क्रिप्टोग्राफी सूचना और संचार को सुरक्षित करने का तकनीक है. इसका उद्देश्य सुचना को गोपनीय रखना होता है. इसके उपयोग से सिर्फ सन्देश भेजने वाले और इसे प्राप्त करने वाले ही सुचना को समझ और संसाधित कर पाते है. इस प्रकार सुचना तक अनधिकृत पहुँच को रोक दिया जाता है. अंग्रेजी शब्द क्रिप्ट का अर्थ होता है गोपनीय या छिपा हुआ. वहीं, ग्राफी का अर्थ है लिखना. इस प्रकार गोपनीय लेखन की कला को ‘क्रिप्टोग्राफी’ है. यह डार्क वेब के माध्यम से भेजे जाने वाले कूट संदेशों के समान प्रतीत हो सकता है.
आधुनिक कम्प्यूटर विज्ञान में इस तकनीक का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है. क्रिप्टोग्राफी में जानकारी की सुरक्षा के लिए जिन तकनीकों का उपयोग किया जाता है, वे गणितीय अवधारणाओं और नियमों पर आधारित गणनाओं के एक सेट से प्राप्त की जाती हैं. इन्हें एल्गोरिदम (Algorithms) के रूप में जाना जाता है. इस तकनीक के माध्यम से संदेशों को इस तरीकों से परिवर्तित कर दिया जाता है, जिससे इसे डिकोड करना कठिन हो जाता है.
इन एल्गोरिदम का उपयोग क्रिप्टोग्राफ़िक कुंजी उत्पादन (Cryptographic Key Generation), डिजिटल हस्ताक्षर, गोपनीय डेटा की सुरक्षा के लिए सत्यापन, इंटरनेट पर सुरक्षित वेब ब्राउज़िंग और क्रेडिट या डेबिट कार्ड से लेनदेन की सुरक्षा के लिए किया जाता है.
क्रिप्टोग्राफी (Cryptography) क्या है?
क्रिप्टोग्राफी (Cryptography) सूचना और डेटा को अनधिकृत पहुँच से सुरक्षित रखने की तकनीक है. इसमें Encryption, Decryption, Hashing और Cryptographic Keys जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है. इसका इस्तेमाल सुरक्षित इंटरनेट संचार, डिजिटल हस्ताक्षर, ऑनलाइन बैंकिंग, पासवर्ड सुरक्षा और अन्य डिजिटल सेवाओं में किया जाता है.
Cryptography कैसे काम करती है?
आज Internet Banking, Digital Payments, E-commerce, Online Communication, Cloud Services और सरकारी Digital Platforms पर संवेदनशील Data का आदान-प्रदान होता है. इस Data को अनधिकृत पहुँच, छेड़छाड़, पहचान की चोरी और अन्य Cyber Threats से सुरक्षित रखने में Cryptography महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
Cryptography केवल Encryption नहीं है. इसमें Cryptographic Algorithms, Keys, Hash Functions, Message Authentication, Digital Signatures, Key Exchange, Digital Certificates, Protocols और Key Management जैसी तकनीकें मिलकर काम करती हैं. इनका उद्देश्य मुख्यतः Confidentiality, Integrity और Authentication जैसी Security Requirements को पूरा करना है.
सरल रूप में:
Data → Algorithm + Key → Encryption / Hashing / Signature → Secure Transmission → Verification / Decryption → Data
Plaintext, Ciphertext और Key
Plaintext (प्लेनटेक्स्ट) मूल Data या Message है, जिसे सामान्य रूप से पढ़ा जा सकता है. उदाहरण के लिए, “Hello” एक Plaintext है.
Ciphertext (सिफरटेक्स्ट) Encryption के बाद प्राप्त कूटबद्ध Data है. इसका स्वरूप Algorithm, Key और अन्य Parameters पर निर्भर करता है. सुरक्षित System में उचित Key के बिना मूल Data प्राप्त करना Computationally कठिन बनाया जाता है.
Key (कुंजी) एक Cryptographic Value है, जिसका उपयोग Encryption, Decryption, Authentication और अन्य Cryptographic Operations में किया जाता है. Symmetric Cryptography में सामान्यतः एक Secret Key का उपयोग होता है, जबकि Asymmetric Cryptography में Public Key और Private Key की जोड़ी होती है.
Plaintext → Encryption + Key → Ciphertext → Decryption + Key → Plaintext
Cryptographic Algorithms
Cryptography में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग Algorithms होते हैं. AES और ChaCha20 Symmetric Encryption के उदाहरण हैं. RSA और ECC Public-Key Cryptography से संबंधित हैं. SHA-2 और SHA-3 Cryptographic Hash Functions हैं. Algorithm यह निर्धारित करता है कि Data और Key पर कौन-सी Mathematical प्रक्रिया लागू होगी.
आधुनिक Cryptography में Algorithm को Secret रखना आवश्यक नहीं है. Secret Key की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है.
Encryption और Decryption
Encryption Plaintext को Algorithm और Key की सहायता से Ciphertext में बदलता है. इसका प्रमुख उद्देश्य Confidentiality (गोपनीयता) है.
Decryption अधिकृत पक्ष को उपयुक्त Key और Algorithm की सहायता से Ciphertext से Plaintext प्राप्त करने देता है. Symmetric और Asymmetric Cryptography में Keys और प्रक्रियाएँ अलग हो सकती हैं.
Plaintext → Encryption → Ciphertext → Decryption → Plaintext
Encryption अपने आप Data की Integrity या Sender Authentication सुनिश्चित नहीं करता. इसके लिए अन्य Cryptographic Mechanisms की आवश्यकता हो सकती है.
Hash Function और Data Integrity
Hash Function किसी भी आकार के Data को निश्चित लंबाई के Hash Value या Digest में बदलता है. इसे मूल Data में सीधे वापस बदलने के लिए Design नहीं किया जाता.
SHA-256 और SHA-3 इसके प्रमुख उदाहरण हैं. Data में परिवर्तन होने पर सामान्यतः उसका Hash भी बदल जाता है. इसलिए Hashing का उपयोग Data Integrity Verification, Digital Signatures और अन्य Cryptographic Applications में होता है.
Data → Hash Function → Hash/Digest
Encryption → Confidentiality
Hashing → Data Integrity के लिए Digest
MAC और Message Authentication
MAC (Message Authentication Code) Secret Key की सहायता से Message की Integrity और Authenticity जांचने में मदद करता है. HMAC इसका एक प्रमुख प्रकार है. MAC से यह जांचने में सहायता मिलती है कि Message में अनधिकृत बदलाव नहीं हुआ और वह संबंधित Secret Key रखने वाले पक्ष से आया है.
Authenticated Encryption
आधुनिक Systems में केवल Encryption पर्याप्त नहीं होता. Authenticated Encryption Confidentiality के साथ Integrity और Authenticity भी प्रदान करता है.
AES-GCM और ChaCha20-Poly1305 इसके प्रमुख उदाहरण हैं.
Encryption + Authentication/Integrity → Authenticated Encryption
Key Exchange और Key Establishment
Secure Communication में दो पक्षों के बीच Cryptographic Key को सुरक्षित रूप से स्थापित करना आवश्यक हो सकता है. Diffie–Hellman (DH) और ECDH इसके प्रमुख उदाहरण हैं. इनके माध्यम से Shared Secret स्थापित किया जा सकता है.
Key Exchange का उद्देश्य सामान्यतः Data को सीधे Encrypt करना नहीं, बल्कि आगे के Secure Communication के लिए Cryptographic Key स्थापित करना है.
Digital Signature
Digital Signature Public-Key Cryptography पर आधारित है. इसका उपयोग Digital Message या Document की Authentication, Integrity और Non-repudiation में सहायता के लिए किया जाता है.
सामान्यतः Message का Cryptographic Hash तैयार किया जाता है. Signer अपनी Private Key से Signature बनाता है और Receiver संबंधित Public Key से उसे Verify करता है.
Message → Hash → Private Key से Signature → Verification → Public Key
Encryption → Confidentiality
Digital Signature → Authentication + Integrity + Non-repudiation
Random Number Generation
Cryptography में मजबूत और अप्रत्याशित Random Values आवश्यक हैं. CSPRNG (Cryptographically Secure Pseudorandom Number Generator) का उपयोग Cryptographic Keys, Nonces और अन्य Security Parameters के निर्माण में किया जा सकता है.
यदि Random Values अनुमान लगाने योग्य हों, तो मजबूत Algorithm के बावजूद पूरा System कमजोर हो सकता है.
PKI और Digital Certificates
PKI (Public Key Infrastructure) Public-Key Cryptography को व्यवस्थित और प्रबंधित करने की व्यवस्था है. इसमें Public/Private Keys, Digital Certificates, Certificate Authorities और Certificate Validation शामिल होते हैं.
Digital Certificate किसी Public Key को Website या Organization जैसी Entity से जोड़ता है. Certificate Authority (CA) Certificate जारी करने और उसकी विश्वसनीयता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. HTTPS में Browser Website के Certificate की जांच कर सकता है.
TLS और Secure Communication
TLS (Transport Layer Security) Network Communication को सुरक्षित करने वाला Cryptographic Protocol है. HTTPS इसका प्रमुख उपयोग है.
TLS Connection में Authentication, Key Establishment और Cryptographic Algorithms का चयन होता है. इसके बाद Application Data को Symmetric Encryption और Authentication/Integrity Mechanisms से सुरक्षित किया जाता है.
Client ↔ TLS Handshake ↔ Authentication + Key Establishment ↔ Secure Encrypted Communication
Key Management
मजबूत Algorithm के साथ Key Management भी आवश्यक है. इसमें Keys को Generate, Store, Distribute, Use, Rotate, Backup, Revoke और Destroy करना शामिल है.
यदि Secret Key चोरी हो जाए या सही तरीके से सुरक्षित न हो, तो मजबूत Encryption Algorithm भी Data को सुरक्षित नहीं रख सकता.
Hardware Security
महत्वपूर्ण Cryptographic Keys को HSM (Hardware Security Module), TPM (Trusted Platform Module) और Secure Element जैसे Hardware में सुरक्षित रखा जा सकता है. ये Keys की सुरक्षा और कुछ Cryptographic Operations को सुरक्षित Hardware Environment में करने में सहायता करते हैं. Banking, Payment Systems, Government Infrastructure और Enterprise Security में इनका महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है.
Post-Quantum Cryptography (PQC)
भविष्य के शक्तिशाली Quantum Computers वर्तमान Public-Key Systems, विशेषकर RSA और ECC, के लिए संभावित खतरा बन सकते हैं. इसलिए Post-Quantum Cryptography (PQC) ऐसे Cryptographic Algorithms विकसित करने पर केंद्रित है, जो संभावित Quantum Attacks के विरुद्ध सुरक्षित रहें.
Cryptography का पूरा कार्य-प्रवाह
वास्तविक Secure Communication में ये Technologies एक साथ काम कर सकती हैं. उदाहरण के लिए, HTTPS में Digital Certificate और Public-Key Cryptography Server Authentication में, Key Establishment Session Key तैयार करने में और Authenticated Encryption वास्तविक Data को सुरक्षित रखने में सहायता करता है.
Identity Verification
↓
Digital Certificate / Public-Key Cryptography
↓
Key Exchange / Key Establishment
↓
Session Key
↓
Authenticated Encryption
↓
Secure Data Transmission
↓
Integrity और Authenticity Verification
↓
Decryption
↓
Original Data
इस प्रकार, Cryptography किसी एक Algorithm या Technology का नाम नहीं है. यह Algorithms, Keys, Hashing, Authentication, Digital Signatures, Key Exchange, Certificates, Protocols और Key Management जैसी तकनीकों का Security Ecosystem है, जो Digital Data और Communication को सुरक्षित बनाने में मिलकर काम करता है.

आधुनिक Cryptography
आधुनिक Cryptography में डेटा की सुरक्षा के लिए कई उन्नत तकनीकों और Algorithms का उपयोग किया जाता है. Symmetric Cryptography में AES और ChaCha20 जैसे Algorithms एक Secret Key की सहायता से डेटा को Encrypt और Decrypt करते हैं. वहीं Asymmetric Cryptography में RSA और ECC जैसी तकनीकों में Public Key तथा Private Key का उपयोग किया जाता है, जिनका प्रयोग सुरक्षित संचार, Key Exchange और Digital Signature में किया जाता है. इसके अलावा SHA-2 और SHA-3 जैसे Hash Functions डेटा की अखंडता (Integrity) सुनिश्चित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं.
इंटरनेट पर सुरक्षित संचार के लिए TLS, संदेशों की सुरक्षा के लिए End-to-End Encryption और दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता के लिए Digital Signature महत्वपूर्ण हैं. भविष्य में Quantum Computers पारंपरिक Cryptographic Algorithms के लिए चुनौती बन सकते हैं, इसलिए ऐसे Algorithms विकसित किए जा रहे हैं जो Quantum Computing के संभावित हमलों का सामना कर सकें; इन्हें Post-Quantum Cryptography (PQC) कहा जाता है.
AES (Advanced Encryption Standard)
AES एक Symmetric-Key Encryption Algorithm है, जो 128-बिट Data Block पर कार्य करता है और 128, 192 तथा 256-बिट Keys का उपयोग करता है. यह DES के स्थान पर व्यापक रूप से अपनाया गया आधुनिक Encryption Standard है.
ChaCha20
ChaCha20 एक Symmetric Stream Cipher है, जो सामान्यतः 256-बिट Key और 96-बिट Nonce का उपयोग करता है. यह Software-based Systems में तेज और सुरक्षित Encryption के लिए उपयोगी है तथा TLS जैसी आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों में प्रयुक्त होता है.
RSA (Rivest–Shamir–Adleman)
RSA एक Asymmetric/Public-Key Cryptography Algorithm है, जिसमें Public Key और Private Key की जोड़ी होती है. इसका उपयोग Encryption, Key Establishment और Digital Signatures में किया जा सकता है. इसकी सुरक्षा बड़े पूर्णांकों के Factorization को कठिन बनाने पर आधारित है.
ECC (Elliptic Curve Cryptography)
ECC एक Public-Key Cryptography तकनीक है, जो Elliptic Curve Mathematics पर आधारित है. यह समान स्तर की Security के लिए RSA की तुलना में छोटी Keys का उपयोग कर सकती है. इसका उपयोग मुख्यतः Digital Signatures और Key Exchange में होता है.
Hash Function
Hash Function Data को एक निश्चित लंबाई के Hash Value/Digest में बदलता है. इसे मूल Data में सीधे वापस बदलने के लिए डिजाइन नहीं किया जाता. इसका प्रमुख उपयोग Data Integrity, Digital Signatures और अन्य Cryptographic Applications में होता है.
SHA-2 (Secure Hash Algorithm 2)
SHA-2 एक Cryptographic Hash Function Family है, जिसमें SHA-224, SHA-256, SHA-384 और SHA-512 प्रमुख Variants हैं. इसका उपयोग Data Integrity, Digital Signatures और Certificates जैसी प्रणालियों में किया जाता है.
SHA-3 (Secure Hash Algorithm 3)
SHA-3 Keccak-based Hash Function Family है और इसकी संरचना SHA-2 से अलग है. इसके प्रमुख Variants SHA3-224, SHA3-256, SHA3-384 और SHA3-512 हैं. इसका उपयोग Data Integrity और अन्य Cryptographic Applications में किया जाता है.
Digital Signature
Digital Signature Public-Key Cryptography पर आधारित है. इसमें Private Key से Signature बनाया और Public Key से Verify किया जाता है. इसका उद्देश्य मुख्यतः Authentication, Integrity और Non-repudiation सुनिश्चित करना है.
TLS (Transport Layer Security)
TLS Network Communication को सुरक्षित करने वाला Cryptographic Protocol है. यह Authentication, Key Establishment और Data Encryption जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग करता है. HTTPS इसका प्रमुख उपयोग है.
Post-Quantum Cryptography (PQC)
PQC का उद्देश्य ऐसे Cryptographic Algorithms विकसित करना है जो भविष्य के शक्तिशाली Quantum Computers से संभावित हमलों के विरुद्ध सुरक्षित रहें. इसका लक्ष्य वर्तमान Cryptographic Infrastructure को Quantum Computing के संभावित खतरे के लिए तैयार करना है.
SSL और TLS क्या है?
SSL (Secure Sockets Layer) और TLS (Transport Layer Security) नेटवर्क पर डेटा को सुरक्षित रूप से भेजने के लिए उपयोग किए जाने वाले Cryptographic Protocols हैं. इनका उद्देश्य संचार के दौरान डेटा की गोपनीयता (Confidentiality), अखंडता (Integrity) और Authentication सुनिश्चित करना है.
SSL इसका पुराना संस्करण है, जबकि TLS इसका अधिक सुरक्षित और आधुनिक उत्तराधिकारी है. आज इंटरनेट पर सुरक्षित संचार के लिए मुख्यतः TLS का उपयोग किया जाता है. HTTPS, HTTP और TLS के संयोजन से सुरक्षित वेब संचार प्रदान करता है.
आधुनिक क्रिप्टोग्राफी का इतिहास (History of Modern Cryptography)
कूट में बातीचीत का इतिहास सदियों पुराना है. 1900 ईसा पूर्व में प्राचीन मिस्त्र में इसके उपयोग का सबूत मिलता है. प्राचीन ग्रीस और रोम में भी इसके उपयोग का पता चलता है.
प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों की सेना की जीत में क्रिप्टोग्राफी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. द्वितीय विश्व युद्ध में इलेक्ट्रोमैकेनिकल सिफर मशीनों का उपयोग प्रमुखता से किया गया. विश्व प्रसिद्ध एनिग्मा मशीन के मदद से मित्र राष्ट्रों की हिटलर पर विजय की कहानी सर्वविदित है.
डेटा एन्क्रिप्शन मानक (डीईएस)
1970 के दशक की शुरुआत में, आईबीएम को एहसास हुआ कि उसका ग्राहक डेटा की सुरक्षा के लिए विशेष एन्क्रिप्शन विधि का अनुरोध कर रहे है. उन्होंने होर्स्ट-फ़िस्टेल की अध्यक्षता में एक क्रिप्टो समूह का गठन किया. इस समूह ने लूसिफ़ेर नामक एक सिफर डिज़ाइन किया. 1973 में अमेरिका के राष्ट्र मानक ब्यूरो (एनबीएस) जिसे अब राष्ट्रीय मानक और प्रौद्योगिकी संस्थान (NIST) के नासे से जाना जाता है, ने ब्लॉक सिफर के लिए एक प्रस्ताव रखा. लूसिफ़ेर को अंततः स्वीकार कर लिया गया. इसे डेटा एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड (DES) नाम दिया गया.
यह फिस्टेल सिफर पर आधारित एक सममित-कुंजी एल्गोरिदम है. इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक डेटा के एन्क्रिप्शन के लिए किया जाता है. इसमें प्रभावी कुंजी आकार 56 बिट्स का होता है, जबकि प्रत्येक डेटा ब्लॉक का आकार 64 बिट्स होता है. DES एक समय में 64-बिट डेटा ब्लॉक को एन्क्रिप्ट करता है. 1997 में एक खोज हमले से इसे भेद दिया गया. इसके बाद इसका उपयोग बंद कर दिया गया. इसके छोटे आकार के कारण इसमें सेंध लगा दिया गया था.
एडवांस एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड (एईएस)
1997 में, NIST ने फिर से एक नए ब्लॉक सिफर के लिए एक प्रस्ताव रखा. इसके बाद रिजेंडेल सिफर को स्वीकार कर लिया गया. साथ ही इसका नाम बदलकर उन्नत एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड (एईएस) कर दिया गया. इस तरह 2001 में DES को एडवांस एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड या AES द्वारा प्रतिस्थापित किया गया. डीईएस के विपरीत, एईएस प्रतिस्थापन-क्रमपरिवर्तन नेटवर्क (Substitution-Permutation Network) पर आधारित है.
एईएस रिजेंडेल का एक उप-समूह है. यह विभिन्न कुंजी और ब्लॉक आकार वाले सिफर का एक परिवार है. एईएस के मामले में, ब्लॉक का आकार 128 बिट्स या 16 अक्षर है जिसका अर्थ है कि एक समय में 16 अक्षर एन्क्रिप्ट किए जा सकते हैं. यह तीन अलग-अलग कुंजी आकार वेरिएंट के साथ आता है: 128 बिट्स, 192 बिट्स और 256 बिट्स.
क्रिप्टोग्राफी में उपयोग होने वाली तकनीकें (Techniques used For Cryptography)
आज के समय क्रिप्टोग्राफी में अधिकाँश एन्क्रिप्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक के कारण हमारे भाषा के शब्द कूटभाषा में बदल जाते है, जिसे सिफर पाठ (Cipher Text) कहा जाता है. यह इस तरह से कुटित होता है कि वास्तविक प्राप्तकर्ता ही इसे सामान्य भाषाई शब्दों में बदल सकता है यानि डिकोड कर सकता है. किसी भी इन्क्रिप्शन को सामान्य भाषा में बदलने की प्रक्रिया डिक्रिप्शन कहा जाता है.
क्रिप्टोग्राफी की विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- गोपनीयता: सूचना तक केवल वही व्यक्ति पहुंच सकता है जिसके लिए वह अभिप्रेषित है. इसके अलावा कोई अन्य व्यक्ति उस तक नहीं पहुंच सकता है.
- सत्यनिष्ठा: प्रेषक और इच्छित प्राप्तकर्ता के बीच सूचना को भंडारण या संक्रमण में संशोधन नहीं किया जा सकता है. इससे सुचना के सत्यता पर भरोसा किया जा सकता है.
- स्वतः-स्वीकारोक्ति: सूचना का भेजने वाला बाद में सूचना भेजने से इनकार नहीं कर सकता है.
- प्रमाणीकरण: प्रेषक और प्राप्तकर्ता की पहचान की पुष्टि की जाती है. साथ ही जानकारी के गंतव्य और उत्पत्ति की पुष्टि की जाती है. इस प्रकार इस तकनीक से भेजे गए सुचना प्रमाणिक माने जाते है.
क्रिप्टोग्राफी के प्रकार:
सामान्य तौर पर क्रिप्टोग्राफी तीन प्रकार की होती है:
- सममित कुंजी (Symmetric Key): यह एक एन्क्रिप्शन प्रणाली है. इसमें संदेश भेजने वाले और प्राप्तकर्ता संदेशों को एन्क्रिप्ट और डिक्रिप्ट करने के लिए एक ही सामान्य कुंजी का उपयोग करते हैं. यह प्रणाली तेज और सरल है. लेकिन, सन्देश भेजने वाले और प्राप्तकर्ता को सुरक्षित तरीके से कुंजी का आदान-प्रदान करना पड़ता है. डेटा एन्क्रिप्शन सिस्टम (DES) और उन्नत एन्क्रिप्शन सिस्टम (AES) इसके ख़ास उदाहरण है.
- हैश फ़ंक्शंस: (Hash Functions) इस एल्गोरिदम में किसी भी कुंजी का उपयोग नहीं होता है. निश्चित लंबाई वाले हैश मान की गणना सादे पाठ के अनुसार की जाती है. इससे सादे पाठ की सामग्री को पुनर्प्राप्त करना असंभव हो जाता है. कई ऑपरेटिंग सिस्टम पासवर्ड एन्क्रिप्ट करने के लिए हैश फ़ंक्शन का उपयोग करते हैं.
- असममित कुंजी (Asymmetric Key): इस प्रणाली के तहत जानकारी को एन्क्रिप्ट और डिक्रिप्ट करने के लिए कुंजी की एक जोड़ी का उपयोग किया जाता है. प्राप्तकर्ता के सार्वजनिक कुंजी का उपयोग एन्क्रिप्शन के लिए और प्राप्तकर्ता के ही निजी कुंजी का उपयोग डिक्रिप्शन के लिए किया जाता है. सार्वजनिक कुंजी और निजी कुंजी अलग-अलग होते हैं. भले ही सार्वजनिक कुंजी हर किसी को पता हो, लेकिन निजी कुंजी सिर्फ इच्छित प्राप्तकर्ता को ही मालुम होता है. इस प्रकार सिर्फ प्राप्तकर्ता ही इसे डिकोड कर सकता है. सबसे लोकप्रिय असममित कुंजी क्रिप्टोग्राफी एल्गोरिदम आरएसए एल्गोरिदम ((RSA algorithm) है.
हैश फ़ंक्शन, सममित और असममित एल्गोरिदम के बीच अंतर:
| विशेषता | हैश फ़ंक्शन | सममित एल्गोरिदम | असममित एल्गोरिदम |
|---|---|---|---|
| कुंजी की संख्या | 0 | 1 | 2 |
| एनआईएसटी द्वारा अनुशंसित कुंजी की लंबाई | 256 बिट्स | 128 बिट्स | 2048 बिट्स |
| उदाहरण | SHA-256, SHA3-256, SHA-512 | एईएस या 3डीईएस | आरएसए, डीएसए, ईसीसी |
क्रिप्टोग्राफी के अनुप्रयोग (Uses of Cryptography)

- कंप्यूटर पासवर्ड: कंप्यूटर सुरक्षा में क्रिप्टोग्राफी का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है. पासवर्ड बनाने और बनाए इस सुरक्षा कवच को बनाए रखने में इसका ख़ास इस्तेमाल किया जाता है. जब कोई उपयोगकर्ता लॉग इन करता है, तो उसका पासवर्ड हैश किया जाता है. इस हैश की तुलना पहले संग्रहीत हैश से की जाती है. सिस्टम में पासवर्ड को संग्रहीत करने से पहले हैश और एन्क्रिप्ट किया जाता है. इस तकनीक में, पासवर्ड एन्क्रिप्ट किए जाते हैं ताकि अगर कोई हैकर पासवर्ड डेटाबेस तक पहुंच प्राप्त कर ले, तो भी वह पासवर्ड नहीं पढ़ सके.
- डिजिटल मुद्राएँ: लेनदेन को सुरक्षित रखने और धोखाधड़ी को रोकने के लिए, बिटकॉइन जैसी डिजिटल मुद्राएँ भी क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती हैं. लेनदेन को सुरक्षित रखने के लिए जटिल एल्गोरिदम और क्रिप्टोग्राफ़िक कुंजियों का उपयोग किया जाता है. इससे लेनदेन के साथ छेड़छाड़ करना या जालसाजी करना लगभग कठिन हो जाता है।
- सुरक्षित वेब ब्राउजिंग: क्रिप्टोग्राफी का उपयोग ऑनलाइन ब्राउजिंग को सुरक्षित करने में किया जाता है. इससे उपयोगकर्ताओं को बातचीत गोपनीय रखने में मदद मिलता है और बीच-बीच में होने वाले हमलों से सुरक्षित रहता है. सार्वजनिक कुंजी का उपयोग सिक्योर सॉकेट लेयर (SSL) और ट्रांसपोर्ट लेयर सिक्योरिटी (TSL) प्रोटोकॉल द्वारा वेब सर्वर और क्लाइंट के बीच डेटा के आदान-प्रदान को एन्क्रिप्ट करने और संचार के लिए एक सुरक्षित चैनल स्थापित करने के लिए किया जाता है.
- इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर: इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर हस्तलिखित हस्ताक्षर के डिजिटल समकक्ष के रूप में कार्य करते हैं. इसका उपयोग दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए किया जाता है. डिजिटल हस्ताक्षर क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करके बनाए जाते हैं और सार्वजनिक कुंजी क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करके मान्य किए जा सकते हैं. कई देशों में, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर कानून द्वारा लागू किया गया है. इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. भारत भी इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर को मान्यता डेटा है.
- प्रमाणीकरण: क्रिप्टोग्राफी का उपयोग कई अलग-अलग स्थितियों में प्रमाणीकरण के लिए किया जाता है. बैंक खाते तक पहुँचते समय, कंप्यूटर में लॉग इन करते समय या सुरक्षित नेटवर्क का उपयोग करते समय इसी तकनीक से प्रमाणीकरण किया जाता है. उपयोगकर्ता की पहचान और उसके संसाधन तक आवश्यक पहुंच के अधिकार की पुष्टि में क्रिप्टोग्राफ़िक तरीकों को प्रमाणीकरण प्रोटोकॉल द्वारा नियोजित किया जाता है.
- क्रिप्टोकरेंसी: लेनदेन को सुरक्षित रखने, धोखाधड़ी को विफल करने और नेटवर्क की अखंडता को बनाए रखने के लिए बिटकॉइन और एथेरियम जैसी क्रिप्टोकरेंसी द्वारा क्रिप्टोग्राफी का भारी उपयोग किया जाता है. लेनदेन को सुरक्षित रखने के लिए जटिल एल्गोरिदम और क्रिप्टोग्राफ़िक कुंजियों का उपयोग किया जाता है, जिससे लेनदेन के साथ छेड़छाड़ करना या जालसाजी करना लगभग कठिन हो जाता है.
- एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन: एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का उपयोग वीडियो वार्तालाप, त्वरित संदेश और ईमेल जैसे दो-तरफ़ा संचार की सुरक्षा के लिए किया जाता है. भले ही संदेश एन्क्रिप्ट किया गया हो, यह आश्वस्त करता है कि केवल इच्छित प्राप्तकर्ता ही संदेश पढ़ सके. व्हाट्सएप और सिग्नल जैसे संचार ऐप्स में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है. यह उपयोगकर्ताओं के लिए उच्च स्तर की सुरक्षा और गोपनीयता प्रदान करता है.
क्रिप्टोग्राफी के लाभ (Benefits of Cryptography)
- अभिगमन नियंत्रण (Access Control): क्रिप्टोग्राफी का उपयोग अभिगमन नियंत्रण के लिए किया जा सकता है. इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल उचित अनुमति वाले लोगों के पास ही संसाधन तक पहुंच हो. इस तरह केवल सही डिक्रिप्शन कुंजी वाले लोग ही एन्क्रिप्शन की बदौलत संसाधन तक पहुंच सकते हैं.
- सुरक्षित संचार: सुरक्षित ऑनलाइन संचार के लिए क्रिप्टोग्राफी महत्वपूर्ण है. यह इंटरनेट पर कई निजी जानकारियां, जैसे पासवर्ड, बैंक खाता संख्या और अन्य संवेदनशील डेटा के आदान-प्रदान में सुरक्षित तंत्र प्रदान करता है.
- साइबर हमलों से सुरक्षा: क्रिप्टोग्राफी विभिन्न प्रकार के साइबर हमलों से बचाव में सहायता करती है. यह इन हमलों का पता लगाने और उन्हें रोकने के लिए रणनीतियाँ प्रदान करता है.
- कानूनी अनुपालन: क्रिप्टोग्राफी कंपनियों को डेटा सुरक्षा और गोपनीयता कानून सहित विभिन्न कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता कर सकती है.
क्रिप्टोग्राफी के नुकसान (Disadvantages of Cryptography)
- जटिलता: क्रिप्टो-शब्दावली जटिल और समझने में कठिन हो सकती है, जो प्रभावी संचार में बाधा बन सकती है.
- शब्दजाल: क्रिप्टो-शब्दावली को उन लोगों द्वारा शब्दजाल के रूप में देखा जा सकता है जो शब्दावली से परिचित नहीं हैं, जिससे भ्रम और गलत संचार हो सकता है.
- अस्पष्टता: क्रिप्टो-शब्दावली का उपयोग क्रिप्टोग्राफ़िक तकनीकों की वास्तविक प्रकृति को अस्पष्ट करने के लिए किया जा सकता है. यह उन स्थितियों में चिंता का विषय हो सकता है, जहां पारदर्शिता और खुलापन महत्वपूर्ण है.
- पहुंच: क्रिप्टो-शब्दावली उन लोगों के लिए पहुंच योग्य नहीं हो सकती है जो इस क्षेत्र के विशेषज्ञ नहीं हैं. यह गैर-विशेषज्ञों की क्रिप्टोग्राफी के बारे में समझने और चर्चा में योगदान करने की क्षमता को सीमित कर सकता है.



