प्लास्टिक कचरा और प्रदूषण

प्लास्टिक आधुनिक जीवन का लगभग अनिवार्य पदार्थ बन चुका है. यह हल्का, सस्ता और टिकाऊ होता है. इसे अनेक आकारों में ढाला जा सकता है. इसी कारण इसका उपयोग बहुत व्यापक है.

पैकेजिंग में प्लास्टिक का बड़े स्तर पर उपयोग होता है. चिकित्सा क्षेत्र भी इस पर निर्भर है. कृषि, परिवहन और निर्माण में भी इसका प्रयोग होता है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी प्लास्टिक के अनेक हिस्से होते हैं.

प्लास्टिक ने आधुनिक जीवन को सुविधाजनक बनाया है. इसने कई वस्तुओं की लागत भी घटाई है. परंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही समस्या बन गई. यह विशेषता इसका अत्यधिक टिकाऊ होना है.

अधिकांश पारंपरिक प्लास्टिक आसानी से विघटित नहीं होते. वे लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं. इस दौरान वे छोटे कणों में टूटते जाते हैं. यही कण मिट्टी और जल में फैलते हैं.

आज प्लास्टिक प्रदूषण वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है. यह केवल कचरा प्रबंधन की समस्या नहीं है. इसके प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक हैं. यह जैव विविधता को प्रभावित करता है. यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी चिंता पैदा करता है. इसका संबंध जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ता है.

इस लेख में हम जानेंगे

प्लास्टिक कचरे की समस्या

कचरे को मोटे तौर पर दो वर्गों में बाँटा जाता है. पहला जैव-निम्नीकरणीय कचरा है. दूसरा अजैव-निम्नीकरणीय कचरा है.

भोजन के अवशेष जैव-निम्नीकरणीय होते हैं. फलों और सब्जियों के छिलके भी इसी श्रेणी में आते हैं. कागज भी अपेक्षाकृत जल्दी विघटित हो सकता है. सूक्ष्मजीव इनके अपघटन में सहायता करते हैं.

अधिकांश पारंपरिक प्लास्टिक इससे बिल्कुल अलग हैं. उनका प्राकृतिक अपघटन बहुत धीमा होता है. कुछ प्लास्टिक सदियों तक बने रह सकते हैं. वे गायब होने के बजाय छोटे कणों में टूटते हैं.

प्लास्टिक उत्पादन का विस्तार बहुत तेज रहा है. 1950 में वैश्विक उत्पादन लगभग 20 लाख टन था. 2019 तक यह लगभग 46 करोड़ टन पहुँचा. यानी उत्पादन करीब 230 गुना बढ़ गया.

इस वृद्धि ने कचरे की मात्रा भी बढ़ाई. आधुनिक उपभोग संस्कृति ने समस्या और गंभीर बनाई. विशेषकर पैकेजिंग इसका प्रमुख कारण बनी है.

प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रकार

प्लास्टिक कचरे को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है. स्रोत इसका एक सरल आधार है.

घरेलू प्लास्टिक कचरा घरों और दैनिक उपभोग से निकलता है. इसमें बोतलें और पैकेट शामिल हैं. इसमें थैलियाँ और खाद्य पैकेजिंग भी आती हैं.

औद्योगिक प्लास्टिक कचरा उत्पादन इकाइयों से निकलता है. इसमें पैकेजिंग और निर्माण अवशेष शामिल होते हैं.

कृषि प्लास्टिक कचरे में मल्च फिल्म प्रमुख है. सिंचाई पाइप और उर्वरक बोरियाँ भी शामिल हैं.

चिकित्सा क्षेत्र भी प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है. इसमें सिरिंज और दस्ताने शामिल हो सकते हैं. कई वस्तुओं को विशेष उपचार की आवश्यकता होती है.

इसे पॉलिमर के आधार पर भी वर्गीकरण किया जाता है. सामान्य रीसाइक्लिंग कोड 1 से 7 तक होते हैं. इनमें PET, HDPE और PVC प्रमुख हैं. अन्य प्रकार LDPE, PP और PS हैं. सातवीं श्रेणी में अन्य प्लास्टिक शामिल किए जाते हैं.

प्लास्टिक रीसाइक्लिंग कोड 1 से 7, PET, HDPE, PVC, LDPE, PP, PS और अन्य प्लास्टिक का पॉलिमर आधारित वर्गीकरण
प्लास्टिक को पॉलिमर के आधार पर रीसाइक्लिंग कोड 1 से 7 में वर्गीकृत किया जाता है, जिनमें PET, HDPE, PVC, LDPE, PP और PS प्रमुख प्रकार हैं.

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक अल्पकालीन उपयोग के लिए बनाया जाता है. इसे प्रायः एक बार उपयोग किया जाता है. फिर इसे फेंक दिया जाता है.

प्लास्टिक थैलियाँ इसका सामान्य उदाहरण हैं. स्ट्रॉ और डिस्पोजेबल कप भी उदाहरण हैं. प्लेटें और कई पैकेजिंग सामग्री भी इसमें आती हैं.

इनका उपयोग समय बहुत कम होता है. परंतु पर्यावरणीय जीवन बहुत लंबा हो सकता है. यही विरोधाभास इसकी गंभीर समस्या है.

माइक्रोप्लास्टिक

पाँच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण माइक्रोप्लास्टिक कहलाते हैं. इनके दो प्रमुख स्रोत माने जाते हैं.

प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक पहले से छोटे आकार में निर्मित होते हैं. कुछ सौंदर्य उत्पादों के माइक्रोबीड्स उदाहरण हैं. औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी छोटे प्लास्टिक कण प्रयुक्त होते हैं. रेजिन पैलेट भी पर्यावरण में पहुँच सकते हैं.

कृत्रिम वस्त्र भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं. धुलाई के दौरान उनसे माइक्रोफाइबर निकलते हैं. ये अपशिष्ट जल के साथ आगे पहुँच सकते हैं.

द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक बड़े प्लास्टिक के विखंडन से बनते हैं. सूर्य का पराबैंगनी विकिरण इसमें भूमिका निभाता है. तापमान और घर्षण भी विखंडन बढ़ाते हैं.

नैनोप्लास्टिक

नैनोप्लास्टिक इससे भी अत्यंत छोटे प्लास्टिक कण हैं. इनके आकार की वैज्ञानिक परिभाषाएँ अलग-अलग हो सकती हैं. इनका अध्ययन अभी तेजी से विकसित हो रहा है.

इनका सूक्ष्म आकार विशेष चिंता उत्पन्न करता है. ये जैविक अवरोधों से गुजर सकते हैं. इनके स्वास्थ्य प्रभावों पर अनुसंधान जारी है.

Sources of Plastic Pollution

प्लास्टिक अपशिष्ट का विस्तार

प्लास्टिक प्रदूषण अब विश्वव्यापी पर्यावरणीय समस्या बन चुका है. इसका विस्तार भूमि से महासागरों तक हो चुका है. दूरस्थ क्षेत्रों में भी प्लास्टिक कण पाए जा रहे हैं. इसलिए यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है.

(अ) एक वैश्विक घटना के रूप में

पिछले दो दशकों में प्लास्टिक का उपयोग तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2000 में वैश्विक उपयोग 23.4 करोड़ टन था. वर्ष 2020 में यह 43.5 करोड़ टन पहुँच गया. यानी केवल दो दशकों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई.

वर्तमान में मानवता सालाना 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक बनाती है. पैकेजिंग इसकी मांग का एक प्रमुख स्रोत है. वस्त्र और परिवहन क्षेत्र भी बड़ी मात्रा इस्तेमाल करते हैं.

प्लास्टिक उत्पादन बढ़ने के साथ कचरा भी तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2000 में 15.6 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा बना था. वर्ष 2019 में यह 35.3 करोड़ टन हो गया.

इस प्रकार प्लास्टिक कचरा दो दशकों में दोगुने से अधिक हुआ.

इसके बावजूद वैश्विक पुनर्चक्रण व्यवस्था बहुत कमजोर रही है. वर्ष 2019 में केवल नौ प्रतिशत कचरा पुनर्चक्रित हुआ. इसमें पुनर्चक्रण प्रक्रिया के दौरान होने वाली हानि भी शामिल है.

लगभग 19 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे का भस्मीकरण किया गया. करीब आधा कचरा सैनिटरी लैंडफिल में पहुँचा. शेष कचरा खुले में फेंका या जलाया गया. कुछ हिस्सा सीधे पर्यावरण में भी पहुँच गया.

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं. UNEP के अनुसार स्थिति अत्यंत गंभीर है. हर वर्ष 1.9 से 2.3 करोड़ टन प्लास्टिक इनमें पहुँचता है. इसमें नदियाँ, झीलें और समुद्र शामिल हैं.

महासागरों में प्लास्टिक का पुराना भंडार भी विशाल है. इसका अनुमान 7.5 से 19.9 करोड़ टन है. इसमें बड़े प्लास्टिक और छोटे कण दोनों शामिल हैं.

1950 से 2017 तक लगभग 920 करोड़ टन प्लास्टिक बना. इसमें करीब 700 करोड़ टन अंततः कचरा बन गया.

भविष्य की स्थिति और अधिक चिंताजनक हो सकती है. मौजूदा नीतियाँ इस वृद्धि को रोकने के लिए अपर्याप्त हैं.

OECD ने 2040 तक का विस्तृत आकलन किया है. अतिरिक्त कार्रवाई नहीं होने पर प्लास्टिक उपयोग तेजी से बढ़ेगा. यह 2020 के 43.5 करोड़ टन से बढ़ सकता है. वर्ष 2040 में यह 73.6 करोड़ टन पहुँच सकता है.

यह केवल बीस वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत वृद्धि होगी.

प्लास्टिक कचरा भी इसी अनुपात में बढ़ने का अनुमान है. यह 2020 में लगभग 36 करोड़ टन था. वर्ष 2040 में यह 61.7 करोड़ टन हो सकता है.

कुप्रबंधित प्लास्टिक कचरा भी बढ़ने की आशंका है. यह 2020 में लगभग 8.1 करोड़ टन था. वर्ष 2040 में 11.9 करोड़ टन पहुँच सकता है.

पर्यावरण में प्लास्टिक रिसाव भी बढ़ सकता है. यह 2020 में करीब दो करोड़ टन था. वर्ष 2040 तक यह तीन करोड़ टन हो सकता है.

नदियों और महासागरों में इसका संचय लगातार बढ़ेगा. वर्ष 2020 में यह लगभग 15.2 करोड़ टन था. OECD के अनुसार 2040 तक यह 30 करोड़ टन हो सकता है.

इस संकट का एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक पक्ष भी है. इसे प्लास्टिक कचरा व्यापार कहा जाता है.

वर्ष 2024 में लगभग 32 लाख टन कचरा सीमापार व्यापार में गया. यह वैश्विक प्लास्टिक कचरे के एक प्रतिशत से भी कम था. इसका लगभग 90 प्रतिशत निर्यात उच्च-आय देशों से हुआ.

हालाँकि इसका अर्थ पूरी तरह एकतरफा व्यापार नहीं है. उच्च-आय वाले देश बड़े आयातक भी हैं. उनके बीच भी प्लास्टिक कचरे का बड़ा व्यापार होता है.

फिर भी गरीब देशों के लिए जोखिम अधिक गंभीर हो सकते हैं. वहाँ कचरा प्रबंधन ढाँचा अक्सर अपेक्षाकृत कमजोर होता है. इससे अवैध डंपिंग और दहन का खतरा बढ़ता है.

चीन के आयात प्रतिबंध ने भी वैश्विक व्यापार बदल दिया. इसके बाद कई प्रवाह दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर मुड़े. इससे अंतरराष्ट्रीय नियमन की आवश्यकता और स्पष्ट हुई.

अतः प्लास्टिक प्रदूषण केवल उत्पादन की समस्या नहीं है. यह उपभोग और कचरा प्रबंधन से भी जुड़ा है. इसके साथ वैश्विक असमानता का प्रश्न भी जुड़ा है.

(ब) भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट

भारत में प्लास्टिक कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ी है. इसका संबंध शहरीकरण और बदलते उपभोग से है. पैकेजिंग का बढ़ता उपयोग भी महत्वपूर्ण कारण है.

ऑनलाइन खरीदारी ने पैकेजिंग की मांग बढ़ाई है. खाद्य वितरण सेवाओं ने भी उपयोग बढ़ाया है. छोटे पैकेटों का इस्तेमाल भी व्यापक है.

भारत के आधिकारिक आँकड़े इस वृद्धि को स्पष्ट करते हैं.

वित्त वर्ष 2018-19 में 33.60 लाख टन कचरा बना. वर्ष 2019-20 में यह 34.70 लाख टन हो गया. वर्ष 2020-21 में मात्रा 41.27 लाख टन पहुँच गई.

वर्ष 2021-22 में लगभग 39.02 लाख टन कचरा दर्ज हुआ. वर्ष 2022-23 में यह फिर बढ़कर 41.36 लाख टन हुआ.

इस प्रकार भारत अब सालाना 40 लाख टन से अधिक प्लास्टिक कचरा बनाता है.

2022-23 की मात्रा दैनिक आधार पर भी बहुत बड़ी है. यह औसतन लगभग 11,332 टन प्रतिदिन बैठती है.

हालाँकि इन आँकड़ों को सावधानी से समझना आवश्यक है. ये राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सूचनाओं पर आधारित हैं. इसलिए रिपोर्टिंग क्षमता इनकी मात्रा को प्रभावित कर सकती है.

राज्यों के बीच भी भारी अंतर दिखाई देता है.

CPCB के 2021-22 के संकलित आँकड़ों में कर्नाटक सबसे आगे था. देश के कचरे में उसकी हिस्सेदारी 13.53 प्रतिशत थी. तेलंगाना की हिस्सेदारी लगभग 12.68 प्रतिशत थी. तमिलनाडु का हिस्सा लगभग 10.18 प्रतिशत था.

ये तीनों प्रमुख प्लास्टिक कचरा उत्पादक राज्य रहे.

भारत में प्लास्टिक की प्रति व्यक्ति खपत अपेक्षाकृत कम रही है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में इसका स्तर कहीं अधिक है. लेकिन भारत की विशाल जनसंख्या कुल मात्रा बढ़ा देती है.

इसलिए केवल प्रति व्यक्ति खपत से समस्या नहीं समझी जा सकती. संग्रहण और प्रसंस्करण क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

भारत में पुनर्चक्रण का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र संभालता है. कचरा बीनने वाले इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे मूल्यवान प्लास्टिक को दूसरे कचरे से अलग करते हैं.

इसके बाद सामग्री कबाड़ी और संग्रहकर्ताओं तक पहुँचती है. वहाँ से यह पुनर्चक्रण उद्योग में प्रवेश करती है.

इस व्यवस्था ने बड़ी मात्रा को लैंडफिल से बचाया है. लेकिन श्रमिकों की परिस्थितियाँ अक्सर सुरक्षित नहीं होतीं. उन्हें औपचारिक व्यवस्था में शामिल करना आवश्यक है.

भारत ने हाल के वर्षों में EPR व्यवस्था भी मजबूत की है. EPR का अर्थ विस्तारित निर्माता जिम्मेदारी है.

इसके तहत उत्पादक और आयातक जिम्मेदारी लेते हैं. ब्रांड मालिक भी इसके दायरे में आते हैं. उन्हें प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का प्रबंधन सुनिश्चित करना होता है.

वर्ष 2022-23 में पंजीकृत संस्थाओं का EPR लगभग 30 लाख टन था. पंजीकृत प्रोसेसरों ने बड़ी मात्रा में कचरा संसाधित किया.

इसके बाद लगभग 25 लाख टन EPR प्रमाणपत्र बने. इसमें पुनर्चक्रण सहित अन्य मान्य प्रसंस्करण शामिल थे.

EPR व्यवस्था का विस्तार इसके बाद और तेज हुआ.

दिसंबर 2024 तक 2,840 प्लास्टिक कचरा प्रोसेसर पंजीकृत थे. केंद्रीकृत EPR पोर्टल पर 50,131 PIBO भी पंजीकृत थे. PIBO में उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक शामिल हैं.

इसी अवधि तक लगभग 103 लाख टन कचरा संसाधित हुआ. यह प्लास्टिक पैकेजिंग से संबंधित संचयी मात्रा है.

यहाँ एक अंतर समझना जरूरी है. 103 लाख टन किसी एक वर्ष का आँकड़ा नहीं है. यह EPR पोर्टल पर दर्ज संचयी प्रसंस्करण है.

भारत में Material Recovery Facilities भी विकसित की जा रही हैं. इन्हें सामान्यतः MRF कहा जाता है.

ये सुविधाएँ मिश्रित कचरे से उपयोगी सामग्री अलग करती हैं. इनमें प्लास्टिक, कागज और धातु शामिल हो सकते हैं. इससे पुनर्चक्रण योग्य सामग्री की रिकवरी बढ़ती है.

उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार 4,446 MRF दर्ज किए गए हैं. इनकी संयुक्त क्षमता 31,427.2 टन प्रतिदिन बताई गई है.

स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन 2.0 इन्हें सहायता प्रदान करता है. इसका उद्देश्य वैज्ञानिक ठोस कचरा प्रबंधन को मजबूत करना है.

इसके बावजूद भारत के सामने बड़ी चुनौतियाँ बनी हुई हैं.

सभी शहरों में संग्रहण व्यवस्था समान नहीं है. स्रोत पर कचरा पृथक्करण भी पूर्ण नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवस्था और अधिक असमान हो सकती है.

मिश्रित प्लास्टिक सबसे कठिन समस्या प्रस्तुत करता है. बहुस्तरीय पैकेजिंग का पुनर्चक्रण भी जटिल है. कम मूल्य वाला प्लास्टिक अक्सर संग्रहित नहीं किया जाता.

इसलिए भारत की चुनौती केवल कचरे की मात्रा नहीं है. वास्तविक चुनौती उसके पूरे जीवनचक्र का प्रबंधन है.

उत्पादन से लेकर संग्रहण तक सुधार जरूरी है. पृथक्करण और पुनर्चक्रण भी मजबूत करना होगा. अंतिम निपटान को भी वैज्ञानिक बनाना आवश्यक है.

EPR और MRF व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं. लेकिन इनकी सफलता प्रभावी निगरानी पर निर्भर करेगी.

प्लास्टिक अपशिष्ट का प्रभाव

प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव बहुआयामी है. यह अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी दोनों को प्रभावित करता है.

आर्थिक प्रभाव

प्रदूषित समुद्र तट पर्यटकों को हतोत्साहित कर सकते हैं. इससे स्थानीय पर्यटन उद्योग प्रभावित होता है. तटीय समुदायों की आय भी घट सकती है.

अंडमान-निकोबार जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में यह विशेष चिंता है. यहाँ स्वच्छ समुद्री पारिस्थितिकी आर्थिक संपदा भी है. समुद्री कचरा इस संपदा को कमजोर करता है.

सफाई पर सार्वजनिक धन भी खर्च होता है. मत्स्य उद्योग को भी आर्थिक नुकसान हो सकता है.

वन्यजीवों पर प्रभाव

समुद्री जीव अक्सर प्लास्टिक को भोजन समझ लेते हैं. कछुए प्लास्टिक थैलियाँ निगल सकते हैं. समुद्री पक्षी भी छोटे टुकड़े खाते हैं.

प्लास्टिक पाचन तंत्र में अवरोध पैदा कर सकता है. इससे वास्तविक भोजन की मात्रा घटती है. पशु कुपोषण का शिकार हो सकता है. गंभीर मामलों में उसकी मृत्यु भी हो सकती है.

फेंके गए जाल दूसरी बड़ी समस्या हैं. इनमें समुद्री जीव फँस सकते हैं. इसे अक्सर ‘घोस्ट फिशिंग’ कहा जाता है.

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

कुछ प्लास्टिक में चिंताजनक रासायनिक पदार्थ मौजूद होते हैं. इनमें BPA और फ़थैलेट्स शामिल हैं. PBDE जैसे पदार्थ भी चिंता का विषय रहे हैं.

कुछ पदार्थ अंतःस्रावी प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं. इन्हें एंडोक्राइन-डिसरप्टिंग रसायन कहा जाता है. ये हार्मोन प्रणाली में हस्तक्षेप कर सकते हैं.

थायरॉयड संबंधी प्रक्रियाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं. प्रजनन स्वास्थ्य पर भी शोध किया गया है. गर्भवती महिलाओं और बच्चों को संवेदनशील समूह माना जाता है.

हालाँकि सावधानी आवश्यक है. माइक्रोप्लास्टिक पर अनुसंधान अभी विकसित हो रहा है. मानव शरीर में इनके कण पाए गए हैं. परंतु सभी स्वास्थ्य प्रभाव अभी निर्णायक नहीं हैं.

भूमि और भूजल प्रदूषण

खुले में पड़ा प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित करता है. कुछ रसायन धीरे-धीरे बाहर निकल सकते हैं.

लैंडफिल में वर्षा जल नीचे की ओर जाता है. इससे दूषित लीचेट बन सकता है. अनुचित प्रबंधन में यह भूजल तक पहुँच सकता है.

वायु प्रदूषण

प्लास्टिक को खुले में जलाना अत्यंत हानिकारक है. इससे विषैले धुएँ का उत्सर्जन हो सकता है. सूक्ष्म कण भी वातावरण में पहुँचते हैं.

PVC जैसे पदार्थों का अनुचित दहन विशेष चिंता है. इससे खतरनाक रसायन निकल सकते हैं. ये श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं.

जल प्रदूषण और खाद्य शृंखला

नदियाँ प्लास्टिक को समुद्र तक पहुँचा सकती हैं. शहरी नालियाँ भी महत्वपूर्ण मार्ग हैं. वर्षा के दौरान यह प्रवाह बढ़ सकता है.

छोटे प्लास्टिक कण प्लवक द्वारा निगले जा सकते हैं. मोलस्क भी इनसे प्रभावित हो सकते हैं. इसके बाद प्रभाव खाद्य-जाल में आगे बढ़ सकता है.

ड्रेनेज और बाढ़

प्लास्टिक थैलियाँ नालियों को बंद कर सकती हैं. पैकेजिंग कचरा भी जल निकासी रोकता है.

तेज वर्षा में समस्या गंभीर हो जाती है. जलभराव बढ़ सकता है. शहरी बाढ़ का जोखिम भी बढ़ता है.

निवास स्थान पर प्रभाव

समुद्र तल पर प्लास्टिक जमा हो सकता है. यह तलछट की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ प्रभावित करता है.

कुछ परिस्थितियों में ऑक्सीजन विनिमय बाधित हो सकता है. इससे हाइपोक्सिक दशाएँ उत्पन्न हो सकती हैं. अत्यधिक कमी से एनोक्सिक स्थिति बन सकती है.

आक्रामक प्रजातियों का प्रसार

तैरता प्लास्टिक कृत्रिम नौका जैसा व्यवहार कर सकता है. छोटे जीव इसकी सतह पर बस जाते हैं. समुद्री धाराएँ इसे दूर तक ले जाती हैं.

इस प्रकार जीव नए क्षेत्रों तक पहुँच सकते हैं. कुछ जीव वहाँ आक्रामक प्रजाति बन सकते हैं.

जलवायु प्रभाव

अधिकांश पारंपरिक प्लास्टिक जीवाश्म ईंधनों से बनते हैं. इसलिए उत्पादन में ऊर्जा की आवश्यकता होती है.

कच्चे माल का निष्कर्षण उत्सर्जन पैदा करता है. उत्पादन और परिवहन भी उत्सर्जन बढ़ाते हैं. भस्मीकरण से भी कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है.

इसलिए प्लास्टिक संकट जलवायु संकट से भी जुड़ा है.

प्रमुख चुनौतियाँ

सबसे बड़ी चुनौती खराब अपशिष्ट प्रबंधन है. कई स्थानों पर कचरा खुले में फेंका जाता है. वहाँ से यह नदियों तक पहुँच सकता है.

महासागरीय धाराएँ कचरे को केंद्रित भी करती हैं. ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच इसका प्रसिद्ध उदाहरण है. यह ठोस कचरे का कोई तैरता द्वीप नहीं है. बल्कि यह मलबे की अधिक सांद्रता वाला क्षेत्र है.

बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक भी सरल समाधान नहीं है. इनके लिए स्पष्ट मानक आवश्यक हैं. उचित परीक्षण और प्रमाणन भी जरूरी है.

ई-कॉमर्स ने नई चुनौती पैदा की है. एक उत्पाद कई पैकेजिंग परतों में आता है. फूड डिलीवरी भी डिस्पोजेबल वस्तुएँ बढ़ाती है.

माइक्रोप्लास्टिक की समस्या अधिक जटिल है. इन्हें एकत्र करना लगभग असंभव हो सकता है. इनके कण हवा में भी पाए गए हैं. बर्फ और बादलों में भी इनका अध्ययन हुआ है.

समुद्री कचरे में प्लास्टिक प्रमुख घटक है. इसका अधिकांश हिस्सा भूमि आधारित गतिविधियों से आता है. समुद्री गतिविधियाँ भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. मछली पकड़ने के जाल इसका उदाहरण हैं.

भारत में नियमों की कमी मुख्य समस्या नहीं है. प्रभावी कार्यान्वयन अधिक बड़ी चुनौती है.

स्थानीय निकायों के संसाधन सीमित हो सकते हैं. स्रोत पर पृथक्करण भी पर्याप्त नहीं होता. पुनर्चक्रण ढाँचा हर क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है.

हर प्लास्टिक तकनीकी रूप से आसानी से पुनर्चक्रित नहीं होता. मिश्रित और बहुस्तरीय पैकेजिंग विशेष चुनौती है.

कॉर्पोरेट जवाबदेही भी महत्वपूर्ण प्रश्न है. केवल उपभोक्ता को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है. उत्पाद डिजाइन भी कचरे की मात्रा निर्धारित करता है.

समाधान

4Rs of Waste Management, Reduce, Reuse, Recycle और Recover, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के चार प्रमुख उपाय
प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए 4Rs—Reduce, Reuse, Recycle और Recover—एक सरल और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं.

प्लास्टिक समस्या का समाधान एक उपाय से संभव नहीं है. इसके लिए समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है.

कम करना — Reduce

सबसे प्रभावी उपाय अनावश्यक प्लास्टिक घटाना है. विशेषकर सिंगल-यूज़ वस्तुओं को कम करना चाहिए.

कर और शुल्क व्यवहार बदल सकते हैं. मुफ्त प्लास्टिक थैलियों पर रोक प्रभावी हो सकती है.

भारत में KVIC की REPLAN जैसी पहल उल्लेखनीय रही है. इसमें प्लास्टिक कचरे के उपयोग से कागज बनाया गया.

पुनः उपयोग — Reuse

एक वस्तु का बार-बार उपयोग बेहतर विकल्प है. इससे नए प्लास्टिक की मांग घटती है.

रीफिल प्रणाली उपयोगी हो सकती है. वापसी योग्य पैकेजिंग भी प्रभावी है. टिकाऊ बोतलें इसका सरल उदाहरण हैं.

पुनर्चक्रण — Recycling

पुनर्चक्रण प्लास्टिक को आर्थिक मूल्य प्रदान करता है. इससे लैंडफिल पर दबाव घट सकता है.

यह रोजगार भी पैदा करता है. अनौपचारिक श्रमिकों को इससे औपचारिक अवसर मिल सकते हैं.

परंतु पुनर्चक्रण की भी सीमाएँ हैं. सभी प्लास्टिक अनंत बार पुनर्चक्रित नहीं किए जा सकते. गुणवत्ता हर चक्र में घट सकती है.

रिकवरी — Recovery

कुछ प्लास्टिक यांत्रिक पुनर्चक्रण के योग्य नहीं होते. उनसे ऊर्जा या ईंधन प्राप्त किया जा सकता है.

परंतु इसे अंतिम विकल्प माना जाना चाहिए. उत्सर्जन नियंत्रण भी आवश्यक है. रिकवरी को कचरा घटाने का विकल्प नहीं बनाना चाहिए.

प्लास्टिक कचरे के निपटान में वैज्ञानिक शोध और नवीनतम प्रगति

प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक निपटान में तेजी से प्रगति हुई है. पारंपरिक यांत्रिक पुनर्चक्रण की अपनी सीमाएँ हैं. इसलिए वैज्ञानिक अब नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं.

इनमें एंजाइम आधारित पुनर्चक्रण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इसमें विशेष एंजाइम PET प्लास्टिक को विघटित करते हैं. वे इसे मूल रासायनिक घटकों में तोड़ सकते हैं. इन घटकों से दोबारा उच्च गुणवत्ता वाला PET बन सकता है. इससे प्लास्टिक का वास्तविक चक्रीय उपयोग संभव हो सकता है.

इस तकनीक ने प्रयोगशाला से आगे प्रगति की है. जुलाई 2026 में CARBIOS ने महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की. उसके प्रदर्शन संयंत्र में 100 परीक्षण बैच पूरे हुए. जटिल PET वस्त्र कचरे में 95% से अधिक रूपांतरण हुआ. यह प्रक्रिया 24 घंटे के भीतर पूरी हुई.

अब इसके औद्योगिक विस्तार पर भी काम चल रहा है. चीन में 50,000 टन वार्षिक क्षमता वाला संयंत्र प्रस्तावित है. इसका संचालन 2028 की पहली छमाही तक अपेक्षित है.

रासायनिक पुनर्चक्रण भी तेजी से विकसित हो रहा है. इसमें प्लास्टिक की पॉलिमर शृंखलाएँ रासायनिक रूप से तोड़ी जाती हैं. इससे उपयोगी मोनोमर और अन्य कच्चे पदार्थ प्राप्त होते हैं.

पायरोलिसिस मिश्रित प्लास्टिक के लिए दूसरा विकल्प है. इसमें ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में प्लास्टिक गर्म किया जाता है. इससे तेल, गैस और उपयोगी रासायनिक पदार्थ मिल सकते हैं. माइक्रोवेव आधारित पायरोलिसिस पर भी नया शोध हो रहा है. इसका लक्ष्य ऊर्जा खपत और प्रक्रिया समय घटाना है.

इन उपलब्धियों से एक नई दिशा स्पष्ट होती है. भविष्य में प्लास्टिक केवल “कचरा” नहीं माना जाएगा. वह नए पदार्थों के लिए उपयोगी संसाधन भी बन सकता है.

सरकार और वैश्विक हस्तक्षेप

भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 आधारभूत ढाँचा प्रदान करते हैं. बाद में इनमें अनेक संशोधन किए गए. 2018 का संशोधन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा था.

भारत ने चयनित सिंगल-यूज़ प्लास्टिक वस्तुओं पर रोक लगाई. यह प्रतिबंध 1 जुलाई 2022 से प्रभावी हुआ. इसमें कम उपयोगिता वाली चिन्हित वस्तुएँ शामिल थीं.

राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कार्यबल भी बनाए गए. राष्ट्रीय स्तर पर भी समन्वय व्यवस्था विकसित की गई.

स्वच्छ भारत मिशन भी उपयोगी मंच प्रदान करता है. इसके माध्यम से पृथक्करण और संग्रहण सुधारा जा सकता है.

विस्तारित निर्माता जिम्मेदारी — EPR

EPR का अर्थ Extended Producer Responsibility है. इसमें निर्माता की जिम्मेदारी बिक्री पर समाप्त नहीं होती.

उत्पाद के उपयोग के बाद भी जिम्मेदारी बनी रहती है. निर्माता संग्रहण और पुनर्चक्रण में भाग लेता है. वित्तीय जिम्मेदारी भी उस पर डाली जा सकती है.

यह व्यवस्था बेहतर डिजाइन को प्रोत्साहित करती है. पुनर्चक्रण योग्य पैकेजिंग की मांग बढ़ती है. पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग को भी बढ़ावा मिलता है.

भारत ने प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए EPR लक्ष्य निर्धारित किए हैं. कुछ श्रेणियों में पुनर्चक्रित सामग्री का न्यूनतम उपयोग भी अनिवार्य है.

वैश्विक प्रयास

2018 का विश्व पर्यावरण दिवस प्लास्टिक प्रदूषण पर केंद्रित था. भारत उस वर्ष वैश्विक मेजबान देश था.

G20 ने समुद्री प्लास्टिक कचरे पर सहयोग बढ़ाया. बासेल कन्वेंशन में प्लास्टिक कचरे संबंधी संशोधन हुए. यूरोपीय संघ ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक निर्देश अपनाया.

2022 में UNEA ने ऐतिहासिक प्रस्ताव 5/14 स्वीकार किया. इसका उद्देश्य कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता बनाना है. इसमें प्लास्टिक का पूरा जीवनचक्र शामिल है.

ग्लोबल प्लास्टिक्स ट्रीटी: जुलाई 2026 तक स्थिति

इस संधि के लिए INC वार्ताएँ जारी हैं. दिसंबर 2024 की बुसान बैठक सहमति तक नहीं पहुँची. इसके बाद वार्ता स्थगित करनी पड़ी.

INC-5.2 अगस्त 2025 में जिनेवा में आयोजित हुई. वहाँ भी अंतिम संधि पर सहमति नहीं बनी. बैठक 15 अगस्त 2025 को फिर स्थगित हुई.

7 फरवरी 2026 को INC-5.3 आयोजित हुई. यह जिनेवा में एक दिवसीय सत्र था. इसमें वास्तविक संधि वार्ता नहीं हुई. इसका उद्देश्य संगठनात्मक और प्रशासनिक विषय थे.

इसी बैठक में चिली के जूलियो कोर्डानो अध्यक्ष चुने गए. वे आगे की वार्ताओं का नेतृत्व कर रहे हैं.

2026 में प्रतिनिधिमंडलों की अनौपचारिक बैठकें भी जारी रहीं. इनमें आगे की वार्ता के लिए आधार तैयार किया जा रहा है.

सबसे कठिन प्रश्नों में उत्पादन नियंत्रण शामिल है. कई देश वैश्विक उत्पादन सीमा चाहते हैं. कुछ देश ऐसी बाध्यकारी सीमा का विरोध करते हैं.

रसायनों और उत्पाद डिजाइन पर भी मतभेद हैं. वित्तीय सहायता भी महत्वपूर्ण विवाद है. इसलिए अंतिम समझौते की समयसीमा अभी निश्चित नहीं है.

UN-Plastic Collective / Un-Plastic Collective

भारत में Un-Plastic Collective (UPC) एक स्वैच्छिक पहल है. इसकी शुरुआत 2019 में हुई.

इसके सह-संस्थापक तीन प्रमुख संगठन हैं. इनमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शामिल है. भारतीय उद्योग परिसंघ दूसरा भागीदार है. WWF-India तीसरा भागीदार है.

इसका उद्देश्य प्लास्टिक के नकारात्मक प्रभाव घटाना है. यह सर्कुलर अर्थव्यवस्था को भी प्रोत्साहित करता है.

इसके दृष्टिकोण को चार प्रमुख दिशाओं में समझा जा सकता है.

  1. अनावश्यक प्लास्टिक उपयोग को समाप्त करना.
  2. पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण को बढ़ाना.
  3. टिकाऊ विकल्पों और पुनर्चक्रित सामग्री को अपनाना.
  4. मापने योग्य और समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करना.

UPC की शुरुआत के समय महत्वपूर्ण भारतीय आँकड़े बताए गए थे. उस समय 94.6 लाख टन वार्षिक कचरे का अनुमान था. लगभग 40 प्रतिशत कचरा असंग्रहीत बताया गया था. प्लास्टिक उपयोग का 43 प्रतिशत पैकेजिंग से जुड़ा था.

इन आँकड़ों को वर्तमान वार्षिक आँकड़ा नहीं मानना चाहिए. ये 2019 में पहल शुरू होने के समय दिए गए थे.

UPC का महत्व केवल सफाई अभियान तक सीमित नहीं है. यह कंपनियों की भूमिका पर जोर देता है. इसका लक्ष्य प्रणालीगत बदलाव को बढ़ावा देना है.

आगे की राह

प्लास्टिक प्रदूषण का समाधान व्यवहार परिवर्तन से शुरू होता है. शिक्षा इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में व्यावहारिक कार्यक्रम आवश्यक हैं. केवल जागरूकता पोस्टर पर्याप्त नहीं हैं. लोगों को विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे.

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर कार्रवाई अधिक लक्षित होनी चाहिए. बहुस्तरीय पैकेजिंग बड़ी चुनौती है. ब्रेड बैग और फूड रैप भी महत्वपूर्ण हैं.

प्रतिबंध से पहले बाजार तैयार करना आवश्यक है. पर्यावरण-अनुकूल विकल्प सस्ते होने चाहिए.

सरकार इनके उत्पादन पर प्रोत्साहन दे सकती है. वैकल्पिक उद्योगों को कर राहत दी जा सकती है. आवश्यक तकनीक के आयात पर राहत संभव है.

गन्ने की खोई उपयोगी विकल्प प्रदान कर सकती है. मकई स्टार्च से भी सामग्री बनाई जा सकती है. अनाज आधारित सामग्री पर भी प्रयोग हो रहे हैं.

परंतु ‘बायोडिग्रेडेबल’ शब्द की निगरानी आवश्यक है. हर ऐसा उत्पाद सामान्य मिट्टी में नहीं टूटता. कुछ को औद्योगिक कम्पोस्टिंग परिस्थितियाँ चाहिए.

व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों में माइक्रोबीड्स नियंत्रित किए जाने चाहिए. वस्त्रों से निकलने वाले माइक्रोफाइबर भी घटाने होंगे.

स्वच्छ भारत मिशन का दायरा उपयोगी हो सकता है. इसे प्लास्टिक पृथक्करण से अधिक निकटता से जोड़ना चाहिए.

कचरा बीनने वालों को नीति में स्थान देना जरूरी है. उन्हें सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए. सुरक्षित कार्य उपकरण भी उपलब्ध होने चाहिए.

खुदरा विक्रेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. उपभोक्ताओं को पुनः उपयोग विकल्प चाहिए. उद्योग को बेहतर डिजाइन अपनाना होगा.

स्थानीय सरकार संग्रहण व्यवस्था मजबूत कर सकती है. नागरिक समाज निगरानी और जागरूकता में सहयोग कर सकता है. पर्यटन संगठन स्वच्छ स्थलों के लिए योगदान दे सकते हैं.

नियमों का उल्लंघन आर्थिक रूप से महँगा होना चाहिए. तभी अनुपालन के लिए वास्तविक प्रोत्साहन बनेगा.

भविष्य में डिजिटल तकनीक भी महत्वपूर्ण होगी. डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट सामग्री की जानकारी दे सकता है. इससे उत्पाद की ट्रेसबिलिटी बेहतर हो सकती है.

EPR प्रणालियों में भी बेहतर सामंजस्य आवश्यक है. हार्मोनाइज्ड मानक कंपनियों का अनुपालन आसान बना सकते हैं. इससे फर्जी प्रमाणपत्रों पर नियंत्रण भी सुधर सकता है.

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उत्पाद डिजाइन में होना चाहिए. ऐसा उत्पाद बनना चाहिए जो लंबे समय चले. उसकी मरम्मत भी संभव होनी चाहिए. अंततः उसका पुनर्चक्रण आसान होना चाहिए.

अर्थव्यवस्था को ‘बनाओ-उपयोग करो-फेंको’ मॉडल से हटना होगा. उसके स्थान पर सर्कुलर मॉडल अपनाना होगा.

निष्कर्ष

प्लास्टिक स्वयं में केवल हानिकारक पदार्थ नहीं है. समस्या उसके अनियंत्रित उपयोग से पैदा होती है. खराब कचरा प्रबंधन इसे और गंभीर बनाता है.

प्लास्टिक ने चिकित्सा और उद्योग को महत्वपूर्ण लाभ दिए हैं. खाद्य संरक्षण में भी इसकी उपयोगिता है. इसलिए पूर्ण उन्मूलन व्यावहारिक लक्ष्य नहीं है.

लक्ष्य अनावश्यक प्लास्टिक को समाप्त करना होना चाहिए. आवश्यक प्लास्टिक का बेहतर प्रबंधन होना चाहिए. उत्पादों को पुनः उपयोग योग्य बनाया जाना चाहिए. पुनर्चक्रण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना चाहिए.

सरकार अकेले यह कार्य नहीं कर सकती. उद्योग अकेले भी समाधान नहीं दे सकता. केवल उपभोक्ताओं को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है.

व्यक्ति को अपना उपभोग बदलना होगा. समुदाय को पृथक्करण और संग्रहण सुधारना होगा. उद्योग को टिकाऊ डिजाइन अपनाना होगा. सरकार को नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन करना होगा.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी उतना ही आवश्यक है. प्लास्टिक नदियों और महासागरों के साथ सीमाएँ पार करता है. इसलिए इसका समाधान भी सीमाओं से परे होना चाहिए.

आने वाले वर्षों का मुख्य प्रश्न स्पष्ट है. मानवता प्लास्टिक का उपयोग कैसे करती है? और उपयोग के बाद उसका क्या करती है?

यदि उत्पादन, उपयोग और निपटान तीनों बदलते हैं, समाधान संभव है. सर्कुलर अर्थव्यवस्था इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

प्लास्टिक प्रदूषण मानव निर्मित समस्या है. इसलिए इसका समाधान भी मानव प्रयासों से संभव है.

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