर विशेष बल दिया गया.
- शिक्षा में लैंगिक असमानता एवं वेतन संबंधी विषमताओं को कम करने का लक्ष्य रखा गया.
- आधारभूत संरचना, ऊर्जा, सड़क एवं दूरसंचार क्षेत्र में निवेश बढ़ाया गया.
- सर्व शिक्षा अभियान (SSA) को व्यापक रूप से विस्तार दिया गया.
- राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) वर्ष 2005 में प्रारम्भ किया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 8.1%
- वास्तविक वृद्धि दर: 7.6%
- स्थिति: उच्च आर्थिक वृद्धि के बावजूद निर्धारित लक्ष्य से कुछ कम सफलता प्राप्त हुई.
एकादश पंचवर्षीय योजना (2007–2012)
- अवधि: 1 अप्रैल 2007 – 31 मार्च 2012
- प्रधानमंत्री: डॉ. मनमोहन सिंह
- मुख्य विषय (Theme): तेज़ एवं अधिक समावेशी विकास (Faster and More Inclusive Growth).
- योजना का उद्देश्य आर्थिक विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाना था.
- शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मानव संसाधन विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई.
- उच्च शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) एवं कौशल विकास के विस्तार पर बल दिया गया.
- पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास (Sustainable Development) को विशेष महत्व दिया गया.
- वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (Right to Education Act, 2009) पारित हुआ, जो 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ.
- राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) एवं अन्य सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का विस्तार किया गया.
- सभी ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया.
- योजना का प्रारूप सी. रंगराजन (C. Rangarajan) के नेतृत्व में तैयार किया गया.
- लक्षित वृद्धि दर: 9%
- वास्तविक वृद्धि दर: 8.0%
- स्थिति: वैश्विक आर्थिक मंदी (2008) के बावजूद भारत ने अपेक्षाकृत उच्च आर्थिक वृद्धि बनाए रखी.
द्वादश पंचवर्षीय योजना (2012–2017)
- अवधि: 1 अप्रैल 2012 – 31 मार्च 2017
- प्रधानमंत्री: डॉ. मनमोहन सिंह (2012–2014), बाद में नरेंद्र मोदी (2014–2017).
- मुख्य विषय (Theme): तेज़, अधिक समावेशी एवं सतत विकास (Faster, More Inclusive and Sustainable Growth).
- यह भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना थी.
- आधारभूत संरचना, ऊर्जा, परिवहन एवं ग्रामीण संपर्क के विकास पर विशेष बल दिया गया.
- सभी गाँवों तक विद्युत आपूर्ति एवं बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का लक्ष्य रखा गया.
- शिक्षा में लैंगिक एवं सामाजिक असमानताओं को कम करने पर ध्यान दिया गया.
- उच्च शिक्षा एवं कौशल विकास के अवसरों का विस्तार किया गया.
- पर्यावरण संरक्षण एवं हरित क्षेत्र (Green Cover) में प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख हेक्टेयर वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया गया.
- कृषि के साथ-साथ गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित करने पर बल दिया गया.
- राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) ने योजना के लिए 8% आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य स्वीकृत किया.
- लक्षित वृद्धि दर: 9% (प्रारंभिक प्रस्ताव); स्वीकृत लक्ष्य: 8%
- वास्तविक वृद्धि दर: लगभग 7% (औसत)
- स्थिति: वर्ष 2015 में नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना के बाद पंचवर्षीय योजना प्रणाली को चरणबद्ध रूप से समाप्त किया गया तथा 2017 के बाद भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का स्थान दीर्घकालिक रणनीतिक नीति-निर्माण ने ले लिया.
2017 के बाद भारत में आर्थिक नियोजन
वर्ष 2017 में द्वादश पंचवर्षीय योजना की समाप्ति के साथ भारत ने पारंपरिक पंचवर्षीय योजना प्रणाली को समाप्त कर दिया. इसके स्थान पर दीर्घकालिक रणनीतिक नीति-निर्माण (Long-Term Strategic Policy Framework) को अपनाया गया, जिसका नेतृत्व नीति आयोग (NITI Aayog) करता है.
दीर्घकालिक रणनीतिक नीति–निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ
- 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग (Planning Commission) के स्थान पर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई.
- वर्ष 2017 के बाद नई पंचवर्षीय योजनाएँ तैयार नहीं की गईं.
- नीति आयोग सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद (Cooperative and Competitive Federalism) के सिद्धांत पर कार्य करता है.
- राज्यों को नीति निर्माण एवं विकास योजनाओं में अधिक भागीदारी प्रदान की गई.
- योजनाओं के स्थान पर लचीली (Flexible) एवं परिणाम–आधारित (Outcome-based) विकास रणनीति अपनाई गई.
- सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की साझेदारी (PPP) तथा नवाचार (Innovation) को प्रोत्साहन दिया गया.
- सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) को राष्ट्रीय विकास रणनीति से जोड़ा गया.
- डेटा आधारित नीति-निर्माण, डिजिटल शासन (Digital Governance) तथा रियल-टाइम मॉनिटरिंग पर विशेष बल दिया गया.
नीति आयोग के प्रमुख रणनीतिक दस्तावेज
1. 15-वर्षीय विज़न दस्तावेज़ (15-Year Vision Document)
- भारत के दीर्घकालिक विकास की व्यापक दिशा निर्धारित करता है.
- आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, सुशासन एवं सतत विकास पर केंद्रित है.
2. 7-वर्षीय रणनीति पत्र (7-Year Strategy Paper)
- दीर्घकालिक विज़न को मध्यम अवधि की कार्यनीति में परिवर्तित करता है.
- विभिन्न मंत्रालयों एवं राज्यों के लिए नीतिगत प्राथमिकताएँ निर्धारित करता है.
3. 3-वर्षीय कार्यसूची (3-Year Action Agenda)
- अल्पकालिक विकास लक्ष्यों एवं सुधार कार्यक्रमों का रोडमैप प्रस्तुत करती है.
- इसमें समयबद्ध कार्ययोजनाएँ तथा मापनीय परिणामों पर बल दिया जाता है.
वर्तमान नियोजन व्यवस्था की विशेषताएँ
- पंचवर्षीय योजनाओं के स्थान पर गतिशील (Dynamic) एवं लचीली नीति व्यवस्था अपनाई गई है.
- विकास कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा एवं आवश्यकतानुसार संशोधन किया जाता है.
- आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, गति शक्ति, राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP), राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, हरित विकास तथा विकसित भारत @2047 जैसे कार्यक्रम इसी रणनीतिक नीति-निर्माण का हिस्सा हैं.
- केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय तथा परिणाम-आधारित प्रशासन को विशेष महत्व दिया जाता है.
दीर्घकालिक रणनीतिक नीति–निर्माण की प्रमुख उपलब्धियाँ (Achievements)
- पंचवर्षीय योजनाओं के स्थान पर लचीली एवं परिणाम–आधारित (Outcome-Based) नीति व्यवस्था अपनाई गई.
- सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद (Cooperative & Competitive Federalism) को बढ़ावा मिला तथा राज्यों की भागीदारी बढ़ी.
- डेटा–आधारित नीति–निर्माण एवं रियल-टाइम मॉनिटरिंग को प्रोत्साहन मिला.
- डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, पीएम गति शक्ति, राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) तथा SDGs जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों को नीति-निर्माण से जोड़ा गया.
- नवाचार (Innovation), स्टार्टअप, कौशल विकास तथा निजी निवेश को बढ़ावा मिला.
- योजनाओं के मूल्यांकन, नीति अनुसंधान एवं साक्ष्य-आधारित निर्णय (Evidence-Based Policy Making) पर अधिक बल दिया गया.
दीर्घकालिक रणनीतिक नीति–निर्माण की प्रमुख सीमाएँ (Failures)
- नीति आयोग केवल सलाहकार संस्था (Advisory Body) है; इसके निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं.
- राज्यों में विकास क्षमता एवं संसाधनों की असमानता के कारण नीति क्रियान्वयन में अंतर दिखाई देता है.
- दीर्घकालिक लक्ष्यों के लिए पर्याप्त एवं सुनिश्चित वित्तीय व्यवस्था का अभाव रहता है.
- विभिन्न मंत्रालयों एवं राज्यों के बीच समन्वय संबंधी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं.
- रोजगार, कृषि आय, क्षेत्रीय असमानता एवं सामाजिक विषमता जैसी संरचनात्मक समस्याएँ अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं.
- कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में लक्ष्य एवं वास्तविक उपलब्धियों के बीच अंतर बना हुआ है, जिससे प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता बनी रहती है.
भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य (05 Objectives of Five Year Plans)
भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं था. इनका लक्ष्य आत्मनिर्भर, समावेशी और आधुनिक भारत का निर्माण करना था. इसके पाँच प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
1. आर्थिक विकास (Economic Growth)
सभी पंचवर्षीय योजनाओं में आर्थिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई. स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर थी. प्रति व्यक्ति आय कम थी. बचत और पूँजी निर्माण की दर भी बहुत कम थी. इसलिए देश गरीबी के दुष्चक्र में फँसा हुआ था.
इस स्थिति को बदलने के लिए योजनाओं में कृषि, उद्योग, ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों के विकास पर जोर दिया गया. लक्ष्य राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना था. इससे गरीबी कम हो और लोगों के जीवन स्तर में सुधार आए.
2. आर्थिक समानता एवं सामाजिक न्याय (Economic Equity and Social Justice)
इस उद्देश्य का लक्ष्य गरीबी और आर्थिक असमानता को कम करना था. योजनाकार चाहते थे कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचे. केवल कुछ लोगों के हाथों में संपत्ति और आय का केंद्रीकरण उचित नहीं माना गया.
इसी सोच के साथ योजनाओं में समावेशी विकास पर बल दिया गया. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974–79) में पहली बार ‘गरीबी हटाओ‘ को प्रमुख लक्ष्य बनाया गया.
3. पूर्ण रोजगार (Full Employment)
बेरोजगारी दूर करना पंचवर्षीय योजनाओं का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था. लेकिन शुरुआती योजनाओं में इसे पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली.
छठी पंचवर्षीय योजना (1980–85) में रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया गया. सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985–90) में इसे विकास नीति का प्रमुख लक्ष्य बनाया गया. इसके बावजूद जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारी की समस्या बनी रही.
4. आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Self-Reliance)
आर्थिक आत्मनिर्भरता का अर्थ है विदेशी सहायता और आयात पर निर्भरता कम करना. स्वतंत्रता के बाद भारत खाद्यान्न, उर्वरक, कच्चे माल और मशीनों के आयात पर काफी निर्भर था.
इसी कारण योजनाओं में घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया. चौथी पंचवर्षीय योजना से आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व मिला. पाँचवीं योजना में खाद्यान्न उत्पादन, निर्यात वृद्धि और आयात-प्रतिस्थापन उद्योगों को बढ़ावा दिया गया. इससे कई क्षेत्रों में भारत की विदेशी निर्भरता घटी. फिर भी पूर्ण आत्मनिर्भरता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका.
5. आधुनिकीकरण (Modernisation)
आधुनिकीकरण को पहली बार छठी पंचवर्षीय योजना में प्रमुख उद्देश्य बनाया गया. इसका अर्थ था अर्थव्यवस्था को आधुनिक और तकनीक आधारित बनाना.
इसके लिए नए उद्योग स्थापित किए गए. नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया. कृषि और उद्योग में तकनीकी सुधार हुए. इससे उत्पादन क्षमता बढ़ी. हालांकि, मशीनीकरण से रोजगार पर प्रभाव पड़ने की आशंका भी बनी रही. इसलिए योजनाकारों ने विकास और रोजगार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया.
अल्पकालिक उद्देश्य (Short-term Objectives)
दीर्घकालिक उद्देश्यों के साथ प्रत्येक पंचवर्षीय योजना के कुछ अल्पकालिक उद्देश्य भी थे. ये उस समय की परिस्थितियों के अनुसार तय किए जाते थे.
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–56) में कृषि विकास, महँगाई पर नियंत्रण और शरणार्थियों के पुनर्वास पर जोर दिया गया.
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–61) का मुख्य लक्ष्य आधारभूत और भारी उद्योगों का विकास था.
- तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961–66) में आधारभूत उद्योगों के विस्तार पर बल दिया गया. बाद में चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों के कारण रक्षा क्षेत्र को भी प्राथमिकता दी गई.
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था: उपलब्धियाँ एवं सीमाएँ
पंचवर्षीय योजनाओं की प्रमुख उपलब्धियाँ (Achievements of Five Year Plans)
1. उच्च आर्थिक वृद्धि दर (Higher Economic Growth)
पंचवर्षीय योजनाओं का प्रमुख उद्देश्य भारत में तीव्र, संतुलित एवं समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करना था. स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि-प्रधान, निम्न आय वाली तथा औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ी हुई थी. योजनाबद्ध विकास के परिणामस्वरूप सकल घरेलू उत्पाद (GDP), राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि हुई. संपूर्ण पंचवर्षीय योजना काल (1951–2017) में भारत ने औसतन लगभग 5 प्रतिशत की वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर्ज की, जो औपनिवेशिक काल की तुलना में उल्लेखनीय उपलब्धि थी. विशेष रूप से 1980 के दशक के बाद तथा 1991 के आर्थिक सुधारों के पश्चात विकास दर में तीव्र वृद्धि हुई और भारत विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया.
2. आर्थिक अवसंरचना का तीव्र विकास (Expansion of Economic Infrastructure)
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान परिवहन, ऊर्जा, सिंचाई एवं संचार जैसी आधारभूत संरचनाओं का व्यापक विकास हुआ. स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 4 लाख किमी सड़क नेटवर्क था, जो योजना काल के अंत तक 50 लाख किमी से अधिक हो गया और भारत विश्व के सबसे बड़े सड़क नेटवर्क वाले देशों में शामिल हो गया. रेलवे मार्गों का विस्तार, विद्युत उत्पादन क्षमता में कई गुना वृद्धि, प्रमुख बंदरगाहों एवं हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण तथा दूरसंचार नेटवर्क का तीव्र विस्तार इसी अवधि में हुआ. भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, नागार्जुन सागर, इंदिरा गांधी नहर जैसी बहुउद्देशीय परियोजनाओं ने सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन दोनों क्षेत्रों को नई गति प्रदान की.
3. आधारभूत एवं पूंजीगत उद्योगों का विकास (Development of Basic and Capital Goods Industries)
द्वितीय पंचवर्षीय योजना में अपनाए गए महालनोबिस मॉडल ने भारत में भारी उद्योगों एवं पूंजीगत वस्तु उद्योगों के विकास की मजबूत नींव रखी. भिलाई, राउरकेला एवं दुर्गापुर इस्पात संयंत्र, भारी विद्युत उपकरण, मशीन निर्माण, उर्वरक, पेट्रो-रसायन तथा इंजीनियरिंग उद्योगों का उल्लेखनीय विस्तार हुआ. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) औद्योगिकीकरण के प्रमुख आधार बने. परिणामस्वरूप भारत आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था से धीरे-धीरे औद्योगिक आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ.
4. कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति (Agricultural Development)
प्रारंभिक योजनाओं में कृषि विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई. हरित क्रांति (Green Revolution), उच्च उत्पादक बीज, रासायनिक उर्वरकों, आधुनिक सिंचाई एवं कृषि अनुसंधान के विस्तार से खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. जहाँ स्वतंत्रता के समय भारत खाद्यान्न आयात पर निर्भर था, वहीं बाद के वर्षों में देश खाद्यान्न उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर बन गया. दुग्ध उत्पादन में श्वेत क्रांति (Operation Flood) तथा बागवानी एवं मत्स्य क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई. कृषि उत्पादकता में वृद्धि ने खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ किया.
5. बचत, निवेश एवं पूंजी निर्माण में वृद्धि (Growth in Savings and Investment)
योजनाबद्ध विकास ने घरेलू बचत, निवेश तथा पूंजी निर्माण को प्रोत्साहित किया. प्रारंभिक वर्षों में सकल घरेलू बचत GDP के लगभग 10 प्रतिशत के आसपास थी, जो समय के साथ बढ़कर 30 प्रतिशत से अधिक तक पहुँच गई. सकल पूंजी निर्माण (Gross Capital Formation) में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे उद्योग, ऊर्जा, परिवहन एवं अवसंरचना क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश संभव हो सका. वित्तीय संस्थानों, बैंकिंग नेटवर्क एवं पूंजी बाजार के विस्तार ने निवेश क्षमता को मजबूत किया तथा दीर्घकालीन आर्थिक विकास की आधारशिला रखी.
6. मानव विकास एवं सामाजिक क्षेत्र में सुधार
पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण विकास तथा सामाजिक सुरक्षा पर निरंतर निवेश किया गया. प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009), राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) तथा एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) जैसी योजनाओं ने मानव विकास सूचकांकों में सुधार किया. औसत आयु, साक्षरता दर तथा स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई.
7. विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं संस्थागत विकास
योजना काल में IIT, IIM, AIIMS, ISRO, DRDO, BARC, NABARD, SIDBI तथा अनेक राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों की स्थापना एवं विस्तार हुआ. अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार के क्षेत्रों में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की. इन संस्थागत सुधारों ने दीर्घकालीन आर्थिक विकास एवं तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत आधार प्रदान किया.
पंचवर्षीय योजनाओं की प्रमुख सीमाएँ (Major Failures of Five Year Plans)
1. अपेक्षित आर्थिक वृद्धि प्राप्त न होना (Inadequate Growth Rate)
यद्यपि भारत ने योजनाबद्ध विकास के दौरान उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की, फिर भी अधिकांश पंचवर्षीय योजनाएँ निर्धारित विकास लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकीं. प्रथम एवं षष्ठ योजना को छोड़कर कई योजनाओं में वास्तविक वृद्धि दर लक्ष्य से कम रही. कृषि पर निर्भरता, युद्ध, सूखा, वैश्विक आर्थिक संकट तथा प्रशासनिक कमियों ने विकास की गति को प्रभावित किया. लंबे समय तक भारत की प्रति व्यक्ति आय निम्न बनी रही और विकसित देशों की तुलना में विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा.
2. समाजवादी समाज की परिकल्पना साकार न होना
पंचवर्षीय योजनाओं का एक प्रमुख उद्देश्य “समाजवादी ढाँचे वाले समाज” (Socialistic Pattern of Society) का निर्माण था. इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार, आय के पुनर्वितरण तथा सामाजिक न्याय पर बल दिया गया. किंतु आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका. वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण (LPG) की नीति अपनाई, जिससे अर्थव्यवस्था अधिक बाजारोन्मुख (Market-Oriented) हो गई और समाजवादी नियोजन की मूल अवधारणा धीरे-धीरे समाप्त हो गई.
3. आर्थिक असमानता एवं सामाजिक विषमता
योजनाओं का उद्देश्य आय एवं संपत्ति की असमानताओं को कम करना था, परंतु विकास का लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच सका. ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों, विकसित एवं पिछड़े राज्यों तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच आय एवं अवसरों की विषमता बनी रही. यद्यपि गरीबी अनुपात में उल्लेखनीय कमी आई, फिर भी क्षेत्रीय असमानता, सामाजिक बहिष्करण तथा आय का असमान वितरण भारत की प्रमुख चुनौतियाँ बने रहे.
4. बेरोजगारी की समस्या
रोजगार सृजन पंचवर्षीय योजनाओं का प्रमुख लक्ष्य था, लेकिन जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं हो सके. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, पूंजी-प्रधान औद्योगिकीकरण तथा कौशल की कमी के कारण खुली एवं प्रच्छन्न (Disguised) बेरोजगारी लंबे समय तक बनी रही. यद्यपि विभिन्न रोजगार योजनाएँ—जैसे जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना तथा बाद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)—प्रारम्भ की गईं, फिर भी गुणवत्तापूर्ण एवं स्थायी रोजगार सृजन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सका.
5. योजनाओं के क्रियान्वयन में कमियाँ
भारतीय नियोजन की सबसे बड़ी चुनौती योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन रहा. अनेक परियोजनाएँ लागत वृद्धि (Cost Overrun), समय विलंब (Time Overrun), प्रशासनिक अक्षमता, लालफीताशाही तथा समन्वय की कमी से प्रभावित हुईं. संसाधनों का अपव्यय, भ्रष्टाचार तथा निगरानी तंत्र की कमजोरियों ने कई योजनाओं की प्रभावशीलता को सीमित कर दिया. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सुखमय चक्रवर्ती (Sukhamoy Chakravarty) ने भी टिप्पणी की थी कि भारतीय योजनाएँ सिद्धांततः उत्कृष्ट थीं, किंतु उनके प्रभावी कार्यान्वयन में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी.
6. सार्वजनिक क्षेत्र की सीमित दक्षता
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को औद्योगिकीकरण का आधार बनाया गया. किंतु समय के साथ अनेक सार्वजनिक उपक्रम कम उत्पादकता, राजनीतिक हस्तक्षेप, वित्तीय घाटे तथा प्रबंधन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हो गए. परिणामस्वरूप कई उपक्रम अर्थव्यवस्था पर वित्तीय बोझ बन गए, जिसके कारण 1991 के बाद विनिवेश (Disinvestment) एवं संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता महसूस हुई.
PM और उनके कार्यकाल में नियोजन

निष्कर्ष
पंचवर्षीय योजनाओं ने स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास, औद्योगिकीकरण, कृषि आत्मनिर्भरता, अवसंरचना निर्माण तथा मानव विकास की मजबूत नींव रखी. यद्यपि इन योजनाओं की कई सीमाएँ रहीं—जैसे असमानता, बेरोजगारी, लक्ष्य एवं उपलब्धि के बीच अंतर तथा क्रियान्वयन संबंधी कमियाँ—फिर भी इन्होंने भारत को एक नियोजित अर्थव्यवस्था से वैश्विक स्तर पर उभरती हुई अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यही कारण है कि 2017 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं का स्थान परिणाम-आधारित, लचीले एवं दीर्घकालिक रणनीतिक नीति-निर्माण ने लिया, जिसकी अगुवाई आज नीति आयोग (NITI Aayog) कर रहा है.
परीक्षा हेतु उपयोगी तथ्य
- योजना आयोग की स्थापना: 15 मार्च 1950
- नीति आयोग की स्थापना: 1 जनवरी 2015
- अंतिम पंचवर्षीय योजना: द्वादश पंचवर्षीय योजना (2012–2017)
- नई पंचवर्षीय योजना: 2017 के बाद कोई पंचवर्षीय योजना लागू नहीं की गई.
- वर्तमान मॉडल: दीर्घकालिक रणनीतिक नीति-निर्माण (Long-Term Strategic Policy Framework) एवं परिणाम-आधारित विकास (Outcome-Based Planning).
भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q.1. भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
उत्तर: पंचवर्षीय योजनाओं के प्रमुख उद्देश्य तीव्र आर्थिक विकास, कृषि एवं औद्योगिक प्रगति, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन, आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय एवं सामाजिक असमानताओं में कमी तथा लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना था.
Q.2. भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर: प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–56) का मुख्य उद्देश्य कृषि विकास, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना था.
Q.3. द्वितीय पंचवर्षीय योजना किस मॉडल पर आधारित थी?
उत्तर: द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–61) महालनोबिस मॉडल (Mahalanobis Model) पर आधारित थी, जिसका मुख्य लक्ष्य भारी उद्योगों एवं सार्वजनिक क्षेत्र का विकास था.
Q.4. एकादश पंचवर्षीय योजना (2007–12) का मुख्य विषय (Theme) क्या था?
उत्तर: एकादश पंचवर्षीय योजना का मुख्य विषय “तेज़ एवं अधिक समावेशी विकास (Faster and More Inclusive Growth)” था.
Q.5. द्वादश पंचवर्षीय योजना (2012–17) का मुख्य विषय क्या था?
उत्तर: द्वादश पंचवर्षीय योजना का मुख्य विषय “तेज़, अधिक समावेशी एवं सतत विकास (Faster, More Inclusive and Sustainable Growth)” था.
Q.6. भारत में रोलिंग योजना (Rolling Plan) क्या थी?
उत्तर: रोलिंग योजना (1978–80) ऐसी नियोजन प्रणाली थी, जिसमें प्रत्येक वर्ष योजना की समीक्षा कर अगले वर्ष के लक्ष्य एवं संसाधनों में आवश्यक संशोधन किए जाते थे.
Q.7. पंचवर्षीय योजनाओं का स्थान किस संस्था ने लिया?
उत्तर: वर्ष 2015 में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना की गई. वर्ष 2017 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के स्थान पर दीर्घकालिक रणनीतिक एवं परिणाम-आधारित नीति-निर्माण की व्यवस्था अपनाई गई.
Q.8. पंचवर्षीय योजनाओं की दो प्रमुख उपलब्धियाँ बताइए.
उत्तर: (i) कृषि एवं औद्योगिक विकास को गति मिली. (ii) आधारभूत अवसंरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ.
Q.9. पंचवर्षीय योजनाओं की दो प्रमुख सीमाएँ क्या थीं?
उत्तर: (i) अधिकांश योजनाएँ निर्धारित आर्थिक वृद्धि लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकीं. (ii) बेरोजगारी, आय असमानता एवं क्षेत्रीय विषमताओं जैसी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकीं.
Q.10. भारत में कुल कितनी पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं?
उत्तर: भारत में 1951 से 2017 के बीच कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं. इसके बाद पंचवर्षीय योजना प्रणाली समाप्त कर दी गई.



