बिहार में सिंचाई के साधन, परियोजनाएं, सरकारी कार्यक्रम व नीति

बिहार की कृषि मूलतः मानसून-आधारित है, और मानसूनी वर्षा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी अनिश्चितता तथा असमान स्थानिक-कालिक वितरण है. राज्य में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1000-1200 मिमी होती है, परंतु इसका लगभग 85 प्रतिशत भाग केवल जून-सितंबर के दक्षिण-पश्चिम मानसून काल में ही प्राप्त होता है, जिससे शेष वर्ष शुष्क बना रहता है.

वर्षा की मात्रा एवं वितरण में क्षेत्रीय भिन्नता के कारण राज्य के उत्तरी भाग में प्रायः बाढ़ तथा दक्षिणी भाग में सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न होती है. यद्यपि राज्य में जल संसाधनों की प्रचुर उपलब्धता है (गंगा, कोसी, गंडक, सोन, बागमती, कमला-बलान जैसी बड़ी नदियाँ तथा विशाल भूजल भंडार), फिर भी असमान वितरण और अवसंरचनात्मक कमियों के कारण जल का समुचित उपयोग नहीं हो पाता. इसीलिए कृत्रिम सिंचाई कृषि उत्पादकता बढ़ाने का सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत साधन बन जाती है — उर्वरक, उन्नत बीज, यंत्रीकरण एवं कीटनाशकों जैसे अन्य कृषि-आगतों की सफलता भी अंततः सुनिश्चित सिंचाई पर निर्भर करती है.

सिविल सेवा परीक्षा (BPSC/UPSC) की दृष्टि से यह विषय बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था, बाढ़-सुखाड़ प्रबंधन तथा अंतरराज्यीय जल-बँटवारा विवादों (जैसे बाणसागर) से जुड़ा होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है.

इस लेख में हम जानेंगे

सिंचाई क्षमता की वर्तमान स्थिति

केंद्रीय जल आयोग एवं बिहार सरकार के अनुमान के अनुसार राज्य की कुल अंतिम सिंचाई क्षमता (Ultimate Irrigation Potential) लगभग 117.54 लाख हेक्टेयर आँकी गई है, जिसमें बृहद एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का योगदान 53.53 लाख हेक्टेयर तथा लघु सिंचाई (भूतल एवं भूजल दोनों) का योगदान 64.01 लाख हेक्टेयर है. हाल के आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार अब तक सृजित सिंचाई क्षमता में निरंतर वृद्धि हुई है.

बृहद एवं मध्यम योजनाओं से लगभग 29-30 लाख हेक्टेयर तथा लघु सिंचाई योजनाओं से लगभग 40-41 लाख हेक्टेयर क्षमता सृजित की जा चुकी है, यानी कुल सृजित क्षमता लगभग 70 लाख हेक्टेयर के आसपास पहुँच चुकी है. बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य का कुल बुआई-योग्य क्षेत्र लगभग 8,207 हजार हेक्टेयर तथा शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 5,412 हजार हेक्टेयर है, जबकि फसल सघनता (Cropping Intensity) लगभग 152 प्रतिशत आँकी गई है.

विभिन्न कृषि-सांख्यिकीय स्रोतों के अनुसार राज्य में शुद्ध सिंचित क्षेत्र, शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 60-63 प्रतिशत है, तथा सकल सिंचित क्षेत्र में नलकूपों की हिस्सेदारी सर्वाधिक (लगभग 53-55 प्रतिशत), उसके बाद नहरों की (लगभग 30-34 प्रतिशत) है, शेष योगदान तालाब, कुआँ, आहर-पइन तथा अन्य साधनों का है.

स्वतंत्रता के समय की तुलना में यह एक बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन है, जब कुआँ, तालाब, नहर तथा अन्य साधनों की संयुक्त हिस्सेदारी सर्वाधिक थी और नलकूप सिंचाई का महत्व नगण्य था. यह बदलाव मुख्यतः ग्रामीण विद्युतीकरण, डीजल पंपसेट के प्रसार तथा गंगा के मैदानी भाग में उथले जलस्तर (जहाँ 10-15 फीट खोदने पर ही जल प्राप्त हो जाता है) के कारण संभव हुआ.

सिंचाई के प्रमुख साधन

बिहार में परंपरागत रूप से सिंचाई के चार प्रमुख साधन माने जाते हैं — नहर, कुआँ, नलकूप तथा तालाब. इसके अतिरिक्त दक्षिण बिहार के मैदानी भाग में आहर-पइन प्रणाली सहभागी (participatory) सिंचाई प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण पारंपरिक माध्यम है, जिसमें आहर वर्षाजल संग्रहण का जलाशय होता है तथा पइन उससे खेतों तक जल पहुँचाने वाली नहरनुमा जलधारा.

नहर सिंचाई (Canal Irrigation in Hindi)

नहर सिंचाई राज्य में सिंचाई का सबसे प्रमुख साधन है. बिहार में मुख्यतः दो प्रकार की नहरें पाई जाती हैं — नित्यवाही (Perennial) नहरें, जो वर्षभर जल-प्रवाह बनाए रखती हैं और मुख्यतः उत्तर बिहार में पाई जाती हैं क्योंकि ये सीधे नदियों या उन पर बने बाँधों के कृत्रिम जलाशयों से निकाली जाती हैं; तथा मौसमी या अनित्यवाही नहरें, जो सीधे नदियों से निकलती हैं परंतु इनमें केवल वर्षाकाल का अतिरिक्त जल ही प्रवाहित होता है. कृषि की दृष्टि से नित्यवाही नहरें अधिक लाभदायक मानी जाती हैं. राज्य में 11 प्रमुख नहरें एवं उनकी अनेक उप-शाखाएँ विभिन्न जिलों में फैली हुई हैं. नहर सिंचाई से सर्वाधिक लाभान्वित जिलों में रोहतास, पश्चिमी चंपारण तथा औरंगाबाद प्रमुख हैं.

नलकूप सिंचाई (Tubewell Irrigation in Hindi)

नलकूप सिंचाई दूसरा सबसे प्रमुख साधन है, जिसे डीजल इंजन या विद्युत शक्ति द्वारा संचालित किया जाता है. गंगा के मैदान की भौगोलिक बनावट पातालतोड़ कुएँ (Artesian Well) जैसी है, जहाँ भूमिगत जल कम गहराई पर उपलब्ध होने से नलकूप एवं ट्यूबवेल सिंचाई के लिए आदर्श स्थितियाँ बनती हैं.

आधुनिक नलकूपों में सामान्यतः 15 से 100 मीटर तक गहरे खोखले पाइप डालकर पंप विधि से जल निकाला जाता है. नलकूप सिंचाई द्वारा सर्वाधिक सिंचाई अरारिया, पटना एवं किशनगंज जैसे जिलों में होती है, जबकि रोहतास में सबसे कम, क्योंकि वहाँ नहरी सिंचाई पहले से ही विकसित है.

निजी नलकूपों को प्रोत्साहन देने हेतु राज्य सरकार ने “बिहार शताब्दी निजी नलकूप योजना” जैसी सब्सिडी-आधारित योजनाएँ चलाई हैं, जिनके अंतर्गत छिछले (70 मीटर तक गहरे) एवं मध्यम गहराई वाले (70-100 मीटर) नलकूपों के लिए क्रमशः अनुदान दिया जाता है. इसके अतिरिक्त मिलियन शैलो ट्यूबवेल कार्यक्रम एवं बिहार भूजल सिंचाई योजना (बिगविस) भी निजी नलकूपों को बढ़ावा देने हेतु संचालित हैं.

तालाब सिंचाई (Pond Irrigation in Hindi)

तालाब सिंचाई एक अत्यंत प्राचीन पद्धति है जो प्रायः सभी जिलों में प्रचलित है. तालाब प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों प्रकार के होते हैं, जिनमें संगृहीत जल सिंचाई हेतु प्रयुक्त होता है. गोपालगंज जिले में तालाबों से सिंचाई का अनुपात सर्वाधिक है.

कुआँ सिंचाई प्राचीनतम साधनों में गिनी जाती है, जिसमें ढेंकुली एवं रहट जैसी परंपरागत तकनीकों से जल निकालकर नालियों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता है. सारण, सीवान एवं गोपालगंज जिलों में कुआँ-सिंचाई का सर्वाधिक प्रचलन देखा जाता है, यद्यपि कुल सिंचित क्षेत्र में इसकी हिस्सेदारी अब बहुत कम रह गई है.

जिलावार सिंचाई-कवरेज के आँकड़े दर्शाते हैं कि अरवल, रोहतास, जमुई, बक्सर, भोजपुर, गोपालगंज तथा सीवान जैसे जिलों में कृषि भूमि का 70 प्रतिशत से अधिक भाग सिंचित है (अरवल में सर्वाधिक, लगभग 87 प्रतिशत), जबकि सुपौल, सहरसा, अररिया, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, समस्तीपुर, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, खगड़िया एवं नवादा जैसे कोसी-सीमांचल क्षेत्र के जिलों में सिंचाई-कवरेज 50 प्रतिशत से भी कम है — यह असमानता कोसी की बाढ़-प्रवृत्ति एवं भूमि-उपयोग की चुनौतियों से जुड़ी है और परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु है.

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ (Multipurpose River Valley Projects in Hindi)

बिहार में जल संसाधन के समुचित उपयोग हेतु दो प्रकार की नीतियाँ अपनाई गई हैं — बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की नहरें, तथा कमांड क्षेत्र विकास पर आधारित सिंचाई नहर योजनाएँ. राज्य की तीन प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ इस प्रकार हैं:

कोसी परियोजना (Kosi Project)

भारत एवं नेपाल सरकार की यह संयुक्त परियोजना 1954 में हुए समझौते (1961 में संशोधित) पर आधारित है. निर्माण कार्य 1955 में आरंभ होकर 1963 में पूर्ण हुआ. इसके मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मलेरिया उन्मूलन तथा भूमि संरक्षण हैं.

नेपाल स्थित हनुमाननगर में निर्मित कोसी बराज (कंक्रीट बाँध, लंबाई 1140 मीटर) से दो नहर प्रणालियाँ निकाली गई हैं — पूर्वी कोसी नहर प्रणाली (मुख्य नहर 44 किमी; शाखाएँ — मुरलीगंज, जानकीनगर, पूर्णिया/बनमनखी, अररिया नहरें; मधेपुरा, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार जिलों में सिंचाई; कटैया में 20 मेगावाट जल-विद्युत केंद्र; लगभग 5 लाख हेक्टेयर सिंचाई-क्षमता) तथा पश्चिमी कोसी नहर प्रणाली (लंबाई 115 किमी; मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर में सिंचाई; लगभग 3.25 लाख हेक्टेयर क्षमता).

कोसी नदी को इसकी बाढ़-विनाशकारी प्रवृत्ति एवं मार्ग-परिवर्तन की प्रवृत्ति के कारण “बिहार का शोक” (Sorrow of Bihar) कहा जाता है.

Kosi Project Infographic with Map in Hindi

गंडक परियोजना (Gandak Project)

भारत सरकार के सहयोग से बिहार तथा उत्तर प्रदेश की यह संयुक्त परियोजना है, जिसका लाभ 1959 के समझौते के आधार पर नेपाल को भी प्राप्त होता है. वाल्मीकिनगर (बिहार) में त्रिवेणी घाट पर 1969-70 में बाँध का निर्माण हुआ, जिसका आधा भाग बिहार तथा आधा नेपाल में स्थित है, इसीलिए इसे त्रिवेणी नहर प्रणाली भी कहते हैं.

इसके अंतर्गत पूर्वी त्रिवेणी नहर (जिसे तिरहुत नहर भी कहते हैं, कुल लंबाई 293 किमी, लगभग 6.6 लाख हेक्टेयर सिंचाई-क्षमता, पूर्वी चंपारण-पश्चिमी चंपारण-मुजफ्फरपुर-वैशाली-समस्तीपुर जिलों को लाभ, सर्वाधिक लाभान्वित जिला पश्चिमी चंपारण) तथा पश्चिमी त्रिवेणी नहर (जिसे सारण नहर भी कहते हैं, कुल लंबाई 200 किमी — नेपाल में 19 किमी, उत्तर प्रदेश में 112 किमी, बिहार में 69 किमी; सारण प्रमंडल के गोपालगंज, सारण, सीवान जिलों में लगभग 4.84 लाख हेक्टेयर सिंचाई) सम्मिलित हैं.

इसके अतिरिक्त पूर्वी एवं पश्चिमी नेपाल नहरें (दोनों नेपाल में स्थित) भी इस परियोजना का भाग हैं, तथा वाल्मीकिनगर एवं सूरजपुरा (नेपाल) में स्थापित जल-विद्युत केंद्रों की संयुक्त क्षमता लगभग 30 मेगावाट (15+15) है.

Gandak Project Map and Infographic in Hindi

सोन परियोजना (Sone Project)

बिहार की प्रथम बृहद सिंचाई परियोजना, जिसका निर्माण 1874 में डेहरी के निकट बारुन नामक स्थान पर बाँध बनाकर किया गया था (बाँध लंबाई 3801 मीटर, ऊँचाई 2.44 मीटर). यह दक्षिण-पश्चिमी बिहार के सर्वाधिक सुखाड़ग्रस्त क्षेत्र को सिंचित करने हेतु बनाई गई थी, जो आज बिहार का “अन्न भंडार” बन चुका है.

1968 में इंद्रपुरी में 14,010 मीटर लंबा बैराज बनाया गया. डेहरी के पास से दो नहरें निकाली गई हैं — पूर्वी सोन नहर (लंबाई 130 किमी, बारुन से पटना तक; लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर सिंचाई; औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, अरवल, पटना जिलों को लाभ) तथा पश्चिमी सोन नहर (डेहरी से निकलकर रोहतास, कैमूर, बक्सर, भोजपुर जिलों में लगभग 3 लाख हेक्टेयर से अधिक सिंचाई). सोन नहर प्रणाली पर डेहरी (6.6 मेगावाट) एवं बारुन (3.3 मेगावाट) जल-विद्युत केंद्र स्थापित हैं.

Sone River Canal Project Map and Infographic in Hindi

बाणसागर जलविवाद एवं समझौता

बाणसागर जल-विवाद बिहार एवं उत्तर प्रदेश के मध्य है. रबी मौसम में सोन-नहर सिंचाई पर निर्भर कैमूर, रोहतास, बक्सर, भोजपुर, अरवल, औरंगाबाद तथा गया जिलों में जल की कमी हो जाती है, क्योंकि आवश्यक 6000-8000 क्यूसेक की तुलना में उत्तर प्रदेश द्वारा प्रायः 3000-4000 क्यूसेक जल ही छोड़ा जाता था. इस समस्या के समाधान हेतु 1973 में मध्य प्रदेश, बिहार एवं उत्तर प्रदेश के बीच त्रिपक्षीय जल-बँटवारा समझौता हुआ.

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सोन नदी पर निर्मित बाणसागर बाँध (नामकरण संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान बाणभट्ट के नाम पर) का निर्माण कार्य 1978 में आरंभ होकर 2006 में पूर्ण हुआ. समझौते के अनुसार सोन एवं सहायक नदियों का कुल वार्षिक जल-प्रवाह 14,250 लाख एकड़ फीट माना गया, जिसमें बिहार को 7,750 लाख एकड़ फीट, उत्तर प्रदेश को 1,250 लाख एकड़ फीट तथा मध्य प्रदेश को 5,250 लाख एकड़ फीट आवंटित हुआ. बिहार के हिस्से में से 50 लाख एकड़ फीट सोन-नहरों के लिए सुरक्षित रखा गया.

बाणसागर जलाशय की क्षमता 40 लाख एकड़ फीट है तथा मध्य प्रदेश, बिहार एवं उत्तर प्रदेश के मध्य जल एवं निर्माण-लागत का बँटवारा 2:1:1 के अनुपात में हुआ. इस परियोजना से बिहार में लगभग 940 वर्ग किमी क्षेत्र सिंचित होता है तथा 425 मेगावाट विद्युत उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग मुख्यतः मध्य प्रदेश करता है.

समझौते के बावजूद पर्याप्त जल-आपूर्ति न मिलने की शिकायत बिहार करता रहा है. 1980 में गठित सोन नदी आयोग को आपसी मतभेद एवं केंद्र की उदासीनता के चलते 1987 में भंग कर दिया गया. यह अंतरराज्यीय जल-विवाद प्रबंधन तंत्र की सीमाओं को दर्शाने वाला उपयोगी उदाहरण है.

अन्य उल्लेखनीय नहरों में ढाका नहर तथा तेउर नहर (पूर्वी चंपारण), कमला नहर (दरभंगा-मधुबनी), सकरी नहर (गया-मुंगेर) एवं यमुना नहर (जहानाबाद) प्रमुख हैं.

अन्य सिंचाई परियोजनाएँ एवं जलाशय

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अतिरिक्त दुर्गावती जलाशय योजना (कैमूर-रोहतास), ऊपरी किऊल जलाशय परियोजना (लखीसराय-मुंगेर), बागमती परियोजना (सीतामढ़ी) तथा बरनाल जलाशय योजना (जमुई) उल्लेखनीय हैं. इसके अतिरिक्त चंदन जलाशय बाँध (भागलपुर, 1972) तथा बढ़ुआ जलाशय बाँध (भागलपुर, 1965) भी सिंचाई-उद्देश्य से निर्मित किए गए. लघु सिंचाई योजनाओं में जमानिया पंप नहर, सम्मत बिगहा-मोरहर योजना, कचनामा वीयर, सोलहहड्डा वीयर आदि जहानाबाद तथा गया जिलों में संचालित हैं.

नदी अंतर्संबंधन (River Interlinking) योजनाएँ

बिहार में जल संसाधन की बहुलता के बावजूद बाढ़ एवं सुखाड़ की सह-उपस्थिति के कारण नदियों के अंतर्संबंधन पर बल दिया जा रहा है. तीन प्रमुख योजनाएँ हैं — बूढ़ी गंडक-नून-वाया-गंगा लिंक (समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया को लाभ; लगभग 1.26 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई-क्षमता), सकरी-नाटा नदी लिंक (नवादा, नालंदा, शेखपुरा; लगभग 68 हजार हेक्टेयर) तथा कोसीमेची अंतरराज्यीय लिंक परियोजना (अररिया, सहरसा, सुपौल, किशनगंज, पूर्णिया).

यह अंतिम योजना परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक कार्य समिति (CCEA) ने मार्च 2025 में इसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (PMKSY-AIBP) के अंतर्गत सम्मिलित करते हुए स्वीकृति प्रदान की है. इस योजना की कुल अनुमानित लागत ₹6,282.32 करोड़ है, जिसमें केंद्रीय सहायता ₹3,652.56 करोड़ (लगभग 60 प्रतिशत) शामिल है.

योजना के अंतर्गत मौजूदा पूर्वी कोसी मुख्य नहर (EKMC) के 41.30 किमी तक के भाग का पुनर्निर्माण किया जाएगा तथा इसे आगे 117.50 किमी तक विस्तारित कर मेची नदी से जोड़ा जाएगा, जिससे प्रत्येक मानसून में कोसी के लगभग 2050 मिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त जल को महानंदा बेसिन की ओर मोड़ा जा सकेगा. इससे लगभग 2.14 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई-क्षमता सृजित होने तथा कोसी क्षेत्र में बाढ़ की तीव्रता घटने की संभावना है.

परियोजना को मार्च 2029 तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है. सकरी-नाटा नदी लिंक को केंद्रीय जल आयोग से पूर्व ही स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है, जबकि बूढ़ी गंडक-गंगा लिंक योजना राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) के माध्यम से प्रक्रियाधीन है.

सरकारी कार्यक्रम एवं नीतियाँ

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजनात्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (PMKSY-AIBP):

पूर्व में केवल “त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP)” नाम से संचालित यह योजना अब केंद्र की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत एक प्रमुख घटक के रूप में कार्यरत है, जिसके तहत केंद्र सरकार उत्तर बिहार की योजनाओं के लिए 90 प्रतिशत तथा शेष राज्य की योजनाओं के लिए 75 प्रतिशत तक केंद्रीय सहायता प्रदान करती है (कोसी-मेची जैसी अंतरराज्यीय लिंक परियोजनाओं में यह अनुपात भिन्न, यथा 60:40, भी हो सकता है).

केंद्र सरकार ने 2021-26 की अवधि हेतु PMKSY के क्रियान्वयन के लिए लगभग ₹93,068 करोड़ के समग्र परिव्यय (जिसमें ₹37,454 करोड़ केंद्रीय सहायता) को स्वीकृति दी है, तथा अप्रैल 2016 से अब तक AIBP घटक के अंतर्गत देशभर में 63 परियोजनाएँ पूर्ण होकर लगभग 26.11 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई-क्षमता सृजित की जा चुकी है.

बिहार में इस कार्यक्रम के अंतर्गत पश्चिम कोसी नहर योजना, कोसी बराज योजना, दुर्गावती जलाशय योजना तथा पुनपुन बराज योजना जैसी परियोजनाओं की मरम्मत एवं पुनर्स्थापन का कार्य सम्मिलित है.

हर खेत तक सिंचाई का पानी कार्यक्रम:

राज्य सरकार की इस योजना के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2023-24 तक 981 योजनाओं/संरचनाओं (723 आहर-पइन, 62 चेक डैम, 196 उद्वह सिंचाई योजनाएँ) का कार्य आरंभ किया गया, जिनसे लगभग 1,49,029 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई-क्षमता पुनर्स्थापित होने तथा लगभग 38 लाख घनमीटर जल-संचयन क्षमता बहाल होने की संभावना है. यह लघु सिंचाई एवं पारंपरिक जल-संरचनाओं के पुनरुद्धार पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण हालिया पहल है.

इंद्रधनुषी क्रांति:

कृषि रोड मैप के अंतर्गत आरंभ यह कार्यक्रम कृषि एवं गैर-कृषि विद्युत फीडरों को पृथक करने (Feeder Separation) पर आधारित है, जिससे “डेडिकेटेड कृषि फीडर” द्वारा किसानों को निर्धारित अवधि में निर्बाध एवं सुनिश्चित विद्युत आपूर्ति की जा सके.

बिहार में विद्युत खपत का मात्र लगभग 5-6 प्रतिशत भाग ही कृषि सिंचाई हेतु उपयोग होता है, जो हरियाणा (लगभग 38 प्रतिशत, सर्वाधिक उपयोग करने वाला राज्य) तथा राष्ट्रीय औसत (लगभग 20 प्रतिशत) से काफी कम है.

राज्य में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है. यद्यपि हाल के वर्षों में विद्युत उत्पादन एवं उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि से यह अंतर धीरे-धीरे कम हो रहा है.

योजना के तीन मुख्य अंग हैं — फीडरों का पृथक्करण, सिंचाई पंपसेटों के निकट उपयुक्त क्षमता वाले वितरण ट्रांसफार्मरों की स्थापना, तथा अधिसंपत्ति की GPS-आधारित मैपिंग एवं वितरण नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण. इसका क्रियान्वयन पायलट आधार पर सर्वप्रथम पटना जिले में किया गया.

बिहार राज्य जल नीति, 2015:

इसके अंतर्गत जल संसाधन विभाग द्वारा जल नियामक प्राधिकार की स्थापना की गई है. इसके अतिरिक्त कमांड क्षेत्र विकास एवं जल प्रबंधन कार्यक्रम (CADWM) के अंतर्गत राज्य में कई योजनाएँ कार्यरत हैं.

पूर्वी क्षेत्र हेतु ICAR अनुसंधान परिसर, पटना

11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 22 फरवरी 2001 को पूर्वी क्षेत्र के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसंधान परिसर (ICAR-RCER) की स्थापना पटना में की गई, जिसके दो अनुसंधान केंद्र दरभंगा एवं राँची में स्थित हैं (दरभंगा केंद्र में मखाना अनुसंधान केंद्र भी सम्मिलित है).

भारत का पूर्वी क्षेत्र कृषि-अनुकूल जल एवं मृदा संसाधनों में समृद्ध होते हुए भी गरीबी उन्मूलन एवं जीवन-स्तर सुधार में इस क्षमता का समुचित दोहन नहीं कर सका है. यह परिसर भूमि-जल प्रबंधन, फसल, बागवानी, जलीय कृषि, मत्स्यपालन, पशु-कुक्कुटपालन तथा कृषि-प्रसंस्करण संबंधी शोध-कार्यों के माध्यम से इस अंतर को पाटने का प्रयास करता है.

तालिका: बिहार की प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ

क्र.योजना का प्रकारयोजना का नामनदीजिला/राज्य
1.बहूद्देशीय योजना1. सोन घाटी परियोजनासोनरोहतास, बिहार
2. गंडक घाटी परियोजनागंडकबिहार, उत्तर प्रदेश
3. कोसी घाटी परियोजनाकोसीबिहार, नेपाल
2.सिंचाई परियोजना1. दुर्गावती जलाशय योजनादुर्गावतीकैमूर एवं रोहतास
2. ऊपरी किऊल जलाशय योजनाकिऊललखीसराय एवं मुंगेर
3. बागमती परियोजनाबागमतीसीतामढ़ी
4. बरनाल जलाशय परियोजनाबरनालजमुई
5. तेउर नहर योजनातेठरपूर्वी चंपारण
6. कमला नहर योजनाकमलादरभंगा, मधुबनी
7. सकरी नहर योजनासकरीगया, मुंगेर
8. चंदन जलाशय योजनाचंदनभागलपुर
9. बटुआ जलाशयबटुआभागलपुर
3.लघु सिंचाई की योजनाएँ1. जमनिया पंप नहर योजनाकर्मनाशा (साझा तंत्र)कैमूर (बिहार) / उत्तर प्रदेश
2. सम्मत बिगहा मोरहर योजनामोरहरजहानाबाद
3. कचनामा बीयर योजनाफल्गु / दरधा तंत्रजहानाबाद
4. मोर वीयर योजनास्थानीय नदी/स्रोतजहानाबाद
5. सोलहंडा वीयर योजनायमुनाजहानाबाद
6. सुगरवे वीयर योजनासुगरवेमधुबनी
7. लवाइच रामपुर बराजदरवा (दरधा)जहानाबाद / पटना
8. नवागढ़ योजनास्थानीय जल स्रोतजहानाबाद
9. सेसंबा वीयर योजनास्थानीय जल स्रोतजहानाबाद
10. इसरवे चेक डैमस्थानीय पहाड़ी स्रोतगया
11. भैटौरा डैमस्थानीय पहाड़ी स्रोतगया
12. कदहर वीयर योजनास्थानीय जल स्रोतगया
13. बछराजा वीयर योजनाबछराजा / स्थानीय स्रोतमधुबनी

अतिरिक्त जानकारी (Additional Information):

नदी और जिलावार अतिरिक्त संवर्धित जानकारी इस प्रकार है:

  • जमनिया पंप नहर योजना: यह कर्मनाशा नदी तंत्र से संबंधित है और इसका लाभ बिहार (कैमूर/बक्सर) तथा उत्तर प्रदेश (गाजीपुर/चंदौली) के सीमावर्ती क्षेत्रों को मिलता है.
  • कचनामा बीयर योजना: यह जहानाबाद जिले में फल्गु/दरधा नदी क्षेत्र के अंतर्गत अवस्थित है.
  • लवाइच रामपुर बराज: यह जहानाबाद/पटना सीमा क्षेत्र में दरधा नदी पर निर्मित है.
  • सुगरवे वीयर योजना: यह मधुबनी जिले के फुलपरास प्रखंड में सुगरवे नदी पर बनाई जा रही है.
  • मोर वीयर, नवागढ़ और सेसंबा योजना: ये जहानाबाद जिले के स्थानीय जल स्रोतों (जैसे दरधा/यमुना/मोरहर की उप-शाखाओं) पर आधारित हैं.

मानसून: बिहार में सिंचाई के साधन के रूप में

बिहार की कृषि मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर) पर आधारित है, जिससे राज्य की लगभग 85% वार्षिक वर्षा (औसतन 1,000–1,200 मिमी) प्राप्त होती है. यद्यपि बिहार में नहर, भूजल एवं अन्य सिंचाई स्रोत उपलब्ध हैं, फिर भी खरीफ फसलों—विशेषकर धान, मक्का, अरहर एवं जूट—की बुवाई और उत्पादन आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है.

उत्तर बिहार के बाढ़-प्रभावित मैदान तथा दक्षिण बिहार के वर्षा-आश्रित पठारी एवं मैदानी क्षेत्र में वर्षा की मात्रा और समय कृषि उत्पादकता को सीधे प्रभावित करते हैं. मानसून की अनियमितता, अल्पवृष्टि अथवा अतिवृष्टि के कारण फसल उत्पादन, भूजल पुनर्भरण तथा सिंचाई क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

इसलिए राज्य सरकार द्वारा नहरों के आधुनिकीकरण, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर), जल-संरक्षण, जल-जीवन-हरियाली अभियान तथा भूजल आधारित सिंचाई को बढ़ावा देकर मानसून पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है.

निष्कर्ष एवं परीक्षोपयोगी दृष्टिकोण

बिहार में सिंचाई क्षेत्रक की सबसे बड़ी चुनौती जल-संसाधन की प्रचुरता तथा उसके असमान वितरण के बीच का विरोधाभास है — उत्तर बिहार बाढ़ से तथा दक्षिण-पश्चिमी भाग सुखाड़ से ग्रस्त रहता है, जबकि दोनों समस्याओं का मूल कारण एक ही है, अर्थात मानसूनी जल का असमय एवं असमान वितरण. नलकूप सिंचाई का बढ़ता वर्चस्व यद्यपि अल्पकालिक समाधान देता है. परंतु भूजल के अतिदोहन तथा गिरते जलस्तर की दीर्घकालिक चिंता को भी जन्म देता है.

कोसी-मेची जैसी नदी अंतर्संबंधन परियोजनाएँ तथा फीडर-पृथक्करण जैसी विद्युत-सुधार पहलें बिहार की सिंचाई संरचना को अधिक संतुलित एवं टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं. परीक्षा-उत्तर में बहुउद्देशीय परियोजनाओं (कोसी, गंडक, सोन), बाणसागर जैसे अंतरराज्यीय जल-विवाद, तथा हालिया योजनाओं (कोसी-मेची लिंक, हर खेत तक सिंचाई का पानी, PMKSY-AIBP) का संतुलित उल्लेख उत्तर को समसामयिक एवं तथ्यपरक बनाता है.

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